Sunday, 15 November 2015

चहकने वाला ननिहाल अब खामोश रहता है


शाम का धुंधलका होते ही घर के पास बने कुंए से पानी खींचना और घर के सामने की जगह पर छिड़क कर जमीन की गर्मी, धूल को दबाने का काम शुरू हो जाता. कई-कई बाल्टी पानी खींचना, कई-कई बार का चक्कर लगाना, जमीन की दिन भर की गर्मी को शांत करने की सफल कोशिश के बाद मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक से मन झूम जाता. चारपाई बिछाने का काम भी होने लगता. कोई अपनी चटाई बिछाकर पहले से अपनी जगह को घेरने लगता. फैलते अंधियारे में कभी चाँद की चाँदनी तो कभी लालटेन की रौशनी फैलती दिखती. इसी रौशनी के सहारे आसपास के बुजुर्ग, युवा, बच्चे, पुरुष, महिलाएँ अपने-अपने झुण्ड बनाकर विस्तार में फैली जगह में चहचाहट भर रहे होते. घर के सामने बने विशाल चबूतरे पर हमारे सबसे बड़े मामा, नन्ना मामा (श्री जनक सिंह क्षत्रिय) जो प्रधानाध्यापक रहे थे, के द्वारा रामचरित मानस का नियमित पाठ होता. उसे नियमित सुनने वाले भी अपनी-अपनी जगह पर बैठे होते. बच्चों की शरारतों, युवाओं के ठहाकों, महिलाओं की रुनझुन करती हँसी के साथ-साथ मानस की चौपाइयों की स्वर-लहरी भक्तिमय रूप में घुलती रहती. 

शाम का धुंधलका घहराते-घहराते रात में बदलता जाता. गली भर में, चबूतरों पर, नीम के पेड़ों के नीचे पाए जाते झुण्ड भी परिवर्तित होते रहते. लोगों की जगह बदलती रहती, बैठने का स्थान बदलता रहता, आपसी वार्तालाप का विषय बदलता रहता. कभी एकदम से चिल्ला-चोट, कभी संशय भरी खुसफुसाहट, कभी ठहाके तो कभी नितांत ख़ामोशी सी. रात में अँधेरे में सिमटती जाती अपनी-अपनी दुनिया में निमग्न ये छोटे-छोटे समूह चलायमान भी बने रहते. कुछ के घर से भोजन कर लेने की पुकार उठती. कुछ भोजन करके ऐसी गतिविधियों का हिस्सा बनते, कुछ समूह का हिस्सा बने लोगों को अपने साथ ले जाकर भोजन का आनंद उठाते. कुछ ज्यादा ही मनमौजी टाइप के लोग अपनी थाली सहित सबके बीच ही प्रकट हो जाते. एक थाली, कई-कई हाथ, न जाति का पूछा जाना, न बड़े-छोटे का भान. छोटे-छोटे कौर परमानन्द की प्राप्ति कराते हुए थाली के भोजन को समाप्त करते जाते. थाली खाली होने के पहले ही भर जाती. कभी इस घर से सूखी सब्जी आ जाती तो कभी उस घर की रसीली सब्जी का स्वाद मिलता. कहीं से दाल आकर लोगों को ललचाती तो कहीं से तीखा अचार आकर चटखारे बढ़ा देता. अनौपचारिक रूप से सब एक-दूसरे से हिले-मिले कहानी, किस्सों, लोकगीतों के हिंडोले पर कब नींद के आगोश में खो जाते, पता ही नहीं चलता. 

ऐसा नहीं कि रातें ही ऐसे खुशगवार गुजरती वरन सुबह से लेकर शाम आने तक जिंदगी ऐसे ही खुशगवार तरीके से गुजरती. दिन भर धूप की, गर्मी की चिंता से मुक्त कभी खलिहान, कभी बगिया की सैर. कभी नीम के झोंके पकड़ने की होड़ में झूलों की पेंग कभी तालाब की गहराई नापने की होड़ तो कभी बम्बा की धार को पीछे छोड़ने की सनक. आम, अमिया पर निशाना साधने को फेंके जाते पत्थर; तरबूज-खरबूज को एक मुक्के से तोड़ने की प्रतियोगिता दिन-दिन भर बच्चों के बीच चलती रहती. गर्मी हो या सर्दी, सभी मौसम में बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक की एकसमान गतिविधियाँ. सभी की सहयोगात्मक स्थिति. सभी के बीच प्रेम, स्नेह, सौहार्द्र का गुलशन लगातार महकता रहता. बच्चों से लेकर बड़ों तक अपनापन दिखाई देता. किसी के बीच किसी तरह भेदभाव समझ नहीं आता. घर की चौखटों पर कोई प्रतिबन्ध न दिखाई देता. गलियाँ चहकती-महकती रहती.

