Thursday, 28 September 2017

बस में यात्रा, लगा कर छाता

यात्रायें छोटे से ही करते रहने का मौका मिलता रहा है. बचपन में भले ही यात्रायें बहुत दूर-दूर की न की गई हों, भले ही बहुत सारे दर्शनीय स्थल न घूमे हों पर लगभग सभी यात्राओं में कुछ न कुछ ऐसा घटित होता रहा है जो हमेशा याद बना रहा. चाचा लोगों के पास जाना, गाँव जाना, ननिहाल जाना होता रहता था. इन यात्राओं की मजेदार घटनाएँ आज भी मन को गुदगुदा जाती हैं. 

अच्छी तरह से याद है कि हम अपने छोटे भाई और अम्मा जी के साथ रोडवेज बस से अपने चाचा-चाची के पास कालपी जा रहे थे. कालपी उरई से लगभग पैंतीस किलोमीटर दूर है. उस समय हमारे मन्ना चाचा, जो सबसे बड़े चाचा थे, रहा करते थे. हम बच्चों के मन्ना चाचा भारतीय स्टेट बैंक में अपनी सेवाएँ देकर सेवानिवृत्त हुए और सामाजिक प्रस्थिति में श्री नरेन्द्र सिंह सेंगर के रूप में जाने-पहचाने जाते हैं. बरसात का मौसम था. तब पानी भी आज के जैसे छिटपुट नहीं बल्कि खूब जमकर बरसता था. इधर बस ने उरई छोड़ा ही है कि बादलों ने अपनी छटा बिखेरी. खूब झमाझम पानी. बस की खिड़कियाँ बंद कर दी गईं. मौसम सुहाना, झमाझम बारिश, हम दोनों भाई चलती बस से मौसम का भरपूर आनंद ले रहे थे.

तेज बारिश के चलते कुछ बूँदें अन्दर घुस आने में सफल हो जा रही थीं. उनके चलते अपनी तरह का ही आनंद आ रहा था. तभी ये आनंद ऊपर से आता मालूम हुआ. ऊपर देखा तो बस की छत से एक-दो बूँदें टपक रही हैं. उन टपकती बूंदों में बड़ा अच्छा लग रहा था मगर कुछ देर में उनके गिरने की गति बढ़ गई. हम और हमारा छोटा भाई, उस समय चार-पांच साल वाली अवस्था में होंगे, उन टपकती बूंदों से भीगने लगे तो हमको वहाँ से उठाकर दूसरी सीट पर बिठा दिया गया. कुछ देर में वहां से भी पानी टपकने लगा.

बाहर पानी लगातार तेज होता जा रहा था. बस की जंग लगी छत में पानी का भरना बराबर हो रहा था. जिसका परिणाम ये हुआ कि जगह-जगह से पानी बुरी तरह से अन्दर टपकने लगा. कुछ लोग जो इस मौसम की मार को समझते थे वे अपने साथ छाता लेकर चल रहे थे. आनन-फानन उन दो-चार लोगों ने अपने-अपने छाते खोल कर बस के बच्चों को भीगने से बचाया. अब आप समझिये उस हास्यास्पद नज़ारे को कि बाहर तेज बरसता पानी, चलती बस, बस में कई जगह से तेजी से टपकता पानी और बस के भीतर छाता खोले पानी से बचते लोग.

आज भी खूब तेज बारिश होने पर या फिर बारिश के समय होने वाली यात्रा में वो छाता लगाकर की गई बस-यात्रा जरूर याद आ जाती है.

Wednesday, 27 September 2017

गुब्बारों के फूटने में बच्चे की हँसी

उसका कुछ भी नाम हो सकता है, कोई भी जाति हो सकती है, कोई भी धर्म हो सकता है. असल में भूख का कोई नाम नहीं होता, मजबूरी की कोई जाति नहीं होती, समस्याओं का कोई धर्म नहीं होता. नाम, जाति, धर्म का ओढ़ना ओढ़े हुए वह बच्चा शहर को एक तरफ से दूसरी तरफ नापने में लगा हुआ था. उस जैसे और भी बच्चे हो सकते हैं. हो सकते हैं क्या, ऐसे बहुत से बच्चे हैं जो अपना बचपन भूलकर पेट की आग शांत करने का जुगाड़ करने में लगे हैं. वह भी ऐसे अनेकानेक बच्चों के बीच का एक बच्चा था. 

