Wednesday, 6 May 2015

आ गिरे धरती माता की गोद में


किसी भी व्यक्ति के लिए पहली बार कोई नया काम करना कितना कठिन होगा कह नहीं सकते किन्तु हमारे लिए पहली बार साइकिल चलाना तो ऐसा था मानो हवाई जहाज चला रहे हों. उस समय कक्षा पाँच में पढ़ा करते थे. साइकिल चलाने का शौक चढ़ा. घर में उस समय पिताजी की साइकिल थी. पिताजी चले जाते थे कचहरी और शाम को आते, तब तक हम भी अपने स्कूल से लौट आते थे. कई बार की हिम्मत भरी कोशिशों के बाद पिताजी से साइकिल चलाने की मंजूरी ले ली. 

उस समय तक हमने साफ करने की दृष्टि से या फिर अपने बड़े लोगों के साथ बाजार, स्कूल आदि जाने के समय ही साइकिल को हाथ लगाया था. अब साइकिल चलानी तो आती ही नहीं थी तो बस उसे पकड़े-पकड़े लुड़काते ही रहे. कई दिनों के बाद साइकिल पर इतना नियंत्रण बना पाये कि वह गिरे नहीं या फिर इधर-उधर झुके नहीं. एक दिन हमारे स्कूल में किसी संस्था या फिर किसी और स्कूल के द्वारा (यह ठीक से याद नहीं) एक टेस्ट का आयोजन किया गया. इस पूरे टेस्ट में हमारे सबसे ज्यादा नम्बर आये थे. हम भी बहुत खुश थे और इसी खुशी में हमने पिताजी से साइकिल चलाने की अनुमति माँग ली.

अब क्या था? कई सप्ताह हो गये थे साइकिल को खाली लुड़काते-लुड़काते, सोचा कि पिताजी भी खुश हैं हमारे रिजल्ट से, हो सकता है कि कुछ न कहें. बस आव देखा न ताव कोशिश करके चढ़ गये साइकिल पर. दो-चार पैडल ही मारे होंगे कि साइकिल एक ओर को झुकने लगी. यदि साइकिल चलानी आती होती तो चला पाते पर नहीं. अब हमारी समझ में नहीं आया कि क्या करें? न तो हैंडल छोड़ा जा रहा था और न ही पैडल चलाना रोका जा रहा था. साइकिल झुकती भी जा रही थी और गति भी पकड़ती जा रही थी. गति थोड़ी रुकती, पैडल जरा थमते, हैंडल और सँभलता उससे पहले वही हुआ जो होना था. हम साइकिल समेत धरती माता की गोद में आ गिरे. तुरन्त खड़े हुए कि कहीं किसी ने देख न लिया हो? कपड़े झाड़कर घर आये और चुपचाप साईकिल यथास्थान खड़ी कर दी. शाम को बाजार जाते समय पिताजी को उसकी कुछ बिगड़ी हालत देखकर पता चल ही गया. परिणाम में पिटाई तो नहीं हुई क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ था किन्तु साइकिल चलाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया.

देखा ऐसी रही हमारी पहली साइकिल सवारी.


Wednesday, 22 April 2015

तमन्ना है आसमां के पार जाने की

चंद पलों की अपनी विषम स्थिति में ऊपर से गुजरती ट्रेन की गति से भी तेज गति से न जाने क्या-क्या सोच लिया गया था. कुछ समय बाद कार जिस तेजी से कानपुर के लिए दौड़ रही थी, उससे कहीं अधिक तेजी से दिमाग दौड़ रहा था. कुछ होने नहीं देना है, कुछ होगा नहीं, कुछ होने नहीं देंगे की जिद सी लिए साँसों को अपने आपमें थामते चले जा रहे थे. रास्ते भर की मजबूत, विश्वासपरक स्थिति हॉस्पिटल के सामने एक पल को उस समय कमजोर लगी जब अपने सामने मुन्नी जिज्जी, जीजा जी (श्री रामकरन सिंह) को खड़े पाया. प्यास लगने की इच्छा और पानी नहीं पिलाने की हिदायत एक साथ होंठों पर प्रकट हुई. जिज्जी के प्यार भरे स्नेहिल हाथ ने जैसे हाँफती-टूटती साँसों को नया जीवन दे दिया हो. स्ट्रैचर पर लेटे उस एक पल से लेकर हमारे कृत्रिम पैर के सहारे खड़े होकर चलने तक जिज्जी-जीजा जी का स्नेहिल हाथ पल भर को भी अलग न हुआ.  

अपने अभिन्न मित्र रवि और अन्य लोगों की सलाह पर कानपुर स्थित एलिम्को में कृत्रिम पैर बनवाने को अंतिम मुहर लगी. कृत्रिम पैर बनवाने की प्रक्रिया क्या होगी? उसके सहारे कैसे चला जायेगा? चल भी पाएंगे या नहीं? और भी तमाम सवाल खुद से करते और फिर खुद से ही उनके जवाब देते. एलिम्को में कृत्रिम पैर बन जाने के बाद वहाँ ही चलने-चलाने का अभ्यास वहीं के चिकित्सकों एवं अन्य योग्य स्टाफ की देखरेख में किया जाता है. सम्बंधित व्यक्ति के चलने सम्बन्धी दोषों को पूरी तरह समाप्त करने के बाद वहाँ से जाने की अनुमति मिलती है.

