Sunday, 17 September 2017

बदल दिए निर्णय बूढ़े बाबा को देख


घर से कॉलेज, हॉस्टल के लिए वापसी हुई, एक दुःख भरे अध्याय के साथ. बाबा जी के निधन ने जैसे पूरे परिवार को हिलाकर रख दिया था. समस्त पारिवारिक संस्कारों की समाप्ति के बाद कॉलेज आना हुआ. रेलवे स्टेशन से बाहर निकले. रास्ते भर दिमाग तमाम सारे फैसले करते हुए हमसे उनकी स्वीकारोक्ति करवाता जा रहा था. कॉलेज का पहला साल मिश्रित रूप से बीता था. शैक्षणिक अंकों में गिरावट दिखी तो लड़ाई-झगड़ों के ग्राफ में बढ़ोत्तरी दिख रही थी. कुछ ग्राफ बनाये हुए और कुछ ग्राफ काल्पनिक. 

ग्वालियर में कदम रखते हुए सोचा कि अब लड़ाई-झगड़ा बंद. किसी से कोई दुर्व्यवहार नहीं. सोचते-विचारते, आगे की योजनायें बनाते चले जा रहे थे कि तभी कानों में किसी वृद्ध व्यक्ति का कातर स्वर पड़ा. पलटकर देखा तो एक ऑटो वाला एक वृद्ध से लड़ने में लगा हुआ था. कदम एकबारगी उस तरफ बढ़ने को हुए कि रास्ते भर लिए गए तमाम निर्णयों में से एक निर्णय ने अपना सिर उठाया कि नहीं, लड़ना नहीं है. 

अपने बैग को कंधे पर लटका, हमें क्या करना है, जो हो रहा है होने दो, सोचकर टैम्पो पकड़ने की राह चल दिए. मुश्किल से दो-तीन कदम ही चले होंगे कि ऐसा लगा जैसे वह बूढ़ा व्यक्ति रो रहा है. मन न माना और पलट कर देखा तो उस ऑटो वाले ने उस वृद्ध के दोनों झोले अपने कब्जे में ले रखे हैं और बूढ़ा व्यक्ति दोनों हाथ जोड़े वाकई रो रहा है. एकदम दिमाग में विचार कौंधा कि यदि कहीं हमारे बाबा कभी ऐसे अकेले परेशानी में पड़ जाते तो? बस जैसे ही ये विचार उभरा वैसे ही रास्ते भर लिए गए तमाम सारे निर्णयों पर परदा पड़ गया.

बूढ़े व्यक्ति की तरफ तेजी से बढ़े कदम रुकते-रुकते तीन-चार तेज तमाचे ऑटो वाले के चेहरे को लाल कर चुके थे और दोनों झोले बूढ़े बाबा के हाथ में थे. आनन-फानन हुई इस ठुकाई कार्यवाही से ऑटो वाला हड़बड़ा गया. इससे पहले कि हम उन बूढ़े बाबा को प्लेटफॉर्म की तरफ ले जा पाते, आसपास खड़े चार-पांच ऑटो वालों ने हमें घेर लिया और चिल्लाने लगे. हमारे कुछ बोलने-कहने से पहले ही एक सैन्य वर्दीधारी व्यक्ति ने पीछे से आकर तेज आवाज़ में उस चिल्लाहट का कारण जानना चाहा. हमारे पूरी बात बताते ही उसने कहा, बेटा, तू बाबा को छोड़कर आ. इसे मैं देखता हूँ. उस वृद्ध व्यक्ति को प्लेटफॉर्म की तरफ पहुँचाते हुए पलट कर देखा तो ऑटो वाला उस सैन्य वर्दीधारी से दो-तीन तमाचे और खाता नजर आया. 

Tuesday, 15 August 2017

पहले भाषण में मिला सबसे बड़ा सम्मान

किसी भी बच्चे का व्यक्तित्व निखारने में शिक्षा के साथ-साथ उसके अभिभावकों, शिक्षकों की महती भूमिका होती है. यह हमारा सौभाग्य रहा कि प्राथमिक स्तर पर हमें स्कूल भले ही छोटा मिला हो किन्तु सभी दीदियों, आचार्यों ने जिम्मेवारी के भाव से हम बच्चों को सँवारने-निखारने का कार्य किया था. स्कूल में प्रति शनिवार होने वाली बालसभा के कारण विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता बनी रहती थी. 

यह संभवतः कक्षा तीन या चार की बात होगी, गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण होना था. स्कूल में तैयारियाँ जोरों से चल रही थीं. गीत-संगीत वालों का रियाज अलग चल रहा था. भाषण देने वालों को अलग से तैयार किया जा रहा था. मैदान पर खेलकूद में भाग लेने वालों की तैयारियाँ अलग चल रही थीं. बच्चों की खेलकूद सम्बन्धी गतिविधियों के लिए मैदान को साफ़ किया जा रहा था. इन सबके बीच स्कूल के वातावरण में हम बच्चों के बीच एक और बात तैर रही थी कि इस बार के कार्यक्रम में कोई बाहर से आ रहा है, जिसे मुख्य अतिथि कहते हैं. हम बच्चों की छोटी सी बुद्धि में ये समझ से परे था कि ये क्या बला आने वाली है, जिसे मुख्य अतिथि कहते हैं. बस इतना समझ आ रहा था कि उन्हीं मुख्य अतिथि के आने के कारण दीदियाँ समय-समय पर हम सबको समझाती कि उस दिन ड्रेस एकदम साफ़-सुथरी हो. गीत अच्छे से गाना है. अच्छे से भाषण देना है. सबको अनुशासन से एक लाइन में रहना है. हर प्रस्तुति के बाद ताली किस ढंग से बजानी है. और तो सब ठीक था, किसी तरह की कोई समस्या नहीं थी पर हमारे लिए अपनी परेशानी का एक कारण ये था कि ध्वजारोहण के ठीक बाद सबसे पहले भाषण हमारा ही होना था. परेशानी ये भी नहीं थी कि सबसे पहले हमें बोलना है, आखिर प्रति शनिवार बालसभा के कारण कोई शर्म, डर, झिझक किसी से नहीं थी. सबसे बड़ी परेशानी थी तो वो अनजाना शब्द मुख्य अतिथि. पता नहीं ये कौन होगा? ये कैसा होगा? फिर सोचा, है तो कोई व्यक्ति ही, देखा जायेगा उसी समय.