उसी तरफ से गुब्बारे बेचने का एक मन को छूने वाला आग्रह हुआ. हमारे एक पल की देरी से आने वाले जवाब के अन्तराल के साथ ही घर जाने की उसकी आतुरता दिखाई दी. किसी भी बच्चे का पेट की आग बुझाने को काम करते देखना अपने आपमें दुखद होता है. इसके बाद भी यदि किसी बच्चे द्वारा कोई हल्का-फुल्का सा काम करते देखते हैं तो अपने आपमें इसका सुकून मिलता है कि कम से कम वो भीख तो नहीं माँग रहा, किसी की जेब तो नहीं काट रहा, कहीं चोरी-चकारी तो नहीं कर रहा है. 

गुब्बारे लेने के आग्रह के समय रात का आठ बजने को आया था. हलकी सी सर्दी के बीच उस बच्चे को अभी लगभग पाँच-छह किमी दूर अपने गाँव जाना था. उसके गुब्बारे लेने का आग्रह स्वीकार किया तो उसके चेहरे पर मुस्कान खिल उठी. इस सहमति के साथ जैसे ही उसकी एक फोटो खींचने की अनुमति उससे माँगी तो उरई शहर के पास के एक गाँव का निवासी, वहीं गाँव के विद्यालय में कक्षा छह का विद्यार्थी वह बच्चा अपनी फोटो लिए जाने की बात से चहक उठा. एक पल को भूल गया कि उसने गुब्बारे लेने का आग्रह किया था. दो फोटो खींच सके कि उसकी ख़ुशी पर पेट की आग फिर हावी हो गई. पेट की आग कहाँ कुछ भूलने देती है, उसकी एक पल की ख़ुशी के पीछे प्रश्नवाचक शब्द निकले. भूख ने उसके अन्दर संदेह पैदा किया कहीं बिना गुब्बारे लिए ही बस फोटो खींच कर ये भाग न जाये. गुब्बारे के धीमे से निकले उसके स्वर को अपनी सहमति के द्वारा आश्वस्त किया तो उसके चेहरे पर फिर से मुस्कान तैर गई.

फोटो खींचने के बीच मोबाइल अपनी जेब के हवाले किया. गुब्बारों के लेने और पैसों के देने के बीच उसने अपने बारे में बताया. विद्यालय जाना और फिर लौटकर गुब्बारे लेकर उरई आ जाना. दिनभर में कोई 35-40 गुब्बारे बेचने के बाद रात को गाँव वापस पहुँच कर कुछ लिख-पढ़ लेना. कक्षा छह के विद्यार्थी को अनुशासित रूप में विद्यालय-परिवार, अध्ययन-व्यवसाय, घर-बाज़ार के साथ तालमेल बनाये देखना अपने आपमें अचरज में डाल गया. एकबारगी मन में आया कि इसकी मदद कुछ पैसे देकर की जाये फिर लगा कि जो बच्चा खुद को कहीं न कहीं भीख माँगने से अलग रखे हुए है, उसे धन की मदद भिक्षावृत्ति को प्रेरित तो नहीं कर देगी? साथ ही लगा कि जो बच्चा पूरे अनुशासित रूप में अपना संतुलन बनाकर आगे बढ़ रहा है, कहीं उसकी खुद्दारी, उसकी राह में व्यवधान उत्पन्न तो नहीं करेगा.

इस दो-चार मिनट की उलझन के बाद जितना संभव हो सकता था, गुब्बारे लिए. गाड़ी-सामान के साथ हाथों की सीमित संख्या ने भी गुब्बारों की खरीद पर अंकुश लगाया. बच्चा अपनी अतुलित प्रसन्नता के साथ गुब्बारे तोड़-तोड़ देता जा रहा था और हम उनको संभालने में लगे हुए थे. बाज़ार से घर तक की यात्रा में कुछ गुब्बारे नवदुर्गा के पावन अवसर पर सजी देवी माँ की झांकियां देख लौट रहे बच्चों में बंट गए तो कुछ गुब्बारे भीड़ की, हवा की चपेट में आकर फूट गए. फट-फट की आवाज़ लोगों में क्या सन्देश दे रही होगी ये तो पता नहीं पर हमें कहीं न कहीं उस ध्वनि में बच्चे की हँसी सुनाई दे रही थी. घर पहुँचने के बाद घर के बच्चे भी चहक-चहक कर बचे हुए कुछ गुब्बारों को फोड़ने-उड़ाने में लग गए.

