Monday, 21 March 2016

उन बच्चों के लिए बुरा बनना भी सही लगा


संस्कार, कार्यप्रणाली सोच विरासत में मिलती है या नहीं इसके बारे में बहुत अनुभव नहीं है मगर हमारे स्वभाव में, व्यक्तित्व में बहुत कुछ ऐसा है जो हमारे अन्दर स्वतः ही जन्मा. ऐसे लक्षणों के लिए हमें प्रयास नहीं करने पड़े. बिना प्रयास ऐसे गुणों का, लक्षणों का प्रकट होना बताता है कि ये जन्म से आये होंगे या फिर पारिवारिक संस्कारों के चलते विरासतन हस्तांतरित हो गए. समय के साथ इन गुणों में कमी तो नहीं आई वरन वृद्धि ही होती रही. ऐसे ही गुणों में से एक को जरूरतमंदों की, मजबूर लोगों सहायता करने के रूप में देखा-समझा जा सकता है. उस समय भी जबकि जेबखर्च के नाम पर गिनी-चुनी पूँजी जेब के अन्दर आती थी. उसी अल्पराशि में हॉस्टल के मैस का शुल्क, दूध, चाय आदि सहित अन्य खाद्य सामग्री, मासिक स्टेशनरी आदि के खर्चों के बाद इतना बचना संभव नहीं हो पाता कि किसी जरूरतमंद की सहायता की जा सके. इसके बाद भी दिल-दिमाग में जूनून सा रहता था कि कुछ न कुछ उन बच्चों के लिए करना है. 

वे बच्चे सड़क पर टहलने वाले, भीख माँगने वाले नहीं थे. वे ऐसे बच्चे थे जो अपनी दुनिया को सिर्फ सुन सकते थे. अपनी हथेलियों, अपनी नाक के सहारे दुनिया को महसूस करते थे. वे थे हॉस्टल के सामने बने अंध विद्यालय के नेत्रहीन बच्चे. हॉस्टल से निकलते ही सामने सड़क पार अंध आश्रम दिखाई देता था. एक दिन अचानक ही उसमें जाना हुआ. दुनिया की अंधी चकाचौंध से बहुत दूर वे बच्चे अपनी ही दुनिया में मगन थे. उनकी हालत देख, उनके रहने के ढंग को देख, उनकी जरूरत, उनकी इच्छाओं को देख मन रो पड़ा. अचानक से अपनी मौज-मस्ती बेकार सी लगने लगी. संवेदनाओं से खुद ही लड़ते हुए मन ही मन उनके लिए कुछ करने का विचार किया. इस विचार के साथ खुद अपनी पढ़ाई का बोझ, कम से कम खर्च में महीने का बजट बनाये रखने की जिम्मेवारी के बीच उनकी मदद करना पहाड़ उठाने जैसा लगा. उस दिन तो बस कुछ सहायता खाने-पीने की कर दी, वो भी अपने मन को बहलाने की खातिर. उसके बाद कई दिन, कई रात मन में उथल-पुथल मची रही. उन नेत्रहीन बच्चों के लिए कुछ न कर पाने की विवशता आँखों से अनेक बार बह निकलती. अंततः एक रास्ता सूझा, जो एकबारगी को गलत कहा जा सकता था किन्तु कुछ अच्छा करने बुरा बनना मंजूर किया.

एक-दो विश्वसनीय मित्रों से चर्चा की और फिर पूरी तैयारी के साथ अपने काम को अंजाम दिया. हॉस्टल के सामने से गुजरती अति-व्यस्त आगरा-बॉम्बे रोड पर आंशिक कब्ज़ा किया गया. गुजरने वाले ट्रकों से हॉकी, डंडों, गालियों, तमाचों के बल पर कुछ मिनटों की वसूली हुई. दस-दस, बीस-बीस रुपयों की कुछ-कुछ पूँजी से एक बड़ी रकम इकठ्ठा हुई. इससे अंध आश्रम के उन बच्चों की दुनिया की इच्छाओं का कुछ भाग पूरा किया गया. इस तरह की धन-उगाही के साथ-साथ वहाँ संचालित एक-दो पेट्रोल पम्प, शराब की दुकानों आदि का भी सहारा लिया गया. कभी निवेदन करके, कभी डरा-धमका कर. इन सबका एकमात्र उद्देश्य था नेत्रहीन बच्चों की सहायता के लिए धन एकत्र करना. यह आन्तरिक आक्रोश का स्वाभाविक प्रस्फुटन था जो मदद न करने की पीड़ा से उपजा था.

यह काम नित्य का कार्य न बनाया गया क्योंकि कहीं न कहीं यह भी लग रहा था कि यह गलत तो है ही. ऐसी गलती कभी-कभार कर ली जाती रही मगर महीने-दो-महीने में अपने मासिक बजट से कुछ न कुछ मदद की जाती रही. अपने हिस्से की आवश्यकताओं में कटौती करते हुए उन बच्चों की इच्छाओं का ध्यान रखा गया. हाँ, कभी-कभी अत्यावश्यक होने पर अधिक धनराशि के लिए दोस्तों, हॉकी, डंडों, गालियों, तमाचों का सहारा लिया जाता और सड़क से गुजरते ट्रक इनका निशाना बनते रहे.  

