Saturday, 4 April 2015

बाल मन की वो नादानी


बचपन के आरम्भिक दिन किराये के मकान में गुजरे. मकान, मकान-मालिक, मोहल्ला, मोहल्लावासी इतने अच्छे और भले थे कि जब तक हम लोग वहाँ रहे महसूस ही नहीं हुआ कि हम लोग किरायेदार हैं. वैसे भी तब हमारी समझ में थी ही नहीं मकान-मालिक और किरायेदार की अवधारणा. हमें तब भी वह मकान अपना सा लगता था, आज भी उस मकान को छोड़े तीन दशक होने को आये पर अपना सा ही लगता है. और लगे भी क्यों नहीं, एक हमने ही नहीं हमारे परिवार के बहुत से लोगों ने अपना बचपन, जवानी उसमें गुजारी है. हम भाई-बहिनों ने उसी आँगन में, उसी छत पर दौड़ना, चलना, गिरना सीखा.

हमारे मकान-मालिक अपने समय के जाने-माने अधिवक्ता थे. पैतृक संपत्ति की कोई कमी नहीं थी. गाँव भी पास में था. अच्छी खासी खेतीबाड़ी थी. उरई स्थित उनका बड़ा मकान इसका उदाहरण भी था. इसके साथ ही उनकी सम्पन्नता को इस रूप में समझा जा सकता था कि उस समय वे एम्बेसडर कार के मालिक भी हुआ करते थे. उनका अपने स्वभाव के विपरीत अदालत जाना, गाँव जाना, बाजार जाना आदि कार से ही हुआ करता था. स्वभाव के बारे में आम धारणा यह बनी थी कि वे कंजूस प्रवृत्ति के हैं. न सिर्फ उनके लिए बल्कि उनकी पत्नी के लिए भी मोहल्ले में ऐसी धारणा बनी हुई थी. उम्रदराज होने के कारण वे दोनों लोग मोहल्ले में बहुतों के चाचा-चाची थे और हम बच्चों के बाबा-दादी हुआ करते थे. हम उनको वकील बाबा कहकर पुकारते थे. 

परिवार के नाम पर उनके दो भाई और इनका भरा-पूरा परिवार उरई में ही आमने-सामने निवास करता था पर वे दोनों जन परिवार के नाम पर दो ही प्राणी थे. उनकी उम्र का तकाजा था या फिर उनकी प्रवृत्ति की वास्तविकता, एक दिन पता चला कि वकील बाबा ने अपनी सफ़ेद एम्बेसडर बेच दी. अब उनका स्थानीय यातायात का साधन साइकिल हो गया. यदाकदा उनकी कार में घूमने के कारण उनकी कार का न रहना बुरा लगा. ये भी बुरा लगा कि अब कार में घूमना नहीं हो पायेगा. बालमन, जो आर्थिक ताने-बाने को समझता न था, एक दिन हमने घर आकर अम्मा से कहा, वकील बाबा ने अपनी कार बेचकर साइकिल खरीद ली है. पिताजी से कहो कि अपनी साईकिल बेचकर कार खरीद लें. अम्मा ने उस समय हँसकर बहुत लाड़ से सिर पर हाथ फिरा दिया. बाद में जिस-जिसने हमारी बात को सुना, खूब हँसा. अम्मा के साथ-साथ बाकी लोगों के हँसने का कारण तब तो समझ नहीं आया मगर जब कार-साइकिल का अर्थ हमें खुद समझ आया तो अपने उस बालमन के समीकरण पर खुद भी हँसे बिना न रहा गया.

Monday, 23 March 2015

पहली बार रक्तदान वो भी डरते-डरते


रक्तदान करके खुद में बड़ा सुखद अनुभव होता है. आज हॉस्टल का वह समय याद आ गया जबकि पहली बार रक्तदान किया था. समय रहा होगा कोई सन 1990 का दिसम्बर महीने का या सन 1991 का जनवरी का. पहली बार रक्तदान करने जाना, मन ही मन एक डर. डर इस बात का कतई नहीं था कि रक्तदान से कोई दिक्कत हो जाएगी या फिर रक्तदान करने से किसी तरह की कमजोरी आ जाएगी. इसके ठीक उलट डर लग रहा था अपनी पहचान सामने आ जाने का. भय था खुद को पहचान लिए जाने का. डर था परिजनों को मालूम चलने पर पड़ने वाली डांट की सम्भावना का.

घर से बाहर ग्वालियर में स्नातक की पढ़ाई हॉस्टल में रहकर कर रहे थे. ग्वालियर में चाचा, मामा रह रहे थे. ऐसे में लगा कि यदि समाचारों में निकल आया तो कहीं डांट न पड़े. असल में हम लोगों को प्रोत्साहित करने को बताया गया था कि जो लोग रक्तदान करेंगे उनका नाम, फोटो अख़बार में निकलेगा. उस समय रक्तदान को लेकर जागरूकता आज की तरह नहीं थी. उस समय ऐसा लगता था जैसे रक्तदान करने के बाद महीनों की दिक्कत हो जाएगी. न जाने कितनी कमजोरी आ जाएगी. हमको ऐसी किसी भ्रान्ति की समस्या नहीं थी. थोड़ा बहुत पढ़ रखा था, थोड़ा बहुत समझ लिया था. इतना समझ चुके थे कि समय-समय पर, नियमित अन्तराल पर रक्तदान करने से शरीर में रक्तकणों, प्लाज्मा आदि के बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है. रक्त की रवानी, शुद्धता बढ़ जाती है. शरीर में ताकत, स्फूर्ति आ जाती है. आज की तरह रक्तदान शिविरों का आयोजन तब नहीं हुआ करता था. तब शिक्षकों, चिकित्सकों आदि की तरफ से भी बहुत ज्यादा कुछ बताया-समझाया नहीं जाता था. तकनीकी भरा दौर उस समय ऐसा नहीं था कि जानकारी सहजता से हर हाथ को मिल जाए.

बहरहाल दिमाग में कोई समस्या नहीं थी और मन भी बना लिया था, सो जयारोग्य हॉस्पिटल में संचालित शिविर में पहुँचे. वहाँ आवश्यक कार्यवाही हेतु जानकारी माँगी गई तो नाम, पता, उम्र, कॉलेज, क्लास आदि सबकुछ गलत भरवा दिया. गनीमत रही कि हमसे परिचय-पत्र नहीं माँगा गया. शरीर दुबला-पतला था किन्तु उनके अपेक्षित वजन को पार कर लिया. अपने पहली बार रक्तदान में एक दिक्कत वजन को लेकर भी लग रही थी. बाकी सब बातें दुरुस्त पायी गईं और हमने जीवन में पहली बार रक्तदान किया. हमें खुद को छोड़कर बाकी सबकुछ फर्जी ही था सो वहाँ से अपना कर्तव्य निर्वहन करते ही जल्दी से भागे कि कहीं कोई परिचित का न मिल जाये. जिस काम के लिए गए थे, वो हो गया. आंतरिक ख़ुशी महसूस हुई. साथ ही संतोष इसका हुआ कि किसी को पता भी नहीं चला. उस दिन उस बात से और भी संतोष मिला कि मीडिया के लोग वहाँ नहीं थे. उसी दिन नियमित रूप से वर्ष में दो-तीन बार रक्तदान करने का निश्चय कर लिया, जो आज तक बना हुआ है. इस निश्चय को तब और बल मिला जबकि खबर पढ़ने को मिली कि विश्वस्तरीय एथलीट अपनी किसी प्रतिस्पर्द्धा में जाने के कुछ घंटे पहले अपना ही रक्त निकलवा कर पुनः चढ़वा लेते हैं. ऐसा करने से उनके शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का संचार उनमें सक्रियता भर देता है.