आखिरकार तैयारियों के जोश के बीच गणतंत्र दिवस भी आ गया. हम सभी बच्चे, सभी अध्यापक-अध्यापिकाएँ सजे-संवरे अनुशासन के साथ अपनी-अपनी जगह खड़े हुए मुख्य अतिथि का इंतजार कर रहे थे. कुछ देर बाद हमारे स्कूल के प्रबंधक जी के साथ कुछ लोगों का आना हुआ. मुख्य अतिथि के रूप में एक बुजुर्ग सज्जन से हम सभी का परिचय करवाया गया. वे शहर के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, जिनके बारे में फिर बहुत बाद में विस्तार से पता चला. उनके आने के बाद ध्वजारोहण हुआ. तिरंगे को सलामी दी गई. तालियाँ बजीं. राष्ट्रगान हुआ. इन सबके तुरंत बाद हमारा नाम पुकारा गया. एक किनारे कुर्सियों पर बैठे मुख्य अतिथि, अपने स्कूल के प्रबंधक जी, बड़ी दीदी और अन्य लोगों को नमस्कार करते हुए बताई गई जगह पर आकर खड़े हुए. माइक के सामने खड़े होकर बोलने का ये पहला अनुभव था. मुख्य अतिथि भी अपने आचार्यों जैसे, अपने मोहल्ले के उन बुजुर्गों जैसे लगे जिन्हें हम बाबा कहते थे तो पिछले कई दिनों से चली आ रही एक अनजानी सी घबराहट अपने आप गायब हो गई. माइक के सामने पूरे आत्मविश्वास, संयम, जोश के साथ भाषण शुरू किया और उसी लयबद्धता के साथ समाप्त भी किया. खूब तालियाँ बजीं. देर तक बजती रहीं. सबने खूब तारीफ की.

उसके बाद से आज तक अनगिनत बार माइक का सामना हुआ. अनगिनत बार बिना माइक के भाषण देना पड़ा. दस-बीस लोगों के सामने बोलना हुआ. सैकड़ों की भीड़ को भी सम्बोधित करने का मौका मिला. छोटे से गाँव में जाकर बोलने का अवसर मिला तो देश की राजधानी में वक्तव्य हुआ पर वो पहला भाषण चिरस्थायी रहा. इसलिए भी क्योंकि भाषण समाप्त होते ही मुख्य अतिथि उठकर हमारे पास आये. पीठ ठोंककर उन्होंने हमें अपनी गोद में उठा लिया. एक लड्डू हमारी छोटी सी हथेली में रखकर खूब तरक्की करो, नाम कमाओ का आशीर्वाद दिया. हमारे लिए यह अभी तक का सबसे बड़ा सम्मान और पुरस्कार है.

Sunday, 7 May 2017

बिटोली के माध्यम से सामाजिक क्षेत्र में गतिशीलता


अजन्मी बेटियों के लिए कुछ करने का संकल्प लेकर जब काम करना शुरू किया तो इसका एहसास था कि परेशानी आएगी पर प्रशासनिक स्तर पर ही सहयोग नहीं मिलेगा, यह कतई नहीं सोचा था. विशुद्ध समाजसेवा के रूप में किये जा रहे इस काम में स्वयं को सुरक्षित भी रखना था. यह तब समझ आया जबकि जालौन में संचालित एक नर्सिंग होम का विज्ञापन उरई में लगा देखा. नियमानुसार किसी भी तरह से अल्ट्रासाउंड के द्वारा भ्रूण लिंग जाँच का विज्ञापन भी नहीं किया जा सकता है. 

1998-99 में जिस समय यह काम शुरू किया उस समय बहुतायत लोगों को नियमों की जानकारी नहीं थी. इस अनभिज्ञता का लाभ उठाकर सिर्फ बेटों की चाह रखने वाले दम्पत्तियों को विज्ञापनों के द्वारा आकर्षित करने का कार्य किया जा रहा था. इसी का लाभ उस नर्सिंग होम की संचालक ने उठाया, जो स्वयं चिकित्सक थी. एक छोटी सी होर्डिंग जालौन रोड पर उस गली के मोड़ पर लगी दिखी, जिस गली में एक महिला चिकित्सक का क्लीनिक था. उस होर्डिंग को खुद उतारकर उसके बारे में तत्कालीन मुख्य चिकित्साधिकारी को इसकी सूचना दी. बाद में उरई में ऐसे विज्ञापन कई जगह लगे देखे गए. कई दिन की मशक्कत के बाद उन विज्ञापन वाली होर्डिंग्स को हटवाया और उनकी शिकायत सीएमओ को करने के साथ-साथ मीडिया को भी कर दी. 

