Tuesday, 5 August 2014

इंतजार उस एक फोन का


कुछ बातें व्यक्ति के जीवन में बहुत प्रभावी न होने के बाद भी प्रभावी बनकर रहती हैं. ऐसी बहुत सी बातें होती हैं जिनका सम्बंधित व्यक्ति के अलावा किसी और के लिए कोई महत्त्व नहीं होता है. हमसे ही सम्बंधित बहुत सी बातों का किसी और के लिए हो सकता है कोई महत्त्व न हो मगर प्रत्येक बात का अपना एक सन्दर्भ होता है, उसका अपना एक प्रभाव होता है. यही बातें ही हैं जो व्यक्ति के अंतर्संबंधों का, सह-संबंधों का आकलन करती हुई उनका विश्लेषण करती हैं. ऐसी ही बातों में अगस्त का पहला रविवार, जिसे फ्रेंडशिप डे के नाम से जाना जाता है, हमारे साथ जुड़ा हुआ है. कोई विशेष बात न होने के बाद भी एक अलग तरह की सुगंध का एहसास उस दिन होता है.

उस दिन रविवार था, अगस्त का पहला रविवार. उन दिनों मोबाइल सपने में भी सोचा नहीं गया था. बेसिक फोन की घंटी घनघनाई. रविवार होने के कारण सभी लोग घर में ही थे. घनघनाती फोन की घंटी रुकी और उधर से हमको पुकारते हुए अम्मा बोली, किसी लड़की का फोन है. 

दिमाग की सारी घंटियाँ घनघना गईं. हैलो के साथ हैप्पी फ्रेंडशिप डे की खनकती आवाज़ कानों में घुल गई. कोई विशेष दिन मनाये जाने का न चलन था और अपनी आदत के अनुसार हम ऐसे किसी दिन के प्रति सजग-सचेत नहीं थे, सचेत-सजग तो आज भी नहीं रहते हैं. सेम टू यू कहने के बाद कुछ और आगे कहते उससे पहले ही दूसरी तरफ से उलाहना आकर कानों में गिरा, आप पहले फोन करके विश नहीं कर सकते थे? 

उलाहना देने का अंदाज़ भी इतना गज़ब कि अपनी आदत के अनुसार ठहाका मारते हुए हमने इतना कहा, दोस्ती में ऐसी औपचारिकता हम नहीं करते. 

दो-तीन मिनट के बाद जब फोन रखा तो समझ नहीं आया कि इस तरह की हलकी-फुलकी मधुर नोंक-झोंक के बाद बात समाप्त हुई या बात शुरू हुई? समय गुजरता रहा. वक्त बदलता रहा. स्थितियाँ-परिस्थितियाँ बदलती रहीं मगर बात ख़तम होकर जहाँ शुरू हुई थी वो न बदली. अगस्त आता रहा. अगस्त का पहला रविवार आता रहा. हर बार की तरह फोन उधर से ही आता रहा. हर बार विश करने के बाद वही मधुर उलाहना दिया जाता रहा, आप पहले फोन करके विश नहीं कर सकते थे? हमारा वो ठहाकेदार जवाब वैसे ही निकलता रहा.

सबकुछ बदलने के बाद भी लगता है जैसे कुछ न बदला. दोस्ती की नोंक-झोंक न बदली. दोस्ती का वो बेलौस अंदाज़ न बदला. अगस्त बार-बार आता रहा. अगस्त में पहला रविवार बार-बार आता रहा. एक आदत सी हो गई अगस्त के पहले रविवार को फोन आने की, एक उलाहना दिए जाने की. आने वाले न जाने कितने वर्षों तक अगस्त आता रहेगा, अगस्त का पहला रविवार भी आता रहेगा, उसका उलाहना भरा फोन भी आता रहेगा.


Wednesday, 30 July 2014

खौफ भरी छोटी सी यात्रा

हमको अपने छोटे भाई हर्षेन्द्र के साथ आगरा से एक परीक्षा देकर कानपुर आना था. रेलवे स्टेशन पहुँचकर पता लगा कि उस समय कानपुर के लिए कोई ट्रेन नहीं है. यदि आगरा से टुंडला पहुँच कर वहाँ से आसानी से कानपुर के लिए ट्रेन मिल जायेगी. आगरा से टुंडला तक बस से आने के बाद टुंडला स्टेशन पर जैसे ही पहुँचे पता लगा कि एक ट्रेन आ रही है. पैसेंजर ट्रेन थी और इसके बाद दो-तीन घंटे कोई ट्रेन भी नहीं थी, कानपुर पहुँचना अत्यावश्यक था. इस कारण से पैसेंजर ट्रेन में बैठने के अलावा कोई और रास्ता भी नहीं था. 