Saturday, 23 September 2017

हॉस्टल के मूँछ कटवा भाईसाहब

कुछ दिनों पहले मुँह नुचवा, चोटी कटवा जैसी घटनाओं की अफवाह चारों तरफ फैली पड़ी थी. कोई अपने नुचे मुँह के साथ खबर बना हुआ था तो कोई महिला अपनी कटी चोटी के साथ टीवी पर दिखाई दे रही थी. इन खबरों के बीच उन महिलाओं को आसानी हो गई जो बॉब कट बाल रखना चाहती थीं मगर कतिपय पारिवारिक स्थिति के चलते अपनी इच्छा का गला घोंट दे रही थीं. चोटी कटवा ने कहीं न कहीं उनकी मदद कर दी. ऐसी घटनाओं को जब-जब पढ़ते तो अपने हॉस्टल के मूँछ कटवा की याद आ जाती.

साइंस कॉलेज, ग्वालियर हॉस्टल में हम जैसे बहुत से नए लड़के थे जो दाढ़ी-मूँछ की शुरुआती झलक देखने को तरस रहे थे. इसी के साथ कुछ सीनियर्स भाई बाक़ायदा दाढ़ी-मूँछधारी थे. मूँछ वाले भाइयों को अपनी मूँछ पर इतराना होता था तो बे-मूँछ भाई अपनी जरा-जरा सी रेख को हवा में उमेठते हुए उनके साथ ताल ठोंकते नजर आते. हम जैसे कुछ भाई दाढ़ी-मूँछ धारी भाइयों का आफ्टर शेव लोशन का इस्तेमाल किसी इत्र की करते. दाढ़ी-मूँछ धारी भाइयों में चिंता का विषय होता कि कौन उनके लोशन पर हाथ साफ कर ले रहा है. दाढ़ी-मूँछ न होने के कारण हम लोगों पर कोई शक भी नहीं करता कि हम लोग ऐसा करते होंगे. ऐसी न जाने कितनी शरारतें हॉस्टल की हवा में तैरती-उतराती रहती थीं.

इन तमाम शरारतों के बीच हमारे राकेश शर्मा भाईसाहब (सीनियर्स को सर के स्थान पर भाईसाहब कहने की परम्परा थी) को अजीब सी शरारत सूझी. देर रात वे चुपके से अपने सहपाठी या अपने सीनियर (जो मूँछधारी होते) के कमरे में जाते और तेज़ ब्लेड के एक वार से उसकी एक तरफ़ की मूँछ उड़ा आते थे. उनके द्वारा यह सब इतनी सहजता से किया जाता कि सोये हुए भाई को खबर ही न हो पाती कि राकेश भाईसाहब उसकी मूँछ के साथ क्या कर गए. एक तरफ की मूँछ से वंचित वह भाई जब अगली सुबह अपने  चेहरे को देखता, अपनी एक तरफ की उड़ी हुई मूँछ देखता तो परेशान हो जाता, हैरान भी होता. बाक़ी लोग मौज लेते हुए इसे सात नम्बर कमरे के भूत का काम बताते. हॉस्टल के सात नंबर कमरे को हमने कभी खुले नहीं देखा. ऐसा कहा जाता कि उसमें एक भूत है और इसी कारण उस कमरे को खोला नहीं जाता. वह कमरा किसी को दिया नहीं जाता. उसमें किसी को रुकाया भी नहीं जाता. असलियत क्या थी न किसी ने बताया, न ही जानने की कोशिश की.

बहरहाल बात अपने हॉस्टल के मूँछ कटवा की. दो-चार लोगों की मूँछें उड़ने के बाद पता चल गया कि ये मूँछ उड़ाने वाला भूत कौन है. इस शरारत को राकेश भाईसाहब ने उन्हीं लोगों पर आज़माया जो अपनी ज़रा-ज़रा सी मूँछों पर इतराते फिरते थे. एक तरफ़ की उड़ने के बाद अगला आदमी दूसरे तरफ़ की ख़ुद उड़ाता था. इसके बाद हम सभी ख़ूब मौज लेते थे, बिना मूँछ वाले भाईसाहब की.

ऐसे ही मूँछधारी भाइयों में में एक भाईसाहब हुआ करते थे एम०पी० सिंह कुशवाह. हॉस्टल के मूँछ कटवा ने उनकी भी एक तरफ़ की मूँछ उड़ा दी. इसके बाद भी उन्होंने दूसरे तरफ़ की मूँछ न बनाई. जो मूँछ उड़ा दी गई थी, उस जगह वे तब तक बैंडेज लगाते रहे जब तक कि उनकी मूँछ न आ गई.