हमारे द्वारा की गई इस कार्यवाही को कहाँ से, किसने लीक किया ये तो पता नहीं चला मगर नर्सिंग होम की संचालक चिकित्सक द्वारा हमारे खिलाफ एफआईआर करवाने की, हमको जेल भिजवाने की धमकी का पता चला. आश्चर्य हुआ कि चिकित्सक होने के बाद भी सम्बंधित नर्सिंग होम की संचालिका को नियमों की जानकारी नहीं थी. वे विज्ञापन सम्बन्धी होर्डिंग हटाने को हमारा अपराध समझ धमकी देने में लगी थीं. सीएमओ कार्यालय के द्वारा ही जब उनको नियमों का संज्ञान करवाया गया तो वे उसी रफ़्तार से शांति धारण कर गईं, जिस रफ़्तार से धमकी दी थी.

इस घटना के बाद और भी कई घटनाएँ सामने आईं, जिनमें कई बार लड़ाई-झगड़े जैसी स्थिति बनी. कुछ समय बाद जानकारी मिली कि कानपुर की तरफ से एक मारुति वैन कालपी क्षेत्र में आती है. जिसमें मोबाइल अल्ट्रासाउंड मशीन के द्वारा गर्भवती महिलाओं की जाँच की जाती है. बेटी न चाहने वाले दंपत्ति कानपुर जाकर भ्रूण हत्या करवा आते हैं. इस पर भी कई बार सीएमओ कार्यालय में लिखकर दिया. कई बार नियमित होने वाली पीएनडीटी समिति की बैठक में भी इस मुद्दे को उठाया पर हर बार हमें ही उस मारुति वैन को पकड़ने के लिए कहकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता. बहुत ज्यादा दबाव बनाये जाने पर समिति एक निर्णय सर्वसम्मति से सुना देती कि जाँच करने पर पाया गया कि कोई वैन इस तरह का कृत्य करने जनपद में नहीं आती है.

इसी तरह कालपी में ही राजेश चिकित्सालय के नाम से लिखी वाल पेंटिंग का सबूत देने के बाद भी प्रशासन की तरफ से कोई कार्यवाही नहीं की गई. उस विज्ञापन में स्पष्ट रूप से लिखा था कि वहां सप्ताह के दो दिनों में अल्ट्रासाउंड की सुविधा उपलब्ध है. इसके उलट सीएमओ कार्यालय में पंजीकृत अल्ट्रासाउंड सेंटर्स की सूची में राजेश चिकित्सालय का कहीं नाम भी नहीं था. नियमानुसार राजेश चिकित्सालय के संचालक पर ऐसा लिखवाने के लिए ही कार्यवाही की जानी चाहिए थी मगर कहीं कुछ न हुआ. ऐसा तब हुआ जबकि जिला प्रशासन को भी एक कार्यशाला में इस बारे में सूचित किया गया. किसी भी तरह की सहायता न मिलने पर राजेश चिकित्सालय के दो जगह लिखे विज्ञापनों को खुद हमने जाकर मिटवाया.

एक बार तो लड़ाई की स्थिति बन गई थी. जालौन-हमीरपुर की सीमा पर कदौरा में एक पान की दुकान के ऊपर एक बोर्ड लगे होने की सूचना मिली. उस बोर्ड में अल्ट्रासाउंड करवाएं के अलावा कुछ भी नहीं लिखा हुआ था. न किसी डॉक्टर का नाम, न किसी नर्सिंग होम का नाम, न किसी जगह का नाम, न कोई पता, न कोई फोन नंबर. यहाँ थोड़ी जल्दबाजी या कहें कि हमारे एक स्थानीय परिचित ने हड़बड़ी कर दी. हमने अपने वहाँ के एक परिचित से उस होर्डिंग की सत्यता जाँचने को कहा साथ ही समझाया कि वे खुद मरीज की तरफ बर्ताव करते हुए उस पान वाले से सम्बंधित लोगों की जानकारी एकत्र करने की कोशिश करें. वे महाशय मामले की गंभीरता को समझे बिना अति-उत्साह में उस जगह पहुँचे. उनका अति-उत्साह वहाँ जानकारी तो एकत्रित न कर सका बल्कि झगड़े का कारण बन बैठा. झगड़े का पता चलते ही हम अपने कुछ मित्रों सहित आनन-फानन वहाँ पहुँचे. स्थानीय पुलिस को मामले की गंभीरता समझाने, नियमों की जानकारी देने पर बात आसानी से निपट गई किन्तु एक बड़ा सुराग हाथ आते-आते रह गया. यदि उस दिन झगड़ा न हुआ होता तो संभवतः अजन्मी बेटियों को मारने वाले गैंग का, उनके एजेंट का, मोबाइल वैन का, मोबाइल अल्ट्रासाउंड मशीन का भंडाफोड़ हो गया होता.