वर्ष 1991 से अभी तक मात्र दो वर्ष 2005 और 2006 ऐसे निकले जबकि हम अपनी शारीरिक दिक्कत के चलते रक्तदान नहीं कर सके. आश्चर्य की एक और बात आपको बताएँ कि हमने अपनी मूल पहचान के साथ पहली बार सन 1996 में रक्तदान किया था जबकि हम परास्नातक की शिक्षा पूरी कर चुके थे. एक बार रक्तदान शिविर में पंजीकरण फॉर्म भरवाते समय झाँसी से आई टीम के सदस्य ने रक्तदाता की जानकारी भरने वाले फॉर्म को भरते समय पूछा कि कितनी बार रक्तदान कर चुके हैं? हमने उसे इंकार की मुद्रा दिखाई तो उसने संख्या भरना आवश्यक बताया. उसके ऐसा कहते ही हमने कहा कि यदि ऐसा है तो संख्या का अनुमान आप लगा लो, हम सन 1991 से लगातार रक्तदान कर रहे हैं. हमारे ऐसा कहते ही उसने कहा क्या सौ बार? उसके इस वाक्य पर हमने मुस्कुराकर इतना ही कहा ऐसा न कहिये, बहुतों को समस्या हो जाएगी यहाँ. ऐसा जवाब सुनकर उसने मुस्कुराकर हमारी तरफ देखा और फॉर्म में अपेक्षित जगह कोई संख्या भर कर फॉर्म हमारे हस्ताक्षर के लिए सामने सरका दिया. हमने भी सिर्फ हस्ताक्षर करने पर ध्यान दिया और आगे बढ़ गए.

संख्या पर दिमाग जब इतने सालों में नहीं दौड़ाया तो यहाँ क्या दौड़ाना? दरअसल संख्याबल की मारामारी बहुत देखने को मिल रही है विगत कुछ समय से. पता नहीं कैसे याद रह जाती है गिनती? कुछ तो ऐसे भी मिले जिन्होंने शायद ही कभी रक्तदान किया हो पर वे प्रशासनिक संबंधों के चलते सर्वाधिक रक्तदान का इनाम तक हासिल कर चुके हैं. हाँ, एक बात अवश्य है कि ऐसे किसी कैम्प में हम रक्तदान करने से बचते हैं. इसके पीछे हमारा मानना है कि एक बार रक्तदान आपको कम से कम तीन माह के लिए प्रतिबंधित कर देता है. ऐसे में किसी जरूरतमंद को आवश्यकता पड़ने पर मजबूर होने के सिवाय कुछ हाथ नहीं रह जाता.

फ़िलहाल तो अपनी रक्तदान करने की संख्या याद भी नहीं और न ही कोई मंशा है याद रखने की. इसके पीछे हमारा मानना है कि यदि दान किया जा रहा है तो गिनती करके उसके महत्त्व को कम नहीं करना चाहिए. वैसे भी हमारे लिए गिनती याद करना इसलिए भी उचित नहीं क्योंकि हम अपनी गिनती का पुराना हिसाब खुद अपने ही ऊपर खर्च कर चुके हैं, सन 2005 में.

Monday, 23 February 2015

रोता-बिलखता छोड़ चली गईं अइया हमारी

पिछले लगभग एक महीने से दिन-रात हॉस्पिटल में बीत रहे थे. पहले छोटी बहिन प्रीतू का दुर्घटना में घायल होना उसके घर आते ही अइया (दादी) का बाथरूम में गिरकर घायल हो जाना. अइया को उरई से लाकर कानपुर में एडमिट करवाना पड़ा. उनका गुल्ला (कमर के नीचे जाँघ की हड्डी) टूट गया था, जिसके चलते उरई में उनको ट्रेक्शन लगवा दिया गया था. उनको कानपुर में कुलवंती हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया था. हम सब उनकी कुछ मेडिकल जांचों के आधार पर उनके स्वास्थ्य के सही होने के बाद होने वाले उनके ऑपरेशन का इंतजार कर रहे थे.

कई रातों लगातार जागने की थकान पता नहीं क्यों उस दोपहर चेहरे पर, देह पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी. दोपहर को नहाने, खाने के लिए चाचा के घर आने पर हमने कुछ देर सोने की बात कहकर तुरंत नर्सिंग होम जाने की इच्छा न दिखाई. थकान के बाद भी सोने का मन नहीं हो रहा था क्योंकि अच्छे से पता था कि अइया हमें एक मिनट को सामने न देखकर हमारी ही रट लगा देती थीं. नहाने, खाने के लिए एक तरह की उनकी अनुमति लेकर ही आते थे. वे भी जैसे नर्सिंग होम के पलंग पर लेटे-लेटे समय का आकलन करती रहती थीं.

यही सोचकर कि यदि देर हो गई तो अइया परेशान होने लगेंगी, नींद नहीं आ रही थी. पता नहीं क्यों मन भी कुछ परेशान सा लग रहा था. इधर-उधर करवट बदलने के बाद भी जब नींद न लगी तो छोटी बहिन दीपू से चाय बनाने को कहकर उठ बैठे. चाय की चुस्कियों के बीच बैठे-बैठे फोन उठाया और उरई का एक बेसिक नंबर डायल कर बैठे. मन में क्या था, दिमाग कहाँ काम कर रहा था, उंगलियाँ कहाँ काम कर रही थीं कुछ पता नहीं. फोन वहीं लगा, जहाँ लगाना चाहते थे. बात हुई, दिल की बात कही, दिल की बात सुनी. कुछ हल्का सा महसूस किया और उसी हलके-फुल्के एहसास के साथ नर्सिंग होम पहुँच गए.

थकान, नींद न आना, फोन पर दिल की बात करना, अइया के पास जल्दी पहुँचने की आकुलता आदि जैसे पूर्व-निर्धारित सा था. अइया के पास बैठे. उनके हाथों को अपने हाथों में लेकर इधर-उधर की मजाकिया बातें की. हमारी शादी, अपने पंती को खिलाने की बात सुनते ही उनके चेहरे पर गज़ब की हँसी, अलौकिक चमक आ जाती. उनको दिन भर में कई बार चिढ़ाते कि देखभाल को आने वाली तमाम सारी नर्सों में से किसी एक को पसंद कर लो. नतबहू भी मिल जाएगी और सेवा करने वाली भी, जो इंजेक्शन भी लगा देगी. एक प्यार भरी झिड़की वे लगातीं और मुस्कान उनके होंठों पर तैर जाती. उस दिन भी ऐसी ही चुहल उनके साथ हो रही थी. मीठा खाने की शौक़ीन हमारी अइया ने उस दिन नबीपुर की बदनाम गुझिया का स्वाद लिया, जो पिताजी उरई से आते समय अपने साथ लेकर आये थे.

