Tuesday, 12 January 2016

व्यक्तित्व विकास का आधार बनी बाल सभा


हो सकता है कि आज की पीढ़ी को ये शब्द बाल सभा कुछ अजूबा सा लगे. ऐसा इसलिए क्योंकि अब किसी विद्यालय में ऐसा कोई आयोजन होते दिखता नहीं है. विद्यालयों में आजकल बच्चों की प्रतिभा को निखारने के स्थान पर मँहगे-मँहगे प्रकाशकों की मँहगी-मँहगी किताबों को रटवाना एकमात्र काम रह गया है. कभी-कभार अभिभावकों को दिखाने के नाम पर, समाचार-पत्रों में सुर्खियाँ बटोरने के नाम पर कहीं-कहीं प्रोजेक्ट, विज्ञान मेला, बाल-मेला जैसे आयोजन करवा लिए जाते हैं. ये आयोजन भी बच्चों से ज्यादा अभिभावकों की प्रतिभा, उनकी जेब की परीक्षा लेते हैं.

बाल सभा शब्द बहुतेरे लोगों के लिए उतना ही अजूबा जितना कि उसे पता चले कि आज भी कुछ लोग फाउंटेन पेन से लिख रहे हैं. आज कॉलेज में जब हमारे विद्यार्थियों, सहकर्मियों, साथियों को पता चलता है कि हम आज भी फाउंटेन पेन से लिखते हैं तो वे आश्चर्य से भर जाते हैं. हालाँकि अभी उरई जैसे शहर में पठन-पाठन पूरी तरह से ई-सामग्री पर, कंप्यूटर पर निर्भर नहीं हो सका है, इस कारण यहाँ के विद्यार्थी पेन-कागज से अपना परिचय बनाये हुए हैं. इसके बाद भी फाउंटेन पेन की उपलब्धता, उपयोग न के बराबर देखने को मिल रहा है. बहरहाल, बात हो रही थी बाल सभा की. बाल सभा को हम अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों का आधार कह सकते हैं. यही वो गतिविधि है जिसने हमारे भीतर की झिझक, संकोच को दूर करके भाषण देने की शक्ति, सञ्चालन करने की क्षमता, नाट्य-कार्यक्रमों में सहभागिता करने को विकसित किया. आज यह सब विद्यालयों से नदारद दिखता है. 

नर्सरी से लेकर कक्षा पाँच तक की मात्र छह वर्ष की अवधि को अल्पावधि भले ही कहा जाये मगर इन छह वर्षों में प्रति शनिवार भोजनावकाश के बाद सभी बच्चों को एक बड़े से बरामदे में एकत्र होना पड़ता था. यह सभी विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य था. बाल सभा में लगभग सभी बच्चों को किसी न किसी रूप में अपनी सहभागिता करनी पड़ती थी. किसी को सञ्चालन, किसी को भाषण, किसी को गीत, किसी को अभिनय, किसी को कविता. सभी हँसी-हँसी पूरे उत्साह के साथ अपनी भूमिकाओं का निर्वहन करते. स्कूल की शिक्षिकाएँ, जिन्हें हम बच्चे दीदी कहा करते थे, अपने कुशल, स्नेहिल निर्देशन में न केवल हमारी वरन अन्य विद्यार्थियों की प्रतिभा को निखारती थीं. 

प्रति शनिवार निश्चित रूप से होने वाली बाल सभा ने हमारे व्यक्तित्व विकास में भी बहुत बड़ी भूमिका का निर्वाह किया. भाषण, सञ्चालन, लेखन, अभिनय, निर्देशन आदि के विकास का आधार उसी बाल सभा में बखूबी हुआ, बस गायन-वादन में अपने को आगे न ला सके. आने वाले समय में इस पर भी हाथ आजमाया जायेगा.


Wednesday, 6 January 2016

आत्मीयता, अपनत्व के सन्देश से भरी वो इंट्रो पार्टी


इंटरमीडिएट पास करने के बाद हमें साइंस कालेज, ग्वालियर में बी०एस-सी० में अध्ययन के लिए प्रवेश दिलवाया गया. हॉस्टल में हमारे रहने की व्यवस्था की गई थी. हॉस्टल के नाम से उस समय पूरे शरीर में सिरहन सी दौड़ जाती थी. डर लगा रहता था रैगिंग का. घर में किसी से यह कहने का साहस नहीं हो पा रहा था कि हम हॉस्टल में नहीं रहेंगे. मरता क्या न करता की स्थिति में हमने हॉस्टल में प्रवेश किया. पहले दिन हमें छोड़ने हमारे पिताजी और चाचाजी आये. पिताजी और चाचाजी ने हमारे आने से पहले ही सीनियर्स से मुलाकात कर ली थी क्योंकि शायद घर के लोग भी रैगिंग के नाम से परेशान हो रहे थे? सीनियर्स ने उनको आश्वस्त किया कि यहाँ रैगिंग के नाम पर ऐसा वैसा कुछ भी नहीं होता है. 

