Wednesday, 18 April 2018

प्रतिद्वंद्विता ज़िन्दगी के साथ


चाह कर भी अपने स्वभाव में कभी गंभीरता नहीं ला सके. जो पल अभी है, वही ज़िन्दगी है का फलसफा अपनाते हुए अपनी जीवन-यात्रा पर आगे बढ़ते रहे.इसका अर्थ ये नहीं कि हमारे द्वारा किसी कार्य को करने में, जिम्मेवारी का निर्वहन करने में, अपने उद्देश्य को पूरा करने में किसी तरफ की कोताही दिखाई जाती है. यह सब पूरी लगन और निष्ठा के साथ किया जाता है, पर हँसी-माजक के साथ, माहौल को हल्का-फुल्का बनाते हुए. पता नहीं क्यों गंभीर मुद्रा, हाव-भाव का लबादा ओढ़े, चेहरे पर जानबूझकर कठोरता चढ़ाये, होंठों को इतनी बुरी तरह कसे कि मुस्कान धोखे से ही न फिसल जाये, ऐसे लोग कभी नहीं सुहाए. ऐसी गंभीरता वाली मुद्रा को कभी भी वरीयता नहीं दी और अपनी ज़िन्दगी का वर्तमान पूरी मौज-मस्ती के साथ जीते रहे. 

हमने ज़िन्दगी को जितना गंभीरतारहित होकर, अल्हड़ता से, मौज-मस्ती के अंदाज में जीना चाहा, ज़िन्दगी उतनी ही गंभीरता से हमारा परीक्षण करती रही. कह सकते हैं कि हम उसके प्रति गंभीर नहीं रहे और वह भी हमारे प्रति गंभीर नहीं रही. हम दोनों एक-दूसरे के साथ खेलते रहे, एक-दूसरे के होकर भी एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बने रहे. यह प्रतिद्वंद्विता पढ़ाई में, सामाजिक जीवन में, पारिवारिक जीवन में, रोजगार में, अपने उद्देश्यों में बराबर देखने को मिलती रही.

यही कारण है कि शिक्षा की नींव किसी और विषय से भरी गई और उस पर इमारत किसी और विषय की बन गई. जब अवसर आया उसे सजाने का तो रंग-रोगन किसी और विषय का हो गया. विज्ञान स्नातक के दौरान ही सिविल सेवा में जाने का कीड़ा कुलबुलाया. इससे पहले कि यह कीड़ा पूरी तरह से काट पाता एमबीए और एमसीए के चुनाव में लोगों की सलाह के बीच झूलते रहे. व्यवसाय प्रबंधन और कंप्यूटर के चयन के बीच स्नातक के बाद परास्नातक में प्रवेश लेने की यात्रा कब अंग्रेजी से राजनीति विज्ञान, राजनीति विज्ञान से अर्थशास्त्र में पहुँचकर थमी, पता नहीं चला.

इधर-उधर हाथ-पैर मारे जाते रहे. कतिपय कारण ऐसे बने कि एमबीए की तरफ तो बढ़ ही न सके, इन्हीं कारणों से पत्रकारिता का कोर्स भी छोड़ना पड़ा. पता नहीं उरई हमारे भीतर बसा था या उरई को हमारी आवश्यकता थी. न हम यहाँ से निकल पाए और न उसने हमें यहाँ से जाने दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि ग्वालियर स्नातक के लिए जाने के बाद भी उरई वापस आना हुआ. उसके बाद दो बार नौकरी एवं अन्य कार्यों के चलते बाहर जाना पड़ा किन्तु चंद दिनों बाद ही खुद को उरई में ही पाया.

इस जाने-आने के क्रम में, डिग्रियाँ बटोरने के क्रम में चार विषय से परास्नातक हो गए. कई जगह के साक्षात्कार हो गए. नौकरी करते-छोड़ते रहे. पत्रकारिता में भी हाथ-पैर चलाते रहे. लेखन में जुटे रहे. इन सबके बीच सिविल सेवा का कीड़ा कुलबुलाने के साथ काटने भी लगा. उरई के अल्प-संसाधनों के बीच अपनी जगह तलाशते हुए उस तरफ बढ़ लिए. तैयारी जितनी आगे बढ़ती, तमाम सामग्री की अनुपलब्धता में वापस धकेल देती. समस्याओं और परेशानियों को महसूस तो कर पा रहे थे किन्तु उनका समाधान हम खुद निकाल पाने में असमर्थ लग रहे रहे थे. कभी खुद को आर्थिक आधार की तलाश में खड़ा पाते तो कभी इसे समय की बर्बादी समझ फिर से अपनी तैयारी में घुस जाते. आर्थिक आधार की अनुपलब्धता ने जिन्दगी के उन सारे सपनों पर भी अंकुश लगा रखा था जिसे एक युवा दिल देखता है, सजाता है. ज़िन्दगी के लिए, ज़िन्दगी से बड़े सपने सजाये जाते मगर उन्हें धरालत पर उतारने से पहले जब वास्तविकता की कसौटी पर कसते तो सारे सपने बिखर जाते.

बिखरे सपनों के साथ ख़ामोशी से, ऊहापोह की इस अवस्था में खुद को खुद के लिए खड़ा करना था. हम चाह कुछ रहे थे पर समय हमसे कुछ और चाह रहा था. हम ज़िन्दगी को आज में जीने की चाहत लिए कल का सपना बुन रहे थे और ज़िन्दगी हमें आज ही हमारी हकीकत दिखाकर हमारे सपनों को बस सपना बनाने को तुली थी. सिविल सेवा के अलावा किसी और नौकरी के लिए सोचा ही नहीं. ऐसे में जबकि लगने लगा कि हमारा इसके लिए चयन हो पाना मुश्किल है तो जो लक्ष्य सोचा था, उसकी तरफ दूसरे रास्ते से बढ़ने का विचार किया. जीवन का अंतिम लक्ष्य राजनीति को बना रखा था. सिविल सेवा एक तरह का वो अनुभव प्राप्त करना था, जिसके आधार पर राजनीति में काम करना और आसान हो जाता.