एक दर्द जो कॉलेज टाइम में महसूस किया था वो आज भी महसूस किया अपने भीतर. सीधा सा अर्थ है कि भीतर का इंसान मरा नहीं है अभी तक.

Saturday, 19 March 2016

खट्टे-मीठे एहसास भरा समय


कभी-कभी समय भी परिस्थितियों के वशीभूत अच्छे-बुरे का खेल खेलता रहता है. अनेक मिश्रित स्मृतियों का संजाल दिल-दिमाग पर हावी रहता है. सुखद घटनाओं की स्मृतियाँ क्षणिक रूप में याद रहकर विस्मृत हो जाती हैं वहीं दुखद घटनाएँ लम्बे समय तक अपनी टीस देती रहती हैं. मनुष्य का स्वभाव सुख को जितना सहेज कर रखने का होता है, सुख उतनी ही तेजी से उसके हाथ से फिसलता जाता है. इसके उलट वह दुःख से जितना भागना चाहता है, दुःख उसके भागने की रफ़्तार से कहीं तज दौड़ कर इन्सान को दबोच लेता है. दुःख की एक छोटी सी मार सुख की प्यार भरी लम्बी थपकी से कहीं अधिक तीव्र होती है. कई बार दुखों की तीव्रता सुखों से भले ही बहुत कम हो पर इंसानी स्वभाव के चलते छोटे-छोटे दुखों को भी बहुत बड़ा बना लिया जाता है. हाँ, कुछ दुःख ऐसे होते हैं जिनकी पीड़ा और टीस किसी भी सुख से कम नहीं होती है, नियंत्रित नहीं होती है. 

वर्ष 2005 भी ऐसी ही मिश्रित अनुभूति लेकर आया. इस अनुभूति में समय ने वह खेल दिखाया जिसका असर पूरी ज़िन्दगी रहेगा, पूरी ज़िन्दगी पर रहेगा. सुखों और दुखों के तराजू में दुखों का पलड़ा इतना भारी हुआ कि ज़िन्दगी भर के सुख भी उसे हल्का नहीं कर सकेंगे. मार्च ने हमारे सिर से पिताजी का साया छीन कर इस दुनिया में अकेला खड़ा कर दिया. परिवार की अनपेक्षित जिम्मेवारी एकदम से कंधे पर आ गई. अभी अपनी जिम्मेवारियों को, पारिवारिक दायित्वों का ककहरा भी न सीख सके थे कि अप्रैल ने ज़िन्दगी भर के लिए हमें दूसरे पर निर्भर कर दिया. कृत्रिम पैर के सहारे, छड़ी के सहारे, किसी न किसी व्यक्ति के सहारे. यह और बात है कि आत्मविश्वास ने इन सहारों पर निर्भर रहते हुए भी इन पर निर्भर सा महसूस न होने दिया.

दुर्घटना के बाद कानपुर में चिकित्सकीय सुविधाओं का लाभ लेते हुए अनेक तरह के अनुभव हुए. अपनों का बेगानापन दिखा, बेगानों ने जबरदस्त अपनापन दिखाया. केएमसी में भर्ती रहने के दौरान उरई से मिलने-देखने वालों का ताँता लगा रहा. वहाँ एक निश्चित समय बाद मरीज से मिलने के लिए पचास रुपये का टोकन बनता था, एक घंटे के लिए. किसी दिन रिसेप्शन पर मिलने को लेकर उरई से पहुँचे हमारे एक परिचित की किसी बात पर कहा-सुनी हो गई. उन्होंने नाराज होते हुए रिसेप्शनिष्ट के सामने दस हजार रुपये पटकते हुए कहा कि सारे रुपयों के टोकन बना दो किन्तु किसी को मिलने से रोका न जाये.

लोगों का स्नेह हमसे मिलने मात्र को लेकर ही नहीं था. पहले दिन से लेकर वहां भर्ती रहने तक छब्बीस यूनिट ब्लड की आवश्यकता हमें पड़ी. पहले दिन की चार यूनिट ब्लड को छोड़ दिया जाये तो शेष ब्लड उरई से आकर लोगों ने दिया. हमने अपने सामाजिक जीवन के सामाजिक कार्यों के अपने अनुभव में स्वयं महसूस किया है कि एक-एक यूनिट ब्लड की प्राप्ति के लिए रक्तदाताओं की बड़ी समस्या आती है. लोगों का हमारे प्रति स्नेह, प्रेम, विश्वास ही कहा जायेगा कि इतनी बड़ी संख्या में फ्रेश ब्लड हमें उपलब्ध हुआ. चूँकि एक दिन में सिर्फ दो यूनिट ब्लड हमें चढ़ाया जाता था, इस कारण लोगों को रक्तदान के लिए रोकना पड़ रहा था, समझाना पड़ रहा था.

