Saturday, 26 January 2019

दोस्तों की दोस्ती का अपना ही नशा है


चार दशकों की जीवन-यात्रा के बाद पलट कर देखते हैं तो बहुत से पलों का साथ रहना दिखता है. बहुत से अवसरों का पीछे छूट जाना दिखाई देता है. अनेकानेक जाने-अनजाने लोगों से मिलना-बिछड़ना इस यात्रा में बना रहा. हँसना-मुस्कुराना, लड़ना-झगड़ना, तर्क-वितर्क के न जाने कितने पड़ावों के बीच लोगों का साथ मिलता रहा, बहुतों का साथ छूटता रहा. इस यात्रा में अच्छे-बुरे, कड़वे-मीठे अनुभवों का स्वाद चखने को मिला. सपनों का बनना-बिगड़ना बना रहा, वास्तविकता और कल्पना की सत्यता का आभास होता रहा. कई बार जीवन एकदम सरल, जाना-पहचाना लगता तो कई बार अबूझ पहेली की तरह अनजाने रूप में सामने खड़ा हो जाता. अपनी होकर भी बहुत बार यह जीवन-यात्रा अपनी सी नहीं लगती. ऐसा लगता कि चमकती धूप में भी स्याह अँधेरा चारों तरफ हो. चाँदनी बिखरी है मगर उसमें भी तपन महसूस होती. सर्वत्र ख़ुशी के झरने झर रहे हैं पर हम उसमें भीग नहीं पा रहे हैं. सुखों की चादर फैली हुई है पर उसके साये में खुद को खड़ा नहीं कर पा रहे हैं.

यही इस जीवन-यात्रा की अनिश्चितता थी कि जो पल अभी-अभी नकारात्मक सन्देश लेकर आया था, वह अपने साथ सकारात्मकता की चिट्ठी लेकर भी आया था. खाली हाथ होते हुए भी समूची दुनिया मुट्ठी में होने का एहसास खुद को सर्वोच्च पायदान पर ले जाता. तन्हाई के बीच अपना कद ही अनेकानेक व्यक्तित्वों का निर्माण कर मधुर कलरव बिखेरने लगता. अंधेरों के सामने दिखने पर उसको अपने भीतर समेट सबकुछ रौशनी में बदल देने की शक्ति भी प्रस्फुटित होने लगती.

ऐसा क्यों होता है? कब होता है? किस कारण होता है? न जाने कितने सवालों के दोराहों, तिराहों, चौराहों से गुजरते हुए भी यदि कोई जीवन-शक्ति सदा साथ रही तो वह थी हमारे दोस्तों की शक्ति. किसी मोड़ पर अकेलेपन का एहसास यदि किसी ने न होने दिया तो वो था हमारे दोस्तों का साथ. अनेक असफलताओं का सफलता में बदलने का ज़ज्बा विकसित करने वाला कोई था तो वो था दोस्तों का साहचर्य.

ऐसे बहुत सारे दोस्तों में हमारी त्रिमूर्ति अश्विनी उर्फ़ बबलू, अभिनव और संदीप का स्थान सबसे अलग है. इस पुस्तक को पढ़ने के दौरान और पढ़ने के बाद सभी को आश्चर्य हुआ हो कि इन तीनों के बारे में यहाँ कुछ अलग से नहीं लिखा गया. हो रहा है न आपको आश्चर्य? इनके लिए अलग से कैसे कुछ लिखा जा सकता है जबकि ये हमसे अलग हैं ही नहीं. हमारे नामों में अंतर है, देखने में हमारे रंग-रूप, कद-काठी अलग हैं मगर आत्मिक रूप से हम एक ही हैं. क्या-क्या लिखें इनके बारे में? क्या-क्या छोड़ें इनके बारे में? हफ़्तों, महीनों न मिलने के बाद भी ऐसी कोई बात नहीं होती जो हमारे बीच आपस में शेयर न होती हो. अच्छा या बुरा कैसा भी समय रहा हो हम किसी न किसी रूप में एक-दूसरे के साथ बराबर रहे, लगातार रहे.

शादी के पहले की मुलाकातों में अक्सर हम सब इसके लिए चिंतित रहते कि हमारे आने वाले जीवनसाथी हमारे संबंधों का निर्वहन किस तरह से करेंगी? जिस तरह की आत्मीयता हम सबमें आपस में है, क्या वो बनी रहेगी? ऐसी सोच अक्सर हमारी तरफ से ही उछाली जाती और इसका कारण भी हम ही रहते. अपने मजाकिया, कुछ भी कह देने (जिसे आम बोलचाल भाषा में मुंहफट कहा जा सकता है) वाले स्वभाव के चलते हमें स्वयं इसकी चिंता लगी रहती.