टिकट खिड़की पर जबरदस्त भीड़ होने के चलते टिकट मिलता संभव न लगा. पहले सोचा कि बिना टिकट ही चढ़ जायें पर कभी बिना टिकट यात्रा न करने के कारण से हिम्मत नहीं हो रही थी. सोचा-विचारी में समय न गँवा कर हमने तुरन्त सामने दरवाजे पर खड़े एक टिकट चेकर से अपनी समस्या बताई. 

उस ने बिना कोई तवज्जो दिये पूरी लापरवाही से कहा कि बैठ जाओ, पैसेंजर में कोई नहीं पकड़ता.

भाईसाहब कोई दिक्कत तो नहीं होगी? हमने शंका दूर करनी चाही.

उसको लगा कि कोई अनाड़ी हैं जो पहली बार बिना टिकट यात्रा करने की हिम्मत जुटा रहे हैं. सो उसने थोड़ा सा ध्यान हम लोगों की ओर दिया और बताया कि वैसे बिना टिकट जाने में कोई समस्या नहीं फिर भी यदि टिकट लेना है तो दो स्टेशन के बाद यह गाड़ी थोड़ी देर तक रुकती है, वहाँ से ले लेना.

उनके इतना कहते है जैसे हमें कोई संजीवनी मिल गई हो. हम दोनों भाई तुरन्त लपके क्योंकि गाड़ी भी रेंगने लगी थी. डिब्बे के अन्दर पहुँचते ही बैठ भी गये, सीट भी मिल गई पर इसके बाद हमारी जो हालत हुई कि पूछिए मत. आने-जाने वाला हर आदमी लगे कि टिकट चेक करने वाला आ गया. कभी इस तरफ देखें, कभी उस तरफ देखें. लगभग 45 मिनट की यात्रा के बाद वह स्टेशन आया जहाँ से टिकट लिया जा सकता था. तुरत-फुरत में दो टिकट लिए गए. अब सुकून मिला और कानपुर तक आराम से आये. आज भी छोटी सी मगर बिना टिकट यात्रा याद है.

Monday, 14 July 2014

बचपन के वे सुहाने दिन

बचपन की ढेर सारी यादें आज भी साथ हैं. बचपन के दोस्त याद हैं. बचपन की शरारतें याद हैं. बचपन में मिलता प्यार-दुलार याद है. कुछ भी तो ऐसा नहीं जिसे भूला जाये और आखिर क्यों भूला जाये? यही एक ऐसी सम्पदा है जो ताउम्र साथ रहती है और कोई चाह कर भी न इसे भूल पाता है, न ही भुला पाता है. मासूम सा, निश्छल सा, प्यारा सा, शरारती सा, हँसता सा, उड़ता सा बचपन. बहुत कुछ ऐसा है जो हमें आज भी याद है. स्वतः की गई अनुभूति के कारण याद है. इसके साथ ही बहुत कुछ ऐसा है जो घर-परिवार के सदस्यों के द्वारा सुनते रहने के कारण याद है.

याद रखना, याद रखे रहना भी बड़ी गज़ब स्थिति है. क्या याद रखते-रखते क्या भूल जाएँ कह नहीं सकते. व्यक्ति अपने जीवन भर बहुत कुछ याद रखता है, बहुत कुछ भूलता भी है. इस याद रखने और भूलने के बीच वह अपने बचपन को कतई नहीं भूल पाता. इसी कारण वह बच्चों के साथ घुल-मिल कर अपने बचपन के दिनों को याद करने लगता है. हम भी इससे बच नहीं सके हैं. आज भी अपना वो पुराना घर, वो बरगद का विशाल पेड़, जिसके मैदान में हम बच्चे खूब धमाचौकड़ी मचाया करते थे, वो स्कूल, वे साथी और न जाने कितनी-कितनी कहानियाँ इधर लेखन के दौरान उभरती रहीं, मन में घुमड़ती रहीं. हर बार कोई कहानी याद आती, हर बार कलम रुककर फिर उसी बचपन में ले जाती. नवरात्रि का रात्रि जागरण, टेसू-झिंझिया का विवाह, मामुलिया का लोकोत्सव, रामलीला का आयोजन, निर्मित मकानों के बालू के ढेरों पर कूदना, पत्थर मार-मार कर बेर, इमली का गिराना, होली का हुल्लड़, दीपावली का धमाल जाने कितना-कितना है जो बार-बार बचपन में घसीट ले जाता है.

