Tuesday, 5 June 2018

वो तीन लड़कियाँ

वो दिन न केवल हमारी कक्षा के लिए बल्कि पूरे कॉलेज के लिए कौतूहल भरा था. ऐसा होना भी था क्योंकि लड़कों से भरे जीआईसी में उस दिन तीन लड़कियों ने एडमीशन लिया. ऐसा माहौल पूरे कॉलेज के छात्रों में दिखाई देने लगा जैसे बंजर जमीन पर कोई फूल निकल आया हो. इसके साथ ही ऐसा लग रहा था जैसे हमारी कक्षा में कोई अजूबे आ गए हों. उन तीनों लड़कियों ने इंटरमीडिएट में जीवविज्ञान की जगह गणित वर्ग को चुना था, इस कारण उनको जीआईसी में प्रवेश लेना पड़ा था. राजकीय इंटर कॉलेज के अलावा उरई में उस समय राजकीय बालिका इंटर कॉलेज भी संचालित हुआ करता था किन्तु वहाँ गणित वर्ग न होने के कारण उन तीनों लड़कियों को राजकीय इंटर कॉलेज में प्रवेश दिया गया था. 

कक्षा में बैठने-बिठाने को लेकर किसी तरह की अव्यवस्था उत्पन्न न हो इसके चलते उन तीनों लड़कियों के बैठने की जगह आगे की पंक्ति में अलग से निर्धारित कर दी गई. पूरी कक्षा उन तीन के आने से पगलाई तो थी ही, अब आगे बैठने के लिए बौराने लगी. वे लड़के जो अध्यापकों के सवालों और निगाहों से बचने के लिए सबसे पीछे या बीच में बैठना पसंद करते थे, वे भी अब आगे बैठने को उतावले दिखने लगे. आगे बैठने के लिए कई बार कक्षा में विश्व युद्ध जैसी स्थिति बन जाती. उस समय तक उरई में कोई भी विद्यालय सह-शिक्षा के रूप में चर्चा में नहीं था. या तो सिर्फ लड़कों के अध्ययन के लिए विद्यालय संचालित थे या कि लड़कियों के लिए. ऐसे में सह-शिक्षा का आरम्भ दिखाई देने पर वह स्थिति भी अपने आपमें चर्चा का विषय बनी हुई थी.

चर्चाएँ कुछ दिनों तक ही सीमित न रहीं. वे लड़कियाँ दो साल हम लोगों के साथ पढ़ीं. दोनों ही साल आये दिन कोई न कोई कहानी बनती रही. कभी लड़कियों से बात करने के सम्बन्ध में, कभी लड़कियों को गिफ्ट देने के सम्बन्ध में, कभी लड़कियों के साथ ट्यूशन में पढ़ने को लेकर. उन तमाम तैरती कहानियों के बीच कई बार वे लड़के भी सवालों के घेरे में ले लिए जाते जो किसी न किसी रूप में उन लड़कियों के संपर्क में थे. एक लड़की से पूर्व-परिचित होने के कारण कई बार ऐसी स्थिति से हमें भी गुजरना पड़ा. 

आज उरई में तमाम विद्यालय सह-शिक्षा रूप में संचालित हैं, लड़के-लड़कियाँ एकसाथ न केवल पढ़ रहे हैं बल्कि एकसाथ उठ-बैठ रहे हैं, एकसाथ आ-जा रहे हैं. ऐसी स्थिति में बदलाव के कई-कई आयाम देखने को मिले. कहानियों के बदलने के दौर दिखे, चर्चाओं के बदलते स्तर दिखे.

Friday, 25 May 2018

आभासी दुनिया का प्यार भरा एहसास


आँखों में चुम्बकीय आकर्षण, चेहरे पर मासूमियत का सौन्दर्य समेटे वह फ्रेंडरिक्वेस्ट के सहारे दोस्तों के दायरे में शामिल हुई. सोशल मीडिया की इस आभासी दुनिया में सभी लोग वास्तविक दुनिया से ही आते हैं. वे चाहें अपने वास्तविक रूप में आपसे संपर्क रखते हों या फिर किसी नकली प्रोफाइल से. बहरहाल, एक आकर्षित करने वाले सौन्दर्य बोध के साथ उसकी उपस्थिति बराबर सोशल मीडिया पर रहती थी. एक-दूसरे की पोस्ट पर टिप्पणियां करने, किसी पोस्ट पर तर्क-वितर्क करने से आरम्भ हुआ आभासी बातचीत का सिलसिला सार्वजनिकता से उतर कर इनबॉक्स तक आ गया. 