हॉस्टल में दो-तीन दिन बड़ी ही अच्छी तरह से कटे. लगभग हर शाम को सभी लोग छत पर या बाहर लॉन में एकत्र होते और हँसी-मजाक चलता रहता. इसी बीच थोड़ी बहुत रैगिंग भी होती रहती पर मारपीट से कोसों दूर. हाँ, उन दो-चार लोगों को अवश्य ही दो-चार हाथ पड़े जिन्होंने सीनियर्स के साथ बदतमीजी की.

एक रात लगभग दस साढ़े दस बजे होंगे, हॉस्टल के गेट पर दो-तीन मोटरसाइकिल और स्कूटर रुकने की आवाजें सुनाईं दीं. थोड़ी देर की शांति के बाद हमारे हॉस्टल चौकीदार, जिन्हें हम लोग उनकी उम्र के कारण बाबा कहते थे, ने आकर मैस में पहुँचने को कहा. अब तो डर के मारे हालत खराब क्योंकि ऐसा सुन रखा था कि किसी दिन पुराने सीनियर छात्र रात को आते हैं और उसी समय जबरदस्त रैंगिंग होती है यहाँ तक कि मारपीट भी. डरते-डरते डाइनिंग हॉल में पहुँचे, वहाँ सीनियर्स पहले से ही मौजूद थे. उन सभी छात्रों को जिन्होंने हॉस्टल में पहली बार प्रवेश लिया था, उन्हें दीवार से टिक कर खड़े होने को कहा गया. ऐसे छात्रों में बी०एस-सी० प्रथम वर्ष के अलावा दूसरे और तीसरे वर्ष के छात्र तो थे ही साथ में कुछ एम०एस-सी० के छात्र भी थे. हॉल के बीचों-बीच पड़ी मेज के एक ओर सीनियर्स भाई बैठे हुए थे, उन्हीं के साथ वे पुराने सीनियर भाई भी बैठे हुए थे, जो कुछ देर पहले आये थे.

सबसे पहले हम सबका परिचय उन लोगों से करवाया गया, कोई राजनीति कर रहा था तो कोई ठेकेदारी. कोई कहीं नौकरी में था तो कोई अपना कारोबार कर रहा था. सबका परिचय जानने के बाद हम लोगों का परिचय शुरू हुआ. सभी का परिचय हो जाने के बाद शुरू हुआ रैगिंग का सिलसिला. रैगिंग के नाम पर सभी को कुछ न कुछ करके दिखाना था. किसी को नाचना पड़ा तो किसी को गाना था. किसी को लड़की बनके किसी लड़के के सामने प्यार का इजहार करना था तो किसी को पंखे को अपना दुश्मन मानकर गालियाँ सुनानी थीं. उसी बातचीत, पूछताछ में एक भाई ने अपना शौक फलां नेता को गोली मारना बताया. इस पर सभी सीनियर्स भाई खूब हँसे और बोले इसे शौक नहीं कहते. इसके बाद भी वो भाई अपनी बात पे अडिग रहे और बार-बार इसे ही अपना शौक बताते रहे. इस तरह की हँसी-मजाक जैसी स्थिति के कारण, किसी दूसरे को कुछ उल्टा-पुल्टा करते देख मजा आता, हँसी भी आती किन्तु हँस नहीं सकते थे क्योंकि हँसे तो बना दिए जाते मुर्गा.

ऐसी रैगिंग के बीच जिसका भय था वह नहीं हुआ यानि कि मारपीट. हाँ, खड़े-खड़े पैरों की हालत खस्ता हुई जा रही थी. किसी लड़के के कुछ न कर पाने पर, किसी के द्वारा कुछ न बता पाने पर पता चला कि सभी को हाथ उठाकर खड़ा करने की सजा मिली. अब खड़े हैं आधा घंटे तक हाथ ऊपर किये. इस बीच सभी सीनियर्स उठकर चाय पीने चले गये और कह भी गये कि हम चाय पीने जा रहे हैं तब तक हाथ ऊपर उठाये रहना. कोई मुर्गा बना था, कोई एक पैर पर खड़ा था, किसी को हाथ उठाने की सजा तो कोई किसी और रूप में सजा काट रहा था. समय गुजरता जा रहा था और सीनियर्स थे कि आने का नाम ही नहीं ले रहे थे. लगभग डेढ घंटे के बाद उन लोगों का आना हुआ.