समय ने बहुत कुछ बदल दिया. इंसानों को भी बदला. गाँवों की संस्कृति को भी बदला. खेतों, खलिहानों, बगीचों, गलियों की मिट्टी की सुगंध को बदला. नीम के पेड़ों पर पड़े झूलों को बदला, तालाबों, नदियों, बम्बों के पानी को बदला. गुलजार रहने वाले खेत, खलिहान, बगीचे, गलियाँ अब सुनसान से दिखाई देते हैं. चबूतरे वीरान हैं, नीम तन्हा खड़े हैं, झूले खामोश लटके हैं, गलियों में सुगन्धित मिट्टी की जगह सीमेंट की गर्मी उड़ रही है. एक थाली में भोजन की परम्परा की जगह घर के आँगन में दीवार खिंची है. अपनेपन की जगह स्वार्थ दिखाई देने लगा है. प्रेम-स्नेह की जगह वैमनष्यता ने ले ली है. अब न दिन चहकते दिखते हैं और न ही रातें गुलज़ार दिखती हैं. कुँओं की जगत पर खिलखिलाहट नहीं सुनाई देती. गली के मकानों से भोजन कर जाने की आवाजें भी नहीं उठती. सब अपने-अपने में मगन हैं. सब अपने-अपने घरौंदों में सिमटे हैं.

कभी चहकता-महकता दिखता गाँव तन्हा है, खामोश है. अपने में सिसकता है, अपने में रोता है किन्तु अब उसके आँसू देखने वाला कोई नहीं, उसके आँसू पोंछने वाला कोई नहीं, उसके हालचाल जानने वाला कोई नहीं.

Sunday, 1 November 2015

उन भयानक दिनों की याद आज भी है


31 अक्टूबर की रात होने से पहले ही हवाओं में इंदिरा गाँधी की हत्या की दुखद खबर तैरने लगी थी. पुष्ट-अपुष्ट खबरों के बीच लोगों में इस खबर को लेकर संशय बना हुआ था. संशय के साथ-साथ लोगों में एक अनजाना सा भय भी दिख रहा था. शाम को अपनी माँ के साथ सब्जी, अन्य घरेलू समान की खरीददारी करते समय दुकानदारों के चेहरों पर, उनकी बातचीत में डर का दर्शन किया जा सकता था. सब्जी मंडी के छोटे-छोटे दुकानदार अपने सामान को लगभग समेटने के अंदाज़ में ग्राहकों को अधिक से अधिक सामान लेने की हिदायत देते जा रहे थे. इंदिरा गाँधी की हत्या हो गई है, अब कुछ न कुछ होगा जैसा भाव उनकी बातचीत में झलक रहा था. उस समय 11 वर्ष की उम्र यह समझाने के लिए बहुत थी कि अब कुछ न कुछ होगा का अर्थ क्या हो सकता है. बाज़ार से घर वापसी के दौरान बाज़ार में एक तरह का हडकंप सा मचा हुआ था. 

पिताजी के अधिवक्ता होने के और राजनैतिक सक्रिय व्यक्ति होने के कारण देर रात घर में आसपास वालों का आना-जाना लगा रहा. आने वालों की बातचीत, लोगों की खुसुर-पुसुर से ऐसा समझ आ रहा था कि इंदिरा गाँधी के किसी सिख अंगरक्षक ने उनकी हत्या की है और उरई से भी कुछ सिख भाग चुके हैं. आने वाले हर व्यक्ति को किसी अनहोनी का डर सता रहा था. शहर के मुख्य बाज़ार से कुछ दूर होने के कारण रात को किसी अनहोनी जैसी घटना सुनाई भी नहीं दी किन्तु सुबह के उजाले में कुछ और ही देखने को मिला. लगभग 10-11 बजे के आसपास घर के सामने से गुजरने वाली गली में रोज की तुलना में बहुत अधिक संख्या में लोगों की एक ही दिशा को भागमभाग मची हुई थी. हर व्यक्ति अपने हाथों में कुछ न कुछ उठाये भागा चला जा रहा था, कुछ तो अपनी शारीरिक सामर्थ्य से अधिक सामान अपने ऊपर लादे गिरते-भागते चले जा रहे थे. पूछने पर एक ही जवाब मिल रहा था कि दंगा हो गया है. पिताजी आसपास के अन्य प्रतिष्ठित लोगों के साथ बाहर निकले हुए थे, उनके वापस आने पर ही सही जानकारी मिल सकती थी. इसके बाद भी एक बात स्पष्ट दिख रही थी कि उरई में कुछ गड़बड़ हो गई है जिस कारण से यहाँ लूटपाट जैसे हालात बन गए हैं.