केएमसी की व्यवस्था देखने वाले एक डॉक्टर साहब प्रतिदिन सुबह-शाम हमसे मिलने आया करते थे. तमाम सारी बातों, हालचाल के साथ-साथ वे एक सवाल निश्चित रूप से रोज पूछते थे कि कुमारेन्द्र जी, आप उरई में करते क्या हैं, जो मिलने वालों की इतनी भीड़ आती है? उनका कहना था कि अपनी लम्बी मेडिकल सेवा में मैंने किसी को इतना फ्रेश ब्लड मिलते नहीं देखा है. ऐसा पहली बार हुआ है कि ब्लड डोनेट करने वालों को रोकना पड़ रहा है.

हम तब भी नहीं समझ सके थे कि वास्तव में हमने किया क्या है? वास्तव में हम करते क्या हैं? क्यों इतने लोग हमें देखने आ रहे हैं? क्यों इतने लोग हमें अपना रक्तदान कर बचाने आ रहे हैं? यह बात तब भी न हम खुद समझ सके थे, न उन डॉक्टर साहब को समझा सके थे. न ही आज समझ सके हैं, न ही आज भी समझा सकते हैं. न कोई पद, न कोई दायित्व, न कोई नौकरी, न कोई व्यापार, न धनवान, न राजनीतिज्ञ पर नगरवासियों का, जनपदवासियों का यही अपार स्नेह हमारे लिए संजीवनी बना. इसी संजीवनी ने एक माह पहले परिवार पर आये विकट संकट में भी खड़ा रहने का साहस प्रदान किया. इसी संजीवनी ने अपनों के बेगानेपन को भुलाने में अपनी भूमिका अदा की. इसी संजीवनी शक्ति ने आर्थिक समस्या में घिरे होने के बाद भी आर्थिक संबल प्रदान किया. इसी संजीवनी ने तमाम सारे दुखों को कम करने की ताकत दी, उनसे लड़ने का हौसला दिया.

समय के साथ दुःख कम होते जाते हैं. उनकी टीस कम होती जाती है. दो-दो कष्टों को सहने वाले परिवार को समय कुछ मरहम लगाना चाहता था. वर्ष 2005 अपने माथे पर सिर्फ कष्टों का कलंक लगवाकर विदा नहीं होना चाहता था. तभी जाते-जाते उसने दिसम्बर में एक छोटी सी ख़ुशी हमारे माध्यम से परिवार को दी. हम जो काम कभी भी नहीं करना चाहते थे, उसी अध्यापन कार्य का नियुक्ति-पत्र मिला. जिस महाविद्यालय में दो-दो बार हमारी नियुक्ति को रुकवाया, रोका गया हो उसी महाविद्यालय ने हमें अपने यहाँ अध्यापन कार्य करने हेतु नियुक्ति-पत्र निर्गत किया. अध्यापन के प्रति इसी प्रकार की रुचि न होने के कारण हमने सिरे से इस प्रस्ताव को नकार दिया. घरवालों के अपने तर्क थे. बिना एक पैर, चलने-फिरने, बाहर बिना सहारे निकलने में हमारी असमर्थता को इसी बहाने दूर होने का बहाना बताया गया. दो-चार महीनों में अध्यापन कार्य छोड़ देने के हमारे पिछले रिकॉर्ड के कारण भी सबने विश्वास जताया कि चंद महीने ही करोगे इस काम को, कर लो जब तक मन लगे.

अंततः पारिवारिक तर्कों, दबावों के चलते देश की ऐतिहासिक तिथि 06 दिसम्बर 2005 को हमने भी अपनी नियुक्ति को ऐतिहासिक बना दिया. ऐतिहासिक इस रूप में कि दो बार इस अध्यापन कार्य को छोड़ने के बाद भी अद्यतन गाँधी महाविद्यालय, उरई के हिन्दी विभाग में मानदेय प्रवक्ता के रूप में कार्यरत हैं. आगे कब तक ये सेवा होगी, पता नहीं. अभी तो वर्ष 2005 के तमाम कष्टों-दुखों को याद करते हुए इस दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं. 



Thursday, 17 March 2016

बहते आँसुओं के बीच


शाम को पिताजी के अभिन्न मित्र, हमारे पारिवारिक सदस्य दादाका आना हुआ, साथ में दो-चार और लोग भी. आते ही पिताजी की तबियत के बारे में जानकारी की. उनके जानकारी करने ने जैसे उन सभी संदेहों को मिटा दिया जो सुबह से दिमाग में उथल-पुथल मचाये हुए थे. आँसू भरी आँखों और भरे गले से इतना ही पूछ पाए, पिताजी को क्या हुआ? दादा ने जो स्नेहिल हाथ हमारे सिर पर फिराया वो आज तक बरक़रार है. बिना किसी के कुछ कहे सब स्पष्ट हो गया, मतलब दोपहर बाद से जो दिलासा दी जा रही थी वो सब सिर्फ तसल्ली देने के लिए थी. वो डरावनी शाम कैसे आँसुओं भरी रात में बदली आज भी समझ नहीं आया. लोगों का आना-जाना, समझाना और हमारा पूरा ध्यान अपनी जिम्मेवारियों पर, अपनी अम्मा पर, अपने दोनों छोटे भाईयों पर, जो पिताजी के पास पहुँचने को सुबह ही निकल चुके थे. अम्मा ने कैसे अपने को संभाला होगा? दोनों भाइयों ने कैसे समूची स्थिति का सामना किया होगा? कैसे पिताजी को इस रूप में देखा होगा?