इधर-उधर की तमाम बातों के दौर चले, अइया से हलके-फुल्के चुहल भरे दौर चले, उरई चलने की चर्चा हुई. उसी दौरान उनको दो-तीन बार हलकी सी खांसी जैसी समझ आई. आवाज़ में खड़खड़ाहट सी महसूस हुई. उन्होंने इशारे से अपनी तकलीफ बतानी चाही. लगा जैसे कुछ कहने की कोशिश कर रही हैं मगर गले में कुछ फँसा होने के कारण शब्द बाहर नहीं आ रहे, आवाज़ बाहर नहीं आ रही. हम उनके दाहिने हाथ पर खड़े थे. अम्मा हमारे पीछे और पिताजी अइया के पैरों के पास पड़ी बैंच पर बैठे थे. उनकी घबराहट सी देख कर उनके सीने पर, गले पर हमने हाथ फिराया. अइया, अइया, क्या बात है, क्या दिक्कत है, क्या कहना है की आवाज़ दी उनको.

उनकी आवाज़ रुंधती सी नजर आई. इससे पहले कि अइया कुछ बोल पातीं, कोई शब्द निकाल पातीं उनको उलटी हो गई. खून की उलटी. उनके सीने पर जल्दी-जल्दी पम्प किया. उनके हाथों को अपने हाथों में लेकर हथेलियाँ मलने का काम किया. एक उलटी और हुई और इससे पहले कि हम लोग कुछ समझ पाते, डॉक्टर नर्स को आवाज़ दे पाते अइया हमेशा को खामोश हो गईं. उनका हाथ हमारे हाथों में बेजान सा होकर थम गया. गर्दन एक तरफ लुड़क गई. आँखें अपने आप बंद हो गईं.

दो दिन पहले ही उनकी मेडिकल जाँच रिपोर्ट के आधार पर ऑपरेशन होना मुश्किल समझ आ रहा था. इसी बात पर डॉक्टर से, घर पर हमारी बहस भी हुई थी कि यहाँ नर्सिंग होम में नहीं रुकायेंगे अइया को. उरई ले जायेंगे. जब तक वे रहेंगी, उनकी सेवा करेंगे. पलंग पर ही उनकी सारी दिनचर्या का निर्वाह करवाएंगे. क्या पता था कि दो दिन बाद उनको उरई लेकर तो जायेंगे मगर जीवित नहीं. उनकी सेवा के लिए नहीं वरन अंतिम संस्कार के लिए. उरई में जिस दिन अइया को ट्रेक्शन लगा था, उनका बोलना, हँसना उसी दिन से सीमित हो गया था. ऐसा महसूस होने लगा था जैसे वे अपने अंतिम समय को देख रही हैं. लगभग दस दिन तक सीमित हँसने-बोलने वाली अइया को हम लोग पूर्णतः ख़ामोशी की अवस्था में उरई लेकर लौट आये.

जनवरी के अंतिम सप्ताह से शुरू हुआ पारिवारिक संकट अइया के देहांत के बाद समाप्त होता दिखा. अइया के देहांत के लगभग एक महीना पूर्व कानपुर से चाचा जी ने प्रीतू की दुर्घटना की खबर सुनाई. उसकी स्थिति गंभीर बताई गई थी, सो हम आनन-फानन तैयारी करके कानपुर को चल दिए. कानपुर मेडिकल सेंटर में गंभीर हालत में भर्ती छोटी बहिन को खतरे से बाहर तो बताया गया किन्तु सिर में लगी चोट ने उसको गंभीर बनाये रखा था. दवाइयों के सहारे सिर की चोट के असर को कम करने का प्रयास बराबर किया जा रहा था. रात-रात भर उसके पैरों में मचती झुनझुनाहट को पंजे को हथेलियों से मलते-सहलाते बीत जाती. कुछ मिनट का रुकना भी प्रीतू को असहज कर देता. भाई जी, झुनझुनी मच रही का एक बहुत धीमा सा स्वर उभरता और हाथ स्वतः उसके पंजों को मलने लगते. पंद्रह-बीस दिन बाद उसकी हालत में सुधार को देखते हुए उसे घर जाने की अनुमति दे दी गई.

अब हम सब उरई में ही थे. अइया भी उरई में थीं मगर एकदम खामोश. उनकी यात्रा अगले दिन सुबह फिर शुरू हुई. बैंड-बाजों के साथ. चार काँधों के साथ. आँखों में नतबहू देखने का, पंती खिलाने का सपना लिए हमारी दबंग, अपने समय के हिसाब से आधुनिक, तेज-तर्रार किन्तु हम भाइयों की प्यारी, दुलारी अइया हम सबको रोता-बिलखता छोड़कर बाबा जी के पास चली गईं थीं.

Wednesday, 12 November 2014

हत्यारा अनुशासन


हँसते-खेलते-कूदते कब हाईस्कूल पास कर लिया पता ही नहीं चला. बोर्ड परीक्षाओं का हौवा भी हम मित्रों को डरा न सका था. हाईस्कूल की परीक्षाओं की समाप्ति को हँसते-खेलते-कूदते इसलिए कहा क्योंकि किसी भी विषय की परीक्षा समाप्त होते ही तय हो जाता था कि कितनी देर में खेल के मैदान पर पहुँचना है? कहाँ खेलने पहुँचना है? उस समय दयानंद वैदिक महाविद्यालय और सनातन धर्म इंटर कॉलेज के मैदानों पर खेलने वालों का जमावड़ा लगता था. बस ये तय हो जाता कि कहाँ पहुँचना है, क्या खेलना है.

हाईस्कूल परीक्षा पास कर लेने की ख़ुशी के साथ इसकी भी ख़ुशी थी कि अब विषय विशेषज्ञ बनने का मौका मिलेगा. जी हाँ, उस समय यह अपने आपमें किसी विशेषज्ञ से कम नहीं था, हम लोगों के लिए कि अब आगे की पढ़ाई विज्ञान वर्ग, कला वर्ग या वाणिज्य वर्ग से होनी है. ये भी उस समय आपस में विमर्श का विषय बना हुआ था, हम दोस्तों के बीच कि विज्ञान विषय की पढ़ाई के लिए कौन गणित का चयन करेगा और कौन जीवविज्ञान की तरफ जायेगा. ऐसा होने, करने के पीछे भी हम लोगों के अपने तर्क रहते थे.