राजनैतिक, सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक विषयों सहित अनेक विषयों पर समय-समय पर चर्चा होती. इन सबके बीच एक अनाम सा, अबूझ सा रिश्ता उसके साथ बनते दिखने लगा. यूँ तो आभासी दुनिया में अनेक लोग इस तरह से अपनत्व की डोर में बंधे हैं जिनसे कभी मिलना नहीं हुआ मगर ऐसे लगता है जैसे बरसों से जान-पहचान हो. कुछ ऐसा ही उसके साथ था. मिलना कभी हुआ नहीं, एक शहर के वासी नहीं, सोशल मीडिया के अलावा कभी, कहीं देखा भी नहीं पर रिश्ते की आत्मीयता बरसों-बरस पुरानी महसूस होती.

शहरों की दूरियाँ बनी रही, सोशल मीडिया का आभासीपन शनैः-शनैः बढ़ता सा लगा. मिलने की उत्कंठा बढ़ती तो मिलने का वादा भी किया जाता पर सबकुछ फिर उसी आभासी दुनिया के इर्द-गिर्द केन्द्रित होकर रह जाता. इसे शायद इत्तेफाक ही कहा जायेगा कि सोशल मीडिया के बहुत सारे लोगों से अनेक अवसरों पर मिलना होता रहा. किसी से हम जाकर मिले, कोई हमसे आकर मिला. किसी ने हमें अपने घर बुलाया, कोई हमारे घर तक चल कर आया. मिलने-जुलने की इस प्रक्रिया के बाद भी उससे मिलना न हो सका. आभासी दुनिया की वह मित्र, वह मित्रता आज भी वहीं स्थित है जहाँ से आरम्भ हुई थी.

सामाजिकता के नाते, वैचारिकता के चलते बहुत आगे तक, बहुत दूर तक चलने, साथ देने की बात हुई मगर वैचारिक रूप से आगे बढ़ने के बाद भी एहसास होता है कि आगे बढ़ना हो ही नहीं सका. समय के साथ-साथ इस वैचारिक यात्रा ने कभी शिथिलता पकड़ी तो कभी गति भी पकड़ी. भौतिक रूप से अभी तक आमने-सामने बैठकर बातचीत नहीं हुई. एक-दूसरे को देखा भी नहीं और पता नहीं उस रहस्यमयी सत्ता ने यह सम्मिलन कब, कैसे, कहाँ निर्धारित कर रखा है? निर्धारित कर भी रखा है या नहीं, यह भी नहीं पता?

फ़िलहाल तो आभासी दुनिया ने बहुत से मित्र दिए, सहयोग करने वाले, प्यार करने वाले, मदद करने वाले, अपना समझने वाले, विश्वास करने वाले, वह भी उनमें से एक है. क्या ये आवश्यक है कि आप सब उसे उसके नाम से ही पहचानें? क्या आवश्यक है कि उसका नाम ज़ाहिर किया ही जाये?



Thursday, 10 May 2018

झंडे में अंतर न कर सके बच्चे


सम्पूर्ण देश की तरह उरई में भी अन्ना के स्वर से स्वर मिला कर नगरवासी अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे थे. अनशन समाप्ति वाले दिन भी सभी के चेहरे पर एक प्रकार की खुशी, एक अलग तरह का उत्साह देखने को मिल रहा था. क्या बच्चे, क्या जवान और क्या बुजुर्ग सभी अपनी ही धुन में मस्त थे. उरई में लगातार बारह दिनों से चल रहे अनशन, धरने के समाप्त होने के समय गांधी चबूतरे पर सभी उत्साहीजन एकत्र होकर आगे की रणनीति पर विचार करने के साथ-साथ एक दूसरे को बधाइयां दे रहे थे, मुंह मीठा करवा रहे थे. 

उत्साह में तिरंगा आसमान को छू रहा था. बच्चे भी अपनी लम्बाई से दो-चार गुने लम्बे झंडे लेकर उत्साह में झूम रहे थे. चार बच्चे ऐसे थे जो पहले दिन से ही बराबर धरनास्थल पर रहते थे और पूरे जोश के साथ अपनी उपस्थिति को दर्ज करवाते थे. उनकी उम्र में सम्भवतः बच्चों को पता ही नहीं होता है कि धरना क्या है, अनशन क्यों किया जाता है, भ्रष्टाचार क्या है, अन्ना और सरकार के बीच का टकराव क्या है पर फिर भी वे चारों बच्चे अपने पूर्ण भोलेपन के साथ हमारे आन्दोलन का हिस्सा बनते.

उनकी मासूमियत का दृश्य इस आन्दोलन के अन्तिम दिन दिखा. खुशी से झूमते लोगों के साथ नाचते-थिरकते बच्चों के साथ उछलती-कूदती बच्ची एकाएक चिल्ला पड़ती है, हाय दइया....... हम लोगों ने घबराकर, चौंककर उसकी तरफ देखा. उसकी पूरी बात को सुनकर एकदम से हंसी छूट गई. उस बच्ची ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ झंडा एकदम छोड़कर चिल्लाई, हाय दइया, जो तो कांग्रेस को झंडा है, जो तिरंगा नईंयां.