कठोर हकीकत को स्वीकारते हुए सामाजिक निर्वहन में लग गए. बहते आँसुओं के बीच डायल किये जाते नंबर, मोबाइल से बातचीत, हिचकियों के बीच किसी अपने के न रहने की दुखद खबर का दिया जाना चलता रहा. अब इंतजार था पिताजी के आने का, पिताजी के आने का कहाँ, पिताजी के पार्थिव शव के आने का. क्या हुआ होगा? कैसे हुआ होगा? कितनी परेशानी हुई होगी? क्या परेशानी हुई होगी? यहाँ से तो अच्छे भले गए थे, फिर अचानक हुआ क्या? सवाल अपने आपसे बहुत से थे और जवाब किसी का भी नहीं था. किससे पूछते? क्या पूछते? चाचा लोग, अम्मा, भाई लोग सभी उसी मनोदशा में होंगे, जिसमें हम थे. सवालों की इस भँवर में गिरते-पड़ते हम, हमारी पत्नी आँसुओं के सैलाब में बीते दिनों को याद करते रहे. पारिवारिक, सामाजिक मान्यताओं के साथ-साथ पिताजी के अनुशासन के चलते उनसे कम से कम बातचीत, काम की बातचीत के चलते उस रात एहसास हुआ कि अपने ही पिताजी से कभी खुलकर बात न कर पाए. आज भी बात कचोटती है पिताजी से बहुत बातचीत न हो पाने की. एक वो समय था और एक आज के बाप-बेटे हैं, लगता है जैसे दो मित्र हैं अलग-अलग आयुवर्ग के. क्या सही हैक्या गलत पता नहीं.. क्योंकि सही अपना समय भी नहीं लगता आज और आज का समय भी हमें नहीं सुहाया आज तक.

बहरहाल, अब एक दशक से ज्यादा हो गया पिताजी को गए. अब बस आसपास के आयोजन, आसपास की हलचल, घर-परिवार की क्रियाविधि, क्रियाकलाप देखकर इतना ही कह पाते हैं कि पिताजी होते तो ऐसा होता, ऐसा न होता. बहुत कुछ अधूरा रह गया था, उनके द्वारा देखना, उनके द्वारा पूरा करना. कोशिश तो बराबर रही कि हम पूरा कर सकें, बड़े होने के नाते सभी छोटों को उनकी कमी न महसूस होने दें मगर पिता तो पिता ही होता है, कोई भी उसकी जगह नहीं ले सकता. हम भी नहीं ले सके हैं, नहीं ले सकेंगे क्योंकि हमारे पिताजी वाकई हमारे पूरे परिवार की धुरी थे, आज भी होंगे, यही सोचकर उनके सोचे हुए काम पूरे करने की कोशिश में हैं. अब इसमें कितना सफल होंगे, ये तो आने वाला वक्त बताएगा, परिवार के बाकी लोग बताएँगे.

बहते आँसुओं के साथ पल-पल उनको याद करते हुए. बस याद ही करते हुए, यादों में ही बसाये हुए उनके बताये-बनाये रास्तों पर आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे. 

Saturday, 20 February 2016

कप्तान बना गई पहली दौड़


कभी-कभी कोई घटना खेल-खेल में घट जाती है और व्यक्तित्व पर छा जाती है. हमारे साथ खेल के मैदान में खेल-खेल में ये घटना घटी जिसने हमें एथलेटिक्स का कप्तान बनवा दिया. इंटरमीडिएट तक तमाम सारे खेलों में हिस्सा लिया मगर कभी भी एथलेटिक्स की तरफ रुझान नहीं रहा था. कॉलेज पहुंचकर भी अन्य खेलों की तरफ निगाह जाती थी मगर एथलेटिक्स की तरफ उधर भी नहीं सोचा. हाँ, बाबा जी द्वारा सुबह टहलने की जो आदत डलवाई गई थी वह हॉस्टल में भी मुन्ना भाईसाहब, पप्पू भाईसाहब के कारण बनी रही.

कॉलेज के वार्षिक खेलकूद के दिन आ गए. सभी खिलाड़ी मैदान पर अपने-अपने खेलों में व्यस्त हो जाते और हम जैसे कुछ दोस्त अपनी मस्ती-शरारत में हाथ आजमाते रहते. हॉस्टल से कोई न कोई किसी न किसी खेल में अपनी सहभागिता कर रहा था. क्रिकेट, शतरंज, बैडमिंटन, कैरम, हॉकी, दौड़ आदि सबमें हॉस्टल की हिस्सेदारी बनी हुई थी. उस दिन पाँच हजार मीटर दौड़ की घोषणा हुई. मुन्ना-पप्पू भाईसाहब सौ मीटर से लेकर पंद्रह सौ मीटर दौड़ में भागीदारी किया करते थे, सो उनको इसमें भाग नहीं लेना था. धावक ट्रेक पर जाने लगे मगर हॉस्टल से इसमें कोई सहभागिता नहीं दिखी. एकदम से लगा जैसे बिना खेले ही हॉस्टल की हार हो गई. हमने कहा कि हम दौड़ेंगे पाँच हजार मीटर दौड़ में. पहले तो कुछ लोगों ने समझाया कि मैदान के एक-दो नहीं पूरे साढ़े बारह चक्कर लगाने होंगे मगर हमने ठान लिया था कि इसमें भाग लेना ही लेना है. हमें पता था कि हम शारीरिक रूप से भले ही मजबूत न दिख रहे हों मगर मानसिक रूप से, आत्मविश्वास के रूप में कमजोर नहीं हैं.