पता नहीं ये चोटी-कटवा या मुँहनुचवा किसलिए ऐसा कर रहा था पर हमारे भाईसाहब ने फ़ुल मौज-मस्ती-शरारत में मूँछ कटवा की भूमिका निभाई. इसमें किसी की मारपीट न हुई, किसी को भूत-चुड़ैल न घोषित किया गया. आज भी ये शरारत याद आने पर गुदगुदी सी होने लगती है.


Wednesday, 20 September 2017

और फिर दौड़ पड़ी कार


दीपावली की बात थी. हमारे बच्चा चाचाजी उस समय ग्वालियर में थे और अपनी कार से आये थे. तब तक हमें कार चलानी नहीं आती थी. घर में पहली कार भी वही थी. अपनी पढ़ाई के दौरान ग्वालियर में कई दोस्तों के घर में कार थी पर सोचा करते थे कि जब अपने घर में कार आयेगी तभी चलाना सीखेंगे. 

त्यौहारों पर सभी चाचा लोग यहाँ उरई में इकट्ठा होकर उन्हें हँसी-खुशी से मनाते हैं. अब माहौल भी उमंग भरा था और घर में कार भी खड़ी थी. हमने चाचा से कार सिखाने के लिए कहा तो चाचा ने कहा कि तुम खुद सीख लो. अब समझ नहीं आया कि क्या किया जाये? एक-दो दिन तो ऐसे ही ऊहापोह में गुजर गये. तीसरे दिन हमने और हमारे छोटे भाई ने हिम्मत करके कार की चाबी उठाई और घुस गये कार में. हालत ये थी कि न तो हमें कार चलानी आती थी और न ही हमारे छोटे भाई पिंटू को. चूँकि हमारे घर के पास जगह कम होने के कारण कार सीधी तो आ जाती है पर जब उसे सड़क तक लाना हो तो बैक करके ही ले जाना होता है. कार चलाना सीखना भी था तो समझ नहीं आया कि अभी सीधे-सीधे तो चलानी आती नहीं है बैक कैसे करेंगे? इसके बाद भी हिम्मत करके चाबी लगाई, घुमाई और कार स्टार्ट.

हम बैठे थे ड्राइविंग सीट पर और छोटा भाई बगल में. लगाया बैक गियर और दबाया एक्सीलेटर पर गाड़ी रफ्तार ही न पकड़े. हमने देखा कि हम ब्रेक पर पैर भी नहीं रखे हैं पर गाड़ी चलने के मूड में नहीं दिख रही थी. लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाये. कार को बन्द कर नीचे उतर आये. अबकी छोटा भाई ड्राइविंग सीट पर बैठा कार स्टार्ट और फिर वही स्थिति. कुछ समझ नहीं आया. तभी मोहल्ले के एक भाईसाहब निकले. हमने आवाज देकर उन्हें बुलाया और अपनी समस्या बताई. भाईसाहब ने एक पल की देरी किये बिना कहा कि देखो हैंडब्रेक तो नहीं लगा है?  अब पता तो था नहीं कि ये क्या बला होती है. भाईसाहब ने बताया और उस समस्या को दूर किया. अब कार धीरे-धीरे पीछे को जाने लगी. ऐसा अभी तक आराम से हो रहा था तो हिम्मत भी आ रही थी. जैसे-तैसे चार-पाँच बार कार के बन्द होने के बाद वह सड़क पर आ गई.  

अब लगाया पहला गियर और एक्सीलेटर दबाते ही कार अपनी असल रफ्तार पकड़ गई. अब एक और समस्या, गियर लगायें तो उसी को देखने लगें और पता चले कि कार सड़क के दूसरी ओर भागने लगे. फिर कार को सड़क के बीच में लायें और जब अगला गियर डालें तो फिर वही स्थिति. इस दौरान समझ आ गया कि गियर बदलते समय उसे देखना नहीं है, बस गियर लीवर को आगे-पीछे करना है. लगभग एक घंटे तक सड़क पर कार को हम दोनों भाई दौड़ाते रहे और सीख भी गये.

इस कार सीखने में अच्छाई यह रही कि हमने किसी को चोटिल नहीं किया न ही कार को कहीं टकराया. अगले दिन हम अपनी दादी, अम्मा, चाची को कार में बिठा कर पास के राधा-कृष्ण मंदिर के दर्शन करवाने ले गये. भीड़ में कार चलाना सीखना और फिर परिवार के सदस्यों को घुमाने ने गजब का आत्मविश्वास ड्राइविंग को लेकर पैदा किया जो आज तक बना हुआ है.