आने के बाद सभी की सजा समाप्त हुई. सीनियर्स ने हम सभी को कुछ टिप्स दिये कि कैसे मिलजुल कर रहना है. बताया कि प्रत्येक को अपने से बड़े का सम्मान करना है. सभी की मदद करनी है, यह भी बताया कि घर से दूर होने के कारण हम सभी को घर की तरह से रहना है. इन सबके बीच समय खिसकते-खिसकते सुबह के पाँच बजने तक पहुँच गया. सीनियर्स, जो सभी बाद में भाईसाहब ही पुकारे गए, चलने को हुए और अपने साथ हम सभी को चलने को कहा. हम सभी हँसी-मजाक के माहौल में उनके साथ रेलवे स्टेशन तक गये. वहाँ पहुँच कर एक रेस्टोरेंट में हम सभी ने बढ़िया चाय-नाश्ता किया. रात भर की थकान, रैगिंग का डर तब तक निकल चुका था.

इसके बाद भी हॉस्टल में रैगिंग हुई, मगर चुहल भरी. हाँ, मारपीट की घटना भी किसी दो-चार के साथ ही हुई, वो भी एक-दो झापड़ों तक की. ऐसा भी तभी हुआ जबकि अगले ने कोई बदतमीजी की. आज भी हॉस्टल की वो आत्मीयता भरी रैगिंग बहुत याद आती है.

Monday, 28 December 2015

हॉस्टल का वो पहला दिन


पढ़ना भी अपने आपमें एक समस्या होती है. क्या पढ़ना है, कहाँ पढ़ना है, क्यों पढ़ना है आदि-आदि सहित और भी न जाने कितने सवाल. अब धरती पर आये, पढ़े-लिखे परिवार में आये तो यकीनन पढ़ना हमारी भी जिम्मेवारी बनती थी. सो पढ़े, मन लगाकर पढ़े और पास हो गए इंटरमीडिएट. पहले तो हाईस्कूल के बाद समस्या उठी थी कि क्या पढ़ना है? अब इंटरमीडिएट पास कर लिया तो फिर वही समस्या खड़ी हो गई कि क्या पढ़ना है, कहाँ पढ़ना है. अब आगे क्या पढ़ा जाये, कहाँ पढ़ा जाये, क्यों पढ़ा जाये जैसे सवालों से जूझते हुए हमने एलान सा कर दिया कि उरई के डी०वी० कॉलेज में नहीं पढ़ेंगे. इसका कारण था उस समय वहाँ बेहिसाब नक़ल का होना. यहाँ हमारा ऐलान हुआ, उधर पिताजी ने भी लौटती डाक की तरह से निर्णय सुना दिया कि उरई नहीं पढ़ना, तो क्या विदेश जाओगे पढ़ने? इस सम्पुट के कुछ अन्तराल बाद सुखद संदेशा फिर सुनाई दिया, ग्वालियर करवा देते हैं एडमीशन. 

कुछ आवश्यक भागदौड़ के बाद हमारा एडमीशन ग्वालियर में हो गया. अरे जी! ग्वालियर किसी संस्था का नाम नहीं है, ग्वालियर शहर के साइंस कॉलेज में हमारा एडमीशन हो गया, बी०एस-सी० में. पढ़ने का बंदोवस्त किया गया तो रहने की व्यवस्था भी की गई. हमारे सबसे छोटे चाचा यानि कि हम सबके भैया चाचा जो उनके भारतीय स्टेट बैंक वालों के लिए श्री धर्मेन्द्र सिंह सेंगर थे, उस समय ग्वालियर में ही रह रहे थे. उनके यहाँ रहने की व्यवस्था की बजाय कॉलेज के हॉस्टल को वरीयता दी गई. कॉलेज के एडमीशन होते ही हॉस्टल में भी प्रवेश मिल गया.

कॉलेज, हॉस्टल, रैगिंग, सीनियर्स आदि के डर को अपने में समेटे पहले दिन हमने पिताजी और चाचा जी की छत्रछाया में हॉस्टल की उस देहरी का स्पर्श किया जो आने वाले सालों में हमारी अत्यंत प्रिय जगह बन गई. हॉस्टल प्रवेश द्वार पर सबसे पहली मुलाकात हुई बी०एस-सी० प्रथम वर्ष के छात्र अनुराग से. फलों के स्वाद के साथ मित्रता की मिठास का शुभारम्भ हुआ, जो आजतक अपना मीठापन बनाये हुए है. अनुराग ने हमसे कुछ दिन पहले ही हॉस्टल में प्रवेश लिया था. उसकी रैगिंग भी हो चुकी थी. जब उसने अपनी रैगिंग के किस्सों की, हॉस्टल के सीनियर्स के व्यवहार की चर्चा की तो हमारी जान में जान आई. जहाँ एक तरफ हमारे भीतर का डर दूर जाता दिखा वहीं दूसरी तरफ पिताजी-चाचा जी भी संतुष्ट दिखे.