दरअसल उसके हाथ में जो तिरंगा था उसमें सफेद पट्टी में अशोक चक्र नहीं बना हुआ था और उस मासूम को तो यही पता था कि जिस तिरंगे की सफेद पट्टी में नीला अशोक चक्र बना हो वही तिरंगा ध्वज है. उसको समझाकर उसके हाथों में उस तिरंगे को थमाया और वह बच्ची भी बात को समझकर पुनः उसी जोश में भारत माता की जय, इंकलाब जिन्दाबाद करने में अपने साथियों के साथ लग गई. इधर हम मित्र इस बात पर विचार करने लगे कि यदि बच्चों में राजनैतिक दलों के प्रति इस तरह की भावना है तो अब वाकई देश में राजनैतिक सुधारों की आवश्यकता है; घनघोर आवश्यकता है.



Wednesday, 18 April 2018

प्रतिद्वंद्विता ज़िन्दगी के साथ


चाह कर भी अपने स्वभाव में कभी गंभीरता नहीं ला सके. जो पल अभी है, वही ज़िन्दगी है का फलसफा अपनाते हुए अपनी जीवन-यात्रा पर आगे बढ़ते रहे.इसका अर्थ ये नहीं कि हमारे द्वारा किसी कार्य को करने में, जिम्मेवारी का निर्वहन करने में, अपने उद्देश्य को पूरा करने में किसी तरफ की कोताही दिखाई जाती है. यह सब पूरी लगन और निष्ठा के साथ किया जाता है, पर हँसी-माजक के साथ, माहौल को हल्का-फुल्का बनाते हुए. पता नहीं क्यों गंभीर मुद्रा, हाव-भाव का लबादा ओढ़े, चेहरे पर जानबूझकर कठोरता चढ़ाये, होंठों को इतनी बुरी तरह कसे कि मुस्कान धोखे से ही न फिसल जाये, ऐसे लोग कभी नहीं सुहाए. ऐसी गंभीरता वाली मुद्रा को कभी भी वरीयता नहीं दी और अपनी ज़िन्दगी का वर्तमान पूरी मौज-मस्ती के साथ जीते रहे. 

हमने ज़िन्दगी को जितना गंभीरतारहित होकर, अल्हड़ता से, मौज-मस्ती के अंदाज में जीना चाहा, ज़िन्दगी उतनी ही गंभीरता से हमारा परीक्षण करती रही. कह सकते हैं कि हम उसके प्रति गंभीर नहीं रहे और वह भी हमारे प्रति गंभीर नहीं रही. हम दोनों एक-दूसरे के साथ खेलते रहे, एक-दूसरे के होकर भी एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बने रहे. यह प्रतिद्वंद्विता पढ़ाई में, सामाजिक जीवन में, पारिवारिक जीवन में, रोजगार में, अपने उद्देश्यों में बराबर देखने को मिलती रही.

यही कारण है कि शिक्षा की नींव किसी और विषय से भरी गई और उस पर इमारत किसी और विषय की बन गई. जब अवसर आया उसे सजाने का तो रंग-रोगन किसी और विषय का हो गया. विज्ञान स्नातक के दौरान ही सिविल सेवा में जाने का कीड़ा कुलबुलाया. इससे पहले कि यह कीड़ा पूरी तरह से काट पाता एमबीए और एमसीए के चुनाव में लोगों की सलाह के बीच झूलते रहे. व्यवसाय प्रबंधन और कंप्यूटर के चयन के बीच स्नातक के बाद परास्नातक में प्रवेश लेने की यात्रा कब अंग्रेजी से राजनीति विज्ञान, राजनीति विज्ञान से अर्थशास्त्र में पहुँचकर थमी, पता नहीं चला.

इधर-उधर हाथ-पैर मारे जाते रहे. कतिपय कारण ऐसे बने कि एमबीए की तरफ तो बढ़ ही न सके, इन्हीं कारणों से पत्रकारिता का कोर्स भी छोड़ना पड़ा. पता नहीं उरई हमारे भीतर बसा था या उरई को हमारी आवश्यकता थी. न हम यहाँ से निकल पाए और न उसने हमें यहाँ से जाने दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि ग्वालियर स्नातक के लिए जाने के बाद भी उरई वापस आना हुआ. उसके बाद दो बार नौकरी एवं अन्य कार्यों के चलते बाहर जाना पड़ा किन्तु चंद दिनों बाद ही खुद को उरई में ही पाया.