अब जबकि सिविल सेवा का विचार लगभग त्याज्य सा हो गया तो सामाजिक कार्यों को पूरी वरीयता के साथ समय देना आरम्भ किया. हालाँकि सामाजिक कार्यों में हमारी खुद की सहभागिता सन 1996 से ही होने लगी थी तथापि तब यह शौकिया कार्य के लिए, स्वानुभूति के लिए, आत्म-संतुष्टि के लिए किया जा रहा था. अब सबकुछ भूल, सबकुछ छोड़ सामाजिक कार्यों में खुद को लगा दिया. कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम का आरम्भ कर दिया. खूब काम किया जाता, जनपद जालौन भर में भागदौड़ की जाती. एकमात्र कार्य कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम किया जा रहा था. सामाजिक कार्यों का सञ्चालन विशुद्ध सामाजिक सेवा की दृष्टि से किया जा रहा था. इसके द्वारा न तो धन कमाने की चाह थी, न समाजसेवा को रोजगार में बदलने की मंशा थी. इस कारण सामाजिक कार्यों के साथ खुद को आर्थिक स्तर पर खड़ा करने का प्रयास भी होता रहता.

मनपसंद काम पूरे मन से हो रहा था. लोगों का आशीर्वाद मिल रहा था. काम करने की संतुष्टि मिल रही थी. उसी समय समय ने फिर करवट ली. ज़िन्दगी फिर प्रतिद्वंद्वी बनकर सामने आ गई. दो पैरों से स्वतंत्र रूप से चलती ज़िन्दगी कृत्रिम आधार के सहारे आगे बढ़ने लगी. भागदौड़ में अंकुश लग गया. कार्य की तीव्रता में अवरोध आ गया. जनपद और जनपद के बाहर की सीमाओं को नापते कदम ठहर से गए मगर आत्मविश्वास कम न हुआ, कार्य-क्षमता प्रभावित नहीं हुई, उद्देश्यों से डिगना नहीं हुआ.

बदलाव बहुत बड़ा हुआ मगर हमारा स्वभाव न बदला. गंभीरता अभी भी न आई. हँसी-मजाक अभी भी अपनी उसी अवस्था में है. ज़िदगी का फलसफा अभी भी वही है. ज़िन्दगी और हम आज भी, अभी भी एक-दूसरे को जाँचने में लगे हैं. एक-दूसरे से प्रतिद्वंद्विता करने में लगे हैं. देखिये, आगे होता क्या है? जीत-हार का समीकरण क्या होता है?



Monday, 9 April 2018

नींव का आधार बना हमारा स्कूल


किसी भी व्यक्ति के जीवन में जन्मने के बाद महत्त्वपूर्ण दिन होता है उसका पहले दिन स्कूल जाना. लगभग सभी के लिए पहला स्कूली दिन बहुत ही ख़ास होता है. एक जैसी होते हुए भी सबकी अलग-अलग सी कहानी रहती है. वैसे देखा जाये तो स्कूल भी अपने आपमें एक अजब सा स्थान होता है, बच्चों के लिए. किसी के लिए दहशत भरा, किसी के लिए कौतुहल भरा, किसी के लिए खेल का स्थान, किसी के लिए बोझिल सा. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक शैक्षिक संस्थान को बहुत सहजता से आत्मसात करते रहे. बहरहाल, हम भी स्कूल गए, गए क्या, भेजे गए. समय से ही स्कूल भेजे गए.

हमारा पहला स्कूली दिन बहुत ही रोचक स्थिति में गुजरा. स्कूल का नाम याद नहीं पर शायद राधाकृष्ण जूनियर हाई स्कूल या फिर कुछ इसी तरह का नाम था. पहले दिन स्कूल जाना हुआ एक आया माँ के साथ. स्कूल पहुँचने के बाद कितना समय स्कूल में बिताया, ये भी सही से याद नहीं पर इतना याद है कि कुछ समय बाद हमें स्कूल में अच्छा नहीं लगा. बंद-बंद सा माहौल, छोटे-छोटे से कमरे. आज के भव्य स्कूलों, सजावटी इमारतों से इतर साधारण सा, किसी पुराने मकान में चलता स्कूल. जब तक वे आया माँ दिखती रहीं, तब तक तो हम स्कूल में जमे रहने की कोशिश करते रहे. उनके कुछ देर बाद न दिखने की स्थिति में स्कूल हमें अच्छा सा न लगा. हमने घर जाने की जिद मचाई तो बताया गया कि आया माँ किसी काम से स्कूल से चली गईं हैं, उनके आते ही घर भिजवा दिया जायेगा.

जिद से ज्यादा जिद्दी होने का स्वभाव बचपन से ही रहा है, आज भी है. शायद उसी जिद के साथ-साथ रोना, चिल्लाना बहुत ज्यादा ही रहा होगा तभी स्कूल प्रबंधन ने एक शिक्षक के साथ हमें घर वापसी की राह दिखाई. घर का पता किसी को मालूम नहीं था. आया माँ स्कूल में नहीं. हमने पूरे विश्वास के साथ कहा कि हमें घर का रास्ता पता है. बस फिर क्या था, अपने विश्वास के बलबूते शिक्षक के साथ घर को चल दिए. हम अपने पहले ही दिन अपनी याददाश्त, अपने विश्वास के सहारे वापस घर तक लौट आये. उस स्कूल में हमारा पहला दिन, उस स्कूल का आखिरी दिन भी साबित हुआ.