हॉस्टल के बाकी भाइयों ने हमारी बात का खूब चिल्ला-चिल्लाकर, शोर मचाकर समर्थन किया. हमारे स्पोर्ट्स टीचर ने भी हमको प्रोत्साहित करते हुए कहा कि तू बस दौड़ पूरी कर ले, हम इनाम देंगे. दौड़ शुरू होने से पहले हमको इतनी लम्बी दौड़ दौड़ने के टिप्स बताये जाने लगे. कोई साथी हमारे पैरों की माँसपेशियों को मलने में लगा था, कोई चिल्ला-चिल्ला कर ताकत भरने में लगा था. सबकी हिम्मत लेकर, हॉस्टल की सहभागिता करने के लिए, महज खेल-खेल में ट्रेक पर उतर आये. उस स्पर्धा से जुड़े प्रोफ़ेसर हम हॉस्टलर्स का जोश देखकर अचंभित थे. लम्बी सीटी बजी और दौड़ना शुरू हुआ. मैदान के साढ़े बारह चक्कर लगाने थे, सो शुरूआती चक्कर आराम से लगाने शुरू किये. हॉस्टल के हमारे साथी क्रम से चिल्लाते हुए हमारे साथ ट्रेक के किनारे दौड़ लगाते जाते. उनका साथ-साथ दौड़ना हममें और जोश भरता. कब एक-दो-तीन-चार चक्कर लगाते-लगाते अंतिम चक्करों तक पहुँचने लगे पता ही नहीं चला. पैर, जांघ, पिंडलियाँ ऐसे लगने लगी मानो हमारे शरीर में ही नहीं हैं. मुँह सूखने की स्थिति में, साँस लम्बी-लम्बी चलने लगी मगर सबका चिल्लाते हुए हमारे साथ दौड़ना हमें थकने नहीं दे रहा था. कभी लगता कि अब गिरे कि तब गिरे मगर अपने साथियों, बड़े भाइयों, स्पोर्ट्स टीचर, कॉलेज के अन्य साथियों की तरफ से आती आवाजों के सहारे अगले चक्कर के लिए बढ़ जाते.

जिसको जीतना था वो जीत गया. हम छह लोगों में पाँचवे स्थान पर आये. आज भी बहुत अच्छे से याद है जैसे ही हमने फिनिश लाइन को छुआ, हमारे हॉस्टल के साथियों ने दौड़कर बाहों में उठा लिया. किसी ने शरीर को चादर से ढंका, कोई पैरों की मालिश करने लगा. ऐसे में हमारे स्पोर्ट्स टीचर ने आकर पीठ थपथपाई और शाबासी देते हुए कहा कि पहली बार में ही इतनी लम्बी दौड़ पूरी करना अपने आप में जीत है. 

अगले दिन हमने दस हजार मीटर दौड़ में भाग लिया. हालाँकि स्थान वहां भी न मिला तथापि तीनों साल लगातार सहभागिता करने के कारण अंतिम वर्ष में हमको एथलेटिक्स का कप्तान चुना गया. उन्हीं स्पोर्ट्स टीचर ने कप्तान की गरिमा, मर्यादा, जिम्मेवारी को समझाते हुए वार्षिक खेल प्रतियोगिताओं के आरम्भ में कॉलेज के ध्वज के साथ हमारे द्वारा सभी खिलाडियों को शपथ ग्रहण करवाई. हमारी अगुवाई में लगभग आधा सैकड़ा खिलाड़ियों ने शपथ लेते हुए अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया. वो दिन आज भी याद है और गौरवान्वित कर जाता है.

CAPTAIN ATHLETICS लिखा वो बैज आज तक सुरक्षित है. उस समय न ब्लेजर बनवा सके और न उसे सीने पर लगा सके. अब बस यादें शेष हैं, उस दिन की, अपने एथलेटिक्स कप्तान होने की, खिलाड़ियों को शपथ दिलवाने की, अपने दौड़ने की.

Monday, 8 February 2016

चवन्नी की जमींदारी


जीवन में कोई व्यक्ति अपने भविष्य को लेकर निरंतर सजग रहता है, लगातार आगे बढ़ने का प्रयास करता है और इस यात्रा में, अपनी सजगता में वो अपने अतीत को विस्मृत नहीं कर पाता है. ये और बात है कि जिंदगी की आपाधापी में इन्सान ने अपने अतीत को स्वतः याद करना बंद सा कर दिया है किन्तु बहुत सी घटनाएँ ऐसी होती हैं जो अक्सर मन-मष्तिष्क में उभर कर बीते दिनों की सैर कराने लगती हैं. 