इस जाने-आने के क्रम में, डिग्रियाँ बटोरने के क्रम में चार विषय से परास्नातक हो गए. कई जगह के साक्षात्कार हो गए. नौकरी करते-छोड़ते रहे. पत्रकारिता में भी हाथ-पैर चलाते रहे. लेखन में जुटे रहे. इन सबके बीच सिविल सेवा का कीड़ा कुलबुलाने के साथ काटने भी लगा. उरई के अल्प-संसाधनों के बीच अपनी जगह तलाशते हुए उस तरफ बढ़ लिए. तैयारी जितनी आगे बढ़ती, तमाम सामग्री की अनुपलब्धता में वापस धकेल देती. समस्याओं और परेशानियों को महसूस तो कर पा रहे थे किन्तु उनका समाधान हम खुद निकाल पाने में असमर्थ लग रहे रहे थे. कभी खुद को आर्थिक आधार की तलाश में खड़ा पाते तो कभी इसे समय की बर्बादी समझ फिर से अपनी तैयारी में घुस जाते. आर्थिक आधार की अनुपलब्धता ने जिन्दगी के उन सारे सपनों पर भी अंकुश लगा रखा था जिसे एक युवा दिल देखता है, सजाता है. ज़िन्दगी के लिए, ज़िन्दगी से बड़े सपने सजाये जाते मगर उन्हें धरालत पर उतारने से पहले जब वास्तविकता की कसौटी पर कसते तो सारे सपने बिखर जाते.

बिखरे सपनों के साथ ख़ामोशी से, ऊहापोह की इस अवस्था में खुद को खुद के लिए खड़ा करना था. हम चाह कुछ रहे थे पर समय हमसे कुछ और चाह रहा था. हम ज़िन्दगी को आज में जीने की चाहत लिए कल का सपना बुन रहे थे और ज़िन्दगी हमें आज ही हमारी हकीकत दिखाकर हमारे सपनों को बस सपना बनाने को तुली थी. सिविल सेवा के अलावा किसी और नौकरी के लिए सोचा ही नहीं. ऐसे में जबकि लगने लगा कि हमारा इसके लिए चयन हो पाना मुश्किल है तो जो लक्ष्य सोचा था, उसकी तरफ दूसरे रास्ते से बढ़ने का विचार किया. जीवन का अंतिम लक्ष्य राजनीति को बना रखा था. सिविल सेवा एक तरह का वो अनुभव प्राप्त करना था, जिसके आधार पर राजनीति में काम करना और आसान हो जाता.

अब जबकि सिविल सेवा का विचार लगभग त्याज्य सा हो गया तो सामाजिक कार्यों को पूरी वरीयता के साथ समय देना आरम्भ किया. हालाँकि सामाजिक कार्यों में हमारी खुद की सहभागिता सन 1996 से ही होने लगी थी तथापि तब यह शौकिया कार्य के लिए, स्वानुभूति के लिए, आत्म-संतुष्टि के लिए किया जा रहा था. अब सबकुछ भूल, सबकुछ छोड़ सामाजिक कार्यों में खुद को लगा दिया. कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम का आरम्भ कर दिया. खूब काम किया जाता, जनपद जालौन भर में भागदौड़ की जाती. एकमात्र कार्य कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम किया जा रहा था. सामाजिक कार्यों का सञ्चालन विशुद्ध सामाजिक सेवा की दृष्टि से किया जा रहा था. इसके द्वारा न तो धन कमाने की चाह थी, न समाजसेवा को रोजगार में बदलने की मंशा थी. इस कारण सामाजिक कार्यों के साथ खुद को आर्थिक स्तर पर खड़ा करने का प्रयास भी होता रहता.

मनपसंद काम पूरे मन से हो रहा था. लोगों का आशीर्वाद मिल रहा था. काम करने की संतुष्टि मिल रही थी. उसी समय समय ने फिर करवट ली. ज़िन्दगी फिर प्रतिद्वंद्वी बनकर सामने आ गई. दो पैरों से स्वतंत्र रूप से चलती ज़िन्दगी कृत्रिम आधार के सहारे आगे बढ़ने लगी. भागदौड़ में अंकुश लग गया. कार्य की तीव्रता में अवरोध आ गया. जनपद और जनपद के बाहर की सीमाओं को नापते कदम ठहर से गए मगर आत्मविश्वास कम न हुआ, कार्य-क्षमता प्रभावित नहीं हुई, उद्देश्यों से डिगना नहीं हुआ.

बदलाव बहुत बड़ा हुआ मगर हमारा स्वभाव न बदला. गंभीरता अभी भी न आई. हँसी-मजाक अभी भी अपनी उसी अवस्था में है. ज़िदगी का फलसफा अभी भी वही है. ज़िन्दगी और हम आज भी, अभी भी एक-दूसरे को जाँचने में लगे हैं. एक-दूसरे से प्रतिद्वंद्विता करने में लगे हैं. देखिये, आगे होता क्या है? जीत-हार का समीकरण क्या होता है?



