Sunday, 4 February 2018

तीन बेटियों से रोशन घर-परिवार


छोटे भाई पिंटू ने अपनी भतीजी का नाम परी उसके जन्म के पहले ही रख दिया था. हॉस्पिटल के लिए निकलती अपनी भाभी को उसकी प्यार भरी धमकी भी मिली कि यदि लड़का हुआ तो हम आपको घर नहीं लायेंगे. शाम का समय होने के कारण महिला चिकित्सालय में बहुत ज्यादा भीड़ तो नहीं थी मगर लोग पर्याप्त संख्या में थे. छोटे भाई की ख़ुशी, उसका मिठाई बाँटना, घर, परिवार, परिचितों को फोन द्वारा परी होने की सूचना देना वहां मौजूद सभी लोगों को आश्चर्य में डाल रहा था. क्या डॉक्टर्स, क्या नर्सेज, क्या बाहर बैठे लोग सभी को बेटी के होने पर ऐसी ख़ुशी देखकर अचम्भा ही हो रहा था. 

समाज में जहाँ एक तरफ बेटी के होने पर रोना-पीटना, मातम जैसा बोझिल माहौल सा बन जाता है वहाँ दूसरी तरफ उस चिर-परिचित माहौल के उलट हम सभी लोग प्रसन्न थे. न केवल भाई ही बल्कि सभी परिजन भी खूब खुश थे. किसी बड़े-बुजुर्ग की नजर में पहली संतान के रूप में पुत्री का जन्म होना हमें भाग्यशाली बना रहा था तो कोई इसे लक्ष्मी, सरस्वती के रूप में वरदान बता रहा था.

यह ख़ुशी अगले वर्ष उस समय दोगुनी हो गई जबकि परी की छोटी बहिन पलक का जन्म उसी जिला महिला चिकित्सालय में हुआ जहाँ स्वयं उसका जन्म हुआ था. परी के जन्म पर समूचे परिवार के रिश्तों को नया नाम मिला था क्योंकि वह हमारे परिवार की पहली संतति थी. कोई बाबा-दादी, कोई नाना-नानी, कोई चाचा-चाची, कोई मामा-मामी, कोई बुआ, कोई फूफा, कोई मौसी, कोई दादा. पलक के जन्म पर हम ताऊ-ताई बने और परी के जन्म पर झूमते भाई-बहू बने माता-पिता. पलक का जन्म ऑपरेशन से हुआ था. मोहल्ले की चाची के स्नेहिल संरक्षण में जब यह तय हो गया कि सामान्य प्रसव नहीं हो पायेगा तो स्वभाव से अत्यंत मधुर, मृदुभाषी, मिलनसार और हमारे प्रति विशेष सदिच्छा रखने वाली महिला सीएमएस डॉ० जैन सूचना पाते ही तत्काल आईं. वे ऑपरेशन थियेटर में तब तक रहीं जब तक कि प्रसव प्रक्रिया पूर्णतः सफल, सुरक्षित संपन्न न हो गई. ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकलने पर उनके शब्दों कुमारेन्द्र जी, आपका कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम सफल रहा, पुत्री का जन्म हुआ है ने हमें उत्साहित कर दिया.

हम दोनों भाइयों की पहली संतान पुत्री रूप में हमको, परिवार को सौभाग्य देने आ चुकी थी. पलक के जन्म पर वही ख़ुशी, वही मिष्ठान वितरण, घर लौटकर वही आतिशबाजी जो परी के जन्म पर हुई थी. चंद वर्षों के इंतजार के बाद सबसे छोटे भाई मिंटू (देवेन्द्र सिंह सेंगर) और बहू को भाग्यशाली होने का गौरव मिला. परी, पलक की छोटी बहिन पारुल ने जन्म लिया. दोनों बड़ी बहिनों की तरह पारुल का जन्म भी जिला महिला चिकित्सालय में ही हुआ था. वहां के स्थायी स्टाफ के लिए यह आश्चर्य का विषय था कि एक परिवार में तीसरी बेटी के जन्म के बाद भी किसी आम परिवार जैसा रोना-पीटना नहीं हो रहा था. उरई में जन्म से निवास करने के कारण, मामा-मामी के जिला चिकित्सालय से सम्बंधित होने के कारण और फिर हमारे कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम के सञ्चालन के कारण चिकित्सालय स्टाफ परिचित था.