आज भी अम्मा जी उस दिन को याद कर बताती हैं कि वे शिक्षक और हमारे घर वाले हैरान थे कि उस अत्यंत छोटी सी उम्र में हमें स्कूल से घर तक की रास्ता कैसे याद रही? हैरानी आपको भी हो रही होगी मगर सच ये है कि आज भी ये प्राकृतिक शक्ति हममें विद्यमान है कि किसी रास्ते से एक बार गुजर जाएँ, किसी भी व्यक्ति से एक बार मिल लें फिर वह हमारे दिमाग में बस जाता है.

पहले स्कूल का पहला दिन तो जाने और आने के साथ ही समाप्त हो गया था. उसके बाद तो ये भी याद नहीं कि दूसरे स्कूल में जाना कितने दिन बाद हुआ था. उम्र का एक लम्बा समय गुजरने के कारण उपजी याददाश्त-दोष वाली इस स्थिति के बाद भी पहले स्कूल का पहला दिन अभी तक याद है तो दूसरे नए स्कूल का पहला दिन भी अभी तक बहुत अच्छे से याद है. तैयार होकर, तेल-फुलेल के साथ अपने बच्चा चाचा के साथ स्कूल पहुँचे. चाचाओं में दूसरे नंबर के बच्चा चाचा, हम सभी बच्चों के अत्यंत प्रिय चाचा हैं. हाँ तो, अपने नए स्कूल के पहले दिन हम अपने इन्हीं बच्चा चाचा के साथ स्कूल के लिए चल पड़े. स्कूल पहुँचे तो हम सारे जरूरी साजो-सामान से सुसज्जित थे, बस कमी थी तो हमारे टिफिन बॉक्स की. इसी को ध्यान में रखते हुए ही हमारे लिए टिफिन सजाया जाना था. सो चाचा जी हमें स्कूल में छोड़कर खुद बाजार को निकल गए.

स्कूल में हमारा समय सही से बीत रहा था. पहले वाले स्कूल के मुकाबले खूब खुला-खुला. प्यार-दुलार देती दीदियाँ. कक्षा के गिने-चुने विद्यार्थियों के बीच पहले ही दिन छा जाना, आज भी याद है. कुछ देर बाद कक्षा में आकर हमारा नाम पुकारा गया. उस तरफ देखा तो आया माँ अपने हाथ में एक नया टिफिन बॉक्स लिए खड़ी हैं और स्कूल के बाहर चाचा जी हमारी कक्षा की तरफ निहारते खड़े हुए थे. लाल-सफ़ेद रंग का गोल टिफिन, जो कई वर्षों तक हमारे लिए अपनी सेवाएँ देने के बाद घर के अन्य कामों में प्रयोग होने लगा. भोजनावकाश के समय अपने टिफिन बॉक्स को खोला तो जैसा कि आपको बताया था उसमें बिस्किट, टॉफी हमारे स्वागत में तत्पर थे. घर के सभी लोगों से, अम्मा से सुना है कि हमने भोजन बहुत देर से, लगभग छह-सात वर्ष की उम्र से करना शुरू किया था. तब तक दूध, बिस्किट, दालमोंठ और बाकी चट्ठा-मिट्ठा से काम चलाया जाता था, अपनी भूख मिटाने को. टिफिन बॉक्स में अपना मनपसंद भोजन देख मन और अधिक प्रसन्न हो गया और हम स्कूल का पहला दिन पूरा समय बिताकर ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट आये.

पं० उमादत्त मिश्र बालिका विद्यालय के नाम से आरम्भ वह स्कूल वर्तमान में भी पं० उमादत्त मिश्र जूनियर हाई स्कूल के नाम से संचालित है. उस समय छोटा सा वह स्कूल अपने आसपास खेलने का मैदान भी समेटे हुआ था, जो अब कुछ हद तक सिकुड़ सा गया है. शिक्षिकाएँ, जिन्हें हम दीदी कहकर पुकारते थे और प्रधानाचार्या को बड़ी दीदी. सभी का स्नेह, प्यार, दुलार, आशीर्वाद तब भी मिला, आज भी मिल रहा है. बड़ी दीदी के रूप में मधु दीदी के साथ शीला दीदी, सुमन दीदी, सरोजनी दीदी, रेखा दीदी, स्नेहलता दीदी और इनके साथ-साथ शुक्ला आचार्य जी और प्रह्लाद आचार्य जी आदि ने हमारी नींव को भली-भांति तैयार किया. इस नींव की सुरक्षा का दायित्व बहुत दिनों तक शीला आया माँ ने उठाया. बाद में हमारे दोनों छोटे भाइयों का प्रवेश भी उसी स्कूल में करवाया गया. जिनकी सुरक्षा का दायित्व हीरा आया माँ के जिम्मे किया गया.

आज भी उस स्कूल के प्रति आकर्षण बना हुआ है. उस स्कूल के शिक्षक, आया माँ, साथी बराबर याद आते हैं, स्मृति में बसे हुए हैं. उस समय के कुछ लोग आज भी साथ हैं. आये दिन उनसे मुलाकात होती रहती है. उस समय को याद करते हैं तो घर-परिवार जैसी अनुभूति होती है, जो आज के स्कूलों में देखने को नहीं मिल रही है.

Monday, 19 March 2018

बड़ों के आशीर्वाद से उपाधियों का बढ़ता परिवार


व्यक्ति के शैक्षणिक विकास में उसके माता-पिता, गुरुजनों का विशेष आशीर्वाद रहता है. माँ सरस्वती की अनुकम्पा हमारे ऊपर ऐसी रही कि शिक्षा प्राप्ति के किसी भी चरण में समस्या का सामना नहीं करना पड़ा. अपने लम्बे सामाजिक और अध्यापन सम्बन्धी अनुभव में देखने को मिला कि शोध कार्य में शोधार्थियों को अनेकानेक समस्याओं, विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है. इसे हमारे ऊपर बड़ों का, गुरुजनों का आशीर्वाद ही कहा जायेगा कि एक नहीं दो-दो पी-एच०डी० करने पर भी एक पल को परेशानियों, समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ा.