बचपन के वे दिन बहुत शिद्दत से याद आते हैं जबकि सभी चाचा-चाची, सभी भाई-बहिन होली, दीपावली उरई इकठ्ठा हुआ करते थे. उस हंगामी मस्ती में न दिन समझ आता था, न रात. न सुबह, न शाम. न खाने की सुध, न सोने की चिंता. बस चौबीस घंटे मस्ती ही मस्ती. ऐसा नहीं कि इसमें सिर्फ हम भाई-बहिन ही शामिल रहते थे. चाचा लोग भी एकदम से बच्चे बने हम सबके साथ उसी बेलौस अंदाज में मस्त रहते थे. घर का खुला हुआ लॉन, पास में बनी पुलिस चौकी का या फिर कॉलेज का ग्राउंड हम सबकी मस्ती का गवाह बनता. कभी पुराने कपड़ों पर साईकिल के ट्यूब को काटकर बनाये छल्लों के सहारे गेंद बनाई जाती तो कभी पॉलीथीन को जला-जलाकर.
घर के बाहर की मस्ती से अलग घर के अन्दर की धमाचौकड़ी भी कुछ अलग तरह की होती. कभी सैनिक बनकर देश की रक्षा की जाती, कभी अधिकारी बन कर जनता के काम किये जाते, कभी पुलिस वाला बनकर चोरियां रोकी जाती तो कभी शिक्षक बनकर पढ़ाने का काम किया जाता, कभी वकील-जज बनकर मुक़दमे निपटाए जाते. पलंग, चारपाई, कुर्सियाँ कार में बदल जाया करते थे. चम्मचें, कटोरियाँ, कंघे आदि घरेलू सामान सम्बंधित खेल के साजो-सामान के रूप में इस्तेमाल किये जाने लगते. 

होली के मस्ती भरे माहौल में क्या घर के लोग, क्या सड़क चलते लोग सभी को रंग लगाया जाता, सभी के साथ उसकी उम्र के हिसाब से अभिवादन करते हुए मिल जाता. दीपावली आती तो देर रात पटाखे चलाने के बाद अलस्सुबह उठकर अधचले, चलने से बचे पटाखों को छत पर बीनने का काम शुरू हो जाता. लालजी की चाट, छुटकन की मटर, संपत की दूध की बोतल, लालमन की जलेबी, स्टेशन के रसगुल्ले, सड़क किनारे लगे पानी के बताशे आदि कितनी-कितनी संख्या में हम बच्चों के पेट के अन्दर चले जाते, कुछ अंदाजा न होता.

आज भी त्योहारों पर अथवा किसी अन्य अवसरों पर सभी का मिलना, इकठ्ठा होना होता है मगर अब वो धमाल नहीं होता. मस्ती-हुड़दंग आज भी होता है मगर कतिपय सामाजिक स्थितियों ने सबकुछ एक निश्चित दायरे में समेट कर रख दिया है. बदलते दौर के इस सामाजिक परिवेश में आज भी वही परिवेश लगातार याद आता है. एक हमें ही नहीं घर में सबके इकठ्ठा होने पर न सही व्यावहारिक रूप में मगर बातचीत में वही माहौल फिर जन्म ले लेता है. हँसी-मजाक, यादें, स्मृतियाँ, पुराने किससे फिर सबको उन्हीं दिनों में सैर कराने निकल पड़ते हैं. भूल कर भी वे दिन फिर-फिर याद आ जाते हैं. इसी याद रखने, भूल जाने, रह-रह कर याद आने का नाम है कुछ सच्ची कुछ झूठी.