तमाम तरह की परेशानियों के बीच काम आज भी चल रहा है. अब सरकार द्वारा इस विषय में रुचि दिखाए जाने से बहुतायत लोगों द्वारा इस ओर कार्य किया जाने लगा है. प्रशासन भी अब नियमित रूप से कार्य करने लगा है. इसके साथ ही तमाम छोटे, बड़े एनजीओ, कॉलेज, स्कूल, कार्यालय, कारखाने आदि तक अपने आपको निगाह में लाने के लिए अब इस दिशा में कार्य कर रहे हैं. सरकार के सक्रिय होने के अलावा सेलिब्रिटी के सक्रिय होने के कारण भी लोगों में इस विषय के प्रति जागरूकता आई है. अच्छा है बेटियों को तमाम परेशानियों के बाद भी जन्म लेने का अवसर मिलने लगा है. इसके बाद भी अभी और जागरूकता की आवश्यकता है. अभी और सजगता की जरूरत है. आखिर जन्म लेने के बाद भी बेटियाँ कहाँ सुरक्षित रह पा रही हैं

पहले जहाँ बेटियों को जन्म लेने देने के लिए लोगों को जागरूक करना था वहीं अब बेटियों की सुरक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करने की जरूरत है. बेटी को प्यार, बहू को अधिकार, आज बेटी को मारोगे, कल बहू कहाँ से लाओगे जैसे नारों के साथ बिटोली अभियान के द्वारा अपेक्षा की जा सकती है कि आने वाले समय में बेटियाँ सुरक्षित रह सकेंगी.



Sunday, 23 April 2017

बाल स्वयंसेवक के रूप में शाखा से परिचय


पहली बार जब शब्द सुना था शाखा तो कुछ समझ नहीं आया था. घर के पास के पुलिस चौकी वाले मैदान में खेलते समय मोहल्ले के पुराने बच्चों ने शाखा चलने के लिए कहा. चूँकि मोहल्ले में आये अभी महीना भर हुआ था और उस पर ये शाखा चलना, घर से पूछकर आने की कहकर उस दिन शाखा जाना टाल दिया. घर आकर अम्मा से बताया और बात पिताजी तक पहुँची. घर में अनुशासन था मगर बेबात रोकटोक नहीं, सो पिताजी ने बिना अनुमति दिए कहा कि पहले उनको घर बुलाओ. अगले दिन हमने बात ज्यों की त्यों कह दी. शाखा लगाने वाले भाईसाहब मोहल्ले के ही थे और हमारे घर से परिचित. पिताजी से मिलने आये. पिताजी की अपनी सामाजिक, राजनैतिक सक्रियता के चलते सभी लोग उनसे परिचित थे. मोहल्ले के नाते पिताजी भी उन भाईसाहब लोगों के नाम से परिचित थे. आज भी याद है कीर्ति दीक्षित भाईसाहब, दिगम्बर भाईसाहब, स्वतंत्रदेव भाईसाहब (जो कांग्रेस सिंह के नाम से भी जाने जाते हैं) अजय भाईसाहब, कमलेश भाईसाहब, कौशल किशोर भाईसाहब के साथ और भी तीन-चार लोगों का घर आना हुआ. 

अगले दिन से सायं शाखा, जो घर के पास बने पाठक के बगीचा में लगती थी, हम तीनों भाइयों का जाना शुरू हो गया. भगवा ध्वज को देखकर तब भी दिल में हिलोरें उठती थी, आज भी उठती हैं. शुरू में वंदना याद करने में दिक्कत आई मगर एक बार याद वंदना अब भी भली-भांति याद है. एक बात जो वहाँ विशेष लगी जिसे आज के माहौल में बार-बार याद करने की आवश्यकता है कि शाखा में किसी एक दिन भी ऐसी कोई बात नहीं सुनाई दी जिससे विभेद दिखाई दे, जिससे प्रेम-सौहार्द्र में तनाव दिखाई दे, जिससे कटुता फैले. शाखा में समय-समय पर बड़े भाइयों द्वारा बौद्धिक भी दिया जाता. उसमें भी किसी रूप में किसी धर्म, मजहब, जाति के विरुद्ध किसी तरह की कोई बात नहीं की जाती. इसके उलट समय-समय पर सामाजिक कार्यों में सहभागिता करवाई जाती रही. सामाजिक विद्वेष को दूर करने सम्बन्धी कदम उठाये जाने की सीख दी जाती. कैसे समाज में लोगों की मदद की जा सकती है इसके बारे में बताया-समझाया जाता.

बहरहाल, तब से शाखा के संस्कार उसी तरह चले आ रहे हैं. समाज में स्वयंसेवक कहलाना आज भी गर्व का विषय है. कतिपय राजनीति के चलते लोगों ने संघ को बदनाम करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी, ये उनका चरित्र है. हमने अपनी सामाजिकता नहीं छोड़ी, ये हमारा चरित्र है.


Thursday, 16 March 2017

भुलाना उन्हें सम्भव ही नहीं, फिर से मिल पाना जिनसे मुमकिन ही नहीं


सन् 2005 की सुबह, फोन की घंटी घनघनाई और फिर शुरू हुआ आशंकाओं, चिन्ताओं का दौर. जो पास नहीं था, उसकी चिन्ता शुरू; कैसे, क्यों, क्या, कब जैसे सवालों की मार स्वयं पर सहते और स्वयं ही उसका जवाब देते. दोनों छोटे भाई निकल चुके थे और हम घर पर. सभी के मन में दुश्चिन्ताओं ने अपना कब्जा जमा रखा था. फोन पर फोन और जवाब में बस घंटी पर घंटी ही बजती रही. रास्ते में चले जा रहे छोटे भाइयों के साथ इस समस्या को बाँटने का मतलब था उनके मन में और ज्यादा परेशानियाँ भर देना. आखिरकार बात हुई, अम्मा से, चाचा से, चाची से, सबने धीरज बँधाया, दिलासा दी पर हम चिन्ताओं को कम न कर सके.