कालांतर में सभी की शादी हुई, परिवार का विकास हुआ मगर हम सब आज भी उसी तरह आत्मीय रिश्ते के साथ जुड़े हुए हैं. सबकी पारिवारिक जिम्मेवारियाँ जहाँ की तहाँ और हमरा दोस्ती भरा रिश्ता भी जहाँ का तहाँ. इसके पीछे उन तीनों के जीवनसाथियों क्रमशः गुंजन, नम्रता और सारिका का महत्त्वपूर्ण योगदान है, सहयोग है. हमारा मजाक वैसे का वैसा है, हमारा स्वभाव ज्यों का त्यों है और हम सबके रिश्ते, सम्बन्ध भी ज्यों के त्यों हैं. पारिवारिक रूप से हम सभी आज भी एकसूत्र में बंधे हुए हैं. ऐसे में उन तीनों को एक पुस्तक में समेट पाना हमें अपने वश के बाहर की बात लगी. सच कहा जाये तो उन तीनों सहित अपने दोस्तों के बारे में यदि लिखना शुरू किया जाये तो उसके लिए एक नहीं कई पुस्तकों की रचना करनी पड़ेगी. कुछ सच्ची कुछ झूठी लिखने के साथ ही इस पर भी विचार बना था, जिसे यथाशीघ्र साकार किया जायेगा.

यह हमारी खुस्किस्मती है कि दोस्तों का मिलना हर स्थिति में हुआ. हर परिस्थिति में हुआ. कोई बचपन में स्कूल से मित्र बना तो कोई कॉलेज की शिक्षा के दौरान संपर्क में आया. किसी से उच्च शिक्षा के दौरान बनी मित्रता अभी तक चल रही है तो किसी से सामाजिक कार्यों के दौरान हुआ संपर्क आज तक गहरी दोस्ती के रूप में विद्यमान है. हॉस्टल जीवन में बहुत से मित्रों का आना हमारे जीवन में हुआ. इसमें बहुत से बड़े भाई की तरह अपना आशीर्वाद, स्नेह हम पर लुटाते हैं तो कुछ छोटे भाई की तरह हमें सम्मान देते हैं और कुछ मित्र तो आज भी उसी तरह की बदतमीजियों के साथ हमारे दिल-दिमाग में बसे हैं, जिन बदतमीजियों के साथ हॉस्टल के समय में घुस गए थे.

स्कूल, कॉलेज, हॉस्टल में साथ पढ़ने-रहने के कारण गहरी मित्रता होना स्वाभाविक सी बात है मगर बहुत से मित्र ऐसे हैं जिनसे अल्पकालिक संपर्क हुआ मगर सम्बन्ध दीर्घकालिक, स्थायी बन गए हैं. वे सभी आज भी नियमित संपर्क में हैं. हाँ जी, आपके सवाल दागे जाएँ उससे पहले हम ही बताये देते हैं कि हमारी दोस्ती के इस घेरे में लड़के भी शामिल हैं, लड़कियाँ भी शामिल हैं. अपनी दोस्ती के कैदखाने में कैद करने वाले बहुत सारे मित्र आज भी लगातार हमारे साथ बने हुए हैं. यहाँ सभी को नाम से इंगित न कर पाने की अपनी विवशता है. इसे हमारे सभी मित्रवर समझेंगे और नजरअंदाज करते हुए अपनी दोस्ती से हमेशा की तरह सराबोर करेंगे.

बहरहाल, पुराने दोस्तों की दोस्ती हमेशा पुरानी शराब सा मजा देती रही. नए-नए मित्र अपने नए-नए रंग के साथ इसमें शामिल होकर दोस्ती के नशे को और नशीला बनाते रहे.

Saturday, 12 January 2019

अपनों के पदचिन्हों पर चलने का सुखद एहसास


हमारा प्राथमिक विद्यालय यद्यपि कक्षा आठ तक था किन्तु घर में सभी का निर्णय हुआ कि कक्षा छह से आगे की पढ़ाई के लिए हमारा एडमीशन राजकीय इंटर कॉलेज में करवाया जाये. पुराना चिरपरिचित स्कूल, दोस्त, शिक्षक छूटने का बुरा लग रहा था साथ ही नए स्कूल में जाने की ख़ुशी भी हो रही थी. इसके बीच जीआईसी में एडमीशन को लेकर गर्व मिश्रित ख़ुशी का एहसास भी हो रहा था. ऐसा इसलिए महसूस हो रहा था क्योंकि जीआईसी के आरम्भिक स्वरूप में संचालित स्कूल में हमारे बाबा जी ने भी अध्ययन किया था. उनके समय यह इंटरमीडिएट तक न होकर मिडिल तक ही संचालित होता था. बाबा जी के बाद उसी जीआईसी में हमारे सबसे छोटे भैया चाचा (श्री धर्मेन्द्र सिंह सेंगर) और हमारे बैंगलोर वाले मामा (श्री सुन्दर सिंह क्षत्रिय) ने भी पढ़ाई की थी. ऐसे विद्यालय में अपने पढ़ने का सोचकर ही प्रसन्नता हो रही थी, जहाँ हमारे पूर्वज अध्ययन कर चुके थे. उस समय जीआईसी में प्रवेश परीक्षा के आधार पर एडमीशन मिला करता था. 