Monday, 9 April 2018

नींव का आधार बना हमारा स्कूल


किसी भी व्यक्ति के जीवन में जन्मने के बाद महत्त्वपूर्ण दिन होता है उसका पहले दिन स्कूल जाना. लगभग सभी के लिए पहला स्कूली दिन बहुत ही ख़ास होता है. एक जैसी होते हुए भी सबकी अलग-अलग सी कहानी रहती है. वैसे देखा जाये तो स्कूल भी अपने आपमें एक अजब सा स्थान होता है, बच्चों के लिए. किसी के लिए दहशत भरा, किसी के लिए कौतुहल भरा, किसी के लिए खेल का स्थान, किसी के लिए बोझिल सा. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक शैक्षिक संस्थान को बहुत सहजता से आत्मसात करते रहे. बहरहाल, हम भी स्कूल गए, गए क्या, भेजे गए. समय से ही स्कूल भेजे गए.

हमारा पहला स्कूली दिन बहुत ही रोचक स्थिति में गुजरा. स्कूल का नाम याद नहीं पर शायद राधाकृष्ण जूनियर हाई स्कूल या फिर कुछ इसी तरह का नाम था. पहले दिन स्कूल जाना हुआ एक आया माँ के साथ. स्कूल पहुँचने के बाद कितना समय स्कूल में बिताया, ये भी सही से याद नहीं पर इतना याद है कि कुछ समय बाद हमें स्कूल में अच्छा नहीं लगा. बंद-बंद सा माहौल, छोटे-छोटे से कमरे. आज के भव्य स्कूलों, सजावटी इमारतों से इतर साधारण सा, किसी पुराने मकान में चलता स्कूल. जब तक वे आया माँ दिखती रहीं, तब तक तो हम स्कूल में जमे रहने की कोशिश करते रहे. उनके कुछ देर बाद न दिखने की स्थिति में स्कूल हमें अच्छा सा न लगा. हमने घर जाने की जिद मचाई तो बताया गया कि आया माँ किसी काम से स्कूल से चली गईं हैं, उनके आते ही घर भिजवा दिया जायेगा.

जिद से ज्यादा जिद्दी होने का स्वभाव बचपन से ही रहा है, आज भी है. शायद उसी जिद के साथ-साथ रोना, चिल्लाना बहुत ज्यादा ही रहा होगा तभी स्कूल प्रबंधन ने एक शिक्षक के साथ हमें घर वापसी की राह दिखाई. घर का पता किसी को मालूम नहीं था. आया माँ स्कूल में नहीं. हमने पूरे विश्वास के साथ कहा कि हमें घर का रास्ता पता है. बस फिर क्या था, अपने विश्वास के बलबूते शिक्षक के साथ घर को चल दिए. हम अपने पहले ही दिन अपनी याददाश्त, अपने विश्वास के सहारे वापस घर तक लौट आये. उस स्कूल में हमारा पहला दिन, उस स्कूल का आखिरी दिन भी साबित हुआ.

आज भी अम्मा जी उस दिन को याद कर बताती हैं कि वे शिक्षक और हमारे घर वाले हैरान थे कि उस अत्यंत छोटी सी उम्र में हमें स्कूल से घर तक की रास्ता कैसे याद रही? हैरानी आपको भी हो रही होगी मगर सच ये है कि आज भी ये प्राकृतिक शक्ति हममें विद्यमान है कि किसी रास्ते से एक बार गुजर जाएँ, किसी भी व्यक्ति से एक बार मिल लें फिर वह हमारे दिमाग में बस जाता है.

पहले स्कूल का पहला दिन तो जाने और आने के साथ ही समाप्त हो गया था. उसके बाद तो ये भी याद नहीं कि दूसरे स्कूल में जाना कितने दिन बाद हुआ था. उम्र का एक लम्बा समय गुजरने के कारण उपजी याददाश्त-दोष वाली इस स्थिति के बाद भी पहले स्कूल का पहला दिन अभी तक याद है तो दूसरे नए स्कूल का पहला दिन भी अभी तक बहुत अच्छे से याद है. तैयार होकर, तेल-फुलेल के साथ अपने बच्चा चाचा के साथ स्कूल पहुँचे. चाचाओं में दूसरे नंबर के बच्चा चाचा, हम सभी बच्चों के अत्यंत प्रिय चाचा हैं. हाँ तो, अपने नए स्कूल के पहले दिन हम अपने इन्हीं बच्चा चाचा के साथ स्कूल के लिए चल पड़े. स्कूल पहुँचे तो हम सारे जरूरी साजो-सामान से सुसज्जित थे, बस कमी थी तो हमारे टिफिन बॉक्स की. इसी को ध्यान में रखते हुए ही हमारे लिए टिफिन सजाया जाना था. सो चाचा जी हमें स्कूल में छोड़कर खुद बाजार को निकल गए.