होते-होते शाम आ गई, वो शाम जिसने उस अँधियारी भरी खबर को सुनाया जो कालिख सुबह ही छा चुकी थी. शाम को पिताजी के अभिन्न मित्र, हमारे पारिवारिक सदस्य दादा का आना हुआ, साथ में दो-चार और लोग भी. आते ही उन्होंने पिताजी की तबियत के बारे में जानकारी ली. उनके द्वारा जानकारी लेने ने उन सभी संदेहों को मिटा दिया जो सुबह से दिमाग में उथल-पुथल मचाये हुए थे. आँसू भरी आँखों और भरे गले से इतना ही पूछ पाए, पिताजी को क्या हुआ? दादा ने जो स्नेहिल हाथ हमारे सिर पर फिराया उसका एहसास आज तक बना हुआ है.

बिना किसी के कुछ कहे सब स्पष्ट हो गया. दोपहर बाद से जो दिलासा दी जा रही थी वो सब सिर्फ तसल्ली देने के लिए थी. वो डरावनी शाम कैसे आँसुओं भरी रात में बदली आज भी समझ नहीं आया. लोगों का आना-जाना, समझाना और हमारा पूरा ध्यान अपनी जिम्मेवारियों पर, अपनी अम्मा पर, अपने दोनों छोटे भाईयों पर, जो पिताजी के पास पहुँचने को सुबह ही निकल चुके थे. अम्मा ने कैसे अपने को संभाला होगा? दोनों भाइयों ने कैसे समूची स्थिति का सामना किया होगा? कैसे पिताजी को इस रूप में देखा होगा?

आँसुओं का सैलाब बह निकला, दिलासा जो सुबह मिली थी वह झूठ साबित हुई, विश्वास जो अपने आपसे कर रहे थे वह बना न रह सका. अब इन्तजार ही किया जा रहा था. एकाएक सब कुछ लुटा-पिटा सा लगने लगा. सब कुछ होते हुए भी खाली-खाली सा. अपने को सँभाल कर वास्तविकता को स्वीकारा, मन को सँभाला और अब चिन्ता शुरू हुई अम्मा की, दोनों छोटे भाइयों की. कैसे सँभाला होगा दोनों ने अपने को? कैसे अम्मा ने नियंत्रित होकर सुबह हमें दिलासा दी थी? कैसे दोनों भाइयों को हिम्मत बँधाई होगी? चिन्ताओं के बीच, मन ही मन अपने आँसुओं को बहाने के बीच शुरू हुआ सामाजिक परम्पराओं के निर्वहन का दौर. हमारा और हमारे अभिन्न मित्रों के द्वारा रिश्तदारों, नातेदारों, मित्रों, सगे-सम्बन्धियों को फोन से सूचना देने का कष्टकारी दौर. हर फोन पर आँसू, हर फोन पर हिचकी और सांत्वना के दो बोल, दिलासा देते लरजते शब्द.

रात भर याद करते रहे पिताजी के साथ गुजारे अपने छोटे से 31 साल के सफर को. हम दोनों पति-पत्नी एक दूसरे को दिलासा देते रात भर इंतजार करते रहे, अन्तिम बार देख लेने का. आँखों ही आँखों में, आँसुओं में भीगी-भीगी रात समाप्त हुई, सुबह भी हुई किन्तु उजाला सा नहीं दिख रहा था. जिम्मेवारियों का निर्वहन, सामाजिक परम्पराओं का निर्वहन सब कुछ कैसे होगा, किस तरह होगा पता नहीं चल रहा था.

रुलाती-रुलाती घड़ी आ गई, आया साथ में पिताजी का पार्थिव शव और साथ में रोते-बिलखते परिवारीजन. सबको सांत्वना भी देना और स्वयं को नियंत्रित रखना, लगा कि कितनी बड़ी जिम्मेवारी एकाएक आ गई है सिर पर. परिवार में सबसे बड़े पुत्र होने का अभिमान हमेशा रहा और छोटों के लिए कुछ भी कर जाने के एहसास ने हमेशा छोटों से आदर-स्नेह भी प्राप्त होता रहा. इस बड़े होने के भाव की जिम्मेवारी इस समय समझ में आ रही थी. अपने आँसुओं को छिपाते हुए छोटों के आँसू पोंछने का काम करते, अम्मा को सँभालते, छोटों को दुलराते हुए अन्तिम यात्रा की तैयारी भी चलती जा रही थी.

संस्कारों, परम्पराओं के बीच प्रज्ज्वलित अग्नि में स्वाहा हो गया वो शरीर जिसके साथ हमने अपने व्यक्तित्व को उभरते देखा. वो आँखें जो एक सपना लेकर जीती रहीं और हमें एक अनुशासन और स्वाभिमान सिखातीं रहीं. वो हाथ जिन्होंने हमें चलना भी सिखाया और लिखना भी सिखाया, जिसके आशीष में हमने अपने आपको सदैव कष्टों से दूर रखा. लौट आये हम अपने आपको एकदम तन्हा सा करके. लौट आये हम अपने आपको अपनों से जुदा करके. लौट आये हम मिट्टी के शरीर को राख बनाकर. लौट आये हम कभी भी न भुलाने वाली यात्रा को लेकर.
आज भी लगता है कि जैसे कल की ही बात हो. पारिवारिक, सामाजिक मान्यताओं के साथ-साथ पिताजी के अनुशासन के चलते उनसे कम से कम बातचीत, काम की बातचीत के चलते उस रात एहसास हुआ कि अपने ही पिताजी से कभी खुलकर बात न कर पाए. आज भी बात कचोटती है पिताजी से बहुत बातचीत न हो पाने की. एक वो समय था और एक आज के बाप-बेटे हैं, लगता है जैसे दो मित्र हैं अलग-अलग आयुवर्ग के. क्या सही है, क्या गलत पता नहीं क्योंकि सही अपना समय भी नहीं लगता आज और आज का समय भी हमें नहीं सुहाया आज तक.