एलिम्को पहुँचने के बाद लगा कि एकमात्र हम ही ऐसी स्थिति से पीड़ित नहीं हैं. चार-पाँच साल की मासूम बच्ची को वहाँ कृत्रिम पैर लगवाने के लिए आते देखा तो लगभग सत्तर वर्ष की वृद्ध महिला को चलने का अभ्यास करते पाया. कोई युवा एक कृत्रिम पैर के सहारे चल रहा है तो कोई युवती दोनों कृत्रिम पैरों से. किसी ने दुर्घटना में अपना पैर खोया है तो कोई किसी बीमारी के कारण अपंगता का शिकार हो गया. कोई अकेले आ रहा, किसी के साथ उसके वृद्ध माता-पिता, किसी के भाई, किसी का दोस्त. संसार के जितने रंग समझ सकते हैं, एलिम्को के भीतर उतने दिनों में उतनी तरह के दर्द दिखाई दिए.

कृत्रिम पैर बन जाने के बाद लगभग पच्चीस दिन तक नियमित रूप से कृत्रिम पैर द्वारा चलने का अभ्यास करने वहाँ जाना पड़ा. इसके लिए जीजा जी हमारे सारथी बने और जिज्जी उसी तरह से मातृत्व भाव से देखभाल करने में तत्पर रहीं जैसे कि हमारे बचपन में रहती थीं. कब जूस पीना है, कब कुछ खाना है, कितनी देर चलने का अभ्यास करना है, कितनी देर आराम करना है, किस तरह चलना है, सही चलना हो रहा या गलत इसका ध्यान जीजा जी-जिज्जी द्वारा ऐसे रखा जाता जैसे कोई बच्चा घुटनों चलने के बाद खड़े होकर चलना सीख रहा हो. वैसे सही में ऐसा हो भी रहा था.

कभी मैदान पर पाँच हजार, दस हजार मीटर की दूरी को हँसते-हँसते नापने वाला एथलीट एलिम्को स्थित दो स्टील बार के सहारे दर्द को पीते हुए चलने का अभ्यास कर रहा हो तो उसकी देखभाल एक बच्चे की तरह ही होगी. एलिम्को से निकलते ही सच्चे साथियों की संख्या में दो साथियों की वृद्धि हो गई. अब कृत्रिम पैर और छड़ी भी आजीवन सच्चे साथियों में शामिल हो गए थे. इन दो साथियों ने न केवल चलने में मदद की वरन दाहिने पैर के एक पल को भी बंद न होने वाले बेइन्तिहाँ दर्द से दोहरे होते शरीर को संतुलित बनाये रखने में भी अपना सहयोग दिया.

ज़िन्दगी कब क्या दिखाए, कहा नहीं जा सकता है. एक पल में देखे-बुने सपने ध्वस्त हो जाते हैं. अचानक से वह स्थिति सामने खड़ी हो जाती है, जिसके बारे में कभी सोचा भी नहीं होता है. जीवन की यही अनिश्चितता व्यक्ति को यदि डराती है तो उसे आगे बढ़ने का हौसला भी देती है. उसके भीतर जिजीविषा का संचार करती है. कल क्या होगा, अगले पल क्या होगा इसके बारे में महज पूर्वानुमान किया जा सकता है. अपने इसी पूर्वानुमान को सच करने के लिए वह निरन्तर प्रत्यनशील रहता है. जागती आँखों से सपनों को देखना और फिर उनको सच करने के लिए लगातार प्रयासरत रहना ही किसी भी व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बन जाता है. ऐसे ही अनेक सपने सच करने की कोशिश में वहाँ तमाम लोगों को देखा. हमारी भी ऐसी ही कोशिश लगातार जारी है.

Saturday, 4 April 2015

बाल मन की वो नादानी


बचपन के आरम्भिक दिन किराये के मकान में गुजरे. मकान, मकान-मालिक, मोहल्ला, मोहल्लावासी इतने अच्छे और भले थे कि जब तक हम लोग वहाँ रहे महसूस ही नहीं हुआ कि हम लोग किरायेदार हैं. वैसे भी तब हमारी समझ में थी ही नहीं मकान-मालिक और किरायेदार की अवधारणा. हमें तब भी वह मकान अपना सा लगता था, आज भी उस मकान को छोड़े तीन दशक होने को आये पर अपना सा ही लगता है. और लगे भी क्यों नहीं, एक हमने ही नहीं हमारे परिवार के बहुत से लोगों ने अपना बचपन, जवानी उसमें गुजारी है. हम भाई-बहिनों ने उसी आँगन में, उसी छत पर दौड़ना, चलना, गिरना सीखा.