स्कूल में हमारा समय सही से बीत रहा था. पहले वाले स्कूल के मुकाबले खूब खुला-खुला. प्यार-दुलार देती दीदियाँ. कक्षा के गिने-चुने विद्यार्थियों के बीच पहले ही दिन छा जाना, आज भी याद है. कुछ देर बाद कक्षा में आकर हमारा नाम पुकारा गया. उस तरफ देखा तो आया माँ अपने हाथ में एक नया टिफिन बॉक्स लिए खड़ी हैं और स्कूल के बाहर चाचा जी हमारी कक्षा की तरफ निहारते खड़े हुए थे. लाल-सफ़ेद रंग का गोल टिफिन, जो कई वर्षों तक हमारे लिए अपनी सेवाएँ देने के बाद घर के अन्य कामों में प्रयोग होने लगा. भोजनावकाश के समय अपने टिफिन बॉक्स को खोला तो जैसा कि आपको बताया था उसमें बिस्किट, टॉफी हमारे स्वागत में तत्पर थे. घर के सभी लोगों से, अम्मा से सुना है कि हमने भोजन बहुत देर से, लगभग छह-सात वर्ष की उम्र से करना शुरू किया था. तब तक दूध, बिस्किट, दालमोंठ और बाकी चट्ठा-मिट्ठा से काम चलाया जाता था, अपनी भूख मिटाने को. टिफिन बॉक्स में अपना मनपसंद भोजन देख मन और अधिक प्रसन्न हो गया और हम स्कूल का पहला दिन पूरा समय बिताकर ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट आये.

पं० उमादत्त मिश्र बालिका विद्यालय के नाम से आरम्भ वह स्कूल वर्तमान में भी पं० उमादत्त मिश्र जूनियर हाई स्कूल के नाम से संचालित है. उस समय छोटा सा वह स्कूल अपने आसपास खेलने का मैदान भी समेटे हुआ था, जो अब कुछ हद तक सिकुड़ सा गया है. शिक्षिकाएँ, जिन्हें हम दीदी कहकर पुकारते थे और प्रधानाचार्या को बड़ी दीदी. सभी का स्नेह, प्यार, दुलार, आशीर्वाद तब भी मिला, आज भी मिल रहा है. बड़ी दीदी के रूप में मधु दीदी के साथ शीला दीदी, सुमन दीदी, सरोजनी दीदी, रेखा दीदी, स्नेहलता दीदी और इनके साथ-साथ शुक्ला आचार्य जी और प्रह्लाद आचार्य जी आदि ने हमारी नींव को भली-भांति तैयार किया. इस नींव की सुरक्षा का दायित्व बहुत दिनों तक शीला आया माँ ने उठाया. बाद में हमारे दोनों छोटे भाइयों का प्रवेश भी उसी स्कूल में करवाया गया. जिनकी सुरक्षा का दायित्व हीरा आया माँ के जिम्मे किया गया.

आज भी उस स्कूल के प्रति आकर्षण बना हुआ है. उस स्कूल के शिक्षक, आया माँ, साथी बराबर याद आते हैं, स्मृति में बसे हुए हैं. उस समय के कुछ लोग आज भी साथ हैं. आये दिन उनसे मुलाकात होती रहती है. उस समय को याद करते हैं तो घर-परिवार जैसी अनुभूति होती है, जो आज के स्कूलों में देखने को नहीं मिल रही है.

Monday, 19 March 2018

बड़ों के आशीर्वाद से उपाधियों का बढ़ता परिवार


व्यक्ति के शैक्षणिक विकास में उसके माता-पिता, गुरुजनों का विशेष आशीर्वाद रहता है. माँ सरस्वती की अनुकम्पा हमारे ऊपर ऐसी रही कि शिक्षा प्राप्ति के किसी भी चरण में समस्या का सामना नहीं करना पड़ा. अपने लम्बे सामाजिक और अध्यापन सम्बन्धी अनुभव में देखने को मिला कि शोध कार्य में शोधार्थियों को अनेकानेक समस्याओं, विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है. इसे हमारे ऊपर बड़ों का, गुरुजनों का आशीर्वाद ही कहा जायेगा कि एक नहीं दो-दो पी-एच०डी० करने पर भी एक पल को परेशानियों, समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ा.

हम कुछ और विचार किये थे अपने लिए पर समय ने हमारे लिए कुछ और ही तय कर रखा था. 1998 में हिन्दी साहित्य में एम०ए० की एक और डिग्री अपने नाम के साथ जोड़ ली. अगले ही वर्ष गुरुकृपा से वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन विषय पर शोध-कार्य की रूपरेखा तैयार मिली. इसके साथ ही आदेश मिला उसको तुरंत विश्वविद्यालय में पंजीकृत करवाने का. हम जिस क्षेत्र में जाने से लगातार बच रहे थे, समय हमें उसी तरफ धकेलने में लगा था. पितातुल्य ब्रजेश अंकल और हिन्दी के प्रकाण्ड विद्वान डॉ० दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव जी के विशेष स्नेह से इतनी छूट मिल गई कि अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी से जब समय मिले तब शोध-कार्य पूरा कर लिया जायेगा.