चाचा की एक बात आज भी याद आती है जो उन्होंने हम लोगों के लौटने के बाद कही थी कि यदि तुममे कार चलाना सीखने की हिम्मत होगी तो बिना किसी सहारे के सीख लोगे, यदि खुद में हिम्मत न होगी तो हम क्या कोई भी तुमको सिखा नहीं सकेगा. आज लगता है कि यह बात हर एक काम में लागू होती है.



Sunday, 17 September 2017

बदल दिए निर्णय बूढ़े बाबा को देख


घर से कॉलेज, हॉस्टल के लिए वापसी हुई, एक दुःख भरे अध्याय के साथ. बाबा जी के निधन ने जैसे पूरे परिवार को हिलाकर रख दिया था. समस्त पारिवारिक संस्कारों की समाप्ति के बाद कॉलेज आना हुआ. रेलवे स्टेशन से बाहर निकले. रास्ते भर दिमाग तमाम सारे फैसले करते हुए हमसे उनकी स्वीकारोक्ति करवाता जा रहा था. कॉलेज का पहला साल मिश्रित रूप से बीता था. शैक्षणिक अंकों में गिरावट दिखी तो लड़ाई-झगड़ों के ग्राफ में बढ़ोत्तरी दिख रही थी. कुछ ग्राफ बनाये हुए और कुछ ग्राफ काल्पनिक. 

ग्वालियर में कदम रखते हुए सोचा कि अब लड़ाई-झगड़ा बंद. किसी से कोई दुर्व्यवहार नहीं. सोचते-विचारते, आगे की योजनायें बनाते चले जा रहे थे कि तभी कानों में किसी वृद्ध व्यक्ति का कातर स्वर पड़ा. पलटकर देखा तो एक ऑटो वाला एक वृद्ध से लड़ने में लगा हुआ था. कदम एकबारगी उस तरफ बढ़ने को हुए कि रास्ते भर लिए गए तमाम निर्णयों में से एक निर्णय ने अपना सिर उठाया कि नहीं, लड़ना नहीं है. 

अपने बैग को कंधे पर लटका, हमें क्या करना है, जो हो रहा है होने दो, सोचकर टैम्पो पकड़ने की राह चल दिए. मुश्किल से दो-तीन कदम ही चले होंगे कि ऐसा लगा जैसे वह बूढ़ा व्यक्ति रो रहा है. मन न माना और पलट कर देखा तो उस ऑटो वाले ने उस वृद्ध के दोनों झोले अपने कब्जे में ले रखे हैं और बूढ़ा व्यक्ति दोनों हाथ जोड़े वाकई रो रहा है. एकदम दिमाग में विचार कौंधा कि यदि कहीं हमारे बाबा कभी ऐसे अकेले परेशानी में पड़ जाते तो? बस जैसे ही ये विचार उभरा वैसे ही रास्ते भर लिए गए तमाम सारे निर्णयों पर परदा पड़ गया.

बूढ़े व्यक्ति की तरफ तेजी से बढ़े कदम रुकते-रुकते तीन-चार तेज तमाचे ऑटो वाले के चेहरे को लाल कर चुके थे और दोनों झोले बूढ़े बाबा के हाथ में थे. आनन-फानन हुई इस ठुकाई कार्यवाही से ऑटो वाला हड़बड़ा गया. इससे पहले कि हम उन बूढ़े बाबा को प्लेटफॉर्म की तरफ ले जा पाते, आसपास खड़े चार-पांच ऑटो वालों ने हमें घेर लिया और चिल्लाने लगे. हमारे कुछ बोलने-कहने से पहले ही एक सैन्य वर्दीधारी व्यक्ति ने पीछे से आकर तेज आवाज़ में उस चिल्लाहट का कारण जानना चाहा. हमारे पूरी बात बताते ही उसने कहा, बेटा, तू बाबा को छोड़कर आ. इसे मैं देखता हूँ. उस वृद्ध व्यक्ति को प्लेटफॉर्म की तरफ पहुँचाते हुए पलट कर देखा तो ऑटो वाला उस सैन्य वर्दीधारी से दो-तीन तमाचे और खाता नजर आया. 