हमारे मकान-मालिक अपने समय के जाने-माने अधिवक्ता थे. पैतृक संपत्ति की कोई कमी नहीं थी. गाँव भी पास में था. अच्छी खासी खेतीबाड़ी थी. उरई स्थित उनका बड़ा मकान इसका उदाहरण भी था. इसके साथ ही उनकी सम्पन्नता को इस रूप में समझा जा सकता था कि उस समय वे एम्बेसडर कार के मालिक भी हुआ करते थे. उनका अपने स्वभाव के विपरीत अदालत जाना, गाँव जाना, बाजार जाना आदि कार से ही हुआ करता था. स्वभाव के बारे में आम धारणा यह बनी थी कि वे कंजूस प्रवृत्ति के हैं. न सिर्फ उनके लिए बल्कि उनकी पत्नी के लिए भी मोहल्ले में ऐसी धारणा बनी हुई थी. उम्रदराज होने के कारण वे दोनों लोग मोहल्ले में बहुतों के चाचा-चाची थे और हम बच्चों के बाबा-दादी हुआ करते थे. हम उनको वकील बाबा कहकर पुकारते थे. 

परिवार के नाम पर उनके दो भाई और इनका भरा-पूरा परिवार उरई में ही आमने-सामने निवास करता था पर वे दोनों जन परिवार के नाम पर दो ही प्राणी थे. उनकी उम्र का तकाजा था या फिर उनकी प्रवृत्ति की वास्तविकता, एक दिन पता चला कि वकील बाबा ने अपनी सफ़ेद एम्बेसडर बेच दी. अब उनका स्थानीय यातायात का साधन साइकिल हो गया. यदाकदा उनकी कार में घूमने के कारण उनकी कार का न रहना बुरा लगा. ये भी बुरा लगा कि अब कार में घूमना नहीं हो पायेगा. बालमन, जो आर्थिक ताने-बाने को समझता न था, एक दिन हमने घर आकर अम्मा से कहा, वकील बाबा ने अपनी कार बेचकर साइकिल खरीद ली है. पिताजी से कहो कि अपनी साईकिल बेचकर कार खरीद लें. अम्मा ने उस समय हँसकर बहुत लाड़ से सिर पर हाथ फिरा दिया. बाद में जिस-जिसने हमारी बात को सुना, खूब हँसा. अम्मा के साथ-साथ बाकी लोगों के हँसने का कारण तब तो समझ नहीं आया मगर जब कार-साइकिल का अर्थ हमें खुद समझ आया तो अपने उस बालमन के समीकरण पर खुद भी हँसे बिना न रहा गया.

Monday, 23 March 2015

पहली बार रक्तदान वो भी डरते-डरते


रक्तदान करके खुद में बड़ा सुखद अनुभव होता है. आज हॉस्टल का वह समय याद आ गया जबकि पहली बार रक्तदान किया था. समय रहा होगा कोई सन 1990 का दिसम्बर महीने का या सन 1991 का जनवरी का. पहली बार रक्तदान करने जाना, मन ही मन एक डर. डर इस बात का कतई नहीं था कि रक्तदान से कोई दिक्कत हो जाएगी या फिर रक्तदान करने से किसी तरह की कमजोरी आ जाएगी. इसके ठीक उलट डर लग रहा था अपनी पहचान सामने आ जाने का. भय था खुद को पहचान लिए जाने का. डर था परिजनों को मालूम चलने पर पड़ने वाली डांट की सम्भावना का.

घर से बाहर ग्वालियर में स्नातक की पढ़ाई हॉस्टल में रहकर कर रहे थे. ग्वालियर में चाचा, मामा रह रहे थे. ऐसे में लगा कि यदि समाचारों में निकल आया तो कहीं डांट न पड़े. असल में हम लोगों को प्रोत्साहित करने को बताया गया था कि जो लोग रक्तदान करेंगे उनका नाम, फोटो अख़बार में निकलेगा. उस समय रक्तदान को लेकर जागरूकता आज की तरह नहीं थी. उस समय ऐसा लगता था जैसे रक्तदान करने के बाद महीनों की दिक्कत हो जाएगी. न जाने कितनी कमजोरी आ जाएगी. हमको ऐसी किसी भ्रान्ति की समस्या नहीं थी. थोड़ा बहुत पढ़ रखा था, थोड़ा बहुत समझ लिया था. इतना समझ चुके थे कि समय-समय पर, नियमित अन्तराल पर रक्तदान करने से शरीर में रक्तकणों, प्लाज्मा आदि के बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है. रक्त की रवानी, शुद्धता बढ़ जाती है. शरीर में ताकत, स्फूर्ति आ जाती है. आज की तरह रक्तदान शिविरों का आयोजन तब नहीं हुआ करता था. तब शिक्षकों, चिकित्सकों आदि की तरफ से भी बहुत ज्यादा कुछ बताया-समझाया नहीं जाता था. तकनीकी भरा दौर उस समय ऐसा नहीं था कि जानकारी सहजता से हर हाथ को मिल जाए.