हम कुछ और विचार किये थे अपने लिए पर समय ने हमारे लिए कुछ और ही तय कर रखा था. 1998 में हिन्दी साहित्य में एम०ए० की एक और डिग्री अपने नाम के साथ जोड़ ली. अगले ही वर्ष गुरुकृपा से वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन विषय पर शोध-कार्य की रूपरेखा तैयार मिली. इसके साथ ही आदेश मिला उसको तुरंत विश्वविद्यालय में पंजीकृत करवाने का. हम जिस क्षेत्र में जाने से लगातार बच रहे थे, समय हमें उसी तरफ धकेलने में लगा था. पितातुल्य ब्रजेश अंकल और हिन्दी के प्रकाण्ड विद्वान डॉ० दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव जी के विशेष स्नेह से इतनी छूट मिल गई कि अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी से जब समय मिले तब शोध-कार्य पूरा कर लिया जायेगा.

समय ने करवट बदली और सन 2002 में यूजीसी की तरफ से 31 दिसम्बर 2002 तक अपनी थीसिस जमा करने वालों को नेट से छूट देने सम्बन्धी संशोधन पारित हुआ. न चाहते हुए भी शुभेच्छुओं के आदेश पर शोध-कार्य में जुटना पड़ा. इस बीच एक व्यक्तिगत समस्या के चलते शोध-कार्य को बंद कर दिया मगर समय ने जो निर्धारित कर दिया था, उसे टालना हमारे लिए संभव न हो सका. सभी के आशीर्वाद, अपनी मेहनत के बाद अंततः नियत समय सीमा में शोध प्रबंध (थीसिस) बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी में जमा हो गई. वर्ष 2004 में अपने नाम के आगे डॉ० लगाने की कामना पूरी हुई. प्रसन्नता इस बात की थी कि अपने जिन विद्वान गुरु जी के निर्देशन में पी-एच०डी० पूरी की वे स्वयं दो विषयों में डी-लिट्० किये थे, हिन्दी साहित्य और भाषा विज्ञान में. इसके साथ ही यह भी गौरव प्राप्त हुआ कि जिस दीक्षांत समारोह में हमें पी-एच०डी० डिग्री प्राप्त हुई, उसमें हम सभी को राष्ट्रपति कलाम साहब का आशीर्वाद मिला.

ख़ुशी के इन क्षणों में एक दुःख अन्दर ही अन्दर सालता रहा कि जिन पितातुल्य पूज्य ब्रजेश अंकल ने हमारी पी-एच०डी० का आधार निर्मित किया, वे हमारे साथ ख़ुशी बाँटने की स्थिति में नहीं थे. पैरालाइसिस के घातक हमले से खुद को उबारकर वे स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे. कुछ भी कहने में असमर्थ उन्होंने अपने हाथों, अपनी भाव-भंगिमा से सदैव की तरह हमें आशीर्वाद दिया और हमारी सफलता पर ख़ुशी प्रकट की.

इसे समयबद्ध पी-एच०डी० का सुफल कहा जायेगा कि दिसम्बर 2005 में हमें गाँधी महाविद्यालय, उरई में मानदेय प्रवक्ता के रूप में अध्यापन कार्य करने का अवसर मिला. यद्यपि आदतन दो बार अध्यापन नौकरी को छोड़ने के बाद भी इसने हमें नहीं छोड़ा. गुरुवर डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी जी के स्नेहिल आदेश पर पुनः-पुनः वापस लौटना पड़ा.

यद्यपि नाम के आगे डॉ० लगाने की तमन्ना पूरी हो चुकी थी तथापि मन में अर्थशास्त्र में शोधकार्य करने का जो बीजारोपण वर्ष 1995 में हुआ था, उसके अंकुरित होने का समय आ गया था. इसे भी किसी शिष्य के लिए गौरवानुभूति का क्षण माना जाना चाहिए कि उसे शिक्षा देने वाला गुरु स्वयं उसको अपने निर्देशन में शोधकार्य करवाने को प्रकट हो जाये. इसे अपने आपमें परमशक्ति से भी बड़ा आशीर्वाद कहा जायेगा जो उस दिन डॉ० शरद जी श्रीवास्तव जी और बड़े भाई समान डॉ० परमात्मा शरण गुप्ता जी ने घर आकर हमें दिया.

अर्थशास्त्र से परास्नातक करने के बाद हमारी विशेष इच्छा थी शरद सर के निर्देशन में पी-एच०डी० करने की. तब उनकी पी-एच०डी० पूरी न होने के कारण हमारी यह इच्छा पूरी न हो सकी थी. अब जबकि वे स्वयं घर आये तो हमने भी पूरी तत्परता दिखाते हुए उनके प्रथम शोधार्थी के रूप में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी में अपना पंजीकरण करवा लिया. बुन्देलखण्ड क्षेत्र के प्रति कार्य करने के विशेष लगाव के चलते जनपद जालौन में कृषि पद्धति का मूल्यांकन को अर्थशास्त्र शोधकार्य का विषय चुना. सामाजिक, पारिवारिक जिम्मेवारियों, अध्यापन सम्बन्धी कार्यों के बीच समय निकाल कर शोध कार्य के नियत पांच वर्षों के अंतिम वर्ष में अर्थशास्त्र में भी थीसिस जमा कर दी. कालांतर में तमाम औपचारिकताओं की समाप्ति पश्चात् एक और डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त हुई.