पिताजी के वापस आने पर पता चला कि कुलदीप नाम का एक धनाढ्य व्यापारी सिख उरई छोड़कर भाग गया है तथा लोगों में इस बात की आशंका है कि उसका भी किसी न किसी रूप में इंदिरा गाँधी हत्याकाण्ड में हाथ रहा है. अभी छोटे हो, नहीं समझोगे, अपना काम करो, जाकर खेलो जैसे वाक्यों के बीच कर्फ्यू, दंगा, लूटपाट जैसे शब्द समझ से परे थे पर इतना तो समझ आ रहा था कि उरई में कुछ गड़बड़ हो गई है. उरई में रह रहे सिख समुदाय की इंदिरा गाँधी हत्याकांड में भागीदारी की सत्यता जो भी रही हो, सिख समुदाय की इस घटना पर प्रतिक्रिया जो भी रही हो पर उग्र भीड़ ने कुलदीप की दुकान और घर को निशाना बनाने के साथ-साथ सिख समुदाय की दुकानों को, घरों को, लोगों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया. कुछ दुकानों, मकानों में आग भी लगा दी गई किन्तु किसी सिख की हत्या का, उसकी जान लेने का मामला सामने नहीं आया. सिखों को, उनके परिवार वालों को प्रशासन की तथा कुछ जागरूक नागरिकों की मदद से सुरक्षा प्रदान की गई. इक्का-दुक्का मारपीट की घटनाओं को छोड़कर यहाँ लूटपाट की घटना अधिक सामने आई.

जैसा कि याद है उरई में लोगों ने हालात को बिगड़ने के स्थान पर संभालने की कोशिश की थी किन्तु चंद राजनैतिक मौकापरस्त लोगों और हालात का फायदा उठाने वालों ने अपनी कुत्सित मानसिकता दिखा ही दी थी. हालात बेकाबू न हों इसके लिए प्रशासन द्वारा कर्फ्यू भी लगाया गया. जैसा कि फिर बाद में समाचार-पत्रों में, रेडियो के समाचारों में जो कुछ, जैसा पढ़ने-सुनने को मिला उसने उस उम्र में भी रोंगटे खड़े कर दिए. कालांतर में कानपुर के उस मकान को देखने का अवसर मिला जिसमें एक परिवार के कई सदस्य जिन्दा जला दिए गए थे. कुछ और जगहों पर जाने पर उस समय के नरसंहार स्थलों को देख कर मन व्हिवल हो उठा था. अपने कुछ परिवारीजनों से इसी समयावधि में उनकी आँखों देखी सुनने के बाद तत्कालीन स्थिति की, हालात की गंभीरता को आज तक महसूस करते हैं.


Saturday, 31 October 2015

कोई स्कूल नहीं हमारे उस स्कूल जैसा

पहले स्कूल से पहले ही दिन वापसी के कितने दिनों तक हम घर में बैठे, ये याद नहीं. ऐसी कोई चर्चा भी नहीं की गई हमसे, हाँ, इसकी चर्चा अवश्य हुई कि हमें स्कूल में भेजे जाने को लेकर घर में उच्च स्तरीय शिखर वार्ताएँ शुरू हो गईं थीं. ऐसा अम्मा जी अक्सर अपनी बातों में जिक्र किया करती हैं. उन दिनों उरई में गिने-चुने स्कूल हुआ करते थे. उस समय का एकमात्र अंग्रेजी माध्यम का मिशन स्कूल आज भी है. घर से बहुत दूर होने के कारण उस स्कूल में हमारे एडमीशन को लेकर आमराय पारिवारिक वार्ताओं में न बन सकी. घर के पास एक स्कूल था पर घर और स्कूल के बीच पड़ता एक विकट नाला उस स्कूल में हमारे प्रवेश में बाधक बना. इसी विचार-विमर्श के बीच हमारे मोहल्ले में ही एक नए स्कूल का उदय हुआ. घर के सभी सदस्यों को लगा जैसे इस स्कूल का खुलना सिर्फ हमारे लिए ही हुआ था. घर से बहुत दूर नहीं, बीच में नदी, नाला, सड़क, यातायात जैसा कुछ नहीं. सो एक दिन निश्चित करके हमारा प्रवेश उस नवोन्मेषी स्कूल में करवा दिया गया.