बहरहाल, एक दशक से अधिक समय हो गया पिताजी को गए. अब बस आसपास के आयोजन, आसपास की हलचल, घर-परिवार की क्रियाविधि, क्रियाकलाप देखकर इतना ही कह पाते हैं कि पिताजी होते तो ऐसा होता, ऐसा न होता. बहुत कुछ अधूरा रह गया था, उनके द्वारा देखना, उनके द्वारा पूरा करना. कोशिश तो बराबर रही कि हम पूरा कर सकें, बड़े होने के नाते सभी छोटों को उनकी कमी न महसूस होने दें मगर पिता तो पिता ही होता है, कोई भी उसकी जगह नहीं ले सकता. हम भी नहीं ले सके हैं, नहीं ले सकेंगे क्योंकि हमारे पिताजी वाकई हमारे पूरे परिवार की धुरी थे, आज भी होंगे, यही सोचकर उनके सोचे हुए काम पूरे करने की कोशिश में हैं. अब इसमें कितना सफल होंगे, ये तो आने वाला वक्त बताएगा, परिवार के बाकी लोग बताएँगे.

आज भी आँख बन्द करते हैं तो अपने आसपास अपने पिताजी का होना पाते हैं. याद करते हैं बीते पलों को और सोचते हैं कि काश! ऐसा कर लिया होता, वैस कर लिया होता. वे होते तो ऐसा करते, वे करते तो कुछ ऐसा होता. अब बस यादें ही यादें. कुछ दुलराती, कुछ गुदगुदाती यादें, कुछ हँसाती तो कुछ मधुरता बिखेरती किन्तु अब तो हर याद में आँखें नम होतीं हैं, हर याद में.

भुलाना उन्हें सम्भव ही नहीं, फिर से मिल पाना जिनसे मुमकिन ही नहीं! यादों में ही मिलने का जतन करते हैं, सपनों में उन्हें खोजने का प्रयत्न करते हैं. बहते आँसुओं के साथ पल-पल उनको याद करते हुए. बस याद ही करते हुए, यादों में ही बसाये हुए उनके बताये-बनाये रास्तों पर आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे. 


Wednesday, 15 March 2017

ख़ुशी का पल समेटे आना हुआ भांजेश्री का


हम सभी लोग हॉस्पिटल की पहली मंजिल पर बने बरामदे के बाहर बैठे हुए थे. चाचा-चाची, बहनोई साहब संदीप सिंह और हम. हॉस्पिटल में बैठे होने के बाद भी किसी के चेहरे पर तनाव नहीं था. सभी को खुशखबरी का इंतजार था. वहाँ बैठे हम लोगों में कुछ देर बाद कोई पापा बनने वाला था, कोई नाना-नानी बनने वाला था और हम मामा बनने वाले थे. हम सभी लोग हँसी-ख़ुशी ऑपरेशन थियेटर की तरफ जाते गलियारे पर अपनी-अपनी निगाहें टिकाये हुए थे. छोटी बहिन दीपू की पहली संतति संसार में आँखें खोलने का इंतजार कर रही थी. ऐसे खुशनुमा माहौल में हमारे बहनोई साहब थोड़ा व्याकुल से नजर आ रहे थे. उनकी व्याकुलता जहाँ ऑपरेशन को लेकर थी वहीं वे अपने पापा जी के वहां न दिखाई पड़ने से भी चिंतित दिख रहे थे. एक-दो बार ऊपर-नीचे देख आने के बाद भी पापा जी उनको न दिखाई दिए. 

वे और हम भी दो-तीन बार ऑपरेशन थियेटर की तरफ चक्कर लगाकर खुशखबरी का पता-ठिकाना पूछ चुके थे. इसी बीच बहनोई साहब कुछ प्रसन्न सी मुद्रा में और भी ज्यादा आकुलता से अपने पापा को खोजने लगे. ऑपरेशन थियेटर की तरफ से प्रसव सुरक्षित होने का इशारा मिला तो हम सब ख़ुशी से झूम उठे. दरवाजे पर नर्सों की एक झलक पाकर उनसे होने वाले बच्चे के बारे में जानना चाहा, उसके स्वास्थ्य के बारे में जानना चाहा, बच्चा लड़का है या लड़की जानना चाहा पर वे मुस्कुराकर अन्दर चली गईं. संभवतः बहनोई साहब ने उनको न बताने के लिए कह रखा था. उसके पीछे का कारण ये भी समझ आया कि वे सबसे पहले इस खुशखबरी को अपने पापा को देना चाहते होंगे. उनसे भी जानने की कोशिश की तो वे हाथ उठाकर मुस्कुराते हुए पापा की खोज में नीचे उतर गए.

सब्र यहाँ किसी को नहीं था, आखिर हम भी मामा बन रहे थे. चाचा-चाची भी नाना-नानी बन रहे थे. बहनोई साहब के नीचे उतरते ही हम बरामदे से लगे बगल के कमरे में घुसे. इसी कमरे से ऑपरेशन थियेटर का रास्ता जाता था, जो नर्सिंग होम के स्टाफ द्वारा उपयोग किया जाता था. जिन नर्सों की झलक दिखाई पड़ी थी, उनमें से दो वहीं बैठी थीं. हमने थोड़ी तेज आवाज़ में कहा, कहाँ है बच्चा? भोपाल शहर की आबोहवा में बुन्देलखण्ड की तेज़ आवाज़ सुनकर वे शायद सहम सी गईं. ये जानते-समझते ही हमने उनसे कहा कि हम बच्चे के सबसे बड़े मामा हैं. उसमें से एक नर्स ने मुस्कुराकर रुकने का इशारा किया. 