Tuesday, 15 August 2017

पहले भाषण में मिला सबसे बड़ा सम्मान

किसी भी बच्चे का व्यक्तित्व निखारने में शिक्षा के साथ-साथ उसके अभिभावकों, शिक्षकों की महती भूमिका होती है. यह हमारा सौभाग्य रहा कि प्राथमिक स्तर पर हमें स्कूल भले ही छोटा मिला हो किन्तु सभी दीदियों, आचार्यों ने जिम्मेवारी के भाव से हम बच्चों को सँवारने-निखारने का कार्य किया था. स्कूल में प्रति शनिवार होने वाली बालसभा के कारण विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता बनी रहती थी. 

यह संभवतः कक्षा तीन या चार की बात होगी, गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण होना था. स्कूल में तैयारियाँ जोरों से चल रही थीं. गीत-संगीत वालों का रियाज अलग चल रहा था. भाषण देने वालों को अलग से तैयार किया जा रहा था. मैदान पर खेलकूद में भाग लेने वालों की तैयारियाँ अलग चल रही थीं. बच्चों की खेलकूद सम्बन्धी गतिविधियों के लिए मैदान को साफ़ किया जा रहा था. इन सबके बीच स्कूल के वातावरण में हम बच्चों के बीच एक और बात तैर रही थी कि इस बार के कार्यक्रम में कोई बाहर से आ रहा है, जिसे मुख्य अतिथि कहते हैं. हम बच्चों की छोटी सी बुद्धि में ये समझ से परे था कि ये क्या बला आने वाली है, जिसे मुख्य अतिथि कहते हैं. बस इतना समझ आ रहा था कि उन्हीं मुख्य अतिथि के आने के कारण दीदियाँ समय-समय पर हम सबको समझाती कि उस दिन ड्रेस एकदम साफ़-सुथरी हो. गीत अच्छे से गाना है. अच्छे से भाषण देना है. सबको अनुशासन से एक लाइन में रहना है. हर प्रस्तुति के बाद ताली किस ढंग से बजानी है. और तो सब ठीक था, किसी तरह की कोई समस्या नहीं थी पर हमारे लिए अपनी परेशानी का एक कारण ये था कि ध्वजारोहण के ठीक बाद सबसे पहले भाषण हमारा ही होना था. परेशानी ये भी नहीं थी कि सबसे पहले हमें बोलना है, आखिर प्रति शनिवार बालसभा के कारण कोई शर्म, डर, झिझक किसी से नहीं थी. सबसे बड़ी परेशानी थी तो वो अनजाना शब्द मुख्य अतिथि. पता नहीं ये कौन होगा? ये कैसा होगा? फिर सोचा, है तो कोई व्यक्ति ही, देखा जायेगा उसी समय.

आखिरकार तैयारियों के जोश के बीच गणतंत्र दिवस भी आ गया. हम सभी बच्चे, सभी अध्यापक-अध्यापिकाएँ सजे-संवरे अनुशासन के साथ अपनी-अपनी जगह खड़े हुए मुख्य अतिथि का इंतजार कर रहे थे. कुछ देर बाद हमारे स्कूल के प्रबंधक जी के साथ कुछ लोगों का आना हुआ. मुख्य अतिथि के रूप में एक बुजुर्ग सज्जन से हम सभी का परिचय करवाया गया. वे शहर के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, जिनके बारे में फिर बहुत बाद में विस्तार से पता चला. उनके आने के बाद ध्वजारोहण हुआ. तिरंगे को सलामी दी गई. तालियाँ बजीं. राष्ट्रगान हुआ. इन सबके तुरंत बाद हमारा नाम पुकारा गया. एक किनारे कुर्सियों पर बैठे मुख्य अतिथि, अपने स्कूल के प्रबंधक जी, बड़ी दीदी और अन्य लोगों को नमस्कार करते हुए बताई गई जगह पर आकर खड़े हुए. माइक के सामने खड़े होकर बोलने का ये पहला अनुभव था. मुख्य अतिथि भी अपने आचार्यों जैसे, अपने मोहल्ले के उन बुजुर्गों जैसे लगे जिन्हें हम बाबा कहते थे तो पिछले कई दिनों से चली आ रही एक अनजानी सी घबराहट अपने आप गायब हो गई. माइक के सामने पूरे आत्मविश्वास, संयम, जोश के साथ भाषण शुरू किया और उसी लयबद्धता के साथ समाप्त भी किया. खूब तालियाँ बजीं. देर तक बजती रहीं. सबने खूब तारीफ की.