बहरहाल दिमाग में कोई समस्या नहीं थी और मन भी बना लिया था, सो जयारोग्य हॉस्पिटल में संचालित शिविर में पहुँचे. वहाँ आवश्यक कार्यवाही हेतु जानकारी माँगी गई तो नाम, पता, उम्र, कॉलेज, क्लास आदि सबकुछ गलत भरवा दिया. गनीमत रही कि हमसे परिचय-पत्र नहीं माँगा गया. शरीर दुबला-पतला था किन्तु उनके अपेक्षित वजन को पार कर लिया. अपने पहली बार रक्तदान में एक दिक्कत वजन को लेकर भी लग रही थी. बाकी सब बातें दुरुस्त पायी गईं और हमने जीवन में पहली बार रक्तदान किया. हमें खुद को छोड़कर बाकी सबकुछ फर्जी ही था सो वहाँ से अपना कर्तव्य निर्वहन करते ही जल्दी से भागे कि कहीं कोई परिचित का न मिल जाये. जिस काम के लिए गए थे, वो हो गया. आंतरिक ख़ुशी महसूस हुई. साथ ही संतोष इसका हुआ कि किसी को पता भी नहीं चला. उस दिन उस बात से और भी संतोष मिला कि मीडिया के लोग वहाँ नहीं थे. उसी दिन नियमित रूप से वर्ष में दो-तीन बार रक्तदान करने का निश्चय कर लिया, जो आज तक बना हुआ है. इस निश्चय को तब और बल मिला जबकि खबर पढ़ने को मिली कि विश्वस्तरीय एथलीट अपनी किसी प्रतिस्पर्द्धा में जाने के कुछ घंटे पहले अपना ही रक्त निकलवा कर पुनः चढ़वा लेते हैं. ऐसा करने से उनके शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का संचार उनमें सक्रियता भर देता है.

वर्ष 1991 से अभी तक मात्र दो वर्ष 2005 और 2006 ऐसे निकले जबकि हम अपनी शारीरिक दिक्कत के चलते रक्तदान नहीं कर सके. आश्चर्य की एक और बात आपको बताएँ कि हमने अपनी मूल पहचान के साथ पहली बार सन 1996 में रक्तदान किया था जबकि हम परास्नातक की शिक्षा पूरी कर चुके थे. एक बार रक्तदान शिविर में पंजीकरण फॉर्म भरवाते समय झाँसी से आई टीम के सदस्य ने रक्तदाता की जानकारी भरने वाले फॉर्म को भरते समय पूछा कि कितनी बार रक्तदान कर चुके हैं? हमने उसे इंकार की मुद्रा दिखाई तो उसने संख्या भरना आवश्यक बताया. उसके ऐसा कहते ही हमने कहा कि यदि ऐसा है तो संख्या का अनुमान आप लगा लो, हम सन 1991 से लगातार रक्तदान कर रहे हैं. हमारे ऐसा कहते ही उसने कहा क्या सौ बार? उसके इस वाक्य पर हमने मुस्कुराकर इतना ही कहा ऐसा न कहिये, बहुतों को समस्या हो जाएगी यहाँ. ऐसा जवाब सुनकर उसने मुस्कुराकर हमारी तरफ देखा और फॉर्म में अपेक्षित जगह कोई संख्या भर कर फॉर्म हमारे हस्ताक्षर के लिए सामने सरका दिया. हमने भी सिर्फ हस्ताक्षर करने पर ध्यान दिया और आगे बढ़ गए.

संख्या पर दिमाग जब इतने सालों में नहीं दौड़ाया तो यहाँ क्या दौड़ाना? दरअसल संख्याबल की मारामारी बहुत देखने को मिल रही है विगत कुछ समय से. पता नहीं कैसे याद रह जाती है गिनती? कुछ तो ऐसे भी मिले जिन्होंने शायद ही कभी रक्तदान किया हो पर वे प्रशासनिक संबंधों के चलते सर्वाधिक रक्तदान का इनाम तक हासिल कर चुके हैं. हाँ, एक बात अवश्य है कि ऐसे किसी कैम्प में हम रक्तदान करने से बचते हैं. इसके पीछे हमारा मानना है कि एक बार रक्तदान आपको कम से कम तीन माह के लिए प्रतिबंधित कर देता है. ऐसे में किसी जरूरतमंद को आवश्यकता पड़ने पर मजबूर होने के सिवाय कुछ हाथ नहीं रह जाता.

फ़िलहाल तो अपनी रक्तदान करने की संख्या याद भी नहीं और न ही कोई मंशा है याद रखने की. इसके पीछे हमारा मानना है कि यदि दान किया जा रहा है तो गिनती करके उसके महत्त्व को कम नहीं करना चाहिए. वैसे भी हमारे लिए गिनती याद करना इसलिए भी उचित नहीं क्योंकि हम अपनी गिनती का पुराना हिसाब खुद अपने ही ऊपर खर्च कर चुके हैं, सन 2005 में.

Monday, 23 February 2015

रोता-बिलखता छोड़ चली गईं अइया हमारी

पिछले लगभग एक महीने से दिन-रात हॉस्पिटल में बीत रहे थे. पहले छोटी बहिन प्रीतू का दुर्घटना में घायल होना उसके घर आते ही अइया (दादी) का बाथरूम में गिरकर घायल हो जाना. अइया को उरई से लाकर कानपुर में एडमिट करवाना पड़ा. उनका गुल्ला (कमर के नीचे जाँघ की हड्डी) टूट गया था, जिसके चलते उरई में उनको ट्रेक्शन लगवा दिया गया था. उनको कानपुर में कुलवंती हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया था. हम सब उनकी कुछ मेडिकल जांचों के आधार पर उनके स्वास्थ्य के सही होने के बाद होने वाले उनके ऑपरेशन का इंतजार कर रहे थे.