हमारी दोनों पी-एच०डी० को सफलतम रूप से अंतिम पायदान तक पहुँचाने में विश्वविद्यालय में कार्यरत हमारे मित्र डॉ० राजीव सेंगर श्रीकृष्ण की भांति सदैव सारथी की मुद्रा में नजर आये. किसी भी तरह की समस्या पर वे उसी सहजता से हमारा शोध-कार्य सम्पन्नता की ओर ले गए जैसे कि कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को शत्रु सेना के बीच से निकालकर विजय की ओर ले जाते थे. अर्थशास्त्र की पी-एच०डी० में छोटे भाई हर्षेन्द्र ने विशेष रूप से मेहनत की.

तमाम प्रमाण-पत्रों, अंक-पत्रों से भरी फाइल में एक और उपाधि शामिल हो गई. उपाधियों का परिवार बढ़ गया मगर उसका योगदान किस रूप में बढ़ेगा, ये देखना है.

Monday, 12 March 2018

बन्दूक चलाने का पहला अनुभव

इसे जातिगत असर कहा जाये या फिर आसपास का वातावरण कि बचपन से ही हमें हथिययारों ने बहुत ही लुभाया है. गाँव में भी पुरानी जमींदारी होने के कारण नक्काशीदार तलवारें और अन्य अस्त्र-शस्त्र देखने को मिलते रहते थे. इसके अलावा घर में रिवाल्वर, बन्दूक होने के कारण भी इनके प्रति एक प्रकार की रुचि बनी हुई थी. कभी-कभी बन्दूक और रिवाल्वर चलाने का मन भी होता था. घर में विशेष रूप से दशहरे के पूजन के बाद रिवाल्वर और बन्दूक चलाने का काम पिताजी या चाचाजी के द्वारा होता था. छत पर जब भी दशहरे और दीपावली पर पूजन के बाद बन्दूक, रिवाल्वर चलाने का उपक्रम होता तो हम बस ललचा कर ही रह जाते. इन पर्वों के अलावा कभी खुशी के अवसर पर भी धमाके कर लिए जाते थे पर इनको करने की जिम्मेवारी सिर्फ और सिर्फ पिताजी की होती, हाँ, यदि घर में उस समय चाचा वगैरह हुए तो वे भी इसमें हिस्सा ले लेते थे. 

बात होगी कोई 1990 की जब हम स्नातक के प्रथम वर्ष में थे. ग्वालियर से छुट्टियों में घर आना हुआ. उसी समय हमारे एक पारिवारिक मित्र के घर नवजात शिशु का आगमन हुआ. अवसर हम सभी के लिए खुशी का था. सभी लोग उन्हीं के घर पर उपस्थित थे. जैसा कि तय था, बन्दूक तो चलनी ही थी. हम चिरपरिचित अंदाज में शांत बैठे थे क्योंकि हमें मालूम था कि पिताजी की दृष्टि में हम अभी इतने बड़े नहीं हुए कि बन्दूक चलाने को मिले. मन तो बहुत कर रहा था किन्तु कहते कैसे? चुपचाप बैठे थे कि तभी पिताजी ने आवाज देकर हमें बुलाया.

आराम से उठकर उनके पास तक पहुँचे तो पिताजी ने बन्दूक हमें थमा दी और साथ में कारतूस की पेटी. दोनों चीजें एक साथ देकर पिताजी ने कहा कि तुम चाचा बन गये हो और अब बड़े भी हो गये हो. चलाओ. घर में बन्दूक की सफाई का काम हमारे जिम्मे ही था इस कारण बन्दूक के संचालन का तरीका भी हमें ज्ञात था. अंधा क्या चाहे दो आँखें, हमने हाँ कही तो पिताजी ने इतना कहा कि आराम से, सुरक्षा के साथ चलाना.

मन ही मन प्रसन्नता का अनुभव भी हो रहा था साथ ही एक डर भी लग रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाये. बन्दूक के चलने पर पीछे लगने वाले धक्के के बारे में भी सुन रखा था जिसका भी डर लग रहा था. मन ही मन खुद को हिम्मत बँधाई और खुले में आकर बन्दूक में कारतूस लगा ऊपर कर फायर कर दिया.

एक फायर हुआ, कैसे हुआ यह समझ ही नहीं आया. सब कुछ सही-सही दिखा. बन्दूक का झटका भी उतना नहीं लगा जितना सुन रखा था, इससे भी हिम्मत बँधी. बन्दूक की नाल खोल कर चला हुआ कारतूस बाहर निकाला. दूसरा कारतूस लगाया और किया दूसरा फायर, फिर तीसरा कारतूस डाला और तीसरा फायर. एक के बाद एक तीन फायर करके लगा कि बहुत बड़ा किला जीत लिया हो. तीन फायर करने के बाद बन्दूक इस तरह थामकर बैठे मानो विश्व-विजय के बाद वापस आये हों.

उसके बाद कई मौके आये जब बन्दूक चलाने को मिली किन्तु जो रोमांच पहली बार चलाने में आया वह आज भी भुलाये नहीं भूलता है.



Wednesday, 7 March 2018

जातिवाद लोगों की नस-नस में समाहित है

इधर देखने में आया है कि समाज में जातिगत-विभेद को लेकर काफी कुछ लिखा-सुना जाता रहा है. हमारा मानना है कि इस समय के व्यावसायिकता भरे दौर में जातिगत भेद की जगह पर अमीर-गरीब का भेद ज्यादा दृष्टिगोचर हो रहा है. यहाँ एक एहसास जो जाति को लेकर हमें आज से कई साल पहले हुआ था. 