समय ने करवट बदली और सन 2002 में यूजीसी की तरफ से 31 दिसम्बर 2002 तक अपनी थीसिस जमा करने वालों को नेट से छूट देने सम्बन्धी संशोधन पारित हुआ. न चाहते हुए भी शुभेच्छुओं के आदेश पर शोध-कार्य में जुटना पड़ा. इस बीच एक व्यक्तिगत समस्या के चलते शोध-कार्य को बंद कर दिया मगर समय ने जो निर्धारित कर दिया था, उसे टालना हमारे लिए संभव न हो सका. सभी के आशीर्वाद, अपनी मेहनत के बाद अंततः नियत समय सीमा में शोध प्रबंध (थीसिस) बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी में जमा हो गई. वर्ष 2004 में अपने नाम के आगे डॉ० लगाने की कामना पूरी हुई. प्रसन्नता इस बात की थी कि अपने जिन विद्वान गुरु जी के निर्देशन में पी-एच०डी० पूरी की वे स्वयं दो विषयों में डी-लिट्० किये थे, हिन्दी साहित्य और भाषा विज्ञान में. इसके साथ ही यह भी गौरव प्राप्त हुआ कि जिस दीक्षांत समारोह में हमें पी-एच०डी० डिग्री प्राप्त हुई, उसमें हम सभी को राष्ट्रपति कलाम साहब का आशीर्वाद मिला.

ख़ुशी के इन क्षणों में एक दुःख अन्दर ही अन्दर सालता रहा कि जिन पितातुल्य पूज्य ब्रजेश अंकल ने हमारी पी-एच०डी० का आधार निर्मित किया, वे हमारे साथ ख़ुशी बाँटने की स्थिति में नहीं थे. पैरालाइसिस के घातक हमले से खुद को उबारकर वे स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे. कुछ भी कहने में असमर्थ उन्होंने अपने हाथों, अपनी भाव-भंगिमा से सदैव की तरह हमें आशीर्वाद दिया और हमारी सफलता पर ख़ुशी प्रकट की.

इसे समयबद्ध पी-एच०डी० का सुफल कहा जायेगा कि दिसम्बर 2005 में हमें गाँधी महाविद्यालय, उरई में मानदेय प्रवक्ता के रूप में अध्यापन कार्य करने का अवसर मिला. यद्यपि आदतन दो बार अध्यापन नौकरी को छोड़ने के बाद भी इसने हमें नहीं छोड़ा. गुरुवर डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी जी के स्नेहिल आदेश पर पुनः-पुनः वापस लौटना पड़ा.

यद्यपि नाम के आगे डॉ० लगाने की तमन्ना पूरी हो चुकी थी तथापि मन में अर्थशास्त्र में शोधकार्य करने का जो बीजारोपण वर्ष 1995 में हुआ था, उसके अंकुरित होने का समय आ गया था. इसे भी किसी शिष्य के लिए गौरवानुभूति का क्षण माना जाना चाहिए कि उसे शिक्षा देने वाला गुरु स्वयं उसको अपने निर्देशन में शोधकार्य करवाने को प्रकट हो जाये. इसे अपने आपमें परमशक्ति से भी बड़ा आशीर्वाद कहा जायेगा जो उस दिन डॉ० शरद जी श्रीवास्तव जी और बड़े भाई समान डॉ० परमात्मा शरण गुप्ता जी ने घर आकर हमें दिया.

अर्थशास्त्र से परास्नातक करने के बाद हमारी विशेष इच्छा थी शरद सर के निर्देशन में पी-एच०डी० करने की. तब उनकी पी-एच०डी० पूरी न होने के कारण हमारी यह इच्छा पूरी न हो सकी थी. अब जबकि वे स्वयं घर आये तो हमने भी पूरी तत्परता दिखाते हुए उनके प्रथम शोधार्थी के रूप में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी में अपना पंजीकरण करवा लिया. बुन्देलखण्ड क्षेत्र के प्रति कार्य करने के विशेष लगाव के चलते जनपद जालौन में कृषि पद्धति का मूल्यांकन को अर्थशास्त्र शोधकार्य का विषय चुना. सामाजिक, पारिवारिक जिम्मेवारियों, अध्यापन सम्बन्धी कार्यों के बीच समय निकाल कर शोध कार्य के नियत पांच वर्षों के अंतिम वर्ष में अर्थशास्त्र में भी थीसिस जमा कर दी. कालांतर में तमाम औपचारिकताओं की समाप्ति पश्चात् एक और डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त हुई.