तीनों बेटियों के जन्म पर एक विशेष बात जो हमने गौर की वो ये कि परी के जन्म पर वहां का तृतीय-चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नजराना जैसा कुछ भी मांगने से हिचक रहे थे. उसका कारण था पुत्री का जन्म होना. इसके बाद भी हम लोगों की तरफ से ख़ुशी-ख़ुशी उनकी अपेक्षा से अधिक उनको दिया गया. कुछ इसी तरह की हिचक पलक के जन्म के समय भी देखने को मिली थी. उनकी हिचकिचाहट के बाद भी उन सभी की ख़ुशी का ख्याल रखा गया. दो बेटियों के होने पर यह स्टाफ हम सबकी मानसिकता, चरित्र से परिचित हो चुका था. ऐसे में पारुल के होने पर उन सबने ख़ुशी-ख़ुशी स्वेच्छा से अपनी माँग को सामने रखा. जिला चिकित्सालय में कार्यरत हमारे एक मित्र ने कहा कि बहुत कम देखने को मिलता है ऐसा परिवारों में. इस कारण आपकी ख़ुशी में हम सब भी शामिल होकर नजराना लेने की हिम्मत कर पा रहे हैं.

यह बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच का सुखद परिणाम है कि हम तीनों भाइयों की पहली संतति बेटी है. अक्षयांशी, दिव्यांशी, अन्वितांशी रूप में तीन देवियाँ हमारे घर-परिवार को खुशहाल बनाये हुए हैं.



Thursday, 9 November 2017

एक नाम के अनेक अंजाम


सुबह-सुबह मोबाइल ने बजना शुरू किया. गुस्सा बहुत आया. रात को सोच कर सोये थे कि देर तक सोयेंगे पर कमबख्त मोबाइल. मन मार कर कॉल रिसीव की और आँखें बंद किये-किये ही हाय-हैलो बोल दिया. हैलो बोलते ही तेज गुस्सा भी आया साथ ही नरमी भी दिखाई आवाज़ में क्योंकि दूसरी तरफ से एक महिला स्वर उभर कर कान में मिश्री घोल रहा था. दूसरी तरफ वाले ने जो नाम पुकारा वह हमारे घर में तो क्या दूर-दूर तक न तो रिश्तेदारी-नातेदारी में था और न ही पास-पड़ोस में. 

यह सोच कर कि गलत नम्बर लगा दिया है मोहतरमा से हमने पूछा किसको नम्बर लगाया है, कौन सा नंबर लगाया है? जवाब में हमें हमारा ही नम्बर बताया गया. हमने फिर सवाल उछाला किसने दिया? अबकी जो जवाब मिला उससे स्पष्ट हो गया कि उन मैडम जी को बात हम से ही करनी है. दरअसल हम कुछ दोस्त मिल कर एक एसोसिएशन बनाये हैं और लोगों को उससे जोड़ने का काम चल रहा है. पी-एच०डी० होल्डर्स एसोसिएशन नामक एसोसिएशन में विशेष रूप से पी-एच०डी० वालों को ही जोड़ा जा रहा है. उसी से जुड़ने के लिए उस तरफ से फोन था.

सामने वाली महिला से हमने नितांत शालीनता से कहा कि ये नम्बर तो हमारा है पर इस नाम का यहाँ कोई नहीं है. जब उन्होंने हमारे दोस्त का नाम दोहराते हुए कहा कि फलां श्रीमान ने कहा था कि आप जिससे बात करेंगी, उसका नाम कुमारी इंदिरा है और उससे बात करके आपको एसोसिएशन के बारे में पूरी जानकारी मिल जायेगी. यदि आप कहते हैं कि इस नम्बर पर इस नाम का कोई नहीं है तो हम आपको डिस्टर्ब करने के लिए आपसे सॉरी बोलते हैं.