पं० उमादत्त मिश्र बालिका विद्यालय के नाम से आरम्भ वह स्कूल वर्तमान में भी पं० उमादत्त मिश्र जूनियर हाई स्कूल के नाम से संचालित है. उस समय छोटा सा वह स्कूल अपने आसपास खेलने का मैदान समेटे हुआ था, जो अब कुछ हद तक सिकुड़ सा गया है. शिक्षिकाएँ, जिन्हें हम दीदी कहकर पुकारते थे और प्रधानाचार्या को बड़ी दीदी. सभी का स्नेह, प्यार, दुलार, आशीर्वाद तब भी मिला, आज भी मिल रहा है. बड़ी दीदी के रूप में मधु दीदी के साथ शीला दीदी, सुमन दीदी, सरोजनी दीदी, रेखा दीदी, स्नेहलता दीदी और इनके साथ-साथ शुक्ला आचार्य जी और प्रह्लाद आचार्य जी आदि ने हमारी नींव को भली-भांति तैयार किया. इस नींव की सुरक्षा का दायित्व बहुत दिनों तक लक्ष्मीआया माँ ने उठाया. बाद में हमारे दोनों छोटे भाइयों का प्रवेश भी उसी स्कूल में करवाया गया. जिनकी सुरक्षा का दायित्व हीरा आया माँ के जिम्मे किया गया.

उस समय विशेष बात यह थी कि स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या कम थी. नया-नया स्कूल होने और बच्चों की संख्या कम होने के कारण सभी बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाता था. ऐसे में वे सभी बच्चे जो पढ़ने-लिखने के साथ-साथ अन्य गतिविधियों में आगे रहते थे, अपने आप ही शिक्षिकाओं और अन्य बच्चों की निगाह में आ जाते थे. अपनी कक्षा सम्बन्धी गतिविधियों के अलावा अन्य दूसरी गतिविधियों में भी हम बराबर सहभागिता करते, आगे रहने का प्रयास करते. इसके चलते न केवल अध्यापकों के वरन समूचे स्कूल के बच्चों के चहेते बने रहते थे. ये तो नहीं कहेंगे कि आज के बच्चों की तरह हीरो टाइप रहन-सहन रहा हो, वेशभूषा रही हो पर अघोषित हीरो तो बने ही थे. हमारी इस हीरोगीरी को हमारे प्यारे-प्यारे से दोस्त और हवा दिए रहते थे. अश्विनी, अनिरुद्ध, रॉबिन्स, मनोज, हरकिशोर, राजीव, संतोष, श्यामबाबू, सौरभ, इरफ़ान, संजय, रोहिणी, स्नेहलता, सुचित्रा, अन्नपूर्णा, रेनू, मनोरमा आदि दोस्तों में से बहुत से आज भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. कुछ इसी दुनिया में बहुत दूर-दूर हैं जो बराबर याद आते रहते हैं. कुछ तो रूठकर हमेशा को दूसरी दुनिया में चले गए, उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.

आज भी उस स्कूल के प्रति आकर्षण बना हुआ है. उस स्कूल के शिक्षक, आया माँ, साथी बराबर याद आते हैं, स्मृति में बसे हुए हैं. उस समय के कुछ लोग आज भी साथ हैं. आये दिन उनसे मुलाकात होती रहती है. उस समय को याद करते हैं तो घर-परिवार जैसी अनुभूति होती है, जो आज के स्कूलों में देखने को नहीं मिल रही है. 