हॉस्टल का वह पहला दिन अत्यंत खुशनुमा बीता. पहले दिन ही सीनियर्स से बड़े भाइयों जैसा स्नेह मिलना इतना शुभ रहा कि पूरे तीन वर्ष निसंकोच, निर्द्वन्द्व, बेफिक्र होकर कब बीत गए पता ही नहीं चला. अपने सीनियर्स, सहपाठी तथा जूनियर्स भाइयों का इतना सहयोग, स्नेह, प्यार रहा कि आज भी उस हॉस्टल लाइफ में वापस जाने का मन करता है.


Saturday, 26 December 2015

वीडियो चलवाना भी सामूहिक पर्व हुआ करता था

बड़ा सा टीवी जो लकड़ी के बक्से में बंद. काले-सफ़ेद, झिलमिल करते चित्र, एक जगह स्टैंड पर रखा, छत पर लगे हवाई जहाजनुमा एंटीना के तार से बंधा. अभी इस आश्चर्य से पूरी तरह मुक्ति भी न पा सके थे कि वीडियो के अवतार ने रोमांचित कर दिया. काले-सफ़ेद की जगह रंगीन चित्र. बड़े से भारीभरकम एंटीना का कोई चक्कर नहीं. किसी एक घर की जागीर नहीं, आज इसके घर तो कल उसके घर.

पूरे मोहल्ले में जोश भर जाता था. आज कोई व्यक्ति वीडियो चलवा रहा है तो कल कोई दूसरा व्यक्ति. आज बरगदिया तरे (नीचे) तो कल पीली कोठी पर पाखर के पेड़ के नीचे. बरगदिया हमारे पाठकपुरा मोहल्ले में वो प्रसिद्द जगह थी जहाँ एक विशालकाय बरगद का पेड़ लगा हुआ था. ये वृक्ष आज भी उसी तरह मौजूद है. उसके किनारे एक मंदिर और आसपास मकान बने हुए थे. ये जगह हम बच्चों के खेलने-कूदने की जगह हुआ करती थी तो बड़ों के विमर्श का मंच. सभी लोग उस जगह को बरगदिया तरे अर्थात बरगद के पेड़ के नीचे से ही जानते-पहचानते-संबोधित करते थे. हाँ, तो बात हो रही थी वीडियो की. किसी दिन सामूहिक चंदा करके वीडियो चलता तो किसी दिन कोई अपनी रईसी दिखाते हुए सारा खर्चा खुद ही करता.

मोहल्ले में लगभग रोज ही वीडियो पर फिल्मों का चलना होता किन्तु हम भाइयों को किसी-किसी दिन ही विशेष परिस्थितियों में, कुछ शर्तों के अनुपालन के बाद किसी बड़े के संरक्षण में फिल्म देखने को मिल पाती. ऐसी सुविधा भी हमें दिखाई जाने वाली फिल्मों के चरित्र के आधार पर उपलब्ध करवाई जाती थी.  ऐसी अनुशासनात्मक बंदिशों के बाद भी कई बार चोरी से फिल्मों का दिख जाना हो जाता था. ऐसा गर्मियों की रातों में ही हो पाता था जबकि रात में छत पर सोने के दौरान आसपास के घरों की छतों पर चलते वीडियो हमें भी लाभान्वित कर जाते. चारपाई को अपने छत की छोटी सी चहारदीवार के सहारे टिका कर उसी पर बैठकर वीडियो क्रांति का चोरी-चोरी लाभ उठा लेते.

वीडियो के उस क्रांतिकारी प्रदर्शन के दौर में मोहल्ले के बच्चों में फिल्म देखने की प्रतियोगिता सी चल पड़ी. कौन सी फिल्म कितनी बार देखी गई, इस बात को लेकर आपस में होड़ लग गई. शहंशाह, नगीना, शराबी, संतोषी माता, प्रेम रोग जैसी फिल्मों को कुछ बच्चों द्वारा पंद्रह-बीस बार देखने का ऐलान सा कर दिया गया. उधर मोहल्ले के बच्चों की फिल्म देखने की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही थी और इधर हमारे खाते में सीमित संख्या बनी हुई थी. पारिवारिक अनुशासन और माहौल का नुकसान भले ही ये रहा हो कि मोहल्ले के बच्चों के साथ फिल्मों की संख्यात्मक प्रतियोगिता में हम फिसड्डी बने रहे पर गुणात्मक रूप में अपने समय की बेहतरीन फ़िल्में देखने का अवसर हमको बचपन में ही मिल गया था. फिल्म जगत के तमाम नामचीन कलाकारों द्वारा अभिनीत बेहतरीन फिल्मों को देखने का मौका मिला. उनमें से बहुत सी फ़िल्में तो समझ आ जाती और बहुत सी ऐसी होती जिन्हें बस देखते ही रहते, देखते ही रह जाते. तब देखते रह जाने वाली ऐसी फिल्मों का अर्थ, उनके कथ्य को अब जाकर समझा.