हमें अपने एक मित्र के साथ एक काम से इलाहाबाद-बनारस आदि की यात्रा पर जाना पड़ा. शायद सन् 1999 की बात होगी, गर्मियों के दिन थे, जून का महीना था. सफर के दौरान यदि ज्यादा समय यात्रा में लगना होता है तो घर से अम्मा भोजन साथ में बाँध दिया करती हैं. आज भी उनकी यही आदत है और इस आदत को हमने भी अपनी आदत बना लिया है. बाहर का कुछ खाने से बेहतर है कि घर का ही कुछ खाया जाये, इसी सोच से हम आज भी घर से कुछ न कुछ खाद्य सामग्री लेकर अपने साथ चलते हैं.

उस दिन उरई से ट्रेन सुबह लगभग 9 बजे के आसपास थी. हम लोग स्टेशन पहुँचे और अपने समय पर ट्रेन के आने पर अपनी मंजिल को चल पड़े. रास्ते में दोपहर में भोजन का समय होने पर हमने घर से अपने साथ लेकर चले पूड़ी-सब्जी आदि का स्वाद लिया और अपनी भूख मिटाई. चूँकि अम्मा का लाड़-दुलार और उनकी निगाह में घर से बहुत दूर जाने की बात, सो पूड़ियाँ और सब्जी कुछ ज्यादा ही दे दी गईं थीं. हम दोनों लोगों ने अपने पेट और भूख के हिसाब से जितना भोजन पर्याप्त हो सकता था उतना किया और शेष को वापस डब्बे में रख दिया. सफर के दौरान हमारी एक आदत हमेशा रही है कि खाने का सामान थोड़ा-बहुत बचा ही लेते हैं और किसी भीख माँगने वाले बच्चे, वृद्ध को अथवा ट्रेन-बस में सफाई करने वाले बच्चे को दे देते हैं. भोजन कुछ ज्यादा होने के कारण और कुछ अपनी आदत के अनुसार बचा गया अथवा बचा लिया. चूँकि दिन गर्मियों के थे इस कारण सब्जी के खराब होने के डर से उसे नहीं बचाया. 

उरई से चलकर हम इलाहाबाद तक आ गये और इसे इत्तेफाक कहिए कि पूरे सफर के दौरान कोई माँगने वाला अथवा सफाई करने वाला नहीं आया. दिमाग में डब्बे में रखी पूड़ियाँ और आम का अचार घूम रहा था. माहौल भी ऐसा है कि किसी को अपने आप कुछ भी खिलाने-देने का संकट मोल भी नहीं ले सकते थे. हमारा दोस्त भी हमारी तरह की प्रवृत्ति का है सो वह भी भोजन के सही उपयोग का स्थान खोज रहा था.

इलाहाबाद स्टेशन पर उतरे तो सोचा कि कोई व्यक्ति तो मिला नहीं, जानवर ही मिल जाये तो उसको ही खिलाकर पूड़ियों को सही ठिकाने लगा दिया जाये. ट्रेन से उतरकर अभी मुश्किल से 20-25 कदम चले होंगे कि एक बुढ़िया वहीं प्लेटफॉर्म पर भीख माँगते दिखी. हम दोनों मित्रों ने एक दूसरे को देखा और लगा कि चलो अब किसी का भला हो जायेगा. हम दोनों उस बुढ़िया के पास पहुँचे और उससे पूछा कि अम्मा कुछ पूड़ियाँ और आम का अचार बचा है खाओगी?

उसके हाँ कहते ही हमने अपने बैग से डिब्बा निकाला और उस बुढ़िया को देने के लिए आगे बढ़ाया. उसने डिब्बा लेने के लिए अपना हाथ तो बढ़ाया नहीं वरन् एक सवाल उछाल दिया, जिसे सुनकर हम दोनों मित्रों के पैरों के नीचे से जमीन सरकने का एहसास हुआ. उस बुढ़िया ने डिब्बे को लेने का कोई जतन किये बगैर पहले पूछा कि बेटा कौन जात के हो? गुस्सा तो बहुत आई किन्तु उस बुढ़िया से क्या कहते. इसी गुस्से में उस बुढ़िया से यह कहकर कि अम्मा तुम फिर न लेओ हमाईं पूड़ियाँ, काये से के हम दोउ जने अछूत हैं, आगे बढ़ गये.

लगा कि देश में जातिगत विभेद की भावना किस कदर घर किये है कि एक भीख माँगने वाली बुढ़िया भी जाति पूछ कर भोजन लेती है. स्टेशन से बाहर आकर उन पूड़ियों को एक गाय और एक कुत्ते के बीच बाँट दिया जो बिना जाति पूछे अपनी भूख मिटाने लगे.

Friday, 2 March 2018

उस होली की मस्ती का अपना ही स्वाद था

हम लोगों के लिए होली का मतलब हमेशा से हुल्लड़ से ही रहा है. उस समय भी जबकि हम छोटे से थे, उस समय भी जब हम किशोरावस्था में कहे जा सकते थे और तब भी जबकि हमें भी बड़ा माना जाने लगा था. हमारे लिए ही नहीं, हमारे पूरे परिवार के लिए होली का मतलब खूब मस्ती, खूब हुल्लड़, खूब हंगामा करना होता था. किसी भी त्यौहार का, पर्व का मजा उस समय और भी बढ़ जाता है जबकि पूरा परिवार एकसाथ हो. आज भले ही हम सभी लोग अपनी-अपनी व्यस्तताओं, अपने-अपने कार्यों में व्यस्त होने के कारण भले ही किसी त्यौहार पर एकसाथ न जुट पा रहे हों मगर उस समय होली और दीपावली, ये दो त्यौहार ऐसे होते थे कि सभी चाचा लोग सपरिवार उरई इकठ्ठा हुआ करते थे. आज भले ही त्योहारों पर इकठ्ठा होने में अन्तराल आया हो मगर परिवार में किसी भी वैवाहिक आयोजन पर अथवा किसी मांगलिक कार्य पर एकजुट हो जाते हैं. बहरहाल, आज की चर्चा फिर कभी, उस समय हम लोग अपने बचपन में थे और पिताजी-अम्मा, चाचा-चाची लोग अपनी युवावस्था में थे. हम सभी भाई-बहिन एकसाथ जुटते तो बस हंगामा ही हंगामा होता. हम बच्चों के हंगामे में चाचा लोग भी शामिल हो जाया करते थे. तीनों चाचियाँ एकसाथ न केवल अपने कामों को हँसते-बोलते निपटाती बल्कि हम बच्चों की तमाम फरमाइशें भी पलक झपकते ही पूरी करतीं.