इतनी देर में नींद तो गायब ही हो गई और हमारी समझ में पूरी बात आ गई. बात समझते ही जोर की हँसी आई किन्तु अपनी हँसी को रोक कर कहा बताइये क्या जानकारी चाहिए? हम वही बोल रहे हैं जिनका नाम आपको फलां श्रीमान ने बताया है. अबकी शायद चकराने की बारी सामने वाले की थी क्योंकि उस तरफ खामोशी सी छा गई. हम समझ गये कि उस तरफ नाम को लेकर संशय उभर आया है. हमने तब उनको समझाया कि आपको जिस व्यक्ति से बात करनी है वो हम ही हैं, बस नाम के उच्चारण को लेकर कुछ गड़बड़ हो गई है. हम ही वो कुमारेन्द्र हैं जिससे आपको बात करनी थी  और आप परेशान न हों क्योंकि आप सही व्यक्ति से बात कर रहीं हैं. जब उन मैडम जी को असलियत बताई तो वे भी खिलखिला पड़ीं.

हो सकता है कि ये सब पढ़कर आप सब भी संशय में आ गए हों? आपको शायद अंदाज़ा न हो कि वे मोहतरमा किससे बात करना चाहतीं थीं? वो बात करना चाहतीं थीं कुमारी इन्दिरा से. उन्होंने अच्छे भले कुमारेन्द्र को संधि-विच्छेद करके कुमारी इन्दिरा बना दिया था. अकसर हमारे नाम को लेकर ऐसा होता रहा है. कभी नादानी में तो कभी प्यार में तो कभी चुहल में. हमारा एक मित्र है संदीप. वैसे तो वह हमें कुमारेन्द्र ही बुलाता है पर जब कभी अपने मूड में होता है तो कुम्मू ही बुलाता है. हमारे इन्हीं दोस्त के रिश्ते के एक भाई हैं. उनको मालूम है कि हमारा नाम कुमारेन्द्र है पर वे आज भी हमें रामेन्द्र बुलाते हैं और सुनने वाला भी समझ जाता है कि बात हमारी हो रही है.

कालेज के दौरान हमारा एक साथी था, उसने भी हमारे नाम के अलग-अलग हिस्से करके एक अलग ही नाम बना दिया था. यहाँ उस समय कालेज के समय का लड़कपन, चुहलबाजी ही काम करती थी. उसने हमारे नाम को चार हिस्सों में बाँट दिया था - कुमार, इन्द्र, सिंह, सेंगर. इसके बाद इसको अंग्रेजी के शार्टफार्म में बनाकर पुकारता था. किस (KISS) - कुमार का K, इन्द्र का I, सिंह का S, सेंगर का S.

इसी तरह और भी कई तरह से लोग उच्चारण में गलती करके नाम के कई रूप बनाते रहे हैं पर मोबाइल से बात करने वाली उन मैडम जी ने जो नाम दिया उसने तो हमें भी घुमा दिया.

Wednesday, 18 October 2017

दोस्ती दिल में बसी है


दोपहर का समय था, यही कोई दो-तीन बजे के आसपास का. मोबाइल की घंटी के साथ अनजाना नंबर डिस्प्ले पर दिखाई दिया. कॉल रिसीव करते ही उधर से नितांत अनौपचारिक लहजे में, सामान्य से हावभाव के साथ सवाल दागा गया, कुमारेन्द्र बोल रहे हो? हाँ कहने के बाद भी आवाज़ में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं हुआ. क्या कर रहे हो? शादी हो गई? कितने बच्चे हैं? घर में और कौन-कौन है? साइंस छोड़कर आर्ट्स में क्यों आ गए? साइंस वाली कोई मिली नहीं क्या? पुरानी वाली कहाँ है? जैसे लगभग दस-पंद्रह सवालों को ऐसे पूछा गया जैसे हमसे कोई पूछताछ की जा रही हो.