Wednesday, 25 June 2014

बच्चों के स्नेह, सम्मान ने ले लिया पहला ऑटोग्राफ


बचपन में लगभग नौ-दस वर्ष की उम्र में ही घरवालों, पड़ोसियों, स्कूल वालों, दोस्तों आदि की तरफ से खूब जमकर प्रशंसा पाई थी, जबकि उस समय हमारी स्व-रचित एक कविता दैनिक भास्कर, स्वतंत्र भारत में बच्चों वाले पृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी. उस कविता प्रकाशन पर सभी ने खूब प्रशंसा की थी. हमें खूब सारा आशीर्वाद भी मिला था. उसके बाद पढ़ाई के बोझ ने लेखन क्षमता को पूरी तरह से पनपने न दिया. इस बीच पेंटिंग, स्केचिंग, निर्देशन, फोटोग्राफी आदि सहित अन्य और भी शौक गले लग गए.

स्कूल से निकल कर कॉलेज पहुँचने के क्रम में लिखना लगातार हुआ, भले ही कम रहा हो परन्तु प्रकाशन नहीं हो सका. स्नातक उपाधि के बाद लेखन की तरफ पुनः मुड़ना हुआ. पत्रिकाओं को रचनाएँ भेजने के साथ ही समाचार-पत्रों में पत्र कॉलम में नियमित रूप से लिखना शुरू किया. पत्रिकाओं में सीमित प्रकाशन स्थान मिलता किन्तु समाचार-पत्रों ने प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया. अमर उजाला ने तो हमारे बहुत सारे पत्रों का प्रकाशन ख़ास ख़त कॉलम के अंतर्गत भी किया. इन पत्रों को पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित भी करवाया जा चुका है.  

अमर उजाला के साथ-साथ दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, आज, राष्ट्रीय सहारा आदि में भी नियमित प्रकाशन होने लगा. जनपद जालौन में हमको हमारी पारिवारिक पृष्ठभूमि से इतर हमारे दो कार्यों ने हमारी पहचान की आधारभूमि निर्मित की. इनमें एक तो पत्र कॉलम में नियमित पत्रों का प्रकाशन और दूसरा कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम का तब आरम्भ करना जबकि इस दिशा में किसी भी तरह का कार्य जनपद में नहीं हो रहा था. फिलहाल तो अपनी मूल बात से न भटकते हुए आपको अपनी उस ख़ुशी की तरफ ले चलते हैं जो हमें हमारे प्रशंसकों से प्राप्त हुई.

नेहरू युवा केंद्र की ओर से राष्ट्रीय पुनर्निर्माण वाहिनी परियोजना जिले में संचालित हो रही थी. परियोजना समन्वयक प्रवीण सिंह जादौन छोटे भाई के मित्र हैं और हमारे लिए भी छोटे भाई के समान ही हैं. सामाजिक कार्यों से जुड़े होने के कारण हमको भी परियोजना की एक समिति का सदस्य मनोनीत किया गया था. सौ स्वयंसेवकों का दस दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम उरई से लगभग सात-आठ किमी दूर बोहदपुरा गाँव के राजकीय प्रशिक्षण संस्थान में चल रहा था. वहां के कार्यक्रम के सञ्चालन, स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित करने की, उनको विविध विषयों पर जानकारी देने जिम्मेवारी हमें भी दी गई थी.

शिविर के दस दिनों तक स्वयंसेवकों के साथ रहने से उनके साथ आत्मीय सम्बन्ध बन गए थे. दस दिनों तक सञ्चालन करने, कई विषयों पर जानकारी देने के कारण बहुत से स्वयंसेवक काफी करीब से जुड़ गए थे. आये दिन किसी न किसी विषय पर वे अलग से मिलकर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान चाहते. वो शिविर का अंतिम दिन था. परम्परानुसार समापन समारोह हुआ. समापन समारोह के बाद लोगों को अपने-अपने क्षेत्र में कार्य करने जाना था. स्पष्ट था कि अब सभी का इस तरह से एकसाथ मिलना शायद ही कभी-कभी हो पाए. स्वयंसेवक, अधिकारीजन, अतिथिजन एक-दूसरे से मिलते हुए चलने की तैयारी में थे. 

