Monday, 12 March 2018

बन्दूक चलाने का पहला अनुभव

इसे जातिगत असर कहा जाये या फिर आसपास का वातावरण कि बचपन से ही हमें हथिययारों ने बहुत ही लुभाया है. गाँव में भी पुरानी जमींदारी होने के कारण नक्काशीदार तलवारें और अन्य अस्त्र-शस्त्र देखने को मिलते रहते थे. इसके अलावा घर में रिवाल्वर, बन्दूक होने के कारण भी इनके प्रति एक प्रकार की रुचि बनी हुई थी. कभी-कभी बन्दूक और रिवाल्वर चलाने का मन भी होता था. घर में विशेष रूप से दशहरे के पूजन के बाद रिवाल्वर और बन्दूक चलाने का काम पिताजी या चाचाजी के द्वारा होता था. छत पर जब भी दशहरे और दीपावली पर पूजन के बाद बन्दूक, रिवाल्वर चलाने का उपक्रम होता तो हम बस ललचा कर ही रह जाते. इन पर्वों के अलावा कभी खुशी के अवसर पर भी धमाके कर लिए जाते थे पर इनको करने की जिम्मेवारी सिर्फ और सिर्फ पिताजी की होती, हाँ, यदि घर में उस समय चाचा वगैरह हुए तो वे भी इसमें हिस्सा ले लेते थे. 

बात होगी कोई 1990 की जब हम स्नातक के प्रथम वर्ष में थे. ग्वालियर से छुट्टियों में घर आना हुआ. उसी समय हमारे एक पारिवारिक मित्र के घर नवजात शिशु का आगमन हुआ. अवसर हम सभी के लिए खुशी का था. सभी लोग उन्हीं के घर पर उपस्थित थे. जैसा कि तय था, बन्दूक तो चलनी ही थी. हम चिरपरिचित अंदाज में शांत बैठे थे क्योंकि हमें मालूम था कि पिताजी की दृष्टि में हम अभी इतने बड़े नहीं हुए कि बन्दूक चलाने को मिले. मन तो बहुत कर रहा था किन्तु कहते कैसे? चुपचाप बैठे थे कि तभी पिताजी ने आवाज देकर हमें बुलाया.

आराम से उठकर उनके पास तक पहुँचे तो पिताजी ने बन्दूक हमें थमा दी और साथ में कारतूस की पेटी. दोनों चीजें एक साथ देकर पिताजी ने कहा कि तुम चाचा बन गये हो और अब बड़े भी हो गये हो. चलाओ. घर में बन्दूक की सफाई का काम हमारे जिम्मे ही था इस कारण बन्दूक के संचालन का तरीका भी हमें ज्ञात था. अंधा क्या चाहे दो आँखें, हमने हाँ कही तो पिताजी ने इतना कहा कि आराम से, सुरक्षा के साथ चलाना.

मन ही मन प्रसन्नता का अनुभव भी हो रहा था साथ ही एक डर भी लग रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाये. बन्दूक के चलने पर पीछे लगने वाले धक्के के बारे में भी सुन रखा था जिसका भी डर लग रहा था. मन ही मन खुद को हिम्मत बँधाई और खुले में आकर बन्दूक में कारतूस लगा ऊपर कर फायर कर दिया.

एक फायर हुआ, कैसे हुआ यह समझ ही नहीं आया. सब कुछ सही-सही दिखा. बन्दूक का झटका भी उतना नहीं लगा जितना सुन रखा था, इससे भी हिम्मत बँधी. बन्दूक की नाल खोल कर चला हुआ कारतूस बाहर निकाला. दूसरा कारतूस लगाया और किया दूसरा फायर, फिर तीसरा कारतूस डाला और तीसरा फायर. एक के बाद एक तीन फायर करके लगा कि बहुत बड़ा किला जीत लिया हो. तीन फायर करने के बाद बन्दूक इस तरह थामकर बैठे मानो विश्व-विजय के बाद वापस आये हों.

उसके बाद कई मौके आये जब बन्दूक चलाने को मिली किन्तु जो रोमांच पहली बार चलाने में आया वह आज भी भुलाये नहीं भूलता है.



Wednesday, 7 March 2018

जातिवाद लोगों की नस-नस में समाहित है

इधर देखने में आया है कि समाज में जातिगत-विभेद को लेकर काफी कुछ लिखा-सुना जाता रहा है. हमारा मानना है कि इस समय के व्यावसायिकता भरे दौर में जातिगत भेद की जगह पर अमीर-गरीब का भेद ज्यादा दृष्टिगोचर हो रहा है. यहाँ एक एहसास जो जाति को लेकर हमें आज से कई साल पहले हुआ था. 

हमें अपने एक मित्र के साथ एक काम से इलाहाबाद-बनारस आदि की यात्रा पर जाना पड़ा. शायद सन् 1999 की बात होगी, गर्मियों के दिन थे, जून का महीना था. सफर के दौरान यदि ज्यादा समय यात्रा में लगना होता है तो घर से अम्मा भोजन साथ में बाँध दिया करती हैं. आज भी उनकी यही आदत है और इस आदत को हमने भी अपनी आदत बना लिया है. बाहर का कुछ खाने से बेहतर है कि घर का ही कुछ खाया जाये, इसी सोच से हम आज भी घर से कुछ न कुछ खाद्य सामग्री लेकर अपने साथ चलते हैं.