Monday, 30 November 2015

किसी अजूबे से कम न था टीवी

बचपन का वो दौर सिर्फ मौज-मस्ती का दौर, शरारतों का दौर, शैतानियों का दौर था. आज की तरह न घुटन भरा माहौल, न आज की तरह पढ़ाई का अनावश्यक बोझ. बचपन का अर्थ तब विशुद्ध बचपन ही होता था. मासूमियत, भोलापन, नादानी से सजा-संवरा बचपन. आज के बच्चों की तरह गैजेट्स से सुसज्जित नहीं था सो आज के बच्चों की तरह बुजुर्गियत भी नहीं थी. तब कोई भी नई चीज कौतूहल का केंद्र हुआ करती थी. घर की साइकिल कौतुहल थी, तो वकील बाबा की एम्बेसडर कार भी आश्चर्य थी. घर में जालीदार एंटीना लगा रेडियो अचरज की विषय-वस्तु थी तो टीवी महाअजूबा के रूप में प्रकट हो गया. 

घर में रेडियो था, जो किंचित आरम्भिक आश्चर्यबोध के पश्चात् गर्व की अनुभूति करवाने लगा. इसके पीछे कारण ये था कि तब मोहल्ले में आसपास रेडियो न के बराबर थे. एक ऐसे डिब्बे के बीच जिसमें बोलने-गाने वाला दिखाई नहीं दे रहा हो कोई ऐसा बड़ा डिब्बा देखने को मिल जाये जिसमें गाने वाले, बातचीत करने वाले सामने दिख रहे हों तो उसे दुनिया का अजूबा ही समझा जायेगा. इतने छोटे से डिब्बे में कैसे घुसे होंगे ये लोग? इतने छोटे से डिब्बे में इतने सारे लोग आये कैसे होंगे? जो लोग दिख रहे, उनके अलावा बाकी लोग कहाँ छिपे हैं? जिस दिन पहली बार टीवी देखा, ऐसे न जाने कितने सवाल दिमाग में आते रहे और दिमाग को चकराते रहे. खुद से ही सवाल करते रहे, खुद को ही जवाब देते रहे. ये शायद 1977-78 की बात होगी, हमारे सबसे बड़े चाचा श्री नरेन्द्र सिंह सेंगर, हम लोगों के मन्ना चाचा तब कालपी में भारतीय स्टेट बैंक में सेवारत थे. हमारा बहुत सारा समय मन्ना चाचा के साथ गुजरा. उरई से बहुत पास होने के कारण या तो चाचा परिवार सहित उरई आ जाते या फिर हम लोग चाचा के पास पहुँच जाते.

चाचा के पास कालपी जाने पर वहीं इस बुद्धू बक्से से परिचय हुआ. चाचा जी के मकान मालिक अपने समय के धनाढ्य व्यक्तियों में माने जाते थे. उनको हम बच्चे ताऊजी-ताईजी से संबोधित करते थे. सरल, स्नेहिल स्वभाव के धनी ताऊजी-ताईजी एक ब्लैक-व्हाइट टीवी के मालिक भी हुआ करते थे. हम लोगों के कालपी पहुँचते ही उस टीवी से उनका और उनके बच्चों का मालिकाना हक़ समाप्त हो जाता और वह बोलता-बतियाता डिब्बा हमारी संपत्ति हो जाया करती. नमस्कार के साथ शुरू होने वाला टीवी शुभ रात्रि के साथ ही बंद होता. एकमात्र दूरदर्शन चैनल होने के कारण सीमित समयावधि में चलने वाले कार्यक्रमों से हम बच्चों का कोई लेना-देना नहीं होता. बस टीवी देखना होता था सो देखते रहते थे. कृषि सम्बन्धी चर्चा हो, स्वास्थ्य सम्बन्धी चर्चा हो, सामाजिक विमर्श हो, समाचार हों, गाने हों बस देखना था सो देखना था. लम्बे-लम्बे एंटीना की सहायता से नेटवर्क पकड़ने का प्रयास किया जाता था. बहुधा कार्यक्रमों में झिलमिलाहट रहती, आवाज़ आती-जाती रहती, चित्र बनते-बिगड़ते रहते इसके बाद भी उन तीन-चार घंटों के टीवी दर्शन से अत्यंत सुखद अनुभूति मिलती. न विषय की समझ, न विमर्श की पहचान, न खबरों से वास्ता मगर इसके बाद भी सबकुछ बहुत अच्छा-अच्छा सा लगता था. हम बच्चों का टीवी दर्शन के साथ-साथ ताईजी का घरेलू पकवान खिलवाते रहने का प्यार-दुलार भी चलता रहता.