हम भी बहुत सहजता से हर सवाल का नापा-तुला जवाब दिए जा रहे थे. किसी तरह की कोई झुंझलाहट नहीं, किसी तरह का कोई प्रतिरोध नहीं. दो-तीन सवालों के बाद पता नहीं क्यों दिल से एक परिचित सा एहसास होने लगा था. दिल में इक लहर सी उठी है अभी जैसी स्थिति साफ़-साफ़ समझ आ रही थी. इतने सवालों के बाद भी हमारी तरफ से कोई अपेक्षित सी प्रतिक्रिया ने देख अगले ने इस बार जरा कड़क स्वर लाते हुए पूछा क्यों, इतनी देर से सवाल पूछते जा रहे हैं, तुमने पूछा भी नहीं कि कौन बोल रहे हो?

अबे, आलोकनाथ बोल रहे हो हमने अपने उसी एक-डेढ़ दशक पुराने अंदाज में जवाब दिया. बस इतना कहना था कि सामने वाले की सारी कड़क गायब हो गई. साफ़ समझ आया कि उसका गला रुंध गया है. आवाज़ में कम्पन बढ़ गया.

अबे यार, इतने साल बाद भी कैसे पहचान लिया तुमने?

ओये आलोक, तुम्हारी आवाज़ सिर्फ कान तक नहीं रही, दिल में बसी है. इसलिए एक-दो सवालों के साथ ही तुमको पहचान लिया था.

इसके बाद उसकी आवाज़ में खनक आ गई. हमारे हॉस्टल के एक अन्य साथी राजेश भाटिया से उसको हमारा नंबर मिला था. संभवतः आलोक की मंशा हमको आश्चर्य में डालने की रही होगी या फिर कुछ डराने जैसी कि कौन है जो जानकारी ले रहा है, पूछताछ कर रहा है.

बहरहाल, 1993 में कॉलेज छोड़ने के अगले साल ही आलोक से मिलना हुआ था, उसके बाद न मिलना न कोई बातचीत, इसके बाद भी 2010 में उसको महज आवाज़ से पहचान लेने पर किसी को भी आश्चर्यचकित होना ही पड़ेगा. दिल से दिल के जुड़े तार बरसों बाद भी खनकते हैं, संबंधों में आत्मीयता हो तो सालों बाद भी उसकी महक समाप्त नहीं होती है, रिश्तों में अपनापन हो तो बिना देखे भी एक-दूसरे की उपस्थिति महसूस होती है. इसे हमने कई बार महसूस किया है, उस दिन ये बात और पुख्ता रूप में सिद्ध हो गई.



Tuesday, 3 October 2017

कॉलेज होगा, सह-शिक्षा होगी तो कहानी जरूर होगी

कॉलेज होगा, सह-शिक्षा होगी तो कहानी जरूर होगी, अब सुनाना न हो तो अलग बात है. ये बात हमारी स्नातक की पढ़ाई के समय हमारे भांजे अभय ने हमसे कही थी. उस समय तो इधर-उधर की कहानी सुनाकर उसे बहला दिया था मगर अब जबकि अपनी कहानी लिखने बैठे तो कॉलेज के इतने किस्से याद आ रहे हैं. ऐसा लग रहा है मानो वे सब किससे आज भी इर्द-गिर्द ही घूम रहे हैं.

हकीकत में किसी के साथ कोई प्रेम कहानी भले ही न चल रही हो पर सबके सब किसी न किसी लड़की के साथ खुद को ऐसे जोड़ते थे जैसे उनको एक-दूसरे के लिए ही बनाया गया है. कभी-कभी तो स्थिति इतनी विकट हो जाया करती थी कि बयानबाजी किसी फ़िल्मी डायलॉग से भी आगे निकल जाया करती थी. किसी लड़की के सौन्दर्य बोध को लेकर कॉलेज के छात्रों में इतना आकर्षण हो जाया करता था कि सब उसे दूसरे की भाभी बताने में नहीं चूकते. हँसी-मजाक के ऐसे दौर के बीच इतना ख्याल रखा जाता कि किसी भी रूप में उस लड़की के साथ कोई बदतमीजी न हो.