उस दिन उरई से ट्रेन सुबह लगभग 9 बजे के आसपास थी. हम लोग स्टेशन पहुँचे और अपने समय पर ट्रेन के आने पर अपनी मंजिल को चल पड़े. रास्ते में दोपहर में भोजन का समय होने पर हमने घर से अपने साथ लेकर चले पूड़ी-सब्जी आदि का स्वाद लिया और अपनी भूख मिटाई. चूँकि अम्मा का लाड़-दुलार और उनकी निगाह में घर से बहुत दूर जाने की बात, सो पूड़ियाँ और सब्जी कुछ ज्यादा ही दे दी गईं थीं. हम दोनों लोगों ने अपने पेट और भूख के हिसाब से जितना भोजन पर्याप्त हो सकता था उतना किया और शेष को वापस डब्बे में रख दिया. सफर के दौरान हमारी एक आदत हमेशा रही है कि खाने का सामान थोड़ा-बहुत बचा ही लेते हैं और किसी भीख माँगने वाले बच्चे, वृद्ध को अथवा ट्रेन-बस में सफाई करने वाले बच्चे को दे देते हैं. भोजन कुछ ज्यादा होने के कारण और कुछ अपनी आदत के अनुसार बचा गया अथवा बचा लिया. चूँकि दिन गर्मियों के थे इस कारण सब्जी के खराब होने के डर से उसे नहीं बचाया. 

उरई से चलकर हम इलाहाबाद तक आ गये और इसे इत्तेफाक कहिए कि पूरे सफर के दौरान कोई माँगने वाला अथवा सफाई करने वाला नहीं आया. दिमाग में डब्बे में रखी पूड़ियाँ और आम का अचार घूम रहा था. माहौल भी ऐसा है कि किसी को अपने आप कुछ भी खिलाने-देने का संकट मोल भी नहीं ले सकते थे. हमारा दोस्त भी हमारी तरह की प्रवृत्ति का है सो वह भी भोजन के सही उपयोग का स्थान खोज रहा था.

इलाहाबाद स्टेशन पर उतरे तो सोचा कि कोई व्यक्ति तो मिला नहीं, जानवर ही मिल जाये तो उसको ही खिलाकर पूड़ियों को सही ठिकाने लगा दिया जाये. ट्रेन से उतरकर अभी मुश्किल से 20-25 कदम चले होंगे कि एक बुढ़िया वहीं प्लेटफॉर्म पर भीख माँगते दिखी. हम दोनों मित्रों ने एक दूसरे को देखा और लगा कि चलो अब किसी का भला हो जायेगा. हम दोनों उस बुढ़िया के पास पहुँचे और उससे पूछा कि अम्मा कुछ पूड़ियाँ और आम का अचार बचा है खाओगी?

उसके हाँ कहते ही हमने अपने बैग से डिब्बा निकाला और उस बुढ़िया को देने के लिए आगे बढ़ाया. उसने डिब्बा लेने के लिए अपना हाथ तो बढ़ाया नहीं वरन् एक सवाल उछाल दिया, जिसे सुनकर हम दोनों मित्रों के पैरों के नीचे से जमीन सरकने का एहसास हुआ. उस बुढ़िया ने डिब्बे को लेने का कोई जतन किये बगैर पहले पूछा कि बेटा कौन जात के हो? गुस्सा तो बहुत आई किन्तु उस बुढ़िया से क्या कहते. इसी गुस्से में उस बुढ़िया से यह कहकर कि अम्मा तुम फिर न लेओ हमाईं पूड़ियाँ, काये से के हम दोउ जने अछूत हैं, आगे बढ़ गये.

लगा कि देश में जातिगत विभेद की भावना किस कदर घर किये है कि एक भीख माँगने वाली बुढ़िया भी जाति पूछ कर भोजन लेती है. स्टेशन से बाहर आकर उन पूड़ियों को एक गाय और एक कुत्ते के बीच बाँट दिया जो बिना जाति पूछे अपनी भूख मिटाने लगे.

Friday, 2 March 2018

उस होली की मस्ती का अपना ही स्वाद था

हम लोगों के लिए होली का मतलब हमेशा से हुल्लड़ से ही रहा है. उस समय भी जबकि हम छोटे से थे, उस समय भी जब हम किशोरावस्था में कहे जा सकते थे और तब भी जबकि हमें भी बड़ा माना जाने लगा था. हमारे लिए ही नहीं, हमारे पूरे परिवार के लिए होली का मतलब खूब मस्ती, खूब हुल्लड़, खूब हंगामा करना होता था. किसी भी त्यौहार का, पर्व का मजा उस समय और भी बढ़ जाता है जबकि पूरा परिवार एकसाथ हो. आज भले ही हम सभी लोग अपनी-अपनी व्यस्तताओं, अपने-अपने कार्यों में व्यस्त होने के कारण भले ही किसी त्यौहार पर एकसाथ न जुट पा रहे हों मगर उस समय होली और दीपावली, ये दो त्यौहार ऐसे होते थे कि सभी चाचा लोग सपरिवार उरई इकठ्ठा हुआ करते थे. आज भले ही त्योहारों पर इकठ्ठा होने में अन्तराल आया हो मगर परिवार में किसी भी वैवाहिक आयोजन पर अथवा किसी मांगलिक कार्य पर एकजुट हो जाते हैं. बहरहाल, आज की चर्चा फिर कभी, उस समय हम लोग अपने बचपन में थे और पिताजी-अम्मा, चाचा-चाची लोग अपनी युवावस्था में थे. हम सभी भाई-बहिन एकसाथ जुटते तो बस हंगामा ही हंगामा होता. हम बच्चों के हंगामे में चाचा लोग भी शामिल हो जाया करते थे. तीनों चाचियाँ एकसाथ न केवल अपने कामों को हँसते-बोलते निपटाती बल्कि हम बच्चों की तमाम फरमाइशें भी पलक झपकते ही पूरी करतीं.