हम सभी मित्रों ने हाईस्कूल में विज्ञान वर्ग को ले रखा था. इस कारण सभी दोस्तों के बीच सहज रूप से ये स्वीकारोक्ति थी और सहमति भी थी कि हम सभी विज्ञान विषय से ही आगे की पढ़ाई करेंगे. इसी सम्भावना और शत-प्रतिशत सहमति के बीच कुछ अचंभित करने जैसा भी हुआ. नए सत्र में कॉलेज खुला. सभी मिले, एक दूसरे के विषयों की जानकारी का आदान-प्रदान हुआ. कोई गणित विषय का चयन कर चुका था, किसी ने जीवविज्ञान को चुना था. हम सभी दोस्तों को ये जानकर आश्चर्य हुआ कि हमारे बीच के ही एक होनहार मित्र राजीव त्रिपाठी ने कला वर्ग में एडमीशन ले लिया था. गर्मियों की पूरी छुट्टियों में लगभग रोज ही उससे मुलाकात होती थी मगर उसने कभी न तो इसका जिक्र किया और न ही अपनी किसी बात से हम लोगों को आभास होने दिया कि वह विज्ञान वर्ग को छोड़कर कला वर्ग से आगे की पढ़ाई करेगा. व्यक्तिगत हमारे लिए आश्चर्य इसलिए भी था क्योंकि वह बचपन से हमारा मित्र था और उसकी तीव्र इच्छा इंजीनियर बनने की थी. अकेले में उसे कई-कई दिन समझाने, कुदेरेने के बाद उसने बताया कि उसके पिताजी की इच्छा उसे प्रशासनिक अधिकारी बनाने की है. उन्होंने ही उसके विषय निर्धारित करके उनके सहारे ही आगे पढ़ने को कहा है. हँसने-मजाक करने वाला, सीधा-साधा, हंसमुख हमारा मित्र राजीव अपने पिता की इच्छा के दवाब में उदास, गुमसुम रहने लगा.

उसके पिता का सख्त अनुशासन हम बचपन से ही देख रहे थे. किसी भी दोस्त का उसके घर जाना लगभग न के बराबर होता था. उसका भी बहुत कम किसी दोस्त के घर जाना होता था. बाहर खेलने की अनुमति भी उसको बहुत कम मिलती थी. यदि कभी उससे मिलने के लिए उसके घर जाना भी होता तो वह अपने कमरे की सड़क पर खुलने वाली खिड़की से बात करता. हम लोग सड़क पर और वह घर के अन्दर से. ऐसे में भी वह अपने पिता की आहट होते ही हम लोगों को वहां से जाने को कहकर खिड़की बंद कर लेता.

समय बीतता रहा. पिता के सख्त अनुशासन और सिविल सेवा में जाने की जिद जैसी सनक में राजीव सिविल सेवा में तो चयनित न हो सका किन्तु अपना दिमागी संतुलन अवश्य खो बैठा. परास्नातक कर लेने के बाद उसे अपने सिविल सेवा में चयनित होने का भ्रम हो गया. हम मित्रों से मिलने पर उसमें कभी सामान्य राजीव नजर आता तो उस सीधे-साधे मासूम से राजीव की जगह कोई घनघोर सख्त प्रशासनिक अधिकारी दिखाई देने लगता. उसकी बातचीत, उसके हावभाव, उसका अंदाज सबकुछ अलहदा लगता. धीरे-धीरे उसकी स्थिति और ख़राब होती रही. कभी कॉलेज के कार्यक्रम में उसके द्वारा की गई उठापटक की खबर सुनाई देती. कभी उसके द्वारा उरई में कई लोगों संग मारपीट किये जाने की घटनाएँ सामने आने लगीं. आये दिन, दिन हो या रात, सूट-बूट में तैयार होकर किसी मीटिंग, बैठक, दौरे के नाम पर उरई की सड़कों पर उसका भटकना आम बात हो गई थी.

एक दिन खबर मिली कि राजीव को किसी दूसरे शहर में किसी मनोरोग चिकित्सालय में भर्ती करा दिया गया है. उसके बाद की उड़ती-उड़ती अनेक खबरों के बीच पुष्ट किन्तु अत्यंत दुखद खबर मिली राजीव के देहांत की. आघात सा लगा, असमय अपने दोस्त का जाना खला. न केवल एक प्रतिभा का क्षरण होना बल्कि एक मासूम व्यक्तित्व का शांत हो जाना व्यथित कर गया. लगा कि उसके पिता का अनुशासन उसका हत्यारा निकला. न सिर्फ उसका हत्यारा बल्कि उसके बड़े दो भाइयों का भी. उसके पिता का अनुशासन इसलिए भी हत्यारा क्योंकि उनकी प्रशासनिक अधिकारी बनाने की सनक के चलते राजीव के दो भाइयों ने आत्महत्या कर ली थी. इससे संदर्भित एक घटना अन्दर तक हिला देती है जबकि उनके शादीशुदा एक बेटे ने उरई से कहीं दूर अपने नौकरी करने वाले शहर में आत्महत्या कर ली थी. ऐसे में भी उनके हत्यारे अनुशासन से डरी उनकी पुत्रवधू उनको फोन करके अनुमति माँगती है, अपने दिवंगत पति के कार्यालय के सहकर्मियों संग अपने पति की पार्थिव देह तक जाने की.

उफ़! अनुशासन का अपना महत्त्व है किन्तु उसे हत्यारा तो न बनाया जाये.


Friday, 10 October 2014

प्यार भरे दिल में प्यार की कहानी


प्रेम को लेकर लोगों के कांसेप्ट बड़े ही विचित्र हैं. उसमें भी पहले प्यार को लेकर और भी गजब धारणाएँ बनी हुई हैं. प्यार एक बार ही होता है. पहले प्यार के बाद प्यार होता ही नहीं. पहला प्यार ही आखिरी प्यार होता है वगैरह-वगैरह. प्रेम को लेकर इतनी रूढ़िवादी सोच अपनी कभी नहीं रही. हमेशा से मानना रहा है कि यदि व्यक्ति जिंदादिल है, खुशमिजाज है, सकारात्मक सोच वाला है तो उसे सदैव प्यार होगा, सबसे प्यार होगा.

हमने भी सबसे प्यार किया. कई-कई से प्यार किया. हर उम्र में प्यार किया. ये और बात है कि वर्तमान सोच के चलते प्यार का अंजाम विवाह नहीं बना. इसके चलते ये भी तो नहीं कहा जा सकता कि प्यार असफल रहा. आखिर प्रेम के सफल, असफल होने का पैमाना क्या है? क्या सिर्फ विवाह ही किसी प्रेम की सफलता है? यदि यही अंतिम सत्य है तो वाकई हमारा प्रत्येक प्रेम असफल कहा जायेगा. लगातार असफलता के बाद भी हम प्रेम करते रहे या कहें कि हमसे भी प्रेम करने वाले मिलते रहे. (इसे मिलती रही भी पढ़ा जा सकता है.)