Saturday, 19 September 2015

बाबा आदम के ज़माने का स्कूटर


हमारी पूरी गैंग के घर लगभग एक ही दिशा में थे. जीआईसी से छुट्टी के बाद हम सब एकसाथ ही घर वापसी करते थे. पूरे रास्ते हुल्लड़, मस्ती, शरारतें होती रहतीं. तब आज की तरह न तो बहुत ज्यादा ट्रैफिक हुआ करता था और न ही बाइक के स्टंट. साइकिलों, रिक्शों की ही आवाजाही अधिक रहती थी. इक्का-दुक्का स्कूटर और कभी-कभी कोई मोटरसाइकिल, जिन्हें हम बच्चे फटफटिया कहते थे, दिख जाया करती थीं. लेम्ब्रेटा स्कूटर अपने अजब से हावभाव के कारण आसानी से पहचाने में आता. इसके साथ ही बजाज, प्रिया, सूर्या के स्कूटर भी अपनी उपस्थिति बनाये हुए थे. इन स्कूटरों के बीच बुलेट, येज़दी और राजदूत फटफटियाँ अपनी दमदार आवाज़ के कारण दिल-दिमाग में बसी थीं. इन सबके बाद भी शहर की सड़कें खाली-खाली ही रहती थीं. इसके अलावा तब शहर के नागरिक भी हम बच्चों को सड़क पर पूरा स्पेस देते थे, अपनी शरारतों को संपन्न करने का.

निश्चित सी दिनचर्या के बीच हम मित्रों की कॉलेज से घर वापसी हो रही थी. हा-हा, ही-ही अपने निर्धारित रूप में चल रही थी. आसपास के लोग, दुकान वाले, रिक्शे वाले हम बच्चों के मजाक का निशाना बनते थे, उस दिन भी बन रहे थे. तभी हम लोगों के बगल से एक स्कूटर बिना आवाज़ के निकला. हल्का आसमानी-सफ़ेद रंग का, नई अलग सी डिजाईन का स्कूटर देख हम सब चौंक से गए. चौंकने के कई कारण थे. एक तो अभी तक के चिरपरिचित एकरंग के स्कूटरों से इतर यह स्कूटर दो रंग का था. दूसरे तेज फट-फट आवाज़ के स्कूटरों से बिलकुल अलग लगभग खामोश आवाज़ वाला स्कूटर भी अपने आपमें चौंका रहा था. तीसरे तब के स्कूटरों में पीछे लगी स्टेपनी से इतर इसमें एक तरह का खालीपन भी आश्चर्य में डाले थे. जिस धीमी रफ़्तार से वह स्कूटर बगल से निकला, उससे कई गुना तीव्र गति में ये सब आश्चर्य आँखों के सामने से घूम गए. इस आश्चर्यजनक अकबकाहट में हमारे मुँह से निकल पड़ा, निकल क्या पड़ा चिल्लाहट सी गूँज उठी देखो, बाबा आदम के ज़माने का स्कूटर. 

इसके बाद स्कूटर उतनी ही तेजी से रुका, जितनी तेजी से हमारे शब्द निकले थे. स्कूटर चलाने वाले युवा सज्जन, जिनके बारे में मालूम चला कि बड़े सेठ जी हैं, उतर कर, बड़ी ही रोब-दाब के साथ हम बच्चों को हड़काने लगे. हम सब पूरी मौज के साथ उन सेठ जी की मौज लेने लगे. बात बढ़ते-बढ़ते हाथापाई, पत्थरबाजी जैसी स्थिति तक आने की आशंका दिखाई देने लगी तो आसपास के दुकानदारों ने उनको समझाने की कोशिश की. इस कोशिश में वे पूरी हनक के साथ उस स्कूटर की कीमत बताते हुए ऐसा एहसास दिलाने लगे मानो हम लोगों ने उनके विशिष्ट स्कूटर की घनघोर बेइज्जती कर दी हो.

बहरहाल वे सज्जन खिसियाहट के साथ अपने स्कूटर में बैठे और सेल्फ बटन के द्वारा उसे स्टार्ट कर वहाँ से निकल लिए. रंग, आकार, आवाज़ से अभी तक आश्चर्य में गोते खा रहे हम बच्चों के लिए ये एक और अचम्भा था कि स्कूटर बटन से स्टार्ट होता है, झुका कर किक मारने से नहीं. ये आगे बढ़ता है तो खटर-पटर किये गियर बदले बिना. आँखों में विस्मय की चमक लिए हम बच्चों के मुंह से अबकी एकसाथ फिर वही शब्द बाबा आदम के ज़माने का स्कूटरगूँजे मगर इस बार पिछली बार के मुकाबले और जोर की आवाज़ से. 