होली, दीपावली के त्योहारों में मिलने पर लगता जैसे सारे संसार की खुशियाँ उन्हीं कुछ दिनों में सिमट आई हों. इसमें भी होली कुछ ज्यादा पसंद आता हम बच्चों को क्योंकि इसमें हुल्लड़ करने की खुली छूट मिली होती. तीनों चाचा लोगों का ज्यादातर होलिका दहन वाले दिन ही आना हुआ करता था. उनके आने के बाद होली के हंगामेदार तरीके से मनाये जाने के तरीके विचार किये जाते. हम सभी भाई-बहिनों की फ़ौज को किसी न किसी चाचा का आशीर्वाद मिल जाता बस उसी रात से हंगामा शुरू हो जाता. वहाँ घर के सभी बड़े लोग होलिका दहन कार्यक्रम में गए होते यहाँ हम बच्चे चाचा के साथ मिलकर कोयला पीस रहे होते, काजल की डिब्बियाँ खोजी जा रही होतीं, कड़ाही, तवे के पीछे की कालिख खुरच रहे होते, फाउंटेन पेन की काली स्याही को कहीं एक जगह इकठ्ठा करने में लगे होते. रात को खाना खाने के बाद की गप्पबाजी दो-दो, तीन-तीन बजे तक समाप्त नहीं होती. हम बच्चे जागते, सोते सी दशा में सबके सोने का इंतजार करते रहते. सबके चेहरे पर मूँछें बनाये जाने का काम, चेहरे पर कलाकारी दिखाने के काम भी चाचा के साथ मिलकर करना होता था. सुबह जागने पर सभी अपने-अपने चेहरों की कारीगरी देखकर हँसता, खीझता. हम बच्चे भी इससे न बच पाते. सबके चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ बनाने वाले हम बच्चों के चेहरे भी रँगे-पुते होते थे.

होली का दिन. रंग खेलने का दिन. पिचकारी की धार मारने का दिन. सबको रंगीन बनाने का दिन. उस दिन तो हम बच्चे तो बच्चे पिताजी-अम्मा, चाचा-चाची भी बच्चे नजर आते. उन दिनों घर पर मिलने वाले भी बहुत लोग आते. उनकी खूब खातिरदारी की जाती. खूब बड़ी छत पर उनको ससम्मान ले जाया जाता. पिताजी और तीनों चाचा लोग मिलकर सबको अपनी गिरफ्त में लेकर वो हाल करते कि पूछिए मत. कभी-कभी कोई बहुत बुरी तरह से रँगा हुआ चेहरा लेकर आता तो पहले उसका चेहरा धुलवाया जाता और फिर बाकायदा कुर्सी पर बैठा कर चेहरे पर पुनः होली खेली जाती. कोई ड्राइंग करने वाले ब्रश से कलाकारी दिखा रहा है. कोई उंगली से कानों में रंग भरने में लगा है. कोई पैरों में महावर लगाकर उसका श्रृंगार कर रहा है तो कोई आँखों में काजल लगाकर उसे संवार रहा है. पूरी प्रक्रिया में कोई जोर-जबरदस्ती नहीं, कोई हंगामा नहीं, कोई खींचा-तानी नहीं इससे हँसते-खेलते माहौल में होली का उत्सव अपने चरम पर पहुँचता जाता. दिन के एक निश्चित समय तक घर में मिलने आये लोगों संग, आपस में होली खेलने के बाद, मोहल्ले में ऊधम मचा लेने के बाद नगर भ्रमण पर निकला जाता. चूँकि गुझिया, पपड़िया, मठरी, शकरपारे आदि इतनी बार और इतने अधिक खाए जा चुके होते कि भोजन करने की आवश्यकता समझ ही नहीं आती. 