आज जबकि तब के बड़े-बड़े एंटीनों की जगह छोटी-छोटी छतरियों ने ले ली है; आज जबकि तब के सामान्य से प्रसारण के मुकाबले फुल एचडी फॉर्मेट में प्रसारण होने लगा है; आज जबकि तब के चंद घंटों के प्रसारण के मुकाबले चौबीस घंटे प्रसारण होने लगा है; आज जबकि तब के एक चैनल के मुकाबले सैकड़ों चैनल कार्यक्रम परोसने में लगे हों तब भी टीवी एक पल को वो सुख-आनंद नहीं दे पाता है जो उस समय मिलता था. चित्रहार के लिए दिन गिनना, सीरियल के लिए पूरे सप्ताह इंतजार करना, नए वर्ष के मनमोहक कार्यक्रमों का वर्ष भर इंतजार रहना, प्रातःकालीन प्रसारण शुरू होने के बाद रंगोली को चारपाई में दुबके-दुबके देखना आदि-आदि अपने आपमें स्वर्गिक अनुभूति देने वाला रोमांच था, जिसकी याद आज भी आनंद के सागर में गोते लगवाती है.  


Saturday, 21 November 2015

कूड़े के ढेर पर पड़े केले के छिलकों से मिटती भूख


इंसान की जिन्दगी में बहुत सी स्थितियाँ ऐसी होतीं हैं जब वह एकदम असहाय स्थिति में होता है और इस तरह की स्थितियों से बाहर आने के लिए वह कुछ भी कर बैठता है. ऐसी विषम स्थिति किसी भी व्यक्ति के जीवन में आने के कई कारण होते हैं, भूख उनमें से एक कारण होती है. कहा भी जाता है कि पेट जो न कराये वो कम है. भूख में आदमी को दम तोड़ते भी सुना है, किसी भी स्थिति तक गिरते देखा है, चोरी करते सुना है, अपना जिस्म बेचते भी सुना है. भूख और गरीबी की विकट स्थिति से लड़ने-जूझने की, जिन्दा रहने की मारामारी में कुछ भी कर गुजरने के लिए उठाये गये कदमों में प्रसिद्ध साहित्यकार शैलेश मटियानी के बारे में पढ़ रखा है कि वे किसी न किसी बहाने से पुलिस की पकड़ में आने की कोशिश करते थे. इससे उनके खाने और रहने की समस्या कुछ हद तक निपट जाया करती थी. 

यह एक दशा है जो हमने पढ़ रखी है. कुछ इसी तरह की दशा से हमें रूबरू होने का कुअवसर उस समय मिला जब हम अपनी स्नातक की पढ़ाई के लिए सन् 1990 में ग्वालियर गये. हमारा रहना हॉस्टल में होता था और ग्वालियर में ही हमारे सबसे छोटे चाचाजी के रहने के कारण हफ्ते में एक-दो बार घर भी जाना होता था. उरई जैसे छोटे शहर से निकल कर ग्वालियर जैसे शहर में आने पर घूमने का अपना अलग ही मजा आता था. इसी कारण से चाचा के घर पर हमेशा रास्ते बदल-बदल कर जाया करते थे.

एक दिन अपनी साईकिल यात्रा रेलवे स्टेशन की ओर से करने का फैसला किया. रेलवे स्टेशन के पास के ओवरब्रिज पर चढ़ते समय रेलवे स्टेशन का नजारा और सामने खड़े किले का दृश्य बहुत ही मजेदार लगता था. विशालकाय किला लगातार पास आते दिखता और फिर उसके नीचे से गुजरना अद्भुत एहसास कराता था. इसी रास्ते पर रानी लक्ष्मी बाई का समाधिस्थल होना और भी गौरवान्वित कर जाता था. उस दिन जैसे ही ओवरब्रिज पर चढ़ने के लिए अपनी साइकिल को मोड़ा तो उसी मोड़ पर लगे कूड़े के ढ़ेर में एक बारह-तेरह साल के लड़के को बैठे देखा. ऐसे दृश्य हमेशा ही किसी न किसी कूड़े के ढ़ेर पर दिखाई देते थे कि छोटे-छोटे लड़के-लड़कियाँ कुछ न कुछ बीनते नजर आते. उस दिन भी कुछ ऐसा ही लगना था किन्तु ऐसा लगा नहीं. वह लड़का बजाय कूड़ा-करकट बीनने के कुछ और ही करता नजर आया. वह कूड़े के ढेर में पड़े केले के छिलकों को खा रहा था. 