कुछ ऐसा ही उन दिनों हुआ जबकि हम प्रेम की कई-कई सीढियाँ अकेले चढ़ते हुए अपने कैरियर की इमारत बनाने की कोशिश कर रहे थे. जिस तरह हम अपने प्रेम को समाज की परिभाषा के अनुसार में सफलता की मंजिल तक नहीं पहुँचा पा रहे थे उसी तरह कैरियर की इमारत बनने की स्थिति में नहीं दिख रही थी. इस ओर से उस ओर तक हर स्थिति हमारे ऊपर असफल होने का ठप्पा लगाने को आतुर थी. उन्हीं विषम दिनों में उससे लगभग रोज ही सामान्य सी औपचारिक मुलाकात हो जाती थी. सामान्य सी बातचीत, सामान्य सा हंसी-मजाक. मुलाकात के चंद दिन ही गुजरे होंगे कि एक दिन उसने समाचार-पत्र में लिपटी एक डायरी देते हुए उसमें अपने बारे में कुछ लिखने को कहा. आग्रह जैसा कुछ नहीं, निवेदन जैसा कुछ नहीं, प्यार जैसा भी नहीं कह सकते मगर दोस्ती जैसा भी समझ नहीं आया. कुछ अधिकार सा समझ आया, उसके कहने में, उसके कुछ बताने में. डायरी अब उसके हाथों से गुजरती हुई हमारे हाथों में थी. दो-चार दिन इसी सोच-विचार में गुजर गए कि कुछ लिखने को आखिर हम ही क्यों? और यदि हम ही तो फिर लिखा क्या जाये? लिखने का अर्थ कुछ और न समझा जाये. बहरहाल, जो मन में था, जो दिल में था, लिखा. समय गुजरता रहा. बातें गुजरती रहीं. मुलाकातें गुजरती रहीं. इसे आरम्भ कहा जा सकता था किन्तु अपनी वास्तविकता को जानते-समझते हुए दिल को धड़कने से रोके रखा गया. 

समय गुजरता रहा. मुलाकातें होती रहीं. बातचीत चलती रही. आँखों ने आँखों से भले ही कुछ कहा हो मगर कुछ बंधन रहे जिन्होंने शब्दों को आज़ाद न होने दिया. ऐसी स्थिति में भी अपने सामने उसको खुद में सिमटते देखा. अपने सामने उसे खुलकर बिखरते देखा. अपने सामने हमारे लिए उसे निश्चिन्त देखा. अपने सामने हमारे लिए उसे चिंतित देखा. प्यार का उमड़ना देखा. अपने लिए उसके होंठों पर मुस्कराहट भी देखी. अपने लिए उसकी आँखों का नम होना भी देखा. यह सब तभी हो पाता है जबकि दिल की गहराइयों में किसी को बसा लिया जाये. इसे भले ही प्यार का नाम दे दिया जाये मगर कई बार लगता है कि यह प्यार से अधिक विश्वास का भाव होता है.

ऐसे ही विश्वास या कि प्यार का सिमटना देखा. कदम-कदम आगे बढ़ते-बढ़ते कदमों को कदम-कदम पीछे होते देखा. भावनाओं को शब्दों में बदलने से रुकते देखा. एहसासों का आभास होने के बाद भी उनको स्वीकार न करते देखा. सबकुछ कहने के बाद भी खामोशियों भरा मौन का मंजर देखा. मजबूरियाँ दोनों तरफ से थी, जो स्पष्ट रूप से सामने दिख रही थी. उसके सामने सामाजिक बंधन जैसी स्थिति थी या कुछ और पता नहीं पर हमारे सामने कैरियर बनाने जैसी स्थिति खड़ी थी. इसी बढ़ते-सिमटते में उसका चले जाना हुआ. वर्षों गुजर गए. वो आज भी दिल में है. इस छोर पर सबकुछ है, उस छोर पर क्या, कितना है पता नहीं. फिर वही बात कि आधुनिक मानकों पर प्रेम असफल रहा. एक और प्रेम कहानी हमारी नजर में पूर्ण पवित्र रही भले ही समाज की नजर से अधूरी रह गई हो.


Thursday, 25 September 2014

बिना गलती सजा स्वीकार नहीं

नई दिल्ली के विकासशील समाज अध्ययन केन्द्र (सीएसडीएस) से जुड़ना नब्बे के दशक के अंतिम वर्षों में डॉ० आदित्य कुमार जी के कारण हुआ. इस संस्था द्वारा कराये जाते चुनाव सर्वे में बुन्देलखण्ड टीम का हिस्सा बनने का अवसर कई बार मिला. अपनी तरफ से पूरी ईमानदारी और निष्ठा भाव से कार्य को सदैव सपन्न करते रहे. सन 2004 में सीएसडीएस द्वारा एशियाई बैरोमीटर निर्धारण करने वाली टीम में उत्तर प्रदेश की तरफ से शामिल होने का मौका मिला. इसकी तैयारियों से संदर्भित दो दर्ज़न राज्यों के सदस्यों की एक कार्यशाला नोएडा में आयोजित हुई, जिसमें शामिल होने का अवसर मिला. वहाँ क्या, कैसे हालात बने, क्या कुछ सीएसडीएस को हमारे बारे में बताया-सुनाया गया कि हमारे खिलाफ मौखिक निर्देश निर्गत किया गया, टीम से बाहर किये जाने का. ऐसा सब हुआ बिना हमारा पक्ष सुने. यदि यह शांति से स्वीकार कर लिया जाता तो कहीं न कहीं अपनी उस गलती को स्वीकारना था जो न तो हमने की और न ही हमें बताई गई. 

इसी सन्दर्भ में निम्न पत्र सीएसडीएस को भेजा गया. जिसके बाद अगली वर्कशॉप में ससम्मान बुलाये जाने जैसा कदम सीएसडीएस द्वारा उठाया गया.

श्रीमान जी,
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें
आशा एवं विश्वास है कि ‘अब’ आप लोग ‘ज्यादा’ प्रसन्न होंगे.

वैसे नववर्ष पर एशियाई बैरोमीटर का निर्धारण करने वाली स्वप्निल सीएसडीएस टीम के बेदखल सदस्य का ‘पत्र’ पाकर आप लोगों की खीझ भरी औचक प्रतिक्रिया तो मन में उभरी ही होगी. चलिए समय की बर्बादी न करते हुए सीधे मुद्दे पर आया जाये, (वैसे भी आप लोगों क पास समय की ही कमी है.) वो यह कि किसी भी निर्णय को ख़ामोशी से स्वीकार लेना उसमें छिपे दोषों की स्वीकार्यता को बढ़ाता है वहीं सही समय पर किसी निर्णय पर ओढ़ी गई ख़ामोशी को तोड़ना बुद्धिमत्ता का परिचायक तो कहा ही जा सकता है. हमारे ऊपर निर्णय लेने में समूची सीएसडीएस टीम लग जाएगी, यह कभी सोचा भी नहीं था किन्तु निर्णय लेने की अतिशय जल्दबाजी और अत्यधिक अहं भाव ने आप लोगों को कुछ महत्त्वपूर्ण पलों से वंचित कर दिया. हालाँकि बेदखल करने का हमारा उदाहरण देकर आपने कुछ हित अवश्य ही साधने का प्रयास किया है किन्तु बहुत कुछ आप लोगों ने खो भी दिया है. क्या खोया है यह आप लोग सोचिये.