होली, दीपावली के त्योहारों में मिलने पर लगता जैसे सारे संसार की खुशियाँ उन्हीं कुछ दिनों में सिमट आई हों. इसमें भी होली कुछ ज्यादा पसंद आता हम बच्चों को क्योंकि इसमें हुल्लड़ करने की खुली छूट मिली होती. तीनों चाचा लोगों का ज्यादातर होलिका दहन वाले दिन ही आना हुआ करता था. उनके आने के बाद होली के हंगामेदार तरीके से मनाये जाने के तरीके विचार किये जाते. हम सभी भाई-बहिनों की फ़ौज को किसी न किसी चाचा का आशीर्वाद मिल जाता बस उसी रात से हंगामा शुरू हो जाता. वहाँ घर के सभी बड़े लोग होलिका दहन कार्यक्रम में गए होते यहाँ हम बच्चे चाचा के साथ मिलकर कोयला पीस रहे होते, काजल की डिब्बियाँ खोजी जा रही होतीं, कड़ाही, तवे के पीछे की कालिख खुरच रहे होते, फाउंटेन पेन की काली स्याही को कहीं एक जगह इकठ्ठा करने में लगे होते. रात को खाना खाने के बाद की गप्पबाजी दो-दो, तीन-तीन बजे तक समाप्त नहीं होती. हम बच्चे जागते, सोते सी दशा में सबके सोने का इंतजार करते रहते. सबके चेहरे पर मूँछें बनाये जाने का काम, चेहरे पर कलाकारी दिखाने के काम भी चाचा के साथ मिलकर करना होता था. सुबह जागने पर सभी अपने-अपने चेहरों की कारीगरी देखकर हँसता, खीझता. हम बच्चे भी इससे न बच पाते. सबके चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ बनाने वाले हम बच्चों के चेहरे भी रँगे-पुते होते थे.

होली का दिन. रंग खेलने का दिन. पिचकारी की धार मारने का दिन. सबको रंगीन बनाने का दिन. उस दिन तो हम बच्चे तो बच्चे पिताजी-अम्मा, चाचा-चाची भी बच्चे नजर आते. उन दिनों घर पर मिलने वाले भी बहुत लोग आते. उनकी खूब खातिरदारी की जाती. खूब बड़ी छत पर उनको ससम्मान ले जाया जाता. पिताजी और तीनों चाचा लोग मिलकर सबको अपनी गिरफ्त में लेकर वो हाल करते कि पूछिए मत. कभी-कभी कोई बहुत बुरी तरह से रँगा हुआ चेहरा लेकर आता तो पहले उसका चेहरा धुलवाया जाता और फिर बाकायदा कुर्सी पर बैठा कर चेहरे पर पुनः होली खेली जाती. कोई ड्राइंग करने वाले ब्रश से कलाकारी दिखा रहा है. कोई उंगली से कानों में रंग भरने में लगा है. कोई पैरों में महावर लगाकर उसका श्रृंगार कर रहा है तो कोई आँखों में काजल लगाकर उसे संवार रहा है. पूरी प्रक्रिया में कोई जोर-जबरदस्ती नहीं, कोई हंगामा नहीं, कोई खींचा-तानी नहीं इससे हँसते-खेलते माहौल में होली का उत्सव अपने चरम पर पहुँचता जाता. दिन के एक निश्चित समय तक घर में मिलने आये लोगों संग, आपस में होली खेलने के बाद, मोहल्ले में ऊधम मचा लेने के बाद नगर भ्रमण पर निकला जाता. चूँकि गुझिया, पपड़िया, मठरी, शकरपारे आदि इतनी बार और इतने अधिक खाए जा चुके होते कि भोजन करने की आवश्यकता समझ ही नहीं आती. 

चाचा लोग हम बच्चों की गैंग के सरगना होते और फिर हम सबका धमाल शुरू होता सडकों पर. परिचित हो या फिर अपरिचित, सभी को एक निगाह से देखा जाता. सबको रंग लगाया जाता, गुलाल लगाया जाता. कोई परिचित का मिला तो हम बच्चों ने उसके पैर छूकर आशीर्वाद लिया. रंग लगाने का, गुलाल लगाने का क्रम संपन्न हुआ. कोई अपरिचित मिला तो उससे अभिवादन हो गया. सड़क चलते बड़ों, बच्चों के अलावा दुकानदारों तक से होली खेल ली जाती. उस समय संपत की पान की बड़ी प्रसिद्द दुकान हुआ करती थी. वहाँ की दूध की बोतल आज भी अपने उसी स्वाद में मिलती है. उसके बाद लालजी चाट का स्वाद लिया जाता. किसी हाथठेले वाले की दुकान से पिचकारी, मुखौटे आदि खरीदने का काम भी कर लिया जाता. किसी कन्फेक्शनरी की दुकान से टॉफी, कम्पट आदि का आनंद लिया जाता. ये दुकानदार भी हम बच्चों के रंगों का शिकार हो जाया करते. तब आज की तरह किसी तरह का मनमुटाव देखने को नहीं मिलता था. आज के जैसी आपसी कटुता भी देखने को नहीं मिलती थी. न तो बड़े किसी बात का बुरा मानते थे और न ही छोटे किसी तरह का अभद्रता करते नजर आते.