उसके बाद से आज तक अनगिनत बार माइक का सामना हुआ. अनगिनत बार बिना माइक के भाषण देना पड़ा. दस-बीस लोगों के सामने बोलना हुआ. सैकड़ों की भीड़ को भी सम्बोधित करने का मौका मिला. छोटे से गाँव में जाकर बोलने का अवसर मिला तो देश की राजधानी में वक्तव्य हुआ पर वो पहला भाषण चिरस्थायी रहा. इसलिए भी क्योंकि भाषण समाप्त होते ही मुख्य अतिथि उठकर हमारे पास आये. पीठ ठोंककर उन्होंने हमें अपनी गोद में उठा लिया. एक लड्डू हमारी छोटी सी हथेली में रखकर खूब तरक्की करो, नाम कमाओ का आशीर्वाद दिया. हमारे लिए यह अभी तक का सबसे बड़ा सम्मान और पुरस्कार है.

Sunday, 7 May 2017

बिटोली के माध्यम से सामाजिक क्षेत्र में गतिशीलता


अजन्मी बेटियों के लिए कुछ करने का संकल्प लेकर जब काम करना शुरू किया तो इसका एहसास था कि परेशानी आएगी पर प्रशासनिक स्तर पर ही सहयोग नहीं मिलेगा, यह कतई नहीं सोचा था. विशुद्ध समाजसेवा के रूप में किये जा रहे इस काम में स्वयं को सुरक्षित भी रखना था. यह तब समझ आया जबकि जालौन में संचालित एक नर्सिंग होम का विज्ञापन उरई में लगा देखा. नियमानुसार किसी भी तरह से अल्ट्रासाउंड के द्वारा भ्रूण लिंग जाँच का विज्ञापन भी नहीं किया जा सकता है. 

1998-99 में जिस समय यह काम शुरू किया उस समय बहुतायत लोगों को नियमों की जानकारी नहीं थी. इस अनभिज्ञता का लाभ उठाकर सिर्फ बेटों की चाह रखने वाले दम्पत्तियों को विज्ञापनों के द्वारा आकर्षित करने का कार्य किया जा रहा था. इसी का लाभ उस नर्सिंग होम की संचालक ने उठाया, जो स्वयं चिकित्सक थी. एक छोटी सी होर्डिंग जालौन रोड पर उस गली के मोड़ पर लगी दिखी, जिस गली में एक महिला चिकित्सक का क्लीनिक था. उस होर्डिंग को खुद उतारकर उसके बारे में तत्कालीन मुख्य चिकित्साधिकारी को इसकी सूचना दी. बाद में उरई में ऐसे विज्ञापन कई जगह लगे देखे गए. कई दिन की मशक्कत के बाद उन विज्ञापन वाली होर्डिंग्स को हटवाया और उनकी शिकायत सीएमओ को करने के साथ-साथ मीडिया को भी कर दी. 

हमारे द्वारा की गई इस कार्यवाही को कहाँ से, किसने लीक किया ये तो पता नहीं चला मगर नर्सिंग होम की संचालक चिकित्सक द्वारा हमारे खिलाफ एफआईआर करवाने की, हमको जेल भिजवाने की धमकी का पता चला. आश्चर्य हुआ कि चिकित्सक होने के बाद भी सम्बंधित नर्सिंग होम की संचालिका को नियमों की जानकारी नहीं थी. वे विज्ञापन सम्बन्धी होर्डिंग हटाने को हमारा अपराध समझ धमकी देने में लगी थीं. सीएमओ कार्यालय के द्वारा ही जब उनको नियमों का संज्ञान करवाया गया तो वे उसी रफ़्तार से शांति धारण कर गईं, जिस रफ़्तार से धमकी दी थी.

इस घटना के बाद और भी कई घटनाएँ सामने आईं, जिनमें कई बार लड़ाई-झगड़े जैसी स्थिति बनी. कुछ समय बाद जानकारी मिली कि कानपुर की तरफ से एक मारुति वैन कालपी क्षेत्र में आती है. जिसमें मोबाइल अल्ट्रासाउंड मशीन के द्वारा गर्भवती महिलाओं की जाँच की जाती है. बेटी न चाहने वाले दंपत्ति कानपुर जाकर भ्रूण हत्या करवा आते हैं. इस पर भी कई बार सीएमओ कार्यालय में लिखकर दिया. कई बार नियमित होने वाली पीएनडीटी समिति की बैठक में भी इस मुद्दे को उठाया पर हर बार हमें ही उस मारुति वैन को पकड़ने के लिए कहकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता. बहुत ज्यादा दबाव बनाये जाने पर समिति एक निर्णय सर्वसम्मति से सुना देती कि जाँच करने पर पाया गया कि कोई वैन इस तरह का कृत्य करने जनपद में नहीं आती है.