हम भी सबसे मिलते हुए चलने की तैयारी किये थे. उसी समय चार-पाँच लड़के-लड़कियों का एक समूह आया. लड़कियों ने सम्मानपूर्वक नमस्कार किया और लड़कों ने एकदम से पैर छू लिए. इस तरह के कृत्य का अंदाजा न होने के कारण हम खुद एकदम से हड़बड़ा गए. कुछ बातचीत हो पाती इससे पहले ही उन सभी बच्चों ने अपनी-अपनी डायरी हमारे सामने करके ऑटोग्राफ की माँग कर दी. हमने पहले तो हँसकर उन बच्चों को टालने की कोशिश की. उनको समझाया कि हम ऐसे व्यक्ति या व्यक्तित्त्व नहीं कि हमारे ऑटोग्राफ लिए जाएँ. उन बच्चों ने बड़ी ही शालीनता से, सम्मान से हमारे लेखन, समाचार-पत्रों में हमारे पत्र प्रकाशन का हवाला देते हुए उनसे बहुत कुछ सीखने की बात कही. विगत दस दिनों में हमारे सञ्चालन, विषयों पर दिए गए प्रस्तुतिकरण से प्रभावित होना बताया.

अपने प्रति उनका स्नेह, सम्मान देखकर मन बहुत प्रसन्न हुआ. बच्चों में उत्साह दिख रहा था हमारा ऑटोग्राफ लेते समय और उन सभी बच्चों को अपने जीवन का पहला ऑटोग्राफ देते समय हमें भी खुद में रोमांच हो रहा था. अपने आपको किसी विशिष्ट व्यक्तित्व से कम न समझते हुए लगा कि अभी तक पत्र कॉलम में जो भी लिखा-छपा वो निरर्थक नहीं गया. विचारों की शक्ति सामाजिक परिवर्तन करती है, मानसिक परिवर्तन करती है. हमारे विचारों से उन बच्चों ने क्या सीखा ये तो वही जानें मगर अपने लिए उनके मन में सम्मान की भावना देखकर सुखद अनुभूति हुई.


Tuesday, 10 June 2014

कुछ सच्ची कुछ झूठी के आवरण में


अपने बारे में कुछ लिखने का, अपने बारे में सबको बताने का विचार बहुत दिनों से या कहें कि बहुत वर्षों से मन में था पर अभी इस उम्र में ही अपने बारे में कुछ लिखने-कहने के बारे में सोचा नहीं था. कई-कई जीवनियों, कई-कई संस्मरणों, कई-कई महानुभावों को पढ़ने के दौरान मन कहता था कि कभी लोग हमारे बारे में भी ऐसे ही पढ़ेंगे. हमारे बारे में भी ऐसे ही चर्चा करेंगे. यह भी सोचा करते थे कि जब हम अपनी कहानी लिखेंगे तो उसको किस शीर्षक के भीतर समेटेंगे? जब हमारी बात किसी पुस्तक के रूप में सामने आएगी तो लोगों के सामने उसे किस नाम से लायेंगे? जितनी बड़ी समस्या अपने बारे में लिखने-बताने की थी, उससे कहीं बड़ी समस्या पुस्तक के शीर्षक को लेकर थी. 

समस्या का समाधान कोई और कर भी नहीं सकता था क्योंकि समस्या किसी के सामने प्रकट भी नहीं की गई थी. यार-दोस्तों के बीच रखी भी नहीं थी. ऐसे में हमारी ही समस्या और हमारा ही समाधान जैसी बात होने के कारण उसका समाधान हमें ही निकालना था. समस्या का समाधान यह निकला कि जब आत्मकथा लिखी जाएगी, जब अपनी कहानी कही जाएगी तो उसका नामकरण उसी समय कर दिया जायेगा. अपनी कहानी लिखना भविष्य का प्रोजेक्ट था, सो उसका नामकरण भी भविष्य के गर्भ में डाल दिया गया. 

समय बदलता रहा, परिस्थितियाँ बदलती रहीं, उम्र बदलती रही, हम बदलते रहे और इस अदला-बदला में विचार भी बदलते रहे. उम्र के तीन दशकों की यात्रा के बाद सोचा कि अब कुछ लिखा जाये पर लगा कि अभी कुछ ज्यादा ही जल्दी हो जाएगी. इतनी जल्दी भी लोगों का सिर नहीं खाना चाहिए. लोगों को पकाना नहीं चाहिए. इसके बाद एक दशक के इंतजार के बाद इस पड़ाव पर आकर सोचा कि अब न देर है और न ही जल्दी. अब कुछ लिखा जा सकता है. लोगों को अपने बारे में बताया जा सकता है. 