चाचा लोग हम बच्चों की गैंग के सरगना होते और फिर हम सबका धमाल शुरू होता सडकों पर. परिचित हो या फिर अपरिचित, सभी को एक निगाह से देखा जाता. सबको रंग लगाया जाता, गुलाल लगाया जाता. कोई परिचित का मिला तो हम बच्चों ने उसके पैर छूकर आशीर्वाद लिया. रंग लगाने का, गुलाल लगाने का क्रम संपन्न हुआ. कोई अपरिचित मिला तो उससे अभिवादन हो गया. सड़क चलते बड़ों, बच्चों के अलावा दुकानदारों तक से होली खेल ली जाती. उस समय संपत की पान की बड़ी प्रसिद्द दुकान हुआ करती थी. वहाँ की दूध की बोतल आज भी अपने उसी स्वाद में मिलती है. उसके बाद लालजी चाट का स्वाद लिया जाता. किसी हाथठेले वाले की दुकान से पिचकारी, मुखौटे आदि खरीदने का काम भी कर लिया जाता. किसी कन्फेक्शनरी की दुकान से टॉफी, कम्पट आदि का आनंद लिया जाता. ये दुकानदार भी हम बच्चों के रंगों का शिकार हो जाया करते. तब आज की तरह किसी तरह का मनमुटाव देखने को नहीं मिलता था. आज के जैसी आपसी कटुता भी देखने को नहीं मिलती थी. न तो बड़े किसी बात का बुरा मानते थे और न ही छोटे किसी तरह का अभद्रता करते नजर आते.

आज होली पर उस समय की होली के हंगामे बराबर याद आते हैं. भाग-भाग कर लोगों को पकड़ना. उनको कुर्सी पर बैठाकर लाल-नीला-हरा करना. कभी-कभी कपड़ाफाड़ होली मनाया जाना. किसी-किसी को गाने की धुन पर खूब नचाया जाना. चेहरे, कान, दांत, हाथ, पैर, पेट, पीठ आदि को बिना रंगीन किये न जाने देना. कभी-कभी रंगों के साथ खूब पानी का मजा लेना. अब सब यादें बनी हुई हैं. चाचा-चाची लोग अपने-अपने परिवार में सिमट गए हैं. हम बच्चों के अपने-अपने परिवार हो गए हैं. मिलना अब नियमित भले न हो पाता हो मगर होली, दीपावली सब एकदूसरे को याद अवश्य कर लेते हैं. होली के हुड़दंग को एक-दूसरे से साझा कर लेते हैं.

Thursday, 1 March 2018

टाइटल का इंतजार होली में


हॉस्टल में हर होली पर लोगों को टाइटल देने का एक काम शुरू किया गया. इसमें साथियों को तो लपेटा ही जाता, शिक्षक भी लपेट लिए जाते. पूरे कॉलेज को मालूम रहता कि तये काम सिर्फ़ हॉस्टल वालों का है मगर आपस में कोई मनमुटाव न होता. आख़िर हम लोग भी शालीनता बनाए रखते थे. होली पर टाइटल निकालने का काम हम इंटरमीडिएट के दौरान भी करते रहे हैं. तब स्कूल में मास्टर साहब के द्वारा पिटाई का डर रहता था सो बड़े पैमाने पर वो काम न करके क्लास स्तर पर निपटा लिया जाता. आपस के कुछ मित्रों के बीच टाइटल का आदान-प्रदान हो जाता और फिर धीरे-धीरे सब उसका प्रसार पूरे स्कूल में कर देते. किसी को कोई शक भी न होता कि ये काम किसका किया है. इंटर कॉलेज से निकल कर स्नातक की पढ़ाई के दौरान जब हॉस्टल में रहना हुआ तब होली के नजदीक आने पर इस टाइटल निकालने के कीड़े ने कुलबुलाना शुरू कर दिया. हॉस्टल का माहौल समझा, बड़े भाइयों की सहमति ली, साथियों का साथ लिया और बस जुट गए टाइटल बनाने में.

उस समय आज के जैसे तकनीक हम लोगों के पास नहीं थी. बाज़ार जाकर चार्ट पेपर, कई रंगों की स्केच खरीदी गईं. हॉस्टल में बहुत गुपचुप तरीके से इस काम को अंजाम दिया गया ताकि होली के ठीक पहले जब छुट्टी हो, तभी सबको सरप्राइज मिले. कॉलेज में कई सारे लड़के-लड़कियाँ ऐसे होते थे जो अपने आपको बहुत ज्यादा हीरो-हीरोइन समझते थे तो उनका टाइटल बनाया ही नहीं जाता. इसका साफ़ सा संकेत ये देना होता था कि उनको कोई जानता ही नहीं कॉलेज में तभी उनका टाइटल नहीं बना. कुछ छात्र-छात्राओं के और प्राध्यापकों के बड़े शालीन से टाइटल बनाये जाते तो कुछ के उनकी हरकतों के हिसाब से. होली पर जब पहली बार टाइटल निकाले गए तो सभी ने उनको बहुत पसंद किया था. उसके बाद होली का एक-वर्षीय इंतजार करना लोगों को रास न आया तो दीपावली पर टाइटल लगाने का काम शुरू किया गया. बिना किसी आरोप-प्रत्यारोप के सहजता से सब उनका स्वागत करते. 