कई रातों लगातार जागने की थकान पता नहीं क्यों उस दोपहर चेहरे पर, देह पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी. दोपहर को नहाने, खाने के लिए चाचा के घर आने पर हमने कुछ देर सोने की बात कहकर तुरंत नर्सिंग होम जाने की इच्छा न दिखाई. थकान के बाद भी सोने का मन नहीं हो रहा था क्योंकि अच्छे से पता था कि अइया हमें एक मिनट को सामने न देखकर हमारी ही रट लगा देती थीं. नहाने, खाने के लिए एक तरह की उनकी अनुमति लेकर ही आते थे. वे भी जैसे नर्सिंग होम के पलंग पर लेटे-लेटे समय का आकलन करती रहती थीं.

यही सोचकर कि यदि देर हो गई तो अइया परेशान होने लगेंगी, नींद नहीं आ रही थी. पता नहीं क्यों मन भी कुछ परेशान सा लग रहा था. इधर-उधर करवट बदलने के बाद भी जब नींद न लगी तो छोटी बहिन दीपू से चाय बनाने को कहकर उठ बैठे. चाय की चुस्कियों के बीच बैठे-बैठे फोन उठाया और उरई का एक बेसिक नंबर डायल कर बैठे. मन में क्या था, दिमाग कहाँ काम कर रहा था, उंगलियाँ कहाँ काम कर रही थीं कुछ पता नहीं. फोन वहीं लगा, जहाँ लगाना चाहते थे. बात हुई, दिल की बात कही, दिल की बात सुनी. कुछ हल्का सा महसूस किया और उसी हलके-फुल्के एहसास के साथ नर्सिंग होम पहुँच गए.

थकान, नींद न आना, फोन पर दिल की बात करना, अइया के पास जल्दी पहुँचने की आकुलता आदि जैसे पूर्व-निर्धारित सा था. अइया के पास बैठे. उनके हाथों को अपने हाथों में लेकर इधर-उधर की मजाकिया बातें की. हमारी शादी, अपने पंती को खिलाने की बात सुनते ही उनके चेहरे पर गज़ब की हँसी, अलौकिक चमक आ जाती. उनको दिन भर में कई बार चिढ़ाते कि देखभाल को आने वाली तमाम सारी नर्सों में से किसी एक को पसंद कर लो. नतबहू भी मिल जाएगी और सेवा करने वाली भी, जो इंजेक्शन भी लगा देगी. एक प्यार भरी झिड़की वे लगातीं और मुस्कान उनके होंठों पर तैर जाती. उस दिन भी ऐसी ही चुहल उनके साथ हो रही थी. मीठा खाने की शौक़ीन हमारी अइया ने उस दिन नबीपुर की बदनाम गुझिया का स्वाद लिया, जो पिताजी उरई से आते समय अपने साथ लेकर आये थे.

इधर-उधर की तमाम बातों के दौर चले, अइया से हलके-फुल्के चुहल भरे दौर चले, उरई चलने की चर्चा हुई. उसी दौरान उनको दो-तीन बार हलकी सी खांसी जैसी समझ आई. आवाज़ में खड़खड़ाहट सी महसूस हुई. उन्होंने इशारे से अपनी तकलीफ बतानी चाही. लगा जैसे कुछ कहने की कोशिश कर रही हैं मगर गले में कुछ फँसा होने के कारण शब्द बाहर नहीं आ रहे, आवाज़ बाहर नहीं आ रही. हम उनके दाहिने हाथ पर खड़े थे. अम्मा हमारे पीछे और पिताजी अइया के पैरों के पास पड़ी बैंच पर बैठे थे. उनकी घबराहट सी देख कर उनके सीने पर, गले पर हमने हाथ फिराया. अइया, अइया, क्या बात है, क्या दिक्कत है, क्या कहना है की आवाज़ दी उनको.

उनकी आवाज़ रुंधती सी नजर आई. इससे पहले कि अइया कुछ बोल पातीं, कोई शब्द निकाल पातीं उनको उलटी हो गई. खून की उलटी. उनके सीने पर जल्दी-जल्दी पम्प किया. उनके हाथों को अपने हाथों में लेकर हथेलियाँ मलने का काम किया. एक उलटी और हुई और इससे पहले कि हम लोग कुछ समझ पाते, डॉक्टर नर्स को आवाज़ दे पाते अइया हमेशा को खामोश हो गईं. उनका हाथ हमारे हाथों में बेजान सा होकर थम गया. गर्दन एक तरफ लुड़क गई. आँखें अपने आप बंद हो गईं.