प्रवेश परीक्षा देने जाने पर पहली बार जीआईसी की भव्य इमारत को देखा. अंग्रेजी वास्तुकला का प्रतीक वह बुलंद इमारत अपनी भव्यता के साथ सबको एक नजर में सम्मोहित कर जाती थी. हमें भी उसका सम्मोहन अपनी तरफ खींच रहा था मगर एक गौरव के साथ, एक आशीर्वाद के साथ, अपनत्व की भावना के साथ. इमारत में घुसते हुए अपने ही घर में पहुँचने जैसा गौरवान्वित करने वाला एहसास हुआ. ऐसा लगा था जैसे यहाँ से शिक्षित हुए हमारे परिवार के लोग हमें अपना आशीर्वाद दे रहे हों. 

प्रवेश परीक्षा देने के बाद, जब तक पिताजी लेने नहीं आये तब तक पूरी इमारत का एक चक्कर लगाकर, उसकी दीवारें छू-छूकर अपने बुजुर्गों की उपस्थिति को महसूस करने का प्रयास किया. बड़े-बड़े कमरे, बड़ा सा हॉल, खूब लम्बा-चौड़ा मैदान, हरी-भरी बगिया, घने छायादार वृक्ष सब मन मोहने में लगे थे. उस छोटी सी अवस्था में सबको छू-छूकर उनमें महसूस होती अपनों की छवि-खुशबू से एकरूप होने का प्रयास किया. प्रवेश परीक्षा का परिणाम आया और हम वहां के लिए चयनित हो गए. हमारी ख़ुशी की सीमा न रही. 

कक्षा छह से इंटरमीडिएट तक जीआईसी हमारी शिक्षा का केंद्र रहा. वहाँ चयनित होने, प्रवेश लेने की ख़ुशी उस समय और बढ़ गई जबकि पुराने स्कूल के कुछ मित्रों ने भी वहां प्रवेश पा लिया. समय के साथ जीआईसी ने भी बहुत से दोस्त दिए. कुछ पढ़ाई तक साथ रहने के बाद दूर हो गए, कुछ आज तक साथ हैं और कुछ तो परिवार का हिस्सा ही बन गए हैं. समय के साथ आगे बढ़ते रहने, दोस्तों के साथ आगे बढ़ते रहने ने हमारी ज़िन्दगी को और जीवंत बनाया है.

Friday, 11 January 2019

लरिकाई को प्रेम कहौ अलि कैसे छूटत


प्यार, इश्क, प्रेम, दीवानगी, आकर्षण आदि शब्दों का बचपने से कोई तारतम्य नहीं होता है. इन कोमल शब्दों को भारी-भरकम बनाने में समाज के उन लोगों की मुख्य भूमिका होती है जो खुद को बुद्धिजीवी घोषित किये रहते हैं. बचपन तो इन शब्दों की सांसारिक, बौद्धिक परिभाषाओं से इतर अपनी बालसुलभ चंचलता, चपलता से इन्हें संवारता रहता है. उस उम्र में न शारीरिक आकर्षण, न वैचारिक तालमेल, न बौद्धिक विमर्श का भाव रहता है, बस सहगामी क्रियाओं में अपने दोस्तों का साथ ही प्यार, इश्क, दीवानगी माना-समझा जा सकता है. इसमें तब न समलिंगी का प्रभावी होना होता था न ही विपरीतलिंगी का. हमारे साथ भी, हमारी कक्षा में भी ऐसा कुछ था.

छोटे कद की, दुबली-पतली सी लड़की, रंग साफ़, गोल चेहरा, पढ़ने में तेज, दोस्ती करने में आगे. कक्षा में बच्चों की कम संख्या होने के कारण सभी बच्चे शिक्षिकाओं की निगाह में बने रहते थे. इसमें भी कुछेक अपनी सक्रियता से कुछ ज्यादा ही निगाह में बने हुए थे. ऐसे ही चंद बच्चों में वो लड़की भी शामिल थी. परीक्षाओं में, कक्षा में होते टेस्ट में हम दोनों में दौड़ चलती रहती. कभी वो आगे, कभी हम. किसी विषय में वो तेज, किसी में हम. वो सुरीली आवाज़ में गीत गाने में माहिर तो हम जोशीले भाषण देने में पारंगत. कुल मिलाकर एक स्वस्थ प्रतियोगिता होने के साथ-साथ गहरी दोस्ती. कक्षा मॉनिटर से लेकर कई-कई कार्यों में हम दोनों का साथ रहता. मौज-मस्ती, शरारतें-शैतानियाँ एकसाथ स्कूल प्रांगण में टहलती-घूमती दिखतीं. 