कुछ बातें हम तक छन कर पहुँची और कुछ सीधे पहुँची तो सार निकला कि ‘ऑफ़ दरिकॉर्ड’ बातों को रिकॉर्ड करने में आपके कथित सहयोगियों का जवाब नहीं. क्या कुछ हमने कहा, क्या कुछ आपके भेदियों ने सुना और क्या कुछ आपके कानों को सुनाया गया, पता नहीं पर परिणाम यह कि ‘कुमारेन्द्र इस सर्वे में काम नहीं करेंगे’ के रूप में सामने आया. यहीं आकर सवाल खड़ा होता है कि आगे कौन काम करना चाहेगा? आप लोगों की अपने बारे में सोच अच्छी होगी (होनी भी चाहिए) पर कभी यह सोचा है कि इस अच्छी सोच का कारण क्या है? हम जैसे तमाम investigators जो आप लोगों की तरह एसी में बैठकर नीति निर्धारण का काम नहीं करते हैं; बातों के बताशे नहीं फोड़ते हैं.

आपकी ओर से बात आई कि हमने आपकी (सीएसडीएस) की पॉलिसी पर सवाल उठाये हैं. क्या आप लोगों को अपनी पॉलिसी निर्विवाद लगती है? आप लोग खुद कहेंगे ‘नहीं’ फिर अपने दोषों का ठीकरा औरों के सिर क्यों फोड़ा जाता है? नॉएडा वर्कशॉप में तो किसी तरह की चर्चा ही नहीं हुई थी (होती भी तो खुलकर होती क्योंकि अपनी आदत चुगली करना नहीं है, जो कहते हैं खुलकर कहते हैं, सभी के सामने कहते हैं. यह तो आप प्रश्नावली पर चर्चा के दौरान देख ही चुके हैं.) पर अब जब यह आरोप लग ही गया है तो थोड़ा खुलकर दौर चलें तभी सही मजा है.

1- पहली बात तो यह कि आप लोग अपने सच्चे हितैषी लोगों को भूलने की परम्परा का निर्वाह करते हैं. यह बात तो सिंह साहब आप स्वीकारेंगे क्योंकि आपको हर बार ‘फ्रेशर’ ही चाहिए होते हैं. इसके अलावा स्व० प्रदीप जी तो याद होंगे ही आपको, जिनके देहांत के बाद आयोजित कार्यशाला में दो शब्द भी सीएसडीएस की ओर से नहीं निकल सके थे. (पता नहीं प्रदीप जी अब आप लोगों की स्मृति में हैं भी या नहीं?)

2- बात जब फ्रेशर की आई तो आपको बताते चलें कि आपको ‘काम करने वालों’ की जरूरत है न कि सहयोगियों की. जैसे किसी इमारत को बनाने में मजदूरों की अहमियत सामान ढोने तक है, किसी भी तरह की सही-गलत परिभाषा देना उसकी सीमा में नहीं आता है. इसके उलट सहयोगियों द्वारा प्रत्येक दोष को दूर करने का प्रयास होता रहता है. (पता नहीं आ कब इस तथ्य-सत्य को समझेंगे?

3- पॉलिसी मेकर्स को सबसे बुरा तब लगता है जब उसकी पॉलिसी पर ही सवाल खड़े होने लगें. सीएसडीएस को समूचे विश्व के सामने खड़ा करने की ललक में कुछ कमियों को नजरअंदाज किया जा सकता था किन्तु जब बात purity और surity की हो और ‘बैरोमीटर’ का निर्धारण हो तो किसी भी तरह की हीलाहवाली नहीं होनी चाहिए. इसके बदले हमारे सिंह साहब कहते हैं कि पिछले सर्वे को भूल जाइए, फ्रेशर की जरूरत है. क्या यह सही पॉलिसी है? सोचियेगा, गलती कौन बताएगा? विश्व समुदाय के सामने गलत डाटा के साथ सिर ऊँचा करेंगे या सिर ऊँचा रखने को रिजल्ट (मनमाफिक) पहले से ही तैयार रहता है?

4- आपका एशियाई बैरोमीटर का प्रोजेक्ट पिछले कई वर्षों से मात्र धन के अभाव में रुका पड़ा था (जैसा कि आपका कहना था). सोचने वाली बात है कि इतने बड़े सर्वे में खर्च हो रहे करोड़ों रुपयों के बाद शुद्धता और शत-प्रतिशतता को सिद्ध करने के लिए आप लोग investigators के क्षेत्र में री-सर्वे करवाने की बात करते हैं. क्या यह investigators पर अविश्वास नहीं? और आप गलत आँकड़े (किसी भी कारण से) लेकर विश्व समुदाय के सामने जायेंगे तो क्या कोई आप लोगों को re-check करने वाला वहां होगा? नहीं होगा न..!! (विश्वास या मजबूरी या धन की अधिकता)

5- धन देने वाली बड़ी-बड़ी फंडिंग एजेंसीज को अपने धन को खपाने वाला कोई माध्यम चाहिए और उस माध्यम के ऊपर एक प्रकार का विश्वास. आप लोग investigators के लिए न तो बड़ी फंडिंग कर पाते हैं और न ही उन पर विश्वास कर पाते हैं और न ही उन्हें सुरक्षा ही दे पाते हैं. क्या यह स्थिति महज कामगार मजदूरों के साथ लागू नहीं होती?

6- जहाँ तक investigators की सुरक्षा का प्रश्न है तो वह केवल अपनी ही सुरक्षा व्यवस्था के सहारे क्षेत्र में जाता है. किसी भी तरह की institutional सुरक्षा के बिना क्षेत्र में उतर कर अलग-अलग व्यक्तियों से बात करना आसान तो नहीं. आप लोग कहते हैं कि आपने भी संवेदनशील विषयों पर संवेदनशील जगहों पर सवालों को उठाया है पर क्या उनकी भाषा-शैली और शब्दावली उतनी ही ‘सरल’ (पता नहीं कितनी सरल) रहती है जितनी कि आपके सर्वे की आपकी प्रश्नावलियों की होती है?

7- आगे बात आती है आप लोगों की नीति निर्धारण को लेकर दिए गए कोरे आश्वासनों की. प्रथमतः तो आइडेंटिटी कार्ड और investigators की सुरक्षा को लेकर बात करना बंद करें (वैसे भी इस पर अधिक चर्चा न होकर बैग और उसकी क्वालिटी पर चर्चा होती है). इस बार का आइडेंटिटी कार्ड जबरदस्त आश्वासनों के बाद भी थर्ड क्लास ही कहा जायेगा (किसी की निगाह में और गिरावट हो तो पता नहीं). वह भी छपे हुए हस्ताक्षरों वाला, जिसकी कोई भी कीमत नहीं. तब investigators की सुरक्षा?

8- यह तो आप भली-भांति जानते होंगे कि किसी भी सर्वे एजेंसी को अपने कार्यकर्ताओं को फील्ड में भेजने के पूर्व उनका बीमा करवाना आवश्यक हो गया है. आप लोग इस प्रकार का रिस्क लेना नहीं चाहते और investigators भी पता नहीं क्यों खामोश है? या तो उसे पता नहीं या वह किसी पर्सनल रिलेशन के कारण सर्वे कर रहा है. क्या यह बिंदु आपकी पॉलिसी का खोखला हिस्सा नहीं है?