दो दिन पहले ही उनकी मेडिकल जाँच रिपोर्ट के आधार पर ऑपरेशन होना मुश्किल समझ आ रहा था. इसी बात पर डॉक्टर से, घर पर हमारी बहस भी हुई थी कि यहाँ नर्सिंग होम में नहीं रुकायेंगे अइया को. उरई ले जायेंगे. जब तक वे रहेंगी, उनकी सेवा करेंगे. पलंग पर ही उनकी सारी दिनचर्या का निर्वाह करवाएंगे. क्या पता था कि दो दिन बाद उनको उरई लेकर तो जायेंगे मगर जीवित नहीं. उनकी सेवा के लिए नहीं वरन अंतिम संस्कार के लिए. उरई में जिस दिन अइया को ट्रेक्शन लगा था, उनका बोलना, हँसना उसी दिन से सीमित हो गया था. ऐसा महसूस होने लगा था जैसे वे अपने अंतिम समय को देख रही हैं. लगभग दस दिन तक सीमित हँसने-बोलने वाली अइया को हम लोग पूर्णतः ख़ामोशी की अवस्था में उरई लेकर लौट आये.

जनवरी के अंतिम सप्ताह से शुरू हुआ पारिवारिक संकट अइया के देहांत के बाद समाप्त होता दिखा. अइया के देहांत के लगभग एक महीना पूर्व कानपुर से चाचा जी ने प्रीतू की दुर्घटना की खबर सुनाई. उसकी स्थिति गंभीर बताई गई थी, सो हम आनन-फानन तैयारी करके कानपुर को चल दिए. कानपुर मेडिकल सेंटर में गंभीर हालत में भर्ती छोटी बहिन को खतरे से बाहर तो बताया गया किन्तु सिर में लगी चोट ने उसको गंभीर बनाये रखा था. दवाइयों के सहारे सिर की चोट के असर को कम करने का प्रयास बराबर किया जा रहा था. रात-रात भर उसके पैरों में मचती झुनझुनाहट को पंजे को हथेलियों से मलते-सहलाते बीत जाती. कुछ मिनट का रुकना भी प्रीतू को असहज कर देता. भाई जी, झुनझुनी मच रही का एक बहुत धीमा सा स्वर उभरता और हाथ स्वतः उसके पंजों को मलने लगते. पंद्रह-बीस दिन बाद उसकी हालत में सुधार को देखते हुए उसे घर जाने की अनुमति दे दी गई.

अब हम सब उरई में ही थे. अइया भी उरई में थीं मगर एकदम खामोश. उनकी यात्रा अगले दिन सुबह फिर शुरू हुई. बैंड-बाजों के साथ. चार काँधों के साथ. आँखों में नतबहू देखने का, पंती खिलाने का सपना लिए हमारी दबंग, अपने समय के हिसाब से आधुनिक, तेज-तर्रार किन्तु हम भाइयों की प्यारी, दुलारी अइया हम सबको रोता-बिलखता छोड़कर बाबा जी के पास चली गईं थीं.

Wednesday, 12 November 2014

हत्यारा अनुशासन


हँसते-खेलते-कूदते कब हाईस्कूल पास कर लिया पता ही नहीं चला. बोर्ड परीक्षाओं का हौवा भी हम मित्रों को डरा न सका था. हाईस्कूल की परीक्षाओं की समाप्ति को हँसते-खेलते-कूदते इसलिए कहा क्योंकि किसी भी विषय की परीक्षा समाप्त होते ही तय हो जाता था कि कितनी देर में खेल के मैदान पर पहुँचना है? कहाँ खेलने पहुँचना है? उस समय दयानंद वैदिक महाविद्यालय और सनातन धर्म इंटर कॉलेज के मैदानों पर खेलने वालों का जमावड़ा लगता था. बस ये तय हो जाता कि कहाँ पहुँचना है, क्या खेलना है.

हाईस्कूल परीक्षा पास कर लेने की ख़ुशी के साथ इसकी भी ख़ुशी थी कि अब विषय विशेषज्ञ बनने का मौका मिलेगा. जी हाँ, उस समय यह अपने आपमें किसी विशेषज्ञ से कम नहीं था, हम लोगों के लिए कि अब आगे की पढ़ाई विज्ञान वर्ग, कला वर्ग या वाणिज्य वर्ग से होनी है. ये भी उस समय आपस में विमर्श का विषय बना हुआ था, हम दोस्तों के बीच कि विज्ञान विषय की पढ़ाई के लिए कौन गणित का चयन करेगा और कौन जीवविज्ञान की तरफ जायेगा. ऐसा होने, करने के पीछे भी हम लोगों के अपने तर्क रहते थे.