दो-तीन बार की मेहनत के बाद लगा कि सब सहजता से इसे ले रहे हैं तो एक साल जोड़े के साथ टाइटल बनाये गए. लड़कों और लड़कियों के जोड़े बनाये गए और प्राध्यापकों के भी जोड़े बनाये गए. कुछ प्राध्यापकों के किस्से महाविद्यालय में बड़े चर्चा में रहे, उनको भी शामिल किया गया. जोड़े से बने टाइटल ने तो जैसे एकदम से धमाल मचा दिया. लड़कों-लड़कियों में तो उसकी प्रतिक्रिया ऐसे आई जैसे उनकी शादी ही करवा दी गई हो. कुछ लड़के अपने साथियों के बीच रोब गाँठने लगे. उन बेचारों, बेचारियों को भी, बड़ी मायूसी हाथ लगी जिनका जोड़ा न बनाया गया. हँसी-मजाक के इसी क्रम में किसी ने बड़ा ज़ालिम सा बयान भी जारी किया था कि फलां लड़की की तरफ कोई आँख उठाकर न देखे, अब वो तुम सबकी भाभी है. यदि किसी ने बात न मानी तो इतने कारतूस चलेंगे कि खोखे बीनने वाले लखपति हो जायेंगे.हम लोग बहुत लम्बे समय तक इस कथन के सहारे उन साहब की मौज लेते रहे. अब जबकि कॉलेज छोड़े दो दशक से अधिक का समय बीत गया है, कभी-कभी मन कर जाता है टाइटल बनाने का. अब तो नगर के कुछ लोगों के, राजनीति के कुछ लोगों के, अपने कॉलेज के कुछ लोगों के टाइटल खुद ही बना लिया करते हैं, खुद ही पढ़ लिया करते हैं, खुद ही मजा ले लिया करते हैं.


Tuesday, 27 February 2018

समोसों के लिए की जाने वाली शरारतें

शैतानियाँ, शरारतें कहीं से भी सीखनी नहीं पड़ती हैं. कोई सिखाता भी नहीं है. यह तो बालपन की स्वाभाविक प्रकृति होती है जो किसी भी बच्चे की नैसर्गिक सक्रियता के बीच उभरती रहती है. स्कूल में हम कुछ मित्रों की बड़ी पक्की, जिसे दांतकाटी रोटी कह सकते हैं, दोस्ती थी. कक्षा में एकसाथ बैठना. भोजनावकाश के समय एकसाथ बैठकर भोजन करना. आपस में मिल-बाँटकर भोजन करना. 

हमारी मंडली में एक मित्र मनोज के पिताजी घरेलू सामानों की एक दुकान अपने घर के पास ही चलाया करते थे. लगभग रोज ही मनोज भी शाम को दुकान पहुँच जाता था. जैसा कि बालसुलभ स्थितियों में होता है, उसके पिता लाड़-प्यार में यह कहते हुए कि शाम को दुकान के मालिक तुम हो, कुछ पैसे उसे दे दिया करते थे. हम मित्र भी दस-पाँच पैसे लेकर आया करते थे. आश्चर्य लगेगा आज की पीढ़ी को जिसको हजारों रुपये में जेबखर्च मिलता हो कि उस समय हम लोगों को पांच-दस पैसे कभी-कभी मिलते थे. ये आज आश्चर्य भले हो मगर उस समय किसी अमीर से कम स्थिति नहीं होती थी हम दोस्तों की. ऐसा रोज तो नहीं होता था पर जिस दिन ऐसा संयोग बनता था कि ठीक-ठाक मुद्रा जेब में आ गई तो सुबह की प्रार्थना के समय ही योजना बनाकर कक्षा में सबसे पीछे बैठा जाता था.

कक्षा में पीछे बैठने के अपने ही विशेष कारण हुआ करते थे. असल में स्कूल परिसर में या उसके आसपास किसी बाहरी व्यक्ति को किसी तरह का खाने-पीने का सामान बेचे जाने की अनुमति नहीं थी. स्कूल समय में किसी बच्चे को बाहर जाने की अनुमति नहीं थी ताकि स्कूल का कोई विद्यार्थी बाहर का कोई सामान न खा लें. इसको सख्ती से पालन करवाने के लिए भोजनावकाश के समय स्कूल का कोई न कोई शिक्षक मुख्य द्वार पर मुस्तैद हो जाया करता था. ऐसे में हम दोस्त अपने खुरापाती दिमाग की मदद से कक्षा के पीछे वाले दरवाजे का उपयोग भागने के लिए किया करते थे.

स्कूल के एकदम पास में एक छोटा सा होटल हुआ करता था, जिसे सभी अन्नू का होटल के नाम से जानते थे. उसके समोसे बहुत ही स्वादिष्ट होते थे. चूँकि भोजनावकाश में अध्यापकों की मुस्तैदी के कारण उन समोसों का स्वाद लिया जा संभव नहीं हो सकता था. ऐसे में कक्षा में सबसे पीछे बैठना समोसों तक पहुँच बनाने में सहायक हो जाता था. हम दोस्त आपस में पैसे इकट्ठे करके एक दोस्त को जिम्मेवारी देते समोसे लाने की. ज्यादातर इसके लिए रॉबिन्स को ही चुना जाता. वह कभी पानी पीने की, कभी बाथरूम जाने की अनुमति लेकर अन्नू के होटल तक अपनी पहुँच बनाता. और कभी-कभी बिना अनुमति के कक्षा के पीछे वाले दरवाजे का उपयोग किया जाता था. स्कूल का मुख्य द्वार लोहे की अनेक रॉड से मिलकर बना हुआ था, जिसमें से थोड़े से प्रयास के बाद हम बच्चे लोग आसानी से निकल जाया करते थे. 