इसी तरह कालपी में ही राजेश चिकित्सालय के नाम से लिखी वाल पेंटिंग का सबूत देने के बाद भी प्रशासन की तरफ से कोई कार्यवाही नहीं की गई. उस विज्ञापन में स्पष्ट रूप से लिखा था कि वहां सप्ताह के दो दिनों में अल्ट्रासाउंड की सुविधा उपलब्ध है. इसके उलट सीएमओ कार्यालय में पंजीकृत अल्ट्रासाउंड सेंटर्स की सूची में राजेश चिकित्सालय का कहीं नाम भी नहीं था. नियमानुसार राजेश चिकित्सालय के संचालक पर ऐसा लिखवाने के लिए ही कार्यवाही की जानी चाहिए थी मगर कहीं कुछ न हुआ. ऐसा तब हुआ जबकि जिला प्रशासन को भी एक कार्यशाला में इस बारे में सूचित किया गया. किसी भी तरह की सहायता न मिलने पर राजेश चिकित्सालय के दो जगह लिखे विज्ञापनों को खुद हमने जाकर मिटवाया.

एक बार तो लड़ाई की स्थिति बन गई थी. जालौन-हमीरपुर की सीमा पर कदौरा में एक पान की दुकान के ऊपर एक बोर्ड लगे होने की सूचना मिली. उस बोर्ड में अल्ट्रासाउंड करवाएं के अलावा कुछ भी नहीं लिखा हुआ था. न किसी डॉक्टर का नाम, न किसी नर्सिंग होम का नाम, न किसी जगह का नाम, न कोई पता, न कोई फोन नंबर. यहाँ थोड़ी जल्दबाजी या कहें कि हमारे एक स्थानीय परिचित ने हड़बड़ी कर दी. हमने अपने वहाँ के एक परिचित से उस होर्डिंग की सत्यता जाँचने को कहा साथ ही समझाया कि वे खुद मरीज की तरफ बर्ताव करते हुए उस पान वाले से सम्बंधित लोगों की जानकारी एकत्र करने की कोशिश करें. वे महाशय मामले की गंभीरता को समझे बिना अति-उत्साह में उस जगह पहुँचे. उनका अति-उत्साह वहाँ जानकारी तो एकत्रित न कर सका बल्कि झगड़े का कारण बन बैठा. झगड़े का पता चलते ही हम अपने कुछ मित्रों सहित आनन-फानन वहाँ पहुँचे. स्थानीय पुलिस को मामले की गंभीरता समझाने, नियमों की जानकारी देने पर बात आसानी से निपट गई किन्तु एक बड़ा सुराग हाथ आते-आते रह गया. यदि उस दिन झगड़ा न हुआ होता तो संभवतः अजन्मी बेटियों को मारने वाले गैंग का, उनके एजेंट का, मोबाइल वैन का, मोबाइल अल्ट्रासाउंड मशीन का भंडाफोड़ हो गया होता.

तमाम तरह की परेशानियों के बीच काम आज भी चल रहा है. अब सरकार द्वारा इस विषय में रुचि दिखाए जाने से बहुतायत लोगों द्वारा इस ओर कार्य किया जाने लगा है. प्रशासन भी अब नियमित रूप से कार्य करने लगा है. इसके साथ ही तमाम छोटे, बड़े एनजीओ, कॉलेज, स्कूल, कार्यालय, कारखाने आदि तक अपने आपको निगाह में लाने के लिए अब इस दिशा में कार्य कर रहे हैं. सरकार के सक्रिय होने के अलावा सेलिब्रिटी के सक्रिय होने के कारण भी लोगों में इस विषय के प्रति जागरूकता आई है. अच्छा है बेटियों को तमाम परेशानियों के बाद भी जन्म लेने का अवसर मिलने लगा है. इसके बाद भी अभी और जागरूकता की आवश्यकता है. अभी और सजगता की जरूरत है. आखिर जन्म लेने के बाद भी बेटियाँ कहाँ सुरक्षित रह पा रही हैं

पहले जहाँ बेटियों को जन्म लेने देने के लिए लोगों को जागरूक करना था वहीं अब बेटियों की सुरक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करने की जरूरत है. बेटी को प्यार, बहू को अधिकार, आज बेटी को मारोगे, कल बहू कहाँ से लाओगे जैसे नारों के साथ बिटोली अभियान के द्वारा अपेक्षा की जा सकती है कि आने वाले समय में बेटियाँ सुरक्षित रह सकेंगी.