क्या लिखा जाये? क्या बताया जाये? क्यों बताया जाये? कैसे बताया जाये? कितना बताया जाये? इस तरह के न जाने कितने प्रश्नों ने अपना सिर उठाया. एक पल में चार दशकों की यात्रा आँखों के सामने से घूम गई. बहुत कुछ सुखद, बहुत कुछ दुखद, कितना अपनापन, कितना बेगानापन, कितनी सफलताएँ, कितनी असफलताएँ, कितने आरोप, कितने प्रत्यारोप, कितनों का मिलना, कितनों का बिछड़ना, क्या-क्या सीखना, क्या-क्या सिखाना, क्या-क्या बनाना, क्या-क्या बिगाड़ना, क्या-क्या हासिल हुआ, क्या-क्या खो दिया, कितना लाभ, कितनी हानि आदि का हिसाब-किताब दिमागी कैल्क्यूलेटर पर होने लगा.

क्यों? क्या? कैसे? किसको? आदि ने डराया भी. बहुत से नकाब उतरने का संकट दिखाई दिया. खुद अपने को भी कमजोर देखा. अपनों की टूटन दिखाई देने लगी. विचार काँपे. हाथ काँपे. कलम ने चलने को मना किया पर वर्षों की मनोच्छा को पूरा करना था, सो हिम्मत बांधी. विचारों को थाम विचारों को ही टटोला. शीर्षक के बहाने एक आवरण खोज निकाला और फिर कुछ सच्ची कुछ झूठी कहने बैठ गए.

Sunday, 25 May 2014

प्रेम में प्रेम भरे सवाल

बात आत्मकथा की हो और वो भी इतनी जल्दी तो बहुत से लोगों में किसी और विषय की अपेक्षा यह जानने की इच्छा होती है कि क्या प्रेम कहानी/कहानियों के बारे में लिखा जायेगालोगों को विश्वास रहता है कि हम जैसे लोगों की एक प्रेम कहानी नहींकई प्रेम कहानियाँ होंगी. जिसे-जिसे भी पता चला कि हम आत्मकथा लिख रहे हैं तो उनमें से बहुतों ने एक-दो सवाल निश्चित किये. अपनी प्रेम कहानियाँ लिखोगेकिस-किस के बारे में लिखोगेसमझ नहीं आता कि यहाँ तो लोगों की एक प्रेम कहानी में ही लाखों सवाल खड़े हो जाते हैं और लोग हैं कि हमसे अपेक्षा कर रहे प्रेम कहानियों की. लोगों को आखिर इतना विश्वास कैसे कि हमारी कोई प्रेम कहानी होगी ही या फिर प्रेम कहानियाँ होंगी हीक्या सिर्फ चेहरे के आधार परफिर विचार किया लोगों की बातों पर तो लगा कि क्या वाकई सभी लोगों को कभी न कभीकिसी न किसी से प्यार होता होगाक्या सभी ने अपने जीवन में किसी न किसी से प्रेम किया होगाजी हाँवही प्रेमवही प्यार जो आप लोग समझ रहे हैं. विषमलिंगियों वाला प्रेमप्रेमी-प्रेमिकाओं वाला प्रेमसाथ जीने-मरने की कसमें खाने वाला प्रेमदिलों की धड़कनें बढ़ाने वाला प्रेमदिन-रात जगाने वाला प्रेम. 

फ़िलहाल औरों की बात औरों पर छोड़ देते हैं पर कुछ बिन्दु तो चर्चा के लिए उछाल ही देते हैंसबके बीच. क्या किसी व्यक्ति को किसी एक व्यक्ति से प्रेम हो जाने के बाद किसी दूसरे से प्यार नहीं होताक्या प्रेमी-प्रेमिका के आपस में विवाह करने के बाद उन्हें किसी और से प्यार नहीं होताक्या एक से अधिक लोगों से प्यार करना असामाजिक हैक्या प्यार की परिणति विवाह होना चाहिएयदि विवाह न हो सके तो क्या रो-रोकर मर जाना चाहिएआखिर प्यार का रूप-स्वरूप क्या है?