कक्षा चलते समय उस फाटक से निकलना इसलिए भी आसान होता था कि सभी अध्यापक अपनी-अपनी कक्षाओं में हुआ करते थे और कभी-कभी आया माँ भी किसी काम में लगी होने के कारण दरवाजे के आसपास नजर नहीं रख पाती थीं. अन्नू के होटल तक झटपट जाने और फटाफट वापस आने की कला में माहिर रॉबिन्स अपनी नेकर की दोनों जेबों में कुछ समोसे भर कर कक्षा में दिखाई देने लगता. कक्षा में सबसे पीछे बैठी पूरी मित्र-मंडली अगले ही पल स्वादिष्ट समोसों का स्वाद ले रही होती थी. कक्षा में सबसे पीछे बैठने का मूल कारण स्कूल के मुख्य द्वार पर नजर रखना और फिर अपनी रणनीति में कामयाब होने के तत्काल बाद कक्षा में ही समोसे का स्वाद लेना रहता था.

आज जब कभी रॉबिन्स के मिलने पर स्कूल की घटनाएँ, स्कूल के दोस्तों की चर्चा होती है तो वह बिना कहे नहीं चूकता है कि तुम लोगों ने हमें खूब दौड़ाया, हमारी जेबों में खूब तेल लगवाया. रॉबिन्स को इस कारण भी ये घटना और भी अच्छे से याद है क्योंकि आये दिन घर में उसकी इसी बात पर कुटाई हो जाया करती थी कि नेकर की जेबें तेल से गन्दी कैसे हो जाती हैं.

Saturday, 24 February 2018

बाबा-अइया का स्नेहिल आँचल

ये हम तीनों भाइयों का सौभाग्य रहा कि हमें अपने अइया-बाबा (श्रीमती शारदा देवी सेंगर-श्री गिरीन्द्र सिंह सेंगर) के साथ रहने का, उनकी सेवा करने का, उनसे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला. गाँव की कृषिगत जिम्मेवारियों से निवृत्त होकर अइया-बाबा हम लोगों के पास आ जाते. उनके आने पर हम तीनों भाइयों को कुछ बेहतरीन लाभ मिलने लगते. जैसे कि पिताजी की डांट-मार से मुक्ति मिल जाती. हम लोगों की शैतानियाँ निखरने लगती. बाबा-अइया  अपने स्नेहिल संरक्षण में यदि हम लोगों की शैतानियों को पंख लगने देते तो इसके साथ ही वे हमारे बौद्धिक ज्ञान, व्यक्तित्व विकास, शारीरिक विकास, चारित्रिक विकास को भी पल्लवित-पुष्पित करते. सुबह घूमने की आदत, पैदल चलने की आदत, मेहनत करने की आदत, समयबद्ध कार्य करने की आदत, अनुशासन में रहने की आदत, पढ़ने की आदत, लिखने की आदत, कागजातों को क्रमबद्ध सुरक्षित रखने की आदत, वैचारिक विमर्श करने की आदत, किसी भी स्थिति को सभी बिन्दुओं पर परखने की आदत आदि का बीजारोपण बाबा जी के द्वारा ही किया गया. 

सुबह हम तीनों भाइयों को उठाकर अपने साथ ले जाना, रास्ते में तमाम ज्ञानवर्द्धक जानकारियां देना, हमें स्कूल छोड़ने और लेने जाने के दौरान बाजार की, तत्कालीन राजनीति की, अपने समय की अनेक बातों को बताते हुए उनका विश्लेषण करना उनके द्वारा होता रहता. बाबा जी द्वारा दी गई शिक्षाओं को, उनके द्वारा दी गई जानकारियों को, उनके सिद्धांतों को यदि लिखने बैठा जाये तो न समाप्त होने वाला अध्याय लिखा जा सकता है. वे हमारी लिखने की आदत देखकर अकसर हमें समझाते रहते थे कि किसी भी घटना पर, किसी भी बिन्दु पर कभी एकपक्षीय होकर मत सोचो, एकपक्षीय होकर कभी विचार न करो. उसके जितने भी पहलू हो सकते हैं, सभी पर विचार करो, कोई न मिले तो उन सभी बिन्दुओं पर खुद से तर्क-वितर्क करो. किसी भी घटना के, विषय के सभी पक्षों पर जब तुम समान रूप से विमर्श करने की स्थिति में होगे तो उस घटना, विषय विशेष पर कभी गलत नहीं होगे.

बाबा ऐसे लोगों से तर्क-वितर्क न करने की सलाह देते थे जो नितांत कुतर्की होते हैं. ऐसे लोगों के बारे में बाबा जी का मत था कि ये खुद तो भ्रमित रहते ही हैं सामने वाले को भी भ्रमित करते हैं. आज भी उनके शब्द हमें अक्षरशः याद हैं. और यही कारण है कि आज भी किसी भी घटना के सन्दर्भ में उससे बनने वाले सभी बिन्दुओं पर हमारा तर्क-वितर्क होता रहता है. अकसर हमारे मित्रों को लगता है कि हम भटकाने-भटकने की कोशिश कर रहे हैं, विषय से इतर बात कर रहे हैं मगर हमें स्वयं पता होता है कि ऐसा हम क्यों कर रहे हैं, इसके पीछे का मूल कारण क्या है. यही कारण है कि आज भी हम किसी भी विषय पर उससे जुड़े सभी संभावित बिन्दुओं पर एकसमान रूप से विचार कर लेते हैं. इस वैचारिक शक्ति ने हमारी लेखन-क्षमता को मजबूती ही दी है.