9- क्या कभी सोचा है कि एक investigators जो लड़का, लड़की कुछ भी हो, मात्र एक-दो हजार के मानदेय के लिए फील्ड में रिस्क लेने को तैयार होता है या और कोई कारण होता है? आप लोगों की संस्था की साख (credit) समूचे देश और विश्व (बैरोमीटर के निर्धारण के बाद) के सामने बढ़ाने वाला investigator उसी तरह क्षेत्र में भागदौड़ करता गौरवान्वित (झूठे ही) होता रहता है और आप लोग एसी का मजा लूटते हैं. क्या यह सब अच्छी पॉलिसी की निशानी है?

10- आपकी सच्ची  पॉलिसी का निर्धारण तो हमें हटाने के बाद ही हो गया. आप लोगों की भृकुटी तनी थी, उत्तर प्रदेश की टीम में किसी लड़की के न होने से. (आप लोग महिलाओं को प्राथमिकता क्यों देते हैं, पता नहीं.) पर हमें निकाले जाने के बाद क्या आप लोगों को लड़कियाँ मिल गईं? सिंह साहब कहते हैं कि जो इस बार नॉएडा वर्कशॉप को ज्वाइन नहीं कर रहे हैं वह इस सर्वे में काम नहीं करेगा. क्या हमारे स्थान पर किसी नॉएडा वर्कशॉप वाले को ही जोड़ा गया? (कोई जवाब नहीं आपके पास क्योंकि आपकी पॉलिसी ही लाजवाब है.)

11- कहिये, इतना पर्याप्त है या और गिनाएं आपकी पॉलिसी की उपलब्धियाँ क्योंकि हम तो काफी समय से आप लोगों के लिए काम कर रहे हैं (साथ काम नहीं कर रहे). आप लोगों को तो ख़ुशी होनी चाहिए थी कि आप लोगों के साथ पुरानी टीम है, (सिंह साहब, क्या कभी आपने अपने स्थान पर किसी फ्रेशर की बात सोची या आप ही सन 60 में सर्वे कर रहे थे और अब ‘मात्र’ आप ही वर्कशॉप में प्रश्नावली पर चर्चा कर रहे हैं. हमेशा खुद को ही फ्रेशर बनाते रहेंगे?) जो अपने अनुभवों से आपके डाटा को और अधिक सत्य के पास ले जा रही है. (क्या इसमें भी कुछ खतरा है आपकी प्रतिष्ठा को? शायद..!!)

12- डाटा की सत्यता की बात शायद आप लोग करते हैं (परिणाम की सत्यता तो पहले से आपके कंप्यूटर में फीड है) किन्तु चाहते नहीं हैं क्योंकि इससे असली सत्यता ज़ाहिर हो जाएगी. यही कारण है कि प्रश्नावली के प्रश्नों का रूप किस कदर उलझाऊ और क्लिष्ट होता है जो पढ़े-लिखे लोगों की समझ में तो आता नहीं (आपकी समझ में आता है? नहीं न..!!) अनपढ़ गाँव की समझ में क्या आता होगा? अब आप इसी क्लिष्टता को लेकर लोकतंत्र और सुरक्षा पर चर्चा कर रहे हैं. प्रश्नों के सरल रूप में तो मुंहफट भोला ग्रामीण सही बात कहकर आपके परिणामों में उथल-पुथल पैदा भी कर सकता है. (क्लिष्ट सवालों में ऐसा डर आपको नहीं है.)

13- प्रश्नावली पर हम चर्चा बाद में करेंगे, उस पर भी बहुत कुछ है कहने को. (वैसे श्री वी०बी० सिंह साहब हमारे द्वारा इसके भुक्तभोगी हैं क्योंकि हम तो भोजनावकाश और टी ब्रेक में भी उनको नहीं छोड़ते थे) अभी पॉलिसी पर ही बात हो तो अच्छा है, क्यों ठीक है न?

14- आप लोग आइडेंटिटी कार्ड पर से investigator, researcher शब्द अगली बार हटवा दीजियेगा क्योंकि investigator वही होता है जो कुछ investigate करे, कुछ खोज सके. आपकी प्रश्नावली और एक संकुचित दायरे में कोई व्यक्ति कुछ खोज नहीं कर सकता है तो investigator या researcher का कोई तात्पर्य ही नहीं. वह तो आपके लिए डाटा मात्र एकत्र करता है तो वह हुआ डाटा कलेक्टर. तो आगे से प्रश्नावली, परिचय-पत्र पर शोधार्थी, investigator, researcher के स्थान पर डाटा collector, आँकड़ा संग्राहक जैसे शब्द छपे हों तो व्यक्ति को अपनी ‘असली औकात’ पता रहेगी. (हमारी तरह किसी टीम का researcher होने के मुगालते में, धोखे में नहीं रहेगा.)

15- पॉलिसी को लेकर एक बात अब आपके सीएसडीएस नई दिल्ली के किसी सदस्य की जानकारी के अनुसार कि समूचे देश का व्यक्ति पेन्सिल से उत्तरों पर गोले बनाता है पर दिल्ली टीम के लड़के पेन से गोले बनाते हैं या निशान (कुछ भी) लगाते हैं. यह किस पॉलिसी के तहत है? इसके अलावा जब आप वर्कशॉप में किसी  की बात को अहमियत नहीं देते तो वर्कशॉप की आवश्यकता क्या है? (कहीं यह भी फंडिंग एजेंसी के धन को खपाने का एक रास्ता तो नहीं?)

16- अंतिम किन्तु अंत यहाँ भी नहीं कि आप लोग जिस मानसिकता के तहत कार्य करते हैं वहां डाटा कुछ भी हो पर परिणाम वही होगा जो आप लोग चाहते हैं. आपकी फंडिंग एजेंसी चाहती है. इसके पीछे का कारण ये है कि शिवसेना और भाजपा के लोग ‘जय श्री राम’ बोलकर दंगा कर सकते हैं, हुल्लड़ करवा सकते हैं किन्तु आपके मुस्लिम भाई (कथित अल्पसंख्यक) अल्लाहो-अकबर बोलकर शांति का पैगाम ही लाते हैं. मात्र एक-दो दिनों के कथित विरोध के बाद जनसँख्या के आँकड़ों को सरकार बदल सकती है तो किसी प्राइवेट सर्वे संस्था (आपकी भी) इतनी हिम्मत नहीं कि सही रुख (लाभकारी रुख) के विरुद्ध चल सकें.

कहने, बताने को बहुत कुछ है किन्तु एकबार में ही कह दिया तो आप लोगों का हाजमा ख़राब हो जायेगा क्योंकि आप लोगों की पाचन क्षमता अच्छी नहीं है (उदाहरण तो हम देख ही चुके हैं). आगे आने वाला समय हम और आपको पुनः मिलवायेगा, यह हमारा विश्वास है. रही बात आपके re-check करवाने की तो स्टेटिस्टिक्स के विद्यार्थी, अनेक सर्वे कर चुके एक व्यक्ति और पत्रकारिता से जुड़े सामान्य जागरूक नागरिक का ‘उद्घोष’ कहें, ‘चैलेन्ज’ कहें कि किसी भी स्थिति में इस तरह की प्रश्नावलियों के सवालों को re-check कोई भी नहीं कर सकता है (भाषा शैली सरल अधिक जो है). और respondent और उसके back ground data से सम्बंधित सवाल द्वितीयक आँकड़ों की श्रेणी में आते हैं (लिंग, शिक्षा, व्यवसाय को छोड़कर) और द्वितीयक आँकड़ों का गलत होना सांख्यिकी के अनुसार भारी गलती नहीं है. (वैसे यह तो आप भी जानते होंगे) फिर आप लोग भी क्या re-check करेंगे?