Thursday, 17 September 2015

पारिवारिक संस्कारों से मिली प्रेरणा

घर में पढ़ाई का माहौल था. बाबा जी ने तो अंग्रेजी शासन में अपने पारिवारिक विरोध के बाद भी अपनी पढ़ाई को जारी रखा था. बाबा जी बताया करते थे कि घर में जमींदारी होने के कारण उनके बड़े भाई नहीं चाहते थे कि वे पढ़ें. उनका सोचना था कि गाँव आकर जमींदारी के कामों में उनका सहयोग करें. ऐसे में बाबा जी की पढ़ने की जिद को उनके पिताजी ने माना और पढ़ने के लिए कानपुर भेजा. बड़े बाबा जी (बाबा जी के बड़े भाई श्री भोला सिंह जी) अक्सर बाकी जरूरी सामानों को तो भेज देते मगर पैसे नहीं भिजवाते थे. 

ऐसे में खुद को आर्थिक स्थिति से उबारने के लिए बाबा जी अपने एक मित्र की ट्रांसपोर्ट कंपनी में बिठूर से उन्नाव ट्रक भी चलाया करते थे. उस समय बनवाया गया लाइसेंस बाबा जी के पास अंतिम समय तक सुरक्षित रहा, जिसे वे कभी-कभी हम लोगों को दिखाकर अपने आत्मविश्वास और अपनी कर्मठता को बताया करते थे. बहरहाल उन्होंने अपने संघर्षों के द्वारा कानून की पढ़ाई पूरी की. बाद में वे सरकारी मुलाजिम बने. उनके चारों बेटों ने भी उनकी प्रेरणा से उच्च शिक्षा प्राप्त की. हमारी दादी भी शिक्षित थीं और अम्मा जी को भी बाबा से उच्च शिक्षा ग्रहण करने की प्रेरणा मिली.

शिक्षा के प्रति यह लगाव सांस्कारिक रूप से हमारे भीतर भी विरासतन आ गया. स्कूल में अपने सभी दोस्तों के बीच पढ़ाई-लिखाई में अव्वल होने के साथ-साथ अन्य गतिविधियों में भी पर्याप्त सक्रियता के साथ आगे-आगे बने रहते थे. यद्यपि घर-परिवार में माना जाता है और खुद हमें भी इस बात का एहसास होता है कि हमारे स्वभाव में एक प्रकार का संकोचीपन, एक तरह की अंतर्मुखी भावना परिलक्षित होती है. बचपन में इसकी अधिकता होने के बाद भी स्कूल में प्रति शनिवार भोजनावकाश के बाद होने वाली बालसभा में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया जाता. कभी सञ्चालन करने, कभी भाषण देने, कभी कविता सुनाने, कभी गीत गाने आदि में बहुत उत्साह से भाग लिया जाता. इसके अलावा खेलकूद में भाग लेना, प्रातःकालीन प्रार्थना के बाद संपन्न होने वाले कुछ नियमित कार्यों में तत्पर रहना, कक्षा में मॉनिटर बनने में आगे रहना, स्कूल में होने वाले छोटे-छोटे कार्यों में छात्र-छात्राओं का नेतृत्व करना भी बखूबी होता रहता. बचपन में जैसे-जैसे संकोची भावना में कमी आती रही, अंतर्मुखी व्यक्तित्व को निखरने में कुछ सहायता मिली, वैसे-वैसे पढ़ाई के प्रति रुझान और बढ़ता गया.

उस स्कूल के बाद भी पढाई का क्रम बना रहा. बाबा जी ने पढ़ाई के महत्त्व को अपनी युवावस्था में ही जान-समझ लिया था. गाँव की बातें बताते समय वे अक्सर कहा करते थे कि तुम्हारे पिताजी और चाचा लोगों को गाँव से इसीलिए बाहर निकाला कि वे पढ़-लिख कर कुछ बन सकें. वे हम सबको बहुत छोटे से ही समझाते रहे थे कि पढ़ाई खूब करना क्योंकि यही दौलत कोई नहीं छीन सकता. वे यह भी समझाते रहते थे कि कभी भी जमीन-जायदाद के लिए लड़ने की, रंजिश लेने की आवश्यकता नहीं. पढ़ने-लिखने के बाद उससे कहीं अधिक संपत्ति अर्जित की जा सकती है. शिक्षा के प्रति उनका अनुशासनात्मक भाव ही कहा जायेगा कि पढ़ाई से कभी मुँह नहीं चुराया. शिक्षा के प्रति उनके द्वारा जगाई गई ललक ने ही हमें दो विषयों, हिन्दी साहित्य और अर्थशास्त्र में, पी-एच०डी० डिग्री प्रदान करवा दी.