दोस्ती का वो छोटा सा सफ़र स्कूल से निकलने के बाद बहुत आगे तक नहीं चला. स्कूल अलग हुआ, विषय बदल गए और उसी के साथ रास्ते भी अलग-अलग हो गए. इसके साथ ही तब के उरई जैसे छोटे शहर की सोच को भी आज बखूबी समझा जा सकता है. कभी-कभार रास्ते चलते, स्कूल से आते-जाते मुलाकात हो जाती तो हाय-हैलो हो जाती. मुस्कान का आदान-प्रदान हो जाता बस. उसका लड़की होना, माता-पिता का सख्त अनुशासन उसे भयभीत किये रहता. हमारी अंतिम मुलाकात हमारे स्नातक अध्ययन के दौरान हुई. चूँकि आपस में कभी प्रेम, इश्क जैसी भावना पली नहीं सो न कभी पत्रों का आदान-प्रदान हुआ. मोबाइल का जन्म उस ज़माने में हुआ भी नहीं था सो न सोशल मीडिया, न कोई मैसेज. वेलेंटाइन डे का पारा भी बहुत बाद में चढ़ना शुरू हुआ, सो दोस्ती से आगे की बात को सोचा भी नहीं गया, न गिफ्ट उपहारों का लेना-देना हुआ.

पता नहीं ऐसी कोई बात बनती भी? पता नहीं दोस्ती का सफ़र किसी और रूप में आगे बढ़ता भी? पता नहीं, के अनिश्चय के साथ वो हमेशा को शहर को छोड़ गई. कहाँ? पता नहीं. किसी से पूछा भी नहीं. आखिर पूछते भी किससे? आखिर पूछते भी क्या? बस याद अब भी है. छवि अब भी बसी है. और यदि यही प्रेम है तो कह सकते हैं कि लरिकाई को प्रेम अलि कहो कैसे छूटे!


Saturday, 5 January 2019

बहती आँखें उसे जाते हुए देखती रहीं


मुलाकात जब पहली बार हुई तो न फिल्मों की तरह पहली नजर वाला आकर्षण उभरा, न पहली नजर के प्रेम जैसा कुछ एहसास हुआ. हाँ, एक तरह का आकर्षण उसके प्रति महसूस हुआ था. उससे मिलना अच्छा सा, सुखद सा लगा था. कुछ दिनों की कुछ मुलाकातें जो हँसी-मजाक के साथ ख़तम हो गईं. हम दोनों की अपनी-अपनी राहें थीं, अध्ययन वालीं, सो आगे चल दिए. पढ़ने को, डिग्री लेने को. पर वो कहते हैं न कि दुनिया गोल है, किसी न किसी दिन फिर मिलते हैं. हम दोनों फिर मिले, अबकी कुछ साल बाद मिले.

पहली बार की मुलाकात के समय के मुकाबले अबकी मुलाकात में हम दोनों कुछ परिपक्व भी थे. इस परिपक्वता में भी पहली नजर के आकर्षण जैसा कुछ न हुआ, न इधर, न उधर. इसके बाद भी वही आकर्षण समझ आया जो पहली मुलाकात में लगा था. वैसा ही अच्छा लगने जैसा, वैसा ही सुखद एहसास जागा था जैसा कि पहली मुलाकात में जागा था. इसके बाद मुलाकातें हुई, कई बार हुईं, नियमित न सही मगर जल्दी-जल्दी हुईं. वैचारिकता के अपने-अपने धरातल निर्मित हो चुके थे. सोचने-समझने की मानसिकता भी विकसित हो चुकी थी. क्या सही है, क्या गलत है की दृष्टि विकसित हो चुकी थी.

ऐसा भी नहीं कि सौन्दर्य बोध का अभाव रहा हो. आँखों में चुम्बकीय आकर्षण, चेहरे पर प्राकृतिक मुस्कान, सादगी का प्रतिरूप. इसके बाद भी महज शारीरिक आकर्षण जैसा कुछ नहीं था. इसका कारण यही रहा कि उसे कभी भी देह के मापदंडों पर नहीं आँका. बहरहाल, समय गुजरता रहा, मुलाकातें चलती रहीं मगर ख़ामोशी उसी तरह बनी रही. उस ख़ामोशी के साए में कुछ स्वर गूँजे. कुछ कहने का प्रयास हुआ.