हमारी दोनों पी-एच०डी० को सफलतम रूप से अंतिम पायदान तक पहुँचाने में विश्वविद्यालय में कार्यरत हमारे मित्र डॉ० राजीव सेंगर श्रीकृष्ण की भांति सदैव सारथी की मुद्रा में नजर आये. किसी भी तरह की समस्या पर वे उसी सहजता से हमारा शोध-कार्य सम्पन्नता की ओर ले गए जैसे कि कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को शत्रु सेना के बीच से निकालकर विजय की ओर ले जाते थे. अर्थशास्त्र की पी-एच०डी० में छोटे भाई हर्षेन्द्र ने विशेष रूप से मेहनत की.

तमाम प्रमाण-पत्रों, अंक-पत्रों से भरी फाइल में एक और उपाधि शामिल हो गई. उपाधियों का परिवार बढ़ गया मगर उसका योगदान किस रूप में बढ़ेगा, ये देखना है.

Monday, 12 March 2018

बन्दूक चलाने का पहला अनुभव

इसे जातिगत असर कहा जाये या फिर आसपास का वातावरण कि बचपन से ही हमें हथिययारों ने बहुत ही लुभाया है. गाँव में भी पुरानी जमींदारी होने के कारण नक्काशीदार तलवारें और अन्य अस्त्र-शस्त्र देखने को मिलते रहते थे. इसके अलावा घर में रिवाल्वर, बन्दूक होने के कारण भी इनके प्रति एक प्रकार की रुचि बनी हुई थी. कभी-कभी बन्दूक और रिवाल्वर चलाने का मन भी होता था. घर में विशेष रूप से दशहरे के पूजन के बाद रिवाल्वर और बन्दूक चलाने का काम पिताजी या चाचाजी के द्वारा होता था. छत पर जब भी दशहरे और दीपावली पर पूजन के बाद बन्दूक, रिवाल्वर चलाने का उपक्रम होता तो हम बस ललचा कर ही रह जाते. इन पर्वों के अलावा कभी खुशी के अवसर पर भी धमाके कर लिए जाते थे पर इनको करने की जिम्मेवारी सिर्फ और सिर्फ पिताजी की होती, हाँ, यदि घर में उस समय चाचा वगैरह हुए तो वे भी इसमें हिस्सा ले लेते थे. 

बात होगी कोई 1990 की जब हम स्नातक के प्रथम वर्ष में थे. ग्वालियर से छुट्टियों में घर आना हुआ. उसी समय हमारे एक पारिवारिक मित्र के घर नवजात शिशु का आगमन हुआ. अवसर हम सभी के लिए खुशी का था. सभी लोग उन्हीं के घर पर उपस्थित थे. जैसा कि तय था, बन्दूक तो चलनी ही थी. हम चिरपरिचित अंदाज में शांत बैठे थे क्योंकि हमें मालूम था कि पिताजी की दृष्टि में हम अभी इतने बड़े नहीं हुए कि बन्दूक चलाने को मिले. मन तो बहुत कर रहा था किन्तु कहते कैसे? चुपचाप बैठे थे कि तभी पिताजी ने आवाज देकर हमें बुलाया.

आराम से उठकर उनके पास तक पहुँचे तो पिताजी ने बन्दूक हमें थमा दी और साथ में कारतूस की पेटी. दोनों चीजें एक साथ देकर पिताजी ने कहा कि तुम चाचा बन गये हो और अब बड़े भी हो गये हो. चलाओ. घर में बन्दूक की सफाई का काम हमारे जिम्मे ही था इस कारण बन्दूक के संचालन का तरीका भी हमें ज्ञात था. अंधा क्या चाहे दो आँखें, हमने हाँ कही तो पिताजी ने इतना कहा कि आराम से, सुरक्षा के साथ चलाना.

मन ही मन प्रसन्नता का अनुभव भी हो रहा था साथ ही एक डर भी लग रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाये. बन्दूक के चलने पर पीछे लगने वाले धक्के के बारे में भी सुन रखा था जिसका भी डर लग रहा था. मन ही मन खुद को हिम्मत बँधाई और खुले में आकर बन्दूक में कारतूस लगा ऊपर कर फायर कर दिया.

एक फायर हुआ, कैसे हुआ यह समझ ही नहीं आया. सब कुछ सही-सही दिखा. बन्दूक का झटका भी उतना नहीं लगा जितना सुन रखा था, इससे भी हिम्मत बँधी. बन्दूक की नाल खोल कर चला हुआ कारतूस बाहर निकाला. दूसरा कारतूस लगाया और किया दूसरा फायर, फिर तीसरा कारतूस डाला और तीसरा फायर. एक के बाद एक तीन फायर करके लगा कि बहुत बड़ा किला जीत लिया हो. तीन फायर करने के बाद बन्दूक इस तरह थामकर बैठे मानो विश्व-विजय के बाद वापस आये हों.

उसके बाद कई मौके आये जब बन्दूक चलाने को मिली किन्तु जो रोमांच पहली बार चलाने में आया वह आज भी भुलाये नहीं भूलता है.