आज होली पर उस समय की होली के हंगामे बराबर याद आते हैं. भाग-भाग कर लोगों को पकड़ना. उनको कुर्सी पर बैठाकर लाल-नीला-हरा करना. कभी-कभी कपड़ाफाड़ होली मनाया जाना. किसी-किसी को गाने की धुन पर खूब नचाया जाना. चेहरे, कान, दांत, हाथ, पैर, पेट, पीठ आदि को बिना रंगीन किये न जाने देना. कभी-कभी रंगों के साथ खूब पानी का मजा लेना. अब सब यादें बनी हुई हैं. चाचा-चाची लोग अपने-अपने परिवार में सिमट गए हैं. हम बच्चों के अपने-अपने परिवार हो गए हैं. मिलना अब नियमित भले न हो पाता हो मगर होली, दीपावली सब एकदूसरे को याद अवश्य कर लेते हैं. होली के हुड़दंग को एक-दूसरे से साझा कर लेते हैं.

Thursday, 1 March 2018

टाइटल का इंतजार होली में


हॉस्टल में हर होली पर लोगों को टाइटल देने का एक काम शुरू किया गया. इसमें साथियों को तो लपेटा ही जाता, शिक्षक भी लपेट लिए जाते. पूरे कॉलेज को मालूम रहता कि तये काम सिर्फ़ हॉस्टल वालों का है मगर आपस में कोई मनमुटाव न होता. आख़िर हम लोग भी शालीनता बनाए रखते थे. होली पर टाइटल निकालने का काम हम इंटरमीडिएट के दौरान भी करते रहे हैं. तब स्कूल में मास्टर साहब के द्वारा पिटाई का डर रहता था सो बड़े पैमाने पर वो काम न करके क्लास स्तर पर निपटा लिया जाता. आपस के कुछ मित्रों के बीच टाइटल का आदान-प्रदान हो जाता और फिर धीरे-धीरे सब उसका प्रसार पूरे स्कूल में कर देते. किसी को कोई शक भी न होता कि ये काम किसका किया है. इंटर कॉलेज से निकल कर स्नातक की पढ़ाई के दौरान जब हॉस्टल में रहना हुआ तब होली के नजदीक आने पर इस टाइटल निकालने के कीड़े ने कुलबुलाना शुरू कर दिया. हॉस्टल का माहौल समझा, बड़े भाइयों की सहमति ली, साथियों का साथ लिया और बस जुट गए टाइटल बनाने में.

उस समय आज के जैसे तकनीक हम लोगों के पास नहीं थी. बाज़ार जाकर चार्ट पेपर, कई रंगों की स्केच खरीदी गईं. हॉस्टल में बहुत गुपचुप तरीके से इस काम को अंजाम दिया गया ताकि होली के ठीक पहले जब छुट्टी हो, तभी सबको सरप्राइज मिले. कॉलेज में कई सारे लड़के-लड़कियाँ ऐसे होते थे जो अपने आपको बहुत ज्यादा हीरो-हीरोइन समझते थे तो उनका टाइटल बनाया ही नहीं जाता. इसका साफ़ सा संकेत ये देना होता था कि उनको कोई जानता ही नहीं कॉलेज में तभी उनका टाइटल नहीं बना. कुछ छात्र-छात्राओं के और प्राध्यापकों के बड़े शालीन से टाइटल बनाये जाते तो कुछ के उनकी हरकतों के हिसाब से. होली पर जब पहली बार टाइटल निकाले गए तो सभी ने उनको बहुत पसंद किया था. उसके बाद होली का एक-वर्षीय इंतजार करना लोगों को रास न आया तो दीपावली पर टाइटल लगाने का काम शुरू किया गया. बिना किसी आरोप-प्रत्यारोप के सहजता से सब उनका स्वागत करते. 

दो-तीन बार की मेहनत के बाद लगा कि सब सहजता से इसे ले रहे हैं तो एक साल जोड़े के साथ टाइटल बनाये गए. लड़कों और लड़कियों के जोड़े बनाये गए और प्राध्यापकों के भी जोड़े बनाये गए. कुछ प्राध्यापकों के किस्से महाविद्यालय में बड़े चर्चा में रहे, उनको भी शामिल किया गया. जोड़े से बने टाइटल ने तो जैसे एकदम से धमाल मचा दिया. लड़कों-लड़कियों में तो उसकी प्रतिक्रिया ऐसे आई जैसे उनकी शादी ही करवा दी गई हो. कुछ लड़के अपने साथियों के बीच रोब गाँठने लगे. उन बेचारों, बेचारियों को भी, बड़ी मायूसी हाथ लगी जिनका जोड़ा न बनाया गया. हँसी-मजाक के इसी क्रम में किसी ने बड़ा ज़ालिम सा बयान भी जारी किया था कि फलां लड़की की तरफ कोई आँख उठाकर न देखे, अब वो तुम सबकी भाभी है. यदि किसी ने बात न मानी तो इतने कारतूस चलेंगे कि खोखे बीनने वाले लखपति हो जायेंगे.हम लोग बहुत लम्बे समय तक इस कथन के सहारे उन साहब की मौज लेते रहे. अब जबकि कॉलेज छोड़े दो दशक से अधिक का समय बीत गया है, कभी-कभी मन कर जाता है टाइटल बनाने का. अब तो नगर के कुछ लोगों के, राजनीति के कुछ लोगों के, अपने कॉलेज के कुछ लोगों के टाइटल खुद ही बना लिया करते हैं, खुद ही पढ़ लिया करते हैं, खुद ही मजा ले लिया करते हैं.