हम सभी मित्रों ने हाईस्कूल में विज्ञान वर्ग को ले रखा था. इस कारण सभी दोस्तों के बीच सहज रूप से ये स्वीकारोक्ति थी और सहमति भी थी कि हम सभी विज्ञान विषय से ही आगे की पढ़ाई करेंगे. इसी सम्भावना और शत-प्रतिशत सहमति के बीच कुछ अचंभित करने जैसा भी हुआ. नए सत्र में कॉलेज खुला. सभी मिले, एक दूसरे के विषयों की जानकारी का आदान-प्रदान हुआ. कोई गणित विषय का चयन कर चुका था, किसी ने जीवविज्ञान को चुना था. हम सभी दोस्तों को ये जानकर आश्चर्य हुआ कि हमारे बीच के ही एक होनहार मित्र राजीव त्रिपाठी ने कला वर्ग में एडमीशन ले लिया था. गर्मियों की पूरी छुट्टियों में लगभग रोज ही उससे मुलाकात होती थी मगर उसने कभी न तो इसका जिक्र किया और न ही अपनी किसी बात से हम लोगों को आभास होने दिया कि वह विज्ञान वर्ग को छोड़कर कला वर्ग से आगे की पढ़ाई करेगा. व्यक्तिगत हमारे लिए आश्चर्य इसलिए भी था क्योंकि वह बचपन से हमारा मित्र था और उसकी तीव्र इच्छा इंजीनियर बनने की थी. अकेले में उसे कई-कई दिन समझाने, कुदेरेने के बाद उसने बताया कि उसके पिताजी की इच्छा उसे प्रशासनिक अधिकारी बनाने की है. उन्होंने ही उसके विषय निर्धारित करके उनके सहारे ही आगे पढ़ने को कहा है. हँसने-मजाक करने वाला, सीधा-साधा, हंसमुख हमारा मित्र राजीव अपने पिता की इच्छा के दवाब में उदास, गुमसुम रहने लगा.

उसके पिता का सख्त अनुशासन हम बचपन से ही देख रहे थे. किसी भी दोस्त का उसके घर जाना लगभग न के बराबर होता था. उसका भी बहुत कम किसी दोस्त के घर जाना होता था. बाहर खेलने की अनुमति भी उसको बहुत कम मिलती थी. यदि कभी उससे मिलने के लिए उसके घर जाना भी होता तो वह अपने कमरे की सड़क पर खुलने वाली खिड़की से बात करता. हम लोग सड़क पर और वह घर के अन्दर से. ऐसे में भी वह अपने पिता की आहट होते ही हम लोगों को वहां से जाने को कहकर खिड़की बंद कर लेता.

समय बीतता रहा. पिता के सख्त अनुशासन और सिविल सेवा में जाने की जिद जैसी सनक में राजीव सिविल सेवा में तो चयनित न हो सका किन्तु अपना दिमागी संतुलन अवश्य खो बैठा. परास्नातक कर लेने के बाद उसे अपने सिविल सेवा में चयनित होने का भ्रम हो गया. हम मित्रों से मिलने पर उसमें कभी सामान्य राजीव नजर आता तो उस सीधे-साधे मासूम से राजीव की जगह कोई घनघोर सख्त प्रशासनिक अधिकारी दिखाई देने लगता. उसकी बातचीत, उसके हावभाव, उसका अंदाज सबकुछ अलहदा लगता. धीरे-धीरे उसकी स्थिति और ख़राब होती रही. कभी कॉलेज के कार्यक्रम में उसके द्वारा की गई उठापटक की खबर सुनाई देती. कभी उसके द्वारा उरई में कई लोगों संग मारपीट किये जाने की घटनाएँ सामने आने लगीं. आये दिन, दिन हो या रात, सूट-बूट में तैयार होकर किसी मीटिंग, बैठक, दौरे के नाम पर उरई की सड़कों पर उसका भटकना आम बात हो गई थी.

एक दिन खबर मिली कि राजीव को किसी दूसरे शहर में किसी मनोरोग चिकित्सालय में भर्ती करा दिया गया है. उसके बाद की उड़ती-उड़ती अनेक खबरों के बीच पुष्ट किन्तु अत्यंत दुखद खबर मिली राजीव के देहांत की. आघात सा लगा, असमय अपने दोस्त का जाना खला. न केवल एक प्रतिभा का क्षरण होना बल्कि एक मासूम व्यक्तित्व का शांत हो जाना व्यथित कर गया. लगा कि उसके पिता का अनुशासन उसका हत्यारा निकला. न सिर्फ उसका हत्यारा बल्कि उसके बड़े दो भाइयों का भी. उसके पिता का अनुशासन इसलिए भी हत्यारा क्योंकि उनकी प्रशासनिक अधिकारी बनाने की सनक के चलते राजीव के दो भाइयों ने आत्महत्या कर ली थी. इससे संदर्भित एक घटना अन्दर तक हिला देती है जबकि उनके शादीशुदा एक बेटे ने उरई से कहीं दूर अपने नौकरी करने वाले शहर में आत्महत्या कर ली थी. ऐसे में भी उनके हत्यारे अनुशासन से डरी उनकी पुत्रवधू उनको फोन करके अनुमति माँगती है, अपने दिवंगत पति के कार्यालय के सहकर्मियों संग अपने पति की पार्थिव देह तक जाने की.

उफ़! अनुशासन का अपना महत्त्व है किन्तु उसे हत्यारा तो न बनाया जाये.


Friday, 10 October 2014

प्यार भरे दिल में प्यार की कहानी


प्रेम को लेकर लोगों के कांसेप्ट बड़े ही विचित्र हैं. उसमें भी पहले प्यार को लेकर और भी गजब धारणाएँ बनी हुई हैं. प्यार एक बार ही होता है. पहले प्यार के बाद प्यार होता ही नहीं. पहला प्यार ही आखिरी प्यार होता है वगैरह-वगैरह. प्रेम को लेकर इतनी रूढ़िवादी सोच अपनी कभी नहीं रही. हमेशा से मानना रहा है कि यदि व्यक्ति जिंदादिल है, खुशमिजाज है, सकारात्मक सोच वाला है तो उसे सदैव प्यार होगा, सबसे प्यार होगा.