वैसे इतना यकीन है कि इतने सारे प्रश्नवाचक चिन्ह देखकर आप लोगों को हमारी प्रेम कहानी/कहानियाँ सुनने-पढ़ने की इच्छा तो मरने सी लगी होगी. ये सोच कर कि पता नहीं आने वाले किस्सों में और कितने प्रश्नवाचक हों. खैरवैसे सही बात यह है कि हमने भी प्रेम कियाखूब कियाजी भर कर किया. बचपन से लेकर अभी तक प्रेम ही प्रेमप्यार ही प्यार. जी हाँजी हाँलड़कियों से ही किया. अब आप कहोगे कि इतना सारा प्यारइतनी सारी लड़कियों से प्यारतो इसका जवाब भी हाँ ही है हमारी तरफ से क्योंकि हमारी नजर में प्रेम वो पवित्र अवधारणा है जो तन से नहीं मन से संचालित होती है. हमारे लिए प्यार शारीरिकता पर नहीं वरन आत्मिकता की आधारभूमि का निर्माण करता है. हमारे लिए प्यार का अर्थ विश्वास हैअविश्वास नहीं. हमारे लिए प्रेम पहली नजर का नहीं वरन गंभीरता का भावबोध है. हमारी नजर में प्रेम का उत्कर्ष वैवाहिक बंधन नहीं वरन सम्बन्ध निर्वहन की जिम्मेवारी है.

अक्सर ऐसी अवधारणा ने बहुत सी नज़रों में हमें अपराधी बनाया है. बहुतेरे लोगों के लिए आज भी प्रेम एक ऐसा विषय है जो बस एक से होकर समाप्त हो जाता है. यह समाप्ति या तो उनके मिलन पर होती है अथवा उनके बिछड़ने पर. संभवतः यह प्रेम का एकाकी स्वरूप है. आखिर प्रेम को किसी एक बिंदु पर ही कैसे बांधा जा सकता हैआखिर कैसे संभव है कि प्रेम से ओतप्रोत एक दिल प्रेम की बारिश न करेएक के अलावा किसी और को प्रेम-रस से सराबोर न करेअसल में समाज में बहुतेरे लोगों में अभी भी प्रेमसौन्दर्यआकर्षण जैसे शब्दों के वास्तविक सन्दर्भ ही ज्ञात नहीं हैं. उनके लिए प्रेम पहली नजर से शुरू होकर देह के मिलन पर ठहर जाने की प्रक्रिया मात्र है. ऐसे लोगों के लिए प्रेम एकाकी भाव को उत्पन्न करता है. यहाँ समझना होगा कि प्रेम और विश्वास का अपना अंतर्संबंध है. प्रेम के साथ विश्वास का होना प्रेम की गंभीरता कोउसके एहसास को और विराट बना देता है. आखिर इसी देश में राधा-कृष्ण का मीरा-कृष्ण का प्रेम ऐसे ही पावन-पूज्य नहीं है. 

अच्छाये बहुत दार्शनिक सा नहीं लगने लगाऐसा लग रहा होगा आपमें से बहुत से लोगों को क्योंकि आज प्रेम क्षणिक आवेग का नाम बनता जा रहा है. आज प्यार का अर्थ पहली नजर से लगाया जाने लगा है. आज प्यार को दैहिक आकर्षण के आसपास केन्द्रित कर दिया गया है. प्रेम की पावन-पूज्य अवधारणा के आधार पर हमारे प्रेम के किस्से भी हैंसिर्फ दर्शन नहीं है. मगर उसके लिए इंतजार करिए. समूची प्रेम कहानियों के लिए एक संकलन अलग से तैयार करना होगा. यहाँ अभी तो इक्का-दुक्काइखरी-बिखरी ही. हाँउन लड़कियों को डरनेघबराने की जरूरत नहीं जिनको हमसे प्यार हुआ या जिनसे हमें प्रेम हुआ या फिर हम-उनको जिन्हें आपस में प्यार हुआ. आखिर कलह से बचने-बचाने का ही तो नाम है कुछ सच्ची कुछ झूठी.