उस शाम उससे पहली बार मिलना तो हो नहीं रहा था. पहले भी कई-कई बार मुलाकात हो चुकी थी. मिलना-जुलना भले नियमित नहीं होता रहा किन्तु होता रहा था. आपस में बातचीत, हँसी-मजाक, छेड़छाड़, गपशप होती रहती थी किन्तु उस शाम की मुलाकात ने दिल को झंकृत कर दिया. समझ नहीं आ रहा था कि ये प्यार है या फिर जब पहली बार मुलाकात हुई थी, तब जो आकर्षण जागा था, वो प्यार था

बेधड़क किसी से भी कुछ भी कह देने की सामर्थ्य कहीं चुकती सी लगने लगी. बहती नदी के धारे संग-संग भावनाएं बन रही थीं, दोस्त की बाँह थामे हिम्मत बटोरने की कोशिश की जा रही थी. अंततः बहती आँखें उसे जाते हुए देखती रहीं और कभी उसका कहा सत्य साबित हुआ कि आँसू सँभाल कर रखिये, किसी दिन हमारे लिए भी बहाने पड़ेंगे.

Tuesday, 18 December 2018

सोशल मीडिया की उन्मुक्तता


मीडिया के साथ जुड़ाव बचपन से ही रहा है. पिताजी के मित्र दैनिक एलार्म समाचार-पत्र का प्रकाशन उरई से करते थे. उनके साथ पारिवारिक संबंधों के कारण पत्रकारिता को बहुत करीब से देखने का अवसर बचपन से ही मिला है. इसी तरह प्रिंट लाइन में जनपद जालौन में अपनी सबसे अलग स्थान रखने वाले श्री राजाराम गुप्ता जी से भी पारिवारिक सम्बन्ध होने के कारण इस क्षेत्र की बारीकियों को भी बहुत करीब से देखने-समझने का अवसर बचपन से ही मिला. हमारे अभी तक के अभिन्नतम मित्रों में से एक अश्विनी कुमार गुप्ता ‘बबलू’ जो श्री राजाराम गुप्ता जी के नाती हैं, और हम बचपन से अभी तक एक-दूसरे के साये की तरह एक-दूसरे के साथ हैं. 

स्नातक करने के बाद अपने लेखन शौक के कारण खुद भी मीडिया के संपर्क में आये. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से संपर्क हुआ, सम्बन्ध बने. इस मीडिया से संपर्क विस्तार के बाद जब सोशल मीडिया में प्रवेश किया तो पता नहीं था कि उसमें जितनी राहें हैं वे सारी भूलभुलैया की तरह काम करती हैं. जरा सा भटके नहीं कि फिर उसी में खो गए. सोशल मीडिया की राह पर चलना शुरू किया ब्लॉग के माध्यम से जो चलते-चलते कब फेसबुक, व्हाट्सएप्प, ट्विटर आदि तक पहुँच गया, पता ही नहीं चला.

वैचारिक आदान-प्रदान के लिए सर्वोत्तम मंच समझकर यहाँ अपनी उपस्थिति कुछ ज्यादा ही बना ली. इस उपस्थिति के अपने ही परिणाम निकले. बहुत से लोग बौद्धिक विमर्श में सहायक बने, उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला. कुछ लोग सामाजिकता में वृद्धि करते दिखे तो उनसे भी सीखा गया. कुछ लोगों का कार्य पूर्वाग्रह से भरकर सिर्फ वैमनष्यता ही फैलाता दिखा तो कुछ दिन उनसे तर्क-वितर्क की स्थिति के बाद लगा कि ऐसे लोगों से बहस का कोई सार नहीं. सो ऐसे लोगों से किनारा करना ज्यादा उचित समझ आया. और भी तमाम तरह की प्रजातियाँ सोशल मीडिया पर मिलीं.

इन्हीं में से एक प्रजाति ऐसी मिली जिसका काम इनबॉक्स में आकर हाय, हैलो करना, दो-चार बार के बाद उससे भी कई कदम आगे जाकर प्यार का इजहार करना, शारीरिक सम्बन्ध बनाने की चाह व्यक्त करना, न्यूड फोटो भेजना शुरू हो जाता. इस तरह के कृत्य करने के बाद भी इस प्रजाति का दम ये भरना रहता कि हमसे प्रेम करती हैं, दिल की गहराइयों से प्रेम करती हैं, हमारे प्यार में सबकुछ कर गुजर जायेंगी. ऐसे कृत्य में जहाँ कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियाँ शामिल थीं वहीं कई वयस्क महिलाएं भी शामिल रहीं. कुछ का जुड़ना होता पाठ्यक्रम सम्बन्धी चर्चाओं के द्वारा, कुछ का सामाजिक कार्यों में सहयोग की खातिर, कुछ का साहित्यिक क्षेत्र के कारण. दो-चार रोज काम की चर्चाओं, बातचीत के बाद उनका अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया जाता.