वे समाज के चालचलन के बारे में, लोगों के कृत्यों के बारे में, लोगों के व्यवहार के बारे में भी समझाते रहते थे. लोगों की सहायता करने को, असहायों की मदद करने को वे लगातार प्रेरित भी करते रहते थे. इस सन्दर्भ में उनकी एक बात सदैव हमारे आसपास घूमती रहती है. उनका कहना था कि तुमसे जितना बन पड़े दूसरों के लिए भला करो, बिना ये जाने-समझे कि वो तुम्हारा परिचित है या अपरिचित; बिना ये सोचे कि भविष्य में वो तुम्हारे काम आएगा या नहीं; बिना इसका विचार किये कि तुमको उस कार्य से लाभ हो रहा या नहीं. दूसरों को परेशानी में, समस्या में देखो तो उसकी निसंकोच मदद करो. इसके साथ ही ये बात याद रखो कि तुम भले ही सबका भला करते रहो मगर किसी को अपने प्रति बुरा सोचने न दो, करने न दो. यदि ऐसा होता है तो वह आगे चलकर तुम्हारे लिए परेशानी पैदा कर सकता है. इसका इलाज यही है उसका ऐसा इलाज करो कि फिर वो किसी का भी बुरा करने तो क्या बुरा सोचने लायक भी न रह जाए.

इसके अलावा उनकी एक सीख आज भी हमें किसी भी तरह की परेशानी में नहीं आने देती. कितनी भी बड़ी समस्या हो हमें परेशान नहीं करती. वे कहा करते थे कि कितनी भी बड़ी समस्या हो उसका हल बहुत छोटी सी घटना में खोजना चाहिए. उनका मानना था कि कोई भी घटना बड़ी नहीं होती, हमारी मानसिकता, हमारा परेशान होना, हमारा अफरातरफी मचाना ही समस्या को बड़ा बना देता है. ऐसे में आत्मसंयम, मानसिक नियंत्रण, सजगता से समस्या का हल निकाला जा सकता है.

बाबा के साथ-साथ अइया का व्यावहारिक ज्ञान अपनी तरह से हम भाइयों की मदद करता था. परम्पराओं, त्योहारों, लोकोत्सव, लोकगीतों आदि के बारे उनकी जानकारी हम सबके ज्ञान में वृद्धि करती थी. उनके द्वारा पिताजी, चाचाओं के बचपन के किससे खूब मजे ले-लेकर हम सबने सुने. वे एक बात बहुत हँस-हँस कर बताया करती थीं कि अपनी पढ़ाई के दौरान चाचा लोग, ख़ास तौर से बच्चा चाचा जब गाँव से उरई वापस आया करते तो दरवाजे तक आने के बाद चाचाओं की एक फरमाइश अइया से हुआ करती थी. आपको बताएँ वो फरमाइश हुआ करती थी ढपली की धुन किड़िक मर-मर-मर-मर-मर, हईंयाँ ना-ना-ना-ना-ना को सुनाना. अइया ने इस धुन को न केवल चाचाओं को सुनाकर उनकी फरमाइश पूरी की बल्कि हम लोगों को भी सुनाकर खूब हँसाया.

आज उनको हम लोगों से दूर गए कई वर्ष हो गए हैं. उनकी शिक्षाओं ने, उनकी जानकारियों ने हमारा हर कदम पर साथ दिया है. बड़ी से बड़ी घटना रही हो या फिर छोटी से छोटी समस्या, सबको हमने हँसते हुए ही दूर किया है. उनके आशीर्वाद का ही सुफल है कि बहुत सी नकारात्मक ताकतों की कोशिशों के बाद भी हम अपनी राह सहजता से बढ़े जा रहे हैं, आगे भी बढ़ते रहेंगे. 

Thursday, 22 February 2018

आँसुओं को मुस्कान में बदलने वाली यादें


समय लगातार गुजरता जाता है. बहुत कुछ इस यात्रा में बदलता जाता है. कुछ नया जुड़ता है, कुछ छूट जाता है. इस जुड़ने-छूटने में, मिलने-बिछड़ने में सजीव, निर्जीव समान रूप से अपना असर दिखाते हैं. इस क्रम में बहुत सी बातें स्मृति-पटल का हिस्सा बन जाती हैं. कुछ अपने दिल के करीब होकर, दिल में बसे होकर भी आसपास नहीं दिखते. उनकी स्मृतियाँ, उनके संस्मरण उनकी उपस्थिति का एहसास कराते रहते हैं. यही एहसास उनके प्रति हमारी संवेदनशीलता का परिचायक है. बरस के बरस गुजरते जाते हैं, दशक के दशक गुजरते जाते हैं मगर इन्हीं स्मृतियों के सहारे लगता है जैसे सबकुछ कल की ही बात हो. 