ऐसा ही कुछ उस समय हुआ था जबकि एक समाचार पढ़ने को मिला था कि सरकार ने स्टील की मंहगाई और अन्य कारणों से पच्चीस पैसे के सिक्के को बनाना बंद कर दिया है. इस बंदी के साथ-साथ इसके चलन को भी समाप्त कर दिया गया. हालाँकि सरकारी आदेश के बहुत पहले से पच्चीस पैसे और पचास पैसे का चलन समाज ने स्वतः ही बंद कर रखा था. अब भले ही ये सिक्के लेन-देन के दौरान चलन में न दिखते हों मगर शौकिया तौर पर बनाये गए संग्रह में से कभी-कभार ये सिक्के और अन्य पुराने सिक्के सामने आकर बचपन में ले जाते हैं. कुछ ऐसा ही अपने संग्रह का अवलोकन करते समय पच्चीस पैसे के सिक्के को देखकर हुआ और बचपन की वो ख़ुशी आँखों के सामने चमक उठी जो एक पच्चीस पैसे के सिक्के के द्वारा मिल जाया करती थी.

ये बात सन् 83-84 की है, जब हम राजकीय इंटर कालेज, उरई के छात्र थे. उस समय हमको स्कूल जाने पर नित्य जेबखर्च के रूप में पच्चीस पैसे मिला करते थे. चार आने का मूल्य होने के कारण आम बोलचाल की भाषा में पच्चीस पैसे के सिक्के को चवन्नी कहकर पुकारा जाता था. आज के बच्चों को यह बहुत ही आश्चर्य भरा लगेगा कि रोज का जेबखर्च मात्र पच्चीस पैसे अर्थात चवन्नी, पर हमारे लिए उस समय यह किसी करोड़पति के खजाने से कम नहीं होता था. उस समय इस एक छोटे से सिक्के के साथ एक छोटी सी पार्टी भी हो जाया करती थी. इसके अलावा हम दो-तीन दोस्त हमेशा एकसाथ रहा करते थे और सभी के ऐसे छोटे-छोटे सिक्के मिल-मिलाकर एक ग्रांड पार्टी का आधार तैयार कर दिया करते थे.

विशेष बात तो यह होती थी घर से स्कूल जाते समय अम्मा ही चवन्नी दिया करती थीं. कभी-कभार ऐसा होता था कि थोड़ी बहुत देर होने के कारण अथवा किसी और वजह से हमें स्कूल छोड़ने के लिए पिताजी साइकिल से जाया करते थे. उनकी हमेशा से एक आदत रही थी कि स्कूल के गेट पर हमें साइकिल से उतारने के बाद हमसे पूछा करते थे कि पैसे मिले? झूठ बोलने की हिम्मत तो जुटा ही नहीं पाते तो ऐसे समय में हम या तो चुप रह जाते या फिर कह देते कि हाँ हैं. इसके बाद भी पिताजी अपनी जेब से पच्चीस पैसे का उपहार हमें दे ही देते. चूँकि पिताजी कभी-कभी ही छोड़ने आते थे और जिस दिन उनका आना होता उस दिन हमारा जेबखर्च पच्चीस से बढ़कर पचास हो जाया करता था. समझिए कि उस दिन तो बस चाँदी ही चाँदी होती थी. क्या कुछ ले लिया जाये और क्या कुछ छोड़ा जाये, समझ में ही नहीं आता था. चूँकि उस समय स्कूल परिसर में ऐसी कोई सामग्री बेचने भी नहीं दी जाती थी जो हम बच्चों के लिए हानिकारक हो, इस कारण से घरवाले भी निश्चिन्त रहते थे.

हमारी पच्चीस पैसे की नवाबी उस समय और तेजी से बढ़ गई जब हमारे साथ पढ़ने के लिए हमारा छोटा भाई पिंटू (श्री हर्षेन्द्र सिंह सेंगर) भी साथ जाने लगा. अब हम दो जनों के बीच पचास पैसे की जमींदारी हो गई जो हमारी मित्र मंडली में किसी के पास नहीं होती थी. हम दो भाइयों के बीच एकसाथ आये पचास पैसे के मालिकाना हक से हम अपनी मित्र मंडली पर रोब भी जमा लेते थे पर भोजनावकाश में सारी हेकड़ी आपस में खान-पान को लेकर छूमंतर हो जाती थी. सबके सब अपने-अपने छोटे से करोडपतित्व को आपस में मिला कर हर सामग्री का मजा उठा लेते थे. 

आज जब भी अपने सिक्कों के संग्रह को देखते हैं तो बरबस ही उस चवन्नी की याद तो आती ही है साथ में उन बीस पैसे के, दस पैसे के, पाँच पैसे के सिक्कों की भी याद आ गई जो न जाने कब अपने आप ही चलन से बाहर हो गये. वाह री चवन्नी! तुम्हारी याद तो हमेशा मन में रहेगी जिसने उस छोटी सी उम्र में ही नवाबी का एहसास करा दिया था, धन की अहमियत को समझा दिया था.