Wednesday, 19 August 2015

एक दिन का स्कूल


किसी भी व्यक्ति के जीवन में जन्मने के बाद महत्त्वपूर्ण दिन होता है उसका पहले दिन स्कूल जाना. लगभग सभी के लिए पहला स्कूली दिन बहुत ही ख़ास होता है. एक जैसी होते हुए भी सबकी अलग-अलग सी कहानी रहती है. वैसे देखा जाये तो स्कूल भी अपने आपमें एक अजब सा स्थान होता है, बच्चों के लिए. किसी के लिए दहशत भरा, किसी के लिए कौतुहल भरा, किसी के लिए खेल का स्थान, किसी के लिए बोझिल सा. हमारे लिए स्कूल कभी भी दहशत भरा नहीं रहा. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक शैक्षिक संस्थान को बहुत सहजता से आत्मसात करते रहे. बहरहाल, हम भी स्कूल गए, गए क्या, भेजे गए. समय से ही स्कूल भेजे गए.

हमारा पहला स्कूली दिन बहुत ही रोचक स्थिति में गुजरा. स्कूल का नाम सही-सही तो याद नहीं पर शायद राधा कृष्ण जूनियर हाई स्कूल या फिर कुछ इसी तरह का नाम था. स्कूल घर से काफी दूर था. स्कूल में प्रवेश कैसे हुआ, किसने करवाया, कब हुआ याद नहीं. हाँ, इतना याद है कि पहले दिन स्कूल जाना हुआ एक आया माँ के साथ. स्कूल पहुँचने के कुछ समय बाद हमें स्कूल में अच्छा नहीं लगा. बंद-बंद सा माहौल, छोटे-छोटे से कमरे. आज के भव्य स्कूलों, सजावटी इमारतों से इतर साधारण सा, किसी पुराने मकान में चलता स्कूल. जब तक वे आया माँ दिखती रहीं, तब तक तो हम स्कूल में जमे रहने की कोशिश करते रहे. उनके कुछ देर बाद न दिखने की स्थिति में हमने घर जाने की जिद मचाई तो बताया गया कि आया माँ किसी काम से स्कूल से चली गईं हैं, उनके आते ही घर भिजवा दिया जायेगा. ये पता लगते ही कि आया माँ स्कूल में नहीं हैं, घर जाने की जिद और तेज हो गई. 

जिद से भी ज्यादा जिद्दी होने का स्वभाव बचपन से ही रहा है, आज भी है. शायद उसी जिद के साथ-साथ रोना, चिल्लाना बहुत ज्यादा ही रहा होगा तभी स्कूल प्रबंधन ने एक शिक्षक के साथ हमें घर वापसी की राह दिखाई. घर का पता किसी को मालूम नहीं था. आया माँ स्कूल में नहीं. हमने पूरे विश्वास के साथ कहा कि हमें घर का रास्ता पता है. बस फिर क्या था, अपने विश्वास के भरोसे एक शिक्षक हमारे साथ घर को चल दिए. हम अपने पहले ही दिन अपनी याददाश्त, अपने विश्वास के सहारे वापस घर तक लौट आये. उस स्कूल में हमारा पहला दिन, उस स्कूल का आखिरी दिन भी साबित हुआ.

आज भी अम्मा जी उस दिन को याद कर बताती हैं कि वे शिक्षक और हमारे घर वाले हैरान थे कि उस अत्यंत छोटी सी उम्र में हमें स्कूल से घर तक का रास्ता कैसे याद रहा? हैरानी आपको भी हो रही होगी मगर सच ये है कि आज भी ये प्राकृतिक शक्ति हममें विद्यमान है कि किसी रास्ते से एक बार गुजर जाएँ, किसी भी व्यक्ति से एक बार मिल लें फिर वह हमारे दिमाग में हमेशा को बस जाता है.