आँखों का धोखा समझ कर दिमाग को झटका दिया और अपनी साइकिल की रफ्तार बढ़ाने के लिए पैडल पर जोर लगाया. मुश्किल से तीन या चार कदम ही साइकिल चल पाई होगी कि मन में उथल-पुथल मचने लगी. ब्रेक लगाये और वहीं खड़े हो गये अब न तो समझ में आये कि आगे बढ़ें या फिर उस लड़के की तरफ जाएँ. जो देखने का भ्रम हुआ था, कहीं सच तो नहीं? जैसे ही यह विचार कौंधा अगले ही पल मन में कुछ विचार किया और साइकिल को घुमा कर उस लड़के के पास खड़ा कर दिया. दिमाग भन्ना गया कि वह अभी भी निर्विकार भाव से केले के छिलके को खुरच-खुरच कर खाने में लगा है. 

क्यों क्या कर रहे हो? की आवाज सुनकर उस लड़के के हाथ से केले का छिलका छूट गया, उसको लगा कि कहीं यह भी अपराध न कर रहा हो. आँखों ने जो देखा था वह सच था. उसके मुँह से कोई आवाज नहीं निकली, बस वह चुपचाप खड़ा हो गया. हमने उससे खाना खाने के लिए पूछा तो उसने सिर हाँ की स्थिति में हिला दिया. उसको अपने साथ लेकर स्टेशन के बाहर ही तरफ बने होटलों की तरफ ले कर चल दिए. अब समस्या यह थी कि उसको होटल में बिठाकर तो खिलाने को कोई भी तैयार नहीं था. एक होटल में सोलह रुपये में भोजन की एक थाली मिलती थी. उससे एक थाली देने को कहा तो उसने बाहर देने से मनाकर दिया. इधर-उधर निगाह दौड़ा कर कुछ समाचार-पत्र और कुछ पॉलीथीन इकट्ठा किये और उस भूखे बच्चे के लिए भोजन प्राप्त किया. सड़क के दूसरी तरफ एक जगह बिठाकर उसे अपने सामने खाना खिलवाया. सामने इसलिए ताकि कोई और उसे परेशान न कर सके.

जीवन में तब से लेकर आज तक बहुत सी अच्छी बुरी घटनाओं को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से देखा-सुना है किन्तु आज भी वह घटना दिमाग से निकाले नहीं निकलती है. तब से लेकर आज तक एक नियम सा बना लिया है कि कभी भी माँगने वालों को, स्टेशन पर, ट्रेन में भीख माँगने वाले को, कूड़ा बीनने वाले बच्चों को रुपये देने की बजाय उनको खाना खिला देते हैं.


Sunday, 15 November 2015

चहकने वाला ननिहाल अब खामोश रहता है


शाम का धुंधलका होते ही घर के पास बने कुंए से पानी खींचना और घर के सामने की जगह पर छिड़क कर जमीन की गर्मी, धूल को दबाने का काम शुरू हो जाता. कई-कई बाल्टी पानी खींचना, कई-कई बार का चक्कर लगाना, जमीन की दिन भर की गर्मी को शांत करने की सफल कोशिश के बाद मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक से मन झूम जाता. चारपाई बिछाने का काम भी होने लगता. कोई अपनी चटाई बिछाकर पहले से अपनी जगह को घेरने लगता. फैलते अंधियारे में कभी चाँद की चाँदनी तो कभी लालटेन की रौशनी फैलती दिखती. इसी रौशनी के सहारे आसपास के बुजुर्ग, युवा, बच्चे, पुरुष, महिलाएँ अपने-अपने झुण्ड बनाकर विस्तार में फैली जगह में चहचाहट भर रहे होते. घर के सामने बने विशाल चबूतरे पर हमारे सबसे बड़े मामा, नन्ना मामा (श्री जनक सिंह क्षत्रिय) जो प्रधानाध्यापक रहे थे, के द्वारा रामचरित मानस का नियमित पाठ होता. उसे नियमित सुनने वाले भी अपनी-अपनी जगह पर बैठे होते. बच्चों की शरारतों, युवाओं के ठहाकों, महिलाओं की रुनझुन करती हँसी के साथ-साथ मानस की चौपाइयों की स्वर-लहरी भक्तिमय रूप में घुलती रहती. 