अगले पल ही वो अपनी गोद में नन्हे से भांजे को लेकर प्रकट हो गई. उसके हाथ से हमने अपने हाथों में लेकर उसके माथे पर आशीर्वाद स्वरूप अपने होंठ लगा दिए. कोमल, मुलायम, मासूम से अपने भांजे को एक निगाह जी भर कर देखने के बाद उसे उसी नर्स के सुरक्षित हाथों में सौंप दिया. ख़ुशी जैसे रोम-रोम से प्रकट हो रही थी. पर्स से कुछ रुपये निकालकर नवजात शिशु की न्योछावर करके नर्स से कहा कि किसी कामवाली बाई को दे देना. एक नर्स ने हँसकर कहा कि क्या मामा जी, हमने भांजे के दर्शन करवाए, हमें कोई नजराना नहीं? बिना कुछ कहे, मुस्कुराकर उन तीनों को भी यथोचित नजराना देकर हम बाहर आ गए.

इसी दौरान बहनोई साहब अपने पापा जी को लेकर मिठाई सहित आ गए. उनके पापा जी गहरी धार्मिक आस्था वाले सुकोमल, सहृदय व्यक्ति हैं. वे उसी समय से नर्सिंग होम के पास बने एक छोटे से मंदिर के सामने ध्यानमग्न होकर भगवान की साधना में बैठ गए थे जैसे ही दीपू को ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया था. जिस समय हम अन्दर अपने भांजे को देख रहे थे, उसी समय बहनोई साहब ने आकर नवजात शिशु के लड़का होने की बात सबको बताई. हमें गायब देखकर हमारे बारे में वे पूछ ही रहे थे कि हमने अन्दर से आकर सबको आश्चर्य में डाल दिया कि हम सबसे पहले अपने भांजे से मिल आये.

हॉस्पिटल में कुछ दिन रुकना पड़ा. चाची, बहनोई साहब, हम लगातार समय-समय से रुकते. नर्सिंग होम से छुट्टी मिलने पर हम ही अपने भांजे, छोटी बहिन दीपू को लेकर उनके घर पहुँचे, जहाँ उसके चाचा अपने पहले भतीजे के इंतजार में पटाखे सजाये बैठे थे. आतिशबाजी के साथ पापा, मम्मी, छोटू ने अपने परिवार के नए सदस्य का स्वागत किया. 

हमारे भांजे श्री आज भी हम सबके अत्यंत प्रिय हैं. हमारे बाद की पीढ़ी में हमारे परिवार की पहली संतति होने के कारण, पहले भांजे होने के कारण प्रिय तो हैं ही. इसके अलावा यह संयोग ही कहा जायेगा कि उसके जन्म के कुछ समय बाद छोटी बहिन दीपू की ट्रेनिंग उरई रहकर ही पूरी हुई और फिर उसकी नियुक्ति भी उरई के नजदीक उन्नाव में हो गई. इससे भी नियमित रूप से भांजे श्री से हम सबका संपर्क बना रहा. बचपन के साथ-साथ अपना कैशौर्य भी ननिहाल वालों के साथ गुजारने के कारण भी वे हम सबके प्रिय बने हुए हैं.

बुन्देलखण्ड में मामा-भांजे का जो रिश्ता है, उस रिश्ते के चलते वो सारे मामाओं की हँसी-मजाक का शिकार भी बनता है. इसका एक उदाहरण हमारे द्वारा किया गया उसका नामकरण भी है. सबके द्वारा बुलाये जाने वाले सनय सिंह अपने जन्म से ही हमारे द्वारा कल्लू सिंह पुकारे जा रहे हैं, अभी भी इसी नाम से पुकारे जाते हैं. मुँह बनाकर उसका चिढ़ना होता रहता है और हमारे साथ-साथ उसके और मामा लोग भी उसे चिढ़ाने का आनंद लेने लगते हैं.



Sunday, 12 March 2017

होली का हुड़दंग रेलवे स्टेशन तक


होली आये और होली में किये हुए हुड़दंग भी याद न आयें तो समझो कि होली मनाई ही नहीं. हम लोग संयुक्त परिवार में रहते आये हैं और बचपन से ही सभी परिजनों के साथ ही होली का मजा लूटते रहे हैं. होली जलने की रात से शुरू हुआ धमाल कई-कई दिनों तक चलता रहता था. बचपन में अपने बड़ों की मदद से होली का हुड़दंग किया जाता था जो बड़े होने पर स्वतंत्र रूप में बदल गया. हॉस्टल का माहौल पारिवारिकता से भरपूर था. हम सभी छात्रों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं था. पहला ही साल था और हम सभी मिलकर दीपावली, दशहरा आदि अपने-अपने घरों में मनाने के पहले हॉस्टल में एकसाथ मना लिया करते थे. इसी विचार के साथ कि होली भी घर जाने के पहले हॉस्टल में मना ली जायेगी सभी कुछ न कुछ प्लानिंग करने में लगे थे.