Friday, 23 May 2014

लिख ही दी जाए कुछ सच्ची कुछ झूठी

कुछ अलग हट के लिखने की सोच रहे थे और कई-कई मुद्दों पर दिमाग जाने के बाद भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या लिखा जाये. क्या-क्या और किस-किस पर नहीं लिखा अपने ब्लॉग की तमाम सारी पोस्ट में. अपने ब्लॉग के द्वारा विभिन्न मुद्दों पर लिखाबहुत से लोगों का स्नेह मिलाबहुत से लोगों का कोप भी सहाकुछ लोग जुड़ते चले गएकुछ लोग जुड़-जुड़ कर भी दूर होते गए. ऐसे में लगा कि कुछ अपनी इस यात्रा के बारे में ही लिखाबताया जाए. इसमें भी मन नहीं भरा क्योंकि इस बारे में पहले भी लिख चुके हैं. फिर लगा कि इस पोस्ट में विशुद्ध अपने बारे में ही कुछ लिखा जाये क्योंकि अपने ऊपर ही कुछ नहीं लिखा अभी तक. (दूसरा तो कोई वैसे ही हम पर लिखने से रहा)  इधर बहुत समय से खुद पर लिखने के लिए कुछ सोचा भी जा रहा हैवो भी आत्मकथा के रूप में. 

जिंदगी के चार दशक कम नहीं होते हैं अपने बारे में कुछ लिखने के लिए और यही सोचकर आत्मकथा लिखना शुरू भी कर दिया है. हाँआत्मकथा लिखना है तो नाम भी रखना पड़ेगासो कुछ सच्ची कुछ झूठी नाम भी सोच लिया है. कुछ मित्रों को इस नाम पर कुछ झूठी’ शब्द पर आपत्ति हुई, हो सकता है कि उनकी आपत्ति सही हो किन्तु हमारी दृष्टि में आत्मकथा खुद की कहानी लिखने से ज्यादा खुद के द्वारा जीवन के समझने कोलोगों को देखने-परखने कोअपने प्रति लोगों के नजरिये कोअपने साथ गुजरे तमाम पलों के अनुभवों को समेटने-सहेजने का माध्यम मात्र है. इसमें सच तो सच के रूप में है ही किन्तु कुछ ऐसे सचजिसके सामने आने से दूसरों की सामाजिकतादूसरों के व्यक्तिगत जीवनदूसरों की गोपनीयता पर किसी तरह का संकट आता होकिसी की मर्यादाकिसी का सम्मानकिसी के आदर्शों को ठेस पहुँचती होको कुछ कल्पनाशीलता का आवरण ओढ़ा कर पेश किया जायेगा. हमारे लिए यही कुछ झूठी’ साथ रहेगा किन्तु सत्य के साथ.

दरअसल हमने अपने जीवन में बहुत कुछ देखाबहुत कुछ सहा है. बहुत कुछ अनुभव इस तरह के हैं जिन्होंने समय से पूर्व हमें बड़ा बना दिया. सुख की बारिश को देखा है तो दुखों की तपती धूप भी सही हैगैरों का साथ पाया है तो अपनों को बेगाने होते भी देखा हैसमाज के कठोर धरातल पर खुद को खड़ा किया है तो ठोकर खाकर खुद को संभाला भी है. बनते-बिगड़ते कार्यों सेखट्टे-मीठे अनुभवों सेबचपन-युवावस्था सेघर-बाहर सेदूसरों से-अपने आपसेसुख-दुःख से बहुत-बहुत कुछ सीखा है. हताशानिराशानकारात्मकता को कभी भी खुद पर हावी नहीं होने दिया है. जीवन को खुशनुमा बनाये रखे का हमने एक मूलमंत्र बना रखा है कि भूतकाल से सीखकर वर्तमान को सुधारोभविष्य कैसा होगा ये किसी को नहीं पता है.’ और यही कारण है कि हँसना, खूब खुलकर हँसना हमारी आदत में हैहर फ़िक्र को धुंए में उड़ाना हमारी फितरत में है (सिगरेट वाला धुआँ नहीं)मौज-मस्तीयारी-दोस्ती निभाना हमारी दिनचर्या में हैअपने लिए नहीं दूसरों के लिए जीना हमारी जीवनशैली में हैबेधड़क होकरनिडर होकरबेख़ौफ़ होकर जीना हमारी विरासत में है. और ये उसी स्थिति में संभव है जबकि आपके साथ आपके अपने तो हों हीगैर भी आपके अपनों जैसे लगते हों और यही हमारी सम्पदा हैहमारी पूँजी है. हमारा पूरा परिवार तो हमारे साथ है हीहमारे मित्रहमारे सहयोगी भी हमारे अपने हैं और इस पूँजी के दम पर ही कभी हसरत थी आसमां छूने कीअब तमन्ना है आसमां के पार जाने की को अपना दर्शन बना रखा है.