किसी लड़की के साथ एक महाशय अपना सम्बन्ध जोड़ते बाकियों को हड़काते रहते थे. उसी दौरान उनको बहुत से लड़कों से अन्य लड़कों की भी खबरें मिली तो एक दिन वे इतने क्रोधित हो गए कि उन्होंने चुनौती ही दे डाली सभी लड़कों को. कॉलेज की बगिया में बैठकी के दौरान वे चिल्लाकर बोले कि उसकी तरफ किसी ने भी आँख उठाकर देख भी लिया तो इतनी गोलियाँ चलेंगी कि खोखे (खाली कारतूस) बीनने वाले लखपति हो जायेंगे. उसके बाद हम दोस्त लोग उनको अकसर चिढ़ा लिया करते कि भाईसाहब, जल्दी गोलियाँ चलवाओ, हम लोग लखपति बनना चाहते हैं.

उसी समय एक और मित्र परेशान घूमते थे. उनकी समस्या बड़ी ही अजीब और दूसरी तरह की थी. वे जीव विज्ञान वर्ग से थे और उनके वर्ग में बहुत सारी लड़कियां पढ़ती थीं पर हमारे उन मित्र की समस्या ये थी कि उनको जो सेक्शन मिला हुआ था उसमें नाममात्र को लड़कियाँ थीं जबकि दूसरे सेक्शन में लड़कियाँ बहुतायत में थी. उनकी परेशानी का निदान भी बताया कि वे अपना सेक्शन बदल लें मगर मित्रता कारणों के चलते वे अपना सेक्शन बदलने को तैयार नहीं हुए.

अगले ने हमसे अपनी समस्या बताई तो हमने उसका समाधान बताया. कहा, प्राचार्य को एक प्रार्थना पत्र लिखो कि दोनों सेक्शन में लड़कियों की बराबर-बराबर संख्या होनी चाहिए. अगले ने तुरंत इस समाधान का अनुपालन किया और अगले ही पल एक प्रार्थना-पत्र तैयार. अब समस्या ये आई कि प्राचार्य को दिया कैसे जाए? हमसे कहा कि यार तुम चलो साथ देने. हम मित्रों को तो अगले की मौज लेनी थी, सो कहा कि तुम्हारे सेक्शन में लड़कियाँ बढ़ने से हमें क्या फायदा? हम तो गणित वर्ग के हैं वहां तो वैसे भी लड़कियों का सूखा पड़ा हुआ है.

हमारे वे मित्र बेचारगी भाव दर्शाते हुए हम लोगों के आगे-पीछे बहुत घूमे मगर हम लोगों ने किसी ने भी उनकी इस काम में सहायता करने से तब तक के लिए इनकार कर दिया जब तक कि वो अपनी जेब ढीली न करे. अगला बंदा जो खाने का शौक़ीन था मगर खिलाने के नाम पर महाकंजूस हम कुछ दोस्तों को हलकी-फुलकी चाय पार्टी देने को मान गया. बस, पार्टी ली, चाय-समोसे गटके और फिर कल करवाते हैं काम का आश्वासन देकर प्रार्थना-पत्र जेब के हवाले किया.

कॉलेज का हँसी-मजाक का समय अपनी गति से निकलता रहा. चार-छह दिन के आश्वासनों के बाद वो पत्र वापस उसी मित्र की जेब में सुरक्षित हो गया. हम लोगों को प्राचार्य के पास जाना नहीं था और अगले की जाने की हिम्मत न हुई. हाँ, बेचारे मित्र बीच-बीच में उस दूसरे सेक्शन में जाकर लेक्चर के साथ सौन्दर्य का लाभ लेकर क्षतिपूर्ति करने लगे. चूँकि अगले का नाम वाद-विवाद, भाषण प्रतियोगिताओं, शतरंज आदि में प्रमुखता से रहता था इस कारण उसके दूसरे सेक्शन में बैठने पर न तो प्राध्यापकों को कोई आपत्ति हुई और विद्यार्थियों के आपत्ति करने का सवाल ही पैदा नहीं होता था. आखिर हॉस्टल की एकता यहीं तो काम आती थी.