हम कुछ लोगों का एक ग्रुप इस तरह का था जो हॉस्टल की व्यवस्था में कुछ ज्यादा ही सक्रिय रहा करता था. इसी कारण से उन दिनों हॉस्टल की कैंटीन की जिम्मेवारी हम सदस्यों पर ही थी. होली की छुट्टियां होने के ठीक दो-तीन दिन पहले रविवार था. रविवार इस कारण से हम लोगों के लिए विशेष हुआ करता था कि उस दिन एक समय, सुबह ही, भोजन बना करता था. खाना बनाने वाले को रात के खाने का अवकाश दिया जाता था. इसी वजह से रविवार को पूड़ी, सब्जी, खीर, रायता आदि बनाया जाता था.

हम सदस्यों ने सोचा कि कुछ अलग तरह से इस दिन का मजा लिया जाये. हमारी इस सोच में और तड़का इससे और लग गया जब पता चला कि हॉस्टल के बहुत से छात्र उसी रविवार को अपने-अपने घर जा रहे हैं. रविवार के भोजन को खास बनाने की योजना हम दोस्तों तक रही और अन्य सभी छात्रों के साथ आम सहमति बनी कि होली इसी रविवार को खेली जायेगी, उसके बाद ही जिसको घर जाना है वो जायेगा. अपनी योजना के मुताबिक उस दिन खीर में खूब सारी भांग मिलवा दी. इस बात की चर्चा किसी से भी नहीं की. सभी ने मिलकर खाना खाया और हम दोस्तों ने सभी को खूब छक कर खीर खिलवाई. मीठे के साथ भांग का नशा और उस पर होली की हुड़दंग का सुरूर. हॉस्टल के सभी छात्रों पर तो जैसे मस्ती खुद आकर विराज गई हो. खूब दम से होली खेली जाने लगी, टेप चलाकर गानों के साथ नाच भी शुरू हुआ. किसी के बीच सीनियर-जूनियर जैसी बात नहीं दिख रही थी.

इसी बीच कुछ छात्र जो होली नहीं खेलना चाहते थे और उन्हें घर भी जाना था, सो उन्होंने खीर भी इतनी नहीं खाई थी कि नशा उनको अपने वश में करता. ऐसे लगभग पांच-छह छात्रों ने हॉस्टल की दीवार फांदकर रेलवे स्टेशन की ओर भागना शुरू किया. उनके दीवार फांदने का कारण ये था कि हम सभी रंगों से भरी बाल्टी आदि लेकर दरवाजे पर ही बैठे थे ताकि कोई भी बिना रंगे घर न जा पाये. हम लोगों को भनक लग गई कि कुछ लोग जो हमारी इस होली में साथ नहीं हैं वे पीछे से भाग गये. बस फिर क्या था, होली का हुड़दंग सिर पर चढ़ा हुआ था, भांग का नशा अपनी मस्ती दिखा ही रहा था, हम सभी जो जिस तरह से बैठा था वैसे ही रेलवे स्टेशन की तरफ दौड़ पड़ा. 

कोई नंगे पैर तो कोई एक पैर में चप्पल-एक पैर में जूता बिधाये; कोई शर्ट तो पहने है पर पैंट गायब तो कोई नंगे बदन दौड़े ही जा रहा था. और तो और उन्हें रंगना भी था जो बिना रंगे निकल पड़े थे तो हाथों में रंगों से भरी बाल्टी भी लिये सड़क पर दौड़ चल रही थी. आप सोचिए कि बिना होली आये, होली जैसी मस्ती को धारण किये एकसाथ दस-पंद्रह लड़के बिना किसी की परवाह किये सड़क पर दौड़े चले जा रहे थे. लगभग चार-पांच किमी की दौड़ लगाने के बाद स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर हुरियारों की टोली पहुंच ही गई, वे भी स्टेशन पर बरामद कर लिए गये जिनको रंगना था. बस फिर क्या था चालू हो गई होली रेलवे स्टेशन पर ही. मस्ती का मूड, भांग का सुरूर, अपने साथियों को रंगने के बाद अपनी तरह के ही कुछ मस्ती के दीवाने यात्रियों को भी रंगना शुरू किया गया. कुछ देर का हुल्लड़ देखने के बाद प्लेटफॉर्म पर बनी चौकी के सिपाहियों ने आकर दो-दो हाथ  करने चाहे तो रंगीन हाथ उनके साथ भी हो गये. बाद में समझाने पर सभी वापस हॉस्टल लौट आये.

भांग का नशा तो दूसरे दिन दोपहर तक उतर गया किन्तु सिर का भारीपन दो दिनों तक बना रहा. इसी भारीपन में नीबू चूस-चूस कर अपनी प्रयोगात्मक परीक्षा दी, जो सोमवार को सुबह सम्पन्न हुई. रेलवे स्टेशन की हमारी होली की खबर हमारे हॉस्टल वार्डन डॉ० धीरेन्द्र सिंह चन्देल साहब के पास तक आ चुकी थी. सभी प्रोफेसर्स को भी पता था कि हम लोग किस तरह की मस्ती के बाद प्रयोगात्मक परीक्षा दे रहे हैं. यह तो भला हो उन सभी गुरुजनों का जिन्होंने पूरे सहयोग के साथ हमारी होली के आनन्द और प्रयोगात्मक परीक्षा के बीच संतुलन बिठा दिया.

आज भी कभी-कभी होली में भांग का स्वाद लेने का प्रयास किया जाता है तो हॉस्टल की होली और रेलवे स्टेशन का हुड़दंग याद आये बिना नहीं रहता है.