ऐसी अनेक प्रोफाइल के लिए सोशल मीडिया पर खुलकर पुरुष-विरोधी अभियान चलाया गया. पुरुषों को खुलकर इसके लिए आरोपी बनाया गया. ये सच हो सकता है कि पुरुष इनबॉक्स में घुसकर बहुतेरी महिलाओं के साथ अशालीन अभिव्यक्ति दर्शाते हों. इसके साथ-साथ यह भी सत्य है कि महिलाओं में भी इस तरह की प्रवृत्ति पाई जाती है. यहाँ बिना किसी दोषारोपण के दोनों पक्षों को समझना होगा कि यौनेच्छा किसी एक व्यक्ति या एक वर्ग के पास नहीं है. किसी के पास कम है तो किसी के पास ज्यादा, मगर इसकी चाह जितनी पुरुष को है, उतनी ही महिला को भी. इसके अलावा सामाजिक बंधनों के बीच पूर्णरूप से स्वतंत्र सोशल मीडिया ने अपनी कामेच्छा को प्रकट करने का आधार प्रदान करवा दिया है. अपने एहसासों को, जज्बातों को दर्शाने का माध्यम प्रदान करवा दिया है. इस निर्बन्धन ने शर्म के बंधन तोड़े हैं, लज्जा के बंधन तोड़े हैं, प्रकटीकरण के द्वार खोले हैं, उन्मुक्तता के द्वार खोले हैं.

तब लगा कि सोशल मीडिया के प्रति लोगों के, विशेष रूप से युवाओं के आकर्षण ने विचारों की अभिव्यक्ति को कितनी स्वतंत्रता दे दी है. विचारों में भी ख़ास तौर से सेक्स सम्बन्धी अभिव्यक्ति को, नग्नता प्रदर्शित करने सम्बन्धी अभिव्यक्ति को. सेक्स की इस उन्मुक्त अभिव्यक्ति के साथ ये सभी लोग, वे चाहे पुरुष हों या स्त्री, किस स्वतंत्रता के पोषक बनेंगे, पता नहीं.

Wednesday, 14 November 2018

आधी रात और खिड़की वाला भूत


रात गहरा चुकी थी और हम मित्रों द्वारा बातों के बताशे बनाने भी बन्द किये जा चुके थे, सो नींद के आगोश में मजबूरीवश जाना ही था. सभी ने विदा ली और अपने-अपने कमरों की ओर चल दिये. ठण्ड के दिन होने के कारण रजाई में घुसते, लेटते ही नींद का आना तो होना नहीं था, दोस्त-यारों के साथ हुई बातों को सोच-सोच मन ही मन हँसते-मुस्कराते सोने का उपक्रम करने लगे. सोचते-विचारते, हँसते-मुस्कराते कब नींद लग गई पता ही नहीं चला.

एकाएक खर्र-खर्र की आवाज ने चौंक कर उठा दिया. हाथ बढ़ा कर मेज पर रखे टेबिल लैम्प को रोशन किया. आवाज बन्द. इधर-उधर, कमरे में निगाह मारी कि कहीं बिल्ली या फिर कोई चूहा आदि न घुस आया हो पर कहीं कुछ नहीं. सपना समझ कर सिर को झटका और टेबिल लैम्प की लाइट को बुझा कर रजाई में फिर से घुस गये. खर्र-खर्र की आवाज आनी फिर शुरू. जैसे ही हाथ बढ़ा कर लाइट जलाई आवाज आनी बन्द.

एक-दो मिनट लाइट को जलने दिया तो आवाज नहीं हुई. अबकी पलंग पर बैठे ही रहे और लाइट बन्द कर दी. जैसे ही रोशनी गई आवाज आनी शुरू हुई. वहीं डरावनी सी खर्र-खर्र. बिना टेबिल लैम्प को जलाये आवाज को सुनने का प्रयास किया कि आ कहाँ से रही है? अगले ही पल समझ में आ गया कि आवाज खिड़की की तरफ से आ रही है. टेबिल लैम्प जलाया तो आवाज आनी बन्द हो गई. लगा कि दोस्त लोग डराना चाह रहे हैं क्योंकि आज हमारे रूम-पार्टनर, राजीव त्रिपाठी भी नहीं थे. उसके होने पर होता भी क्या, हमारे साथ-साथ वो भी डरता. असल में हॉस्टल में किसी न किसी रूप में भूत-प्रेत-चुड़ैल आदि के किस्से सुनाये जाते थे. किसी कमरे को भुतहा बनाया जाता, किसी पेड़ पर भूत का निवास बताया जाता. इससे डर का माहौल बना ही रहता. यह सब लगभग रोज का नियम होता था. आज भी महफिल जमी थी बातों-बातों में डरावने किस्से भी तैर चुके थे.