बस ताकते-निहारते, चंद बातें करके तीन साल बिताकर सबके प्रेम अपनी-अपनी जगह चले गए. कुछ के प्रेम तो समय के साथ बदलते भी रहे. इन सबके बीच न गोलियाँ चली, न खोखे बीने गए और न हम लखपति बन पाए. हाँ, आज भी उन दिनों की मासूम प्रेम-कथाओं को याद करके मुस्की मार लेते हैं, यार-दोस्तों को चिढ़ा लेते हैं.

Thursday, 28 September 2017

बस में यात्रा, लगा कर छाता

यात्रायें छोटे से ही करते रहने का मौका मिलता रहा है. बचपन में भले ही यात्रायें बहुत दूर-दूर की न की गई हों, भले ही बहुत सारे दर्शनीय स्थल न घूमे हों पर लगभग सभी यात्राओं में कुछ न कुछ ऐसा घटित होता रहा है जो हमेशा याद बना रहा. चाचा लोगों के पास जाना, गाँव जाना, ननिहाल जाना होता रहता था. इन यात्राओं की मजेदार घटनाएँ आज भी मन को गुदगुदा जाती हैं. 

अच्छी तरह से याद है कि हम अपने छोटे भाई और अम्मा जी के साथ रोडवेज बस से अपने चाचा-चाची के पास कालपी जा रहे थे. कालपी उरई से लगभग पैंतीस किलोमीटर दूर है. उस समय हमारे मन्ना चाचा, जो सबसे बड़े चाचा थे, रहा करते थे. हम बच्चों के मन्ना चाचा भारतीय स्टेट बैंक में अपनी सेवाएँ देकर सेवानिवृत्त हुए और सामाजिक प्रस्थिति में श्री नरेन्द्र सिंह सेंगर के रूप में जाने-पहचाने जाते हैं. बरसात का मौसम था. तब पानी भी आज के जैसे छिटपुट नहीं बल्कि खूब जमकर बरसता था. इधर बस ने उरई छोड़ा ही है कि बादलों ने अपनी छटा बिखेरी. खूब झमाझम पानी. बस की खिड़कियाँ बंद कर दी गईं. मौसम सुहाना, झमाझम बारिश, हम दोनों भाई चलती बस से मौसम का भरपूर आनंद ले रहे थे.

तेज बारिश के चलते कुछ बूँदें अन्दर घुस आने में सफल हो जा रही थीं. उनके चलते अपनी तरह का ही आनंद आ रहा था. तभी ये आनंद ऊपर से आता मालूम हुआ. ऊपर देखा तो बस की छत से एक-दो बूँदें टपक रही हैं. उन टपकती बूंदों में बड़ा अच्छा लग रहा था मगर कुछ देर में उनके गिरने की गति बढ़ गई. हम और हमारा छोटा भाई, उस समय चार-पांच साल वाली अवस्था में होंगे, उन टपकती बूंदों से भीगने लगे तो हमको वहाँ से उठाकर दूसरी सीट पर बिठा दिया गया. कुछ देर में वहां से भी पानी टपकने लगा.

बाहर पानी लगातार तेज होता जा रहा था. बस की जंग लगी छत में पानी का भरना बराबर हो रहा था. जिसका परिणाम ये हुआ कि जगह-जगह से पानी बुरी तरह से अन्दर टपकने लगा. कुछ लोग जो इस मौसम की मार को समझते थे वे अपने साथ छाता लेकर चल रहे थे. आनन-फानन उन दो-चार लोगों ने अपने-अपने छाते खोल कर बस के बच्चों को भीगने से बचाया. अब आप समझिये उस हास्यास्पद नज़ारे को कि बाहर तेज बरसता पानी, चलती बस, बस में कई जगह से तेजी से टपकता पानी और बस के भीतर छाता खोले पानी से बचते लोग.