Wednesday, 3 June 2015

आटा गूँथने की कोशिश में बन गई रबड़ी

गर्मियों के दिन आते हैं और जब कभी हम सभी आँगन में बैठ कर एकसाथ भोजन करते हैं तो अपने बचपन का एक किस्सा याद आ जाता है. छोटे-छोटे हाथों से पहली कोशिश रोटी बनाने के पहले आटा गूँथने की. बात उन दिनों की है जब हम कक्षा आठ में या नौ में पढ़ रहे होंगे. गरमी के दिन थे और परीक्षाओं के प्रेत से भी मुक्ति मिल चुकी थी, मई या जून की बात होगी. गरमी के कारण या फिर किसी और कारण से अम्मा जी की तबियत कुछ बिगड़ सी गई. अपनी क्षमता के अनुसार उन्होंने उस दशा में भी हम तीनों भाइयों का और घर का सारा काम सम्पन्न किया. लगातार काम करते रहने और कम से कम आराम करने के कारण अम्मा की तबियत ज्यादा ही खराब हो गई.

अम्मा तो पड़ गईं बिस्तर पर और मुसीबत आ गई हम भाइयों की. खाने की समस्या, सुबह नाश्ते की दिक्कत. पड़ोसी हम लोगों को बहुत ही अच्छे मिले हुए थे इस कारण समस्या अपना भयावह स्वरूप नहीं दिखा पाती थी. बगल के घर की दीदी आकर मदद करतीं और हम तीनों भाई दौड़-दौड़ कर उनका हाथ बँटाते रहते. दो-तीन दिनों के बाद एक शाम हमने अम्मा से कहा कि आज हम आटा गूँथते हैं. अम्मा ने मना किया कि अभी तुमसे ऐसा हो नहीं पायेगा पर हमने भी ऐसा करने की ठान ली. अपने नियत समय पर दीदी को भी आना था तो यह भी पता था कि उनके आते ही हमारा यह विचार खटाई में पड़ जायेगा. हमने अपने कार्य को करने के लिए पूरा मन बना लिया था. इससे पहले कभी भी आटा गूँथा नहीं था सो मन में कुछ ज्यादा ही उत्साह था. यह भी विचार आ रहा था कि हम अम्मा का एक काम तो कर ही सकते हैं. अम्मा आँगन में चारपाई पर लेटीं थीं और हम जमीन पर आटा, परात, पानी का जग लेकर बैठ गये. अम्मा ने जितना बताया उतना आटा परात में डालकर उसमें पानी मिलाया.

अब शुरू हुई हमारी आटा कहानी, पानी डरते-डरते डाला तो कम तो होना ही था. अम्मा के निर्देश पर थोड़ा सा और पानी डालकर गूँथना शुरू किया. आटे का स्वरूप कुछ-कुछ सही आने लगा पर अभी पानी की कमी लग रही थी. अम्मा के कहने पर फिर पानी डाला और हाथ चलाने शुरू किये. अब लगा कि पानी कुछ ज्यादा हो गया है. जब पानी ज्यादा हुआ तो थोड़ा सा आटा मिला दिया. हाथ चलाये तो लगा कि आटा ज्यादा है, फिर पानी की धार.

ऐसा तीन-बार करना पड़ गया. आटा, पानी.... पानी, आटा होते-होते आटा अन्ततः गुँथ तो गया किन्तु बजाय हम चार-पाँच लोगों के कम से कम आठ-नौ लोगों के लिए काफी हो गया. अब क्या हो? याद आये फिर भले पड़ोसी. दीदी को आवाज दी, जितना आटा हम लोगों के काम आ सकता था उतना तो निकाला शेष दीदी के हवाले कर दिया. दीदी ने मुस्कुराते हुए शाबासी भी दी और अम्मा ने भी हौसला बढ़ाया. इसका परिणाम यह निकला कि अगले दो-चार दिन आटा-वृद्धि के बाद हमने आटा भली-भाँति गूँथना सीख लिया. इस सीख का सुखद फल हमें तब मिला जब हम पढ़ने के लिए ग्वालियर साइंस कॉलेज के हॉस्टल में रहे. मैस के लगातार बन्द रहने के कारण पेट भरने में इस आटा-कहानी ने बड़ी मदद की.