Tuesday, 12 January 2016

व्यक्तित्व विकास का आधार बनी बाल सभा


हो सकता है कि आज की पीढ़ी को ये शब्द बाल सभा कुछ अजूबा सा लगे. ऐसा इसलिए क्योंकि अब किसी विद्यालय में ऐसा कोई आयोजन होते दिखता नहीं है. विद्यालयों में आजकल बच्चों की प्रतिभा को निखारने के स्थान पर मँहगे-मँहगे प्रकाशकों की मँहगी-मँहगी किताबों को रटवाना एकमात्र काम रह गया है. कभी-कभार अभिभावकों को दिखाने के नाम पर, समाचार-पत्रों में सुर्खियाँ बटोरने के नाम पर कहीं-कहीं प्रोजेक्ट, विज्ञान मेला, बाल-मेला जैसे आयोजन करवा लिए जाते हैं. ये आयोजन भी बच्चों से ज्यादा अभिभावकों की प्रतिभा, उनकी जेब की परीक्षा लेते हैं.

बाल सभा शब्द बहुतेरे लोगों के लिए उतना ही अजूबा जितना कि उसे पता चले कि आज भी कुछ लोग फाउंटेन पेन से लिख रहे हैं. आज कॉलेज में जब हमारे विद्यार्थियों, सहकर्मियों, साथियों को पता चलता है कि हम आज भी फाउंटेन पेन से लिखते हैं तो वे आश्चर्य से भर जाते हैं. हालाँकि अभी उरई जैसे शहर में पठन-पाठन पूरी तरह से ई-सामग्री पर, कंप्यूटर पर निर्भर नहीं हो सका है, इस कारण यहाँ के विद्यार्थी पेन-कागज से अपना परिचय बनाये हुए हैं. इसके बाद भी फाउंटेन पेन की उपलब्धता, उपयोग न के बराबर देखने को मिल रहा है. बहरहाल, बात हो रही थी बाल सभा की. बाल सभा को हम अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों का आधार कह सकते हैं. यही वो गतिविधि है जिसने हमारे भीतर की झिझक, संकोच को दूर करके भाषण देने की शक्ति, सञ्चालन करने की क्षमता, नाट्य-कार्यक्रमों में सहभागिता करने को विकसित किया. आज यह सब विद्यालयों से नदारद दिखता है. 

नर्सरी से लेकर कक्षा पाँच तक की मात्र छह वर्ष की अवधि को अल्पावधि भले ही कहा जाये मगर इन छह वर्षों में प्रति शनिवार भोजनावकाश के बाद सभी बच्चों को एक बड़े से बरामदे में एकत्र होना पड़ता था. यह सभी विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य था. बाल सभा में लगभग सभी बच्चों को किसी न किसी रूप में अपनी सहभागिता करनी पड़ती थी. किसी को सञ्चालन, किसी को भाषण, किसी को गीत, किसी को अभिनय, किसी को कविता. सभी हँसी-हँसी पूरे उत्साह के साथ अपनी भूमिकाओं का निर्वहन करते. स्कूल की शिक्षिकाएँ, जिन्हें हम बच्चे दीदी कहा करते थे, अपने कुशल, स्नेहिल निर्देशन में न केवल हमारी वरन अन्य विद्यार्थियों की प्रतिभा को निखारती थीं. 

प्रति शनिवार निश्चित रूप से होने वाली बाल सभा ने हमारे व्यक्तित्व विकास में भी बहुत बड़ी भूमिका का निर्वाह किया. भाषण, सञ्चालन, लेखन, अभिनय, निर्देशन आदि के विकास का आधार उसी बाल सभा में बखूबी हुआ, बस गायन-वादन में अपने को आगे न ला सके. आने वाले समय में इस पर भी हाथ आजमाया जायेगा.


Wednesday, 6 January 2016

आत्मीयता, अपनत्व के सन्देश से भरी वो इंट्रो पार्टी


इंटरमीडिएट पास करने के बाद हमें साइंस कालेज, ग्वालियर में बी०एस-सी० में अध्ययन के लिए प्रवेश दिलवाया गया. हॉस्टल में हमारे रहने की व्यवस्था की गई थी. हॉस्टल के नाम से उस समय पूरे शरीर में सिरहन सी दौड़ जाती थी. डर लगा रहता था रैगिंग का. घर में किसी से यह कहने का साहस नहीं हो पा रहा था कि हम हॉस्टल में नहीं रहेंगे. मरता क्या न करता की स्थिति में हमने हॉस्टल में प्रवेश किया. पहले दिन हमें छोड़ने हमारे पिताजी और चाचाजी आये. पिताजी और चाचाजी ने हमारे आने से पहले ही सीनियर्स से मुलाकात कर ली थी क्योंकि शायद घर के लोग भी रैगिंग के नाम से परेशान हो रहे थे? सीनियर्स ने उनको आश्वस्त किया कि यहाँ रैगिंग के नाम पर ऐसा वैसा कुछ भी नहीं होता है. 

हॉस्टल में दो-तीन दिन बड़ी ही अच्छी तरह से कटे. लगभग हर शाम को सभी लोग छत पर या बाहर लॉन में एकत्र होते और हँसी-मजाक चलता रहता. इसी बीच थोड़ी बहुत रैगिंग भी होती रहती पर मारपीट से कोसों दूर. हाँ, उन दो-चार लोगों को अवश्य ही दो-चार हाथ पड़े जिन्होंने सीनियर्स के साथ बदतमीजी की.