आज भी खूब तेज बारिश होने पर या फिर बारिश के समय होने वाली यात्रा में वो छाता लगाकर की गई बस-यात्रा जरूर याद आ जाती है.

Wednesday, 27 September 2017

गुब्बारों के फूटने में बच्चे की हँसी

उसका कुछ भी नाम हो सकता है, कोई भी जाति हो सकती है, कोई भी धर्म हो सकता है. असल में भूख का कोई नाम नहीं होता, मजबूरी की कोई जाति नहीं होती, समस्याओं का कोई धर्म नहीं होता. नाम, जाति, धर्म का ओढ़ना ओढ़े हुए वह बच्चा शहर को एक तरफ से दूसरी तरफ नापने में लगा हुआ था. उस जैसे और भी बच्चे हो सकते हैं. हो सकते हैं क्या, ऐसे बहुत से बच्चे हैं जो अपना बचपन भूलकर पेट की आग शांत करने का जुगाड़ करने में लगे हैं. वह भी ऐसे अनेकानेक बच्चों के बीच का एक बच्चा था. 

उसी तरफ से गुब्बारे बेचने का एक मन को छूने वाला आग्रह हुआ. हमारे एक पल की देरी से आने वाले जवाब के अन्तराल के साथ ही घर जाने की उसकी आतुरता दिखाई दी. किसी भी बच्चे का पेट की आग बुझाने को काम करते देखना अपने आपमें दुखद होता है. इसके बाद भी यदि किसी बच्चे द्वारा कोई हल्का-फुल्का सा काम करते देखते हैं तो अपने आपमें इसका सुकून मिलता है कि कम से कम वो भीख तो नहीं माँग रहा, किसी की जेब तो नहीं काट रहा, कहीं चोरी-चकारी तो नहीं कर रहा है. 

गुब्बारे लेने के आग्रह के समय रात का आठ बजने को आया था. हलकी सी सर्दी के बीच उस बच्चे को अभी लगभग पाँच-छह किमी दूर अपने गाँव जाना था. उसके गुब्बारे लेने का आग्रह स्वीकार किया तो उसके चेहरे पर मुस्कान खिल उठी. इस सहमति के साथ जैसे ही उसकी एक फोटो खींचने की अनुमति उससे माँगी तो उरई शहर के पास के एक गाँव का निवासी, वहीं गाँव के विद्यालय में कक्षा छह का विद्यार्थी वह बच्चा अपनी फोटो लिए जाने की बात से चहक उठा. एक पल को भूल गया कि उसने गुब्बारे लेने का आग्रह किया था. दो फोटो खींच सके कि उसकी ख़ुशी पर पेट की आग फिर हावी हो गई. पेट की आग कहाँ कुछ भूलने देती है, उसकी एक पल की ख़ुशी के पीछे प्रश्नवाचक शब्द निकले. भूख ने उसके अन्दर संदेह पैदा किया कहीं बिना गुब्बारे लिए ही बस फोटो खींच कर ये भाग न जाये. गुब्बारे के धीमे से निकले उसके स्वर को अपनी सहमति के द्वारा आश्वस्त किया तो उसके चेहरे पर फिर से मुस्कान तैर गई.

फोटो खींचने के बीच मोबाइल अपनी जेब के हवाले किया. गुब्बारों के लेने और पैसों के देने के बीच उसने अपने बारे में बताया. विद्यालय जाना और फिर लौटकर गुब्बारे लेकर उरई आ जाना. दिनभर में कोई 35-40 गुब्बारे बेचने के बाद रात को गाँव वापस पहुँच कर कुछ लिख-पढ़ लेना. कक्षा छह के विद्यार्थी को अनुशासित रूप में विद्यालय-परिवार, अध्ययन-व्यवसाय, घर-बाज़ार के साथ तालमेल बनाये देखना अपने आपमें अचरज में डाल गया. एकबारगी मन में आया कि इसकी मदद कुछ पैसे देकर की जाये फिर लगा कि जो बच्चा खुद को कहीं न कहीं भीख माँगने से अलग रखे हुए है, उसे धन की मदद भिक्षावृत्ति को प्रेरित तो नहीं कर देगी? साथ ही लगा कि जो बच्चा पूरे अनुशासित रूप में अपना संतुलन बनाकर आगे बढ़ रहा है, कहीं उसकी खुद्दारी, उसकी राह में व्यवधान उत्पन्न तो नहीं करेगा.