हमने भी सबसे प्यार किया. कई-कई से प्यार किया. हर उम्र में प्यार किया. ये और बात है कि वर्तमान सोच के चलते प्यार का अंजाम विवाह नहीं बना. इसके चलते ये भी तो नहीं कहा जा सकता कि प्यार असफल रहा. आखिर प्रेम के सफल, असफल होने का पैमाना क्या है? क्या सिर्फ विवाह ही किसी प्रेम की सफलता है? यदि यही अंतिम सत्य है तो वाकई हमारा प्रत्येक प्रेम असफल कहा जायेगा. लगातार असफलता के बाद भी हम प्रेम करते रहे या कहें कि हमसे भी प्रेम करने वाले मिलते रहे. (इसे मिलती रही भी पढ़ा जा सकता है.)

कुछ ऐसा ही उन दिनों हुआ जबकि हम प्रेम की कई-कई सीढियाँ अकेले चढ़ते हुए अपने कैरियर की इमारत बनाने की कोशिश कर रहे थे. जिस तरह हम अपने प्रेम को समाज की परिभाषा के अनुसार में सफलता की मंजिल तक नहीं पहुँचा पा रहे थे उसी तरह कैरियर की इमारत बनने की स्थिति में नहीं दिख रही थी. इस ओर से उस ओर तक हर स्थिति हमारे ऊपर असफल होने का ठप्पा लगाने को आतुर थी. उन्हीं विषम दिनों में उससे लगभग रोज ही सामान्य सी औपचारिक मुलाकात हो जाती थी. सामान्य सी बातचीत, सामान्य सा हंसी-मजाक. मुलाकात के चंद दिन ही गुजरे होंगे कि एक दिन उसने समाचार-पत्र में लिपटी एक डायरी देते हुए उसमें अपने बारे में कुछ लिखने को कहा. आग्रह जैसा कुछ नहीं, निवेदन जैसा कुछ नहीं, प्यार जैसा भी नहीं कह सकते मगर दोस्ती जैसा भी समझ नहीं आया. कुछ अधिकार सा समझ आया, उसके कहने में, उसके कुछ बताने में. डायरी अब उसके हाथों से गुजरती हुई हमारे हाथों में थी. दो-चार दिन इसी सोच-विचार में गुजर गए कि कुछ लिखने को आखिर हम ही क्यों? और यदि हम ही तो फिर लिखा क्या जाये? लिखने का अर्थ कुछ और न समझा जाये. बहरहाल, जो मन में था, जो दिल में था, लिखा. समय गुजरता रहा. बातें गुजरती रहीं. मुलाकातें गुजरती रहीं. इसे आरम्भ कहा जा सकता था किन्तु अपनी वास्तविकता को जानते-समझते हुए दिल को धड़कने से रोके रखा गया. 

समय गुजरता रहा. मुलाकातें होती रहीं. बातचीत चलती रही. आँखों ने आँखों से भले ही कुछ कहा हो मगर कुछ बंधन रहे जिन्होंने शब्दों को आज़ाद न होने दिया. ऐसी स्थिति में भी अपने सामने उसको खुद में सिमटते देखा. अपने सामने उसे खुलकर बिखरते देखा. अपने सामने हमारे लिए उसे निश्चिन्त देखा. अपने सामने हमारे लिए उसे चिंतित देखा. प्यार का उमड़ना देखा. अपने लिए उसके होंठों पर मुस्कराहट भी देखी. अपने लिए उसकी आँखों का नम होना भी देखा. यह सब तभी हो पाता है जबकि दिल की गहराइयों में किसी को बसा लिया जाये. इसे भले ही प्यार का नाम दे दिया जाये मगर कई बार लगता है कि यह प्यार से अधिक विश्वास का भाव होता है.

ऐसे ही विश्वास या कि प्यार का सिमटना देखा. कदम-कदम आगे बढ़ते-बढ़ते कदमों को कदम-कदम पीछे होते देखा. भावनाओं को शब्दों में बदलने से रुकते देखा. एहसासों का आभास होने के बाद भी उनको स्वीकार न करते देखा. सबकुछ कहने के बाद भी खामोशियों भरा मौन का मंजर देखा. मजबूरियाँ दोनों तरफ से थी, जो स्पष्ट रूप से सामने दिख रही थी. उसके सामने सामाजिक बंधन जैसी स्थिति थी या कुछ और पता नहीं पर हमारे सामने कैरियर बनाने जैसी स्थिति खड़ी थी. इसी बढ़ते-सिमटते में उसका चले जाना हुआ. वर्षों गुजर गए. वो आज भी दिल में है. इस छोर पर सबकुछ है, उस छोर पर क्या, कितना है पता नहीं. फिर वही बात कि आधुनिक मानकों पर प्रेम असफल रहा. एक और प्रेम कहानी हमारी नजर में पूर्ण पवित्र रही भले ही समाज की नजर से अधूरी रह गई हो.