एक रात लगभग दस साढ़े दस बजे होंगे, हॉस्टल के गेट पर दो-तीन मोटरसाइकिल और स्कूटर रुकने की आवाजें सुनाईं दीं. थोड़ी देर की शांति के बाद हमारे हॉस्टल चौकीदार, जिन्हें हम लोग उनकी उम्र के कारण बाबा कहते थे, ने आकर मैस में पहुँचने को कहा. अब तो डर के मारे हालत खराब क्योंकि ऐसा सुन रखा था कि किसी दिन पुराने सीनियर छात्र रात को आते हैं और उसी समय जबरदस्त रैंगिंग होती है यहाँ तक कि मारपीट भी. डरते-डरते डाइनिंग हॉल में पहुँचे, वहाँ सीनियर्स पहले से ही मौजूद थे. उन सभी छात्रों को जिन्होंने हॉस्टल में पहली बार प्रवेश लिया था, उन्हें दीवार से टिक कर खड़े होने को कहा गया. ऐसे छात्रों में बी०एस-सी० प्रथम वर्ष के अलावा दूसरे और तीसरे वर्ष के छात्र तो थे ही साथ में कुछ एम०एस-सी० के छात्र भी थे. हॉल के बीचों-बीच पड़ी मेज के एक ओर सीनियर्स भाई बैठे हुए थे, उन्हीं के साथ वे पुराने सीनियर भाई भी बैठे हुए थे, जो कुछ देर पहले आये थे.

सबसे पहले हम सबका परिचय उन लोगों से करवाया गया, कोई राजनीति कर रहा था तो कोई ठेकेदारी. कोई कहीं नौकरी में था तो कोई अपना कारोबार कर रहा था. सबका परिचय जानने के बाद हम लोगों का परिचय शुरू हुआ. सभी का परिचय हो जाने के बाद शुरू हुआ रैगिंग का सिलसिला. रैगिंग के नाम पर सभी को कुछ न कुछ करके दिखाना था. किसी को नाचना पड़ा तो किसी को गाना था. किसी को लड़की बनके किसी लड़के के सामने प्यार का इजहार करना था तो किसी को पंखे को अपना दुश्मन मानकर गालियाँ सुनानी थीं. उसी बातचीत, पूछताछ में एक भाई ने अपना शौक फलां नेता को गोली मारना बताया. इस पर सभी सीनियर्स भाई खूब हँसे और बोले इसे शौक नहीं कहते. इसके बाद भी वो भाई अपनी बात पे अडिग रहे और बार-बार इसे ही अपना शौक बताते रहे. इस तरह की हँसी-मजाक जैसी स्थिति के कारण, किसी दूसरे को कुछ उल्टा-पुल्टा करते देख मजा आता, हँसी भी आती किन्तु हँस नहीं सकते थे क्योंकि हँसे तो बना दिए जाते मुर्गा.

ऐसी रैगिंग के बीच जिसका भय था वह नहीं हुआ यानि कि मारपीट. हाँ, खड़े-खड़े पैरों की हालत खस्ता हुई जा रही थी. किसी लड़के के कुछ न कर पाने पर, किसी के द्वारा कुछ न बता पाने पर पता चला कि सभी को हाथ उठाकर खड़ा करने की सजा मिली. अब खड़े हैं आधा घंटे तक हाथ ऊपर किये. इस बीच सभी सीनियर्स उठकर चाय पीने चले गये और कह भी गये कि हम चाय पीने जा रहे हैं तब तक हाथ ऊपर उठाये रहना. कोई मुर्गा बना था, कोई एक पैर पर खड़ा था, किसी को हाथ उठाने की सजा तो कोई किसी और रूप में सजा काट रहा था. समय गुजरता जा रहा था और सीनियर्स थे कि आने का नाम ही नहीं ले रहे थे. लगभग डेढ घंटे के बाद उन लोगों का आना हुआ.

आने के बाद सभी की सजा समाप्त हुई. सीनियर्स ने हम सभी को कुछ टिप्स दिये कि कैसे मिलजुल कर रहना है. बताया कि प्रत्येक को अपने से बड़े का सम्मान करना है. सभी की मदद करनी है, यह भी बताया कि घर से दूर होने के कारण हम सभी को घर की तरह से रहना है. इन सबके बीच समय खिसकते-खिसकते सुबह के पाँच बजने तक पहुँच गया. सीनियर्स, जो सभी बाद में भाईसाहब ही पुकारे गए, चलने को हुए और अपने साथ हम सभी को चलने को कहा. हम सभी हँसी-मजाक के माहौल में उनके साथ रेलवे स्टेशन तक गये. वहाँ पहुँच कर एक रेस्टोरेंट में हम सभी ने बढ़िया चाय-नाश्ता किया. रात भर की थकान, रैगिंग का डर तब तक निकल चुका था.

इसके बाद भी हॉस्टल में रैगिंग हुई, मगर चुहल भरी. हाँ, मारपीट की घटना भी किसी दो-चार के साथ ही हुई, वो भी एक-दो झापड़ों तक की. ऐसा भी तभी हुआ जबकि अगले ने कोई बदतमीजी की. आज भी हॉस्टल की वो आत्मीयता भरी रैगिंग बहुत याद आती है.