आप लोगों की समय की कमी के बाद भी इतना सब लिख दिया. आगे से समय निकाल कर रखियेगा क्योंकि अभी आपको और सारे पत्रों का सामना करना होगा. वैसे आप तो जवाब देंगे नहीं क्योंकि हमें निकालने की ‘हिम्मत’ तो सीएसडीएस टीम ने कर ली पर लिखित में कोई सूचना प्रेषित करने की ‘ताकत’ न जुटा सके. यदि अब ताकत आ जाये तो पत्र अवश्य डालियेगा क्योंकि आगे के लिए भी कुछ न कुछ प्राप्त होता रहेगा. वैसे कहा भी है-

“रिश्ते छूटें मगर दिल नहीं तोड़ा करते”

अगले एक और धमाकेदार पत्र की घोषणा के साथ सीएसडीएस एशिया बैरोमीटर तय करती (आँकड़े बटोरती कामगार मजदूर की टोली) टीम का बेदखल सदस्य-



Friday, 19 September 2014

प्रिंट के साथ-साथ इंटरनेट पर भी लेखन आरम्भ

पहली बार की घटनाओं का एक मीठा सा एहसास सभी को हो यही सोच कर एक ब्लॉग प्रारम्भ किया था. अब चूँकि बात ब्लॉग की हो रही है तो सोचा कि क्यों न अपने पहली बार ब्लॉग पर आने के बारे में आप लोगों से बात की जाये. घर पर इंटरनेट कनेक्शन लिए लगभग पाँच माह होने को आ गये थे. अपने काम की कुछ साइट पर घूमने के साथ साथ ऐसी साइट भी देखा करते थे जिन पर अपने लेख, कविता, कहानी आदि को भेज कर प्रकाशित करवा सकें. 

किसी भी लेखक के लिए छपास रोग बहुत ही विकट रोग है. हमारे ख्याल से वे दिन तो हवा हो गये जब लोग स्वान्तः सुखाय के लिए लिखा करते थे. अब तो छपास रोग के कारण लिखना पड़ता है. यही छपास रोग हममें भी था पर शायद इसकी बहुत हद तक पूर्ति इस रूप में हो चुकी थी कि माँ सरस्वती और बड़ों के आशीर्वाद से उस समय से ही छपना शुरू हो गये थे जब हमें बच्चा कहा जाता था. उम्र रही होगी कोई नौ-दस वर्ष की. तबसे कागज पर तो छपते रहे. अब घर में इंटरनेट हो और लेखन भी होता हो तो छपास का कीड़ा दूसरे रूप में कुलबुलाया. बहुत खोजबीन की पर समझ नहीं आया कि इंटरनेट पर इस रोग का निदान कैसे हो? खोजी प्रवृति ने हिन्दी खोज के दौरान यह तो दिखाया कि बहुत से लोग हिन्दी में अपने मन का विषय लिखते दिख रहे हैं पर कैसे यह समझ से परे था?

एक दिन टीवी पर एक कार्यक्रम आ रहा था जिस पर चर्चा हो रही थी ब्लॉग से सम्बंधित. बस दिमाग ने क्लिक से इस शब्द को पकड़ा. ब्लॉग की बातें सुनी जो ब्लॉग बनाने को लेकर तो नहीं पर किसी सेलीब्रिटी को लेकर हो रहीं थीं. इससे पहले अमिताभ बच्चन के ब्लॉग की बातें सुनते रहते थे सो एक दिन बिग अड्डा पर जाकर पंजीकरण करवा दिया मगर कुछ पल्ले न पड़ा था. ब्लॉग की बात सुनते ही तुरन्त कम्प्यूटर ऑन किया, गूगल पर जाकर सर्च किया Create Blog. अब एक दो हों तो समझ में भी आये, वहाँ तो ढेरों साइट. न समझ आये कि इस वेबसाइट पर बनाना है, न समझ में आये कि उस वेबसाइट पर बनाना है. दिमाग पर जोर डाल कर देखा तो बहुत सी साइट के एड्रेस पर या तो ब्लॉगपोस्ट लिखा मिला या फिर वर्डप्रैस. बस हिम्मत करके ब्लॉगर पर गये और ब्लाग बना डाला. इसके बाद वर्डप्रेस पर भी जाकर एक ब्लॉग बना डाला. नाम भी बड़ा जबरदस्त रखा रायटोक्रेटकुमारेन्द्र. ब्लॉग बनाने के बाद वर्डप्रेस पर कम लिखना हुआ. ब्लॉगर पर खूब लिखा गया, खूब सारे ब्लॉग बना कर लिखा गया. 

अब दोनों जगह ब्लाग बन गये पर पोस्ट कहीं नहीं किया. दोनों जगह जाकर देखा पर हिम्मत नहीं हुई कुछ भी पोस्ट करने की. सोचा कहीं पोस्ट करने के बाद कोई पंजीकरण की कोई शर्त न हो? डर लगा कि कहीं इसका कोई भुगतान न करना पड़े? ऐसा बहुत होता है, किसी स्टार के निशान के नीचे छिपी हुई स्थिति में. इस सम्बन्ध में और जानकारी के लिए अपने एक मित्र को फोन किया, अपने भाई को फोन किया. पूरी तरह से आश्वस्ति के बाद हमने अपनी पहली पोस्ट लिखी. अब यह भी समस्या थी कि इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ेंगे कैसे? फिर सोचा कि ये समस्या बाद की है, पहले कुछ लिख लिया जाये. तो बैठ गए लिखने, जो दिमाग में आया, अपनी पहली ब्लॉग पोस्ट के रूप में. पहली पोस्ट जो लिखी, वो यहाँ साथ में दी गई है, आप भी जरूर पढ़ें.

दलित विमर्श को समझने की जरूरत है

साहित्य में समाज की तरह दलित विमर्श को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है. देखा जाए तो दलित विमर्श को अभी भी सही अर्थों में समझा नहीं गया है. दलित विमर्श के नाम पर कुछ भी लिख देना विमर्श नहीं है. साहित्यकार को ये विचार करना होगा की उसके द्वारा लिखा गया सारा समाज देखता है. दलित साहित्यकार दलित विमर्श को स्वानुभूती सहानुभूति के नाम देकर विमर्श की वास्तविक धार को मोथरा कर रहे हैं. अपने समाज का मसीहा मानने वाले महात्मा बुद्ध को क्या वे स्वानुभूती या समनुभुती अथवा सहानुभूति के द्वारा अपना रहे हैं? महात्मा बुद्ध तो एक राजपरिवार के सदस्य थे उनहोंने न तो दुःख देखा था न ही किसी तरह का कष्ट सहा था फ़िर दलितों के लिए निकली उनकी आह को दलित अपना क्यों मानते हैं? दलित विमर्श के बारे में यदि गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो यह अपनी धार खो देगा.