इस दो-चार मिनट की उलझन के बाद जितना संभव हो सकता था, गुब्बारे लिए. गाड़ी-सामान के साथ हाथों की सीमित संख्या ने भी गुब्बारों की खरीद पर अंकुश लगाया. बच्चा अपनी अतुलित प्रसन्नता के साथ गुब्बारे तोड़-तोड़ देता जा रहा था और हम उनको संभालने में लगे हुए थे. बाज़ार से घर तक की यात्रा में कुछ गुब्बारे नवदुर्गा के पावन अवसर पर सजी देवी माँ की झांकियां देख लौट रहे बच्चों में बंट गए तो कुछ गुब्बारे भीड़ की, हवा की चपेट में आकर फूट गए. फट-फट की आवाज़ लोगों में क्या सन्देश दे रही होगी ये तो पता नहीं पर हमें कहीं न कहीं उस ध्वनि में बच्चे की हँसी सुनाई दे रही थी. घर पहुँचने के बाद घर के बच्चे भी चहक-चहक कर बचे हुए कुछ गुब्बारों को फोड़ने-उड़ाने में लग गए.

Saturday, 23 September 2017

हॉस्टल के मूँछ कटवा भाईसाहब

कुछ दिनों पहले मुँह नुचवा, चोटी कटवा जैसी घटनाओं की अफवाह चारों तरफ फैली पड़ी थी. कोई अपने नुचे मुँह के साथ खबर बना हुआ था तो कोई महिला अपनी कटी चोटी के साथ टीवी पर दिखाई दे रही थी. इन खबरों के बीच उन महिलाओं को आसानी हो गई जो बॉब कट बाल रखना चाहती थीं मगर कतिपय पारिवारिक स्थिति के चलते अपनी इच्छा का गला घोंट दे रही थीं. चोटी कटवा ने कहीं न कहीं उनकी मदद कर दी. ऐसी घटनाओं को जब-जब पढ़ते तो अपने हॉस्टल के मूँछ कटवा की याद आ जाती.

साइंस कॉलेज, ग्वालियर हॉस्टल में हम जैसे बहुत से नए लड़के थे जो दाढ़ी-मूँछ की शुरुआती झलक देखने को तरस रहे थे. इसी के साथ कुछ सीनियर्स भाई बाक़ायदा दाढ़ी-मूँछधारी थे. मूँछ वाले भाइयों को अपनी मूँछ पर इतराना होता था तो बे-मूँछ भाई अपनी जरा-जरा सी रेख को हवा में उमेठते हुए उनके साथ ताल ठोंकते नजर आते. हम जैसे कुछ भाई दाढ़ी-मूँछ धारी भाइयों का आफ्टर शेव लोशन का इस्तेमाल किसी इत्र की करते. दाढ़ी-मूँछ धारी भाइयों में चिंता का विषय होता कि कौन उनके लोशन पर हाथ साफ कर ले रहा है. दाढ़ी-मूँछ न होने के कारण हम लोगों पर कोई शक भी नहीं करता कि हम लोग ऐसा करते होंगे. ऐसी न जाने कितनी शरारतें हॉस्टल की हवा में तैरती-उतराती रहती थीं.

इन तमाम शरारतों के बीच हमारे राकेश शर्मा भाईसाहब (सीनियर्स को सर के स्थान पर भाईसाहब कहने की परम्परा थी) को अजीब सी शरारत सूझी. देर रात वे चुपके से अपने सहपाठी या अपने सीनियर (जो मूँछधारी होते) के कमरे