खिड़की की तरफ मुँह करके एक-दो आवाजें दीं पर कोई आहट भी नहीं मिली. लाइट जलता छोड़कर रजाई ओढ़ कर लेटे पर आवाज नहीं आई. लाइट बन्द की और आवाज आनी शुरू. हम चुपचाप बिना आहट के यह समझने और देखने की कोशिश करने लगे कि कहीं खिड़की पर कोई है तो नहीं? लगभग चार-पाँच मिनट की कोशिश के बाद भी कोई समझ न आया और कोई आहट भी नहीं समझ आई, हाँ, खर्र-खर्र की आवाज लगातार होती रही. अब थोड़ा सा डर लगा. एक तो अकेले होने का डर और ऊपर से हॉस्टल के चर्चित भूतों का डर. हालांकि हमें कभी भी भूत-प्रेत जैसी बातों से डर नहीं लगा किन्तु माहौल का नया-नया होना और फिर रोज-रोज के वहीं किस्सों ने आज मन में डर पैदा कर दिया. हॉस्टल में हम कुछ लोगों के कमरों में विशेष हथियार सुशोभित होते रहते थे. उसी में से एक हथियार पलंग में गद्दे के नीचे से निकाल खुद को मजबूती प्रदान की. आवाज़ होते ही लाइट जलाई और एकदम से कूद कर खिड़की पर आ गये. यह सोचा कि यदि भूतों के हाथों मरना लिखा होगा तो यही सही और यदि दोस्त लोग हैं तो उनको सीधे-सीधे पकड़ा जा सकता है. 

खिड़की से जो देखा उसने डर तो दूर कर दिया पर चौकीदार बाबा के ऊपर गुस्सा ला दिया. चिल्ला कर बाबा को बुलाया. खर्र-खर्र की आवाज को पैदा करने वाला कोई भूत नहीं और न ही हमारे कोई मित्र वगैरह थे. एक गाय हमारे कमरे के ठीक नीचे खड़े होकर वहाँ लगे पेड़ के तने से अपना सींग रगड़ती थी तो खर्र-खर्र की डरावनी सी आवाज होने लगती थी. जैसे ही लाइट जलती वह सींग रगड़ना रोक देती और जैसे ही लाइट बन्द होती वैसे ही उसका सींग पेड़ के तने पर रगड़ना शुरू हो जाता. चौकीदार बाबा ने आकर उस गाय को वहाँ से दूर भगाया और हम भी अपने मन में एक पल को बिठा चुके भूत को भगा कर फिर से रजाई में दुबक गये.

Wednesday, 19 September 2018

कन्या भ्रूण हत्या वाले कुमारेन्द्र


जब काम मनमाफिक न हो तो उसमें मन नहीं लगता. कुछ ऐसा ही हमारे साथ प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर हो रहा था, नौकरी को लेकर हो रहा था. सपना था सिविल सेवा में जाने का मगर वो हकीकत में न बदल सका. किसी और नौकरी के प्रति किसी तरह की दिलचस्पी नहीं थी. प्राइवेट नौकरी का मन अपने स्वभाव के कारण कभी नहीं हुआ. क्या किया जाये, क्या नहीं, इस ऊहापोह में सिर्फ समय ही बर्बाद हो रहा था. इसी तरह के तमाम उतार-चढ़ावों के बीच 1998 में अजन्मी बेटियों को बचाने की मुहिम छेड़ दी. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान इस सम्बन्ध में बहुत से आँकड़े मिले जो निराशा पैदा करते थे. आश्चर्य तब हुआ यह जानकर कि जिले में कार्यरत तमाम स्वयंसेवी संस्थाओं में से कोई भी कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए कार्य नहीं कर रही थी. 

जिले में जब काम शुरू किया तो अपनी तरह का पहला काम होने के कारण हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये, कैसे किया जाये. इसके साथ ही सामान्यजन को भी समझ नहीं आ रहा था कि हम उसके साथ किस मुद्दे पर बात कर रहे हैं. जनता सहयोग करने की इच्छा रख रही थी मगर उसकी समझ से परे था कि सहयोग क्या और कैसे किया जाये? प्रशासन, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, अन्य चिकित्सा अधिकारियों से भी इस सम्बन्ध में कोई सहयोग नहीं मिल रहा था. समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के माध्यम से तमाम जानकारियाँ, आँकड़े जुटाए और जनपद में लोगों को इस बारे में जागरूक करने का प्रयास किया.

इस प्रयास में बहुत से खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए. एक महिला चिकित्सक द्वारा जेल भिजवाने तक की धमकी दी गई.  बुजुर्ग महिलाओं-पुरुषों द्वारा इस बारे में पुरानी धारणाओं पर अडिग रहने की मानसिकता दिखी तो युवाओं द्वारा परिवर्तन करने की सोच परिलक्षित हुई. उसी दौरान महिला चिकित्सालय में एक जागरूकता कार्यक्रम के दौरान लोगों को पीएनडीटी के नियमों, दंड आदि को बताया-समझाया जा रहा था. उसी समय एक बुजुर्ग महिला ने अपना अनोखा सुझाव दिया. उसने कहा कि बेटा, सरकार से कहो कि जिसके दो-तीन बेटियाँ हैं उनको यह जांच फ्री करे कि पेट में लड़का है या लड़की है. उसे पकड़े नहीं, न ही जेल में डाले. जब उस बुजुर्ग महिला को समझाया कि ऐसा करने दिया तो लोग लड़कियों को मार डालेंगे. तमाम तरह के उदाहरणों से उस महिला को समझाया कि बेटियाँ भी अब परिवार का नाम रोशन करती हैं, वंश-वृद्धि करती हैं. बहुत देर तक उस महिला से बात करने पर अंततः उस वृद्ध महिला को एहसास हुआ कि बेटियों को भी जन्म दिया जाना चाहिए. इसके बाद उस महिला ने हमारे सिर पर हाथ फेरकर आशीर्वाद दिया. ऐसे एक-दो नहीं अनेक घटनाएँ इस कार्यक्रम के सञ्चालन में हमारे साथ घटीं.

कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम का आधार हमने इंटरमीडिएट के विद्यार्थियों, महाविद्यालय के विद्यार्थियों, युवाओं को बनाया हुआ था. इसके अलावा एनसीसी और एनएसएस के बच्चों के बीच इस कार्यक्रम को लगातार किया जाता. हमारा मानना है कि यदि नई पीढ़ी जागरूक हो जाये तो आने वाले समय में बेटियों को बोझ समझना अपने आप समाप्त हो जायेगा. इन नवजवानों के साथ-साथ बुजुर्गजनों को भी अपने कार्यक्रम का हिस्सा बनाया और उनको बेटियों के महत्त्व को समझाया.

बेटियों को बचाने का जूनून सा था. काम करना था, कहीं से कोई फंडिंग नहीं थी, प्रशासनिक सहयोग किसी भी तरह से नहीं मिल रहा था. तमाम खर्चों की पूर्ति मित्रों और समाज के कतिपय शुभचिंतकों द्वारा हो जाती थी. इसी दौरान एक कार्यक्रम के माध्यम से लखनऊ की संस्था वात्सल्य से संपर्क हुआ, जो कन्या भ्रूण हत्या निवारण पर कार्य कर रही थी. वात्सल्य को हमारा अभी तक का कार्य बहुत पसंद आया और उसी के आधार पर उनके कोपल प्रोजेक्ट से हमारा जुड़ना हुआ. इस प्रोजेक्ट से जुड़ने से कुछ आर्थिक सहयोग अवश्य मिला किन्तु उसी दौरान हुई अपनी दुर्घटना के कारण यह प्रोजेक्ट हाथ से निकल गया. एक साल बिस्तर पर ही निकल गया. योजनायें बनती रहीं, संपर्क बनाये रखे गए और अंततः अपनी सबसे प्रिय छोटी बहिन दीपू (दीपशिखा) के नाम पर संचालित अपनी संस्था दीपशिखा के तत्त्वावधान में सन 2006 से राष्ट्रव्यापी अभियान बिटोली आरम्भ कर दिया.

जनपद में पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते, बाबाजी, पिताजी के नाम से जो पहचान मिली वो आज भी हमारा आधार बनी हुई है. इसके अलावा व्यक्तिगत रूप से हमारी पहचान को विस्तार देने का कार्य हमारे सामाजिक कार्यों, सांस्कृतिक अभिरुचि, लेखकीय क्षमता के साथ-साथ कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम ने किया. यदि कहा जाये कि सबसे अधिक पहचान कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम से मिली तो अतिश्योक्ति न होगी. इसका एक पहलू ये भी सामने आया कि जनपद में बहुतायत लोग त्रुटिवश कन्या भ्रूण हत्या वाले कुमारेन्द्र का संबोधन कर जाते हैं. हमसे, हमारे कार्यों से अनभिज्ञ लोग ऐसा सुनकर भले ही हमारे प्रति कोई नकारात्मक विचार बनायें, हम उसी समय हँसकर सुधार करवा देते हैं कि कन्या भ्रूण हत्या वाले कुमारेन्द्र नहीं बल्कि कन्या भ्रूण हत्या निवारण वाले कुमारेन्द्र.

आज भी यदाकदा वे परिवार, वे बच्चियाँ मिल जाती हैं जो हमारे जागरूकता कार्यक्रम के कारण इस संसार में हैं तो ख़ुशी होती है. ये और बात है कि उनको हम मर्यादावश सार्वजनिक रूप से सामने नहीं ला सकते. बहुत सी बेटियों को बचा सके और बहुत सी बेटियों को बचा भी न सके. सैकड़ों परिवारों को जागरूक किया पर सैकड़ों को समझा भी न सके. आज कई साल इस अभियान को संचालित करते हुए गुजर गए मगर अभी तक संतोषजनक स्थिति का एहसास नहीं हो सका है. बेटियाँ आज भी असुरक्षित हैं, न सही जन्मने के पहले, जन्मने के बाद ही सही पर वे असुरक्षित हैं.