शाम का धुंधलका घहराते-घहराते रात में बदलता जाता. गली भर में, चबूतरों पर, नीम के पेड़ों के नीचे पाए जाते झुण्ड भी परिवर्तित होते रहते. लोगों की जगह बदलती रहती, बैठने का स्थान बदलता रहता, आपसी वार्तालाप का विषय बदलता रहता. कभी एकदम से चिल्ला-चोट, कभी संशय भरी खुसफुसाहट, कभी ठहाके तो कभी नितांत ख़ामोशी सी. रात में अँधेरे में सिमटती जाती अपनी-अपनी दुनिया में निमग्न ये छोटे-छोटे समूह चलायमान भी बने रहते. कुछ के घर से भोजन कर लेने की पुकार उठती. कुछ भोजन करके ऐसी गतिविधियों का हिस्सा बनते, कुछ समूह का हिस्सा बने लोगों को अपने साथ ले जाकर भोजन का आनंद उठाते. कुछ ज्यादा ही मनमौजी टाइप के लोग अपनी थाली सहित सबके बीच ही प्रकट हो जाते. एक थाली, कई-कई हाथ, न जाति का पूछा जाना, न बड़े-छोटे का भान. छोटे-छोटे कौर परमानन्द की प्राप्ति कराते हुए थाली के भोजन को समाप्त करते जाते. थाली खाली होने के पहले ही भर जाती. कभी इस घर से सूखी सब्जी आ जाती तो कभी उस घर की रसीली सब्जी का स्वाद मिलता. कहीं से दाल आकर लोगों को ललचाती तो कहीं से तीखा अचार आकर चटखारे बढ़ा देता. अनौपचारिक रूप से सब एक-दूसरे से हिले-मिले कहानी, किस्सों, लोकगीतों के हिंडोले पर कब नींद के आगोश में खो जाते, पता ही नहीं चलता. 

ऐसा नहीं कि रातें ही ऐसे खुशगवार गुजरती वरन सुबह से लेकर शाम आने तक जिंदगी ऐसे ही खुशगवार तरीके से गुजरती. दिन भर धूप की, गर्मी की चिंता से मुक्त कभी खलिहान, कभी बगिया की सैर. कभी नीम के झोंके पकड़ने की होड़ में झूलों की पेंग कभी तालाब की गहराई नापने की होड़ तो कभी बम्बा की धार को पीछे छोड़ने की सनक. आम, अमिया पर निशाना साधने को फेंके जाते पत्थर; तरबूज-खरबूज को एक मुक्के से तोड़ने की प्रतियोगिता दिन-दिन भर बच्चों के बीच चलती रहती. गर्मी हो या सर्दी, सभी मौसम में बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक की एकसमान गतिविधियाँ. सभी की सहयोगात्मक स्थिति. सभी के बीच प्रेम, स्नेह, सौहार्द्र का गुलशन लगातार महकता रहता. बच्चों से लेकर बड़ों तक अपनापन दिखाई देता. किसी के बीच किसी तरह भेदभाव समझ नहीं आता. घर की चौखटों पर कोई प्रतिबन्ध न दिखाई देता. गलियाँ चहकती-महकती रहती.

समय ने बहुत कुछ बदल दिया. इंसानों को भी बदला. गाँवों की संस्कृति को भी बदला. खेतों, खलिहानों, बगीचों, गलियों की मिट्टी की सुगंध को बदला. नीम के पेड़ों पर पड़े झूलों को बदला, तालाबों, नदियों, बम्बों के पानी को बदला. गुलजार रहने वाले खेत, खलिहान, बगीचे, गलियाँ अब सुनसान से दिखाई देते हैं. चबूतरे वीरान हैं, नीम तन्हा खड़े हैं, झूले खामोश लटके हैं, गलियों में सुगन्धित मिट्टी की जगह सीमेंट की गर्मी उड़ रही है. एक थाली में भोजन की परम्परा की जगह घर के आँगन में दीवार खिंची है. अपनेपन की जगह स्वार्थ दिखाई देने लगा है. प्रेम-स्नेह की जगह वैमनष्यता ने ले ली है. अब न दिन चहकते दिखते हैं और न ही रातें गुलज़ार दिखती हैं. कुँओं की जगत पर खिलखिलाहट नहीं सुनाई देती. गली के मकानों से भोजन कर जाने की आवाजें भी नहीं उठती. सब अपने-अपने में मगन हैं. सब अपने-अपने घरौंदों में सिमटे हैं.

कभी चहकता-महकता दिखता गाँव तन्हा है, खामोश है. अपने में सिसकता है, अपने में रोता है किन्तु अब उसके आँसू देखने वाला कोई नहीं, उसके आँसू पोंछने वाला कोई नहीं, उसके हालचाल जानने वाला कोई नहीं.