पीछे पलट कर देखते हैं तो लगभग दो दशक की यात्रा दिखाई देती है. दिखाई देता है बहुत से अपने लोगों का साथ चलना, बहुत से अपने लोगों का ही साथ होना. साथ होकर साथ न दिखने वालों में हमारी अइया  भी हैं. जी हाँ, अइया  यानि कि हमारी दादी. वो दिन आज भी ज्यों का त्यों दिल-दिमाग में अंकित है. चिकित्सा कारणों से अइया  को एक नर्सिंग हॉस्पिटल में भर्ती किया गया था. लगभग एक सप्ताह से उनकी शारीरिक प्रक्रिया को सामान्य रूप में लाने की कोशिश की जा रही थी ताकि उनका ऑपरेशन किया जा सके. उनकी अवस्था चिकित्सकों को अनुमति नहीं दे रही थी कि वे अइया  का ऑपरेशन कर सकें. अइया  भी अपनी अवस्था से चिर-परिचित थीं और कष्टों के बाद भी लगातार सबके साथ समन्वय बनाये हुए थीं.

हमारी अइया  लगातार हम लोगों के साथ रहने के चलते एक आदत स्वरूप में हम सबके लिए बनी हुईं थीं और हम सब भी जैसे उनकी आवश्यकता से ज्यादा अनिवार्यता के रूप में थे. हमारे न दिखने पर या फिर अम्मा के न दिखने पर वे उसी समय आवाज लगाना शुरू कर देतीं. हमारे तीनों चाचा लोगों यानि कि उनके तीनों बेटों के वहां होने, बहुओं, नाती-नातिनों के वहाँ होने के बाद भी यदि उनकी जरूरत किसी से पूरी होती तो बड़ी बहू यानि कि हमारी अम्मा से या फिर हमसे.

नर्सिंग होम में किसी दिन यदि वे उदास दिखतीं तो उनको हमारा सन्दर्भ देते हुए चिढ़ा दिया जाता कि अभी कैसे जाओगी हम सबको छोड़ कर. अभी नत-बहू देखना है, पंती खिलाना है. नर्सिंग होने के पलंग पर, पैर में ट्रेक्शन का भार लिए, हाथों में ड्रिप निडिल की चुभन समेटे अइया  खुलकर मुस्कुरा देतीं. उनकी हलकी सी मुस्कराहट भी हम सबको प्रसन्न कर देती. उस आखिरी दिन उरई से पिताजी का आना हुआ. उन भर्ती के दिनों में वे बड़ी मुश्किल से खाना खाने को राज़ी होतीं मगर मिठाई की परम शौक़ीन अइया  को जैसे ही बताया गया कि पिताजी बदनाम गुझिया लाये हैं तो वे झट से खाने को राजी हो गईं.

गुझिया उस दिन उनका अंतिम खाद्य-पदार्थ बना. उसके कुछ घंटों बाद उनके गले में घरघराहट सी हुई. हम बगल में ही उनका हाथ पकड़े बैठे हुए थे. ऐसा इस कारण से कि एक तो उनको हमारे होने का भान रहे, दूसरा जैसे ही उनका हाथ छोड़ो वे तुरंत हाथ मोड़ लेतीं. इससे अनेक बार ड्रिप चढाने के लिए लगाई गई वीगो को बदलना पड़ा. उनके हाव-भाव देखकर लगा जैसे उनको साँस लेने में दिक्कत हो रही है. उनके गले को धीरे से सहलाया, सीने पर हाथ फिराया किन्तु उनको आराम समझ नहीं आया. और बस अगले पल ही एक खांसी-हिचकी सी मिश्रित स्थिति बनी. उसी के साथ मुंह से काले तरल पदार्थ की पलटी हुई और बस अइया  दूसरे लोक को चल दीं.

संसार में आने वाले व्यक्ति को जाना होता ही है, ये विधान है. अवस्था कैसी भी हो अपने सदस्य के जाने का दुःख होता ही है. अइया  के जाने का दुःख तो था ही. संतोष इसका था कि उनके अंतिम समय में पूरा परिवार उनके सामने था, उनके साथ था, जैसा कि बाबा के साथ न हो सका था. अइया  के चले जाने के लगभग दो दशक होने को आये मगर एक-एक घटना, एक-एक बात जीवंत है. उनके कमरे के साथ, उनके सामान के साथ, उनकी यादों के साथ. 

जिस दिन उनको पेंशन मिलती, हम तीनों भाइयों को वे कुछ न कुछ देतीं मगर उस नाती को कुछ ज्यादा धनराशि मिलती जो उनको लेकर जाता था. खाने-पीने को लेकर होती चुहल, उनके पुराने दिनों को लेकर होती बातें, उनकी कुछ बनी-बनाई धारणाओं पर हँसी-मजाक बराबर होता रहता, जो उनके बाद बस याद का जरिया है. 

अपने अंतिम समय तक वे इसे मानने को तैयार न हुईं कि सीलिंग फैन कमरे की हवा को ही चारों तरफ फेंकता है, उसमें किसी तरह का बिजली का करेंट नहीं होता है. वे अपनी त्वचा दिखाकर बराबर कहती कि ये पंखा बिजली से चलता है और बिजली फेंकता है. तभी हमारी खाल जल गई है. इसी तरह की धारणा रसोई गैस को लेकर बनी हुई थी. गैस की शिकायत होने पर वे कहती कि गैस की रोटी, सब्जी, दाल खाई जाएगी तो पेट में गैस ही बनेगी. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अइया  की याद में आये आँसुओं को मुस्कान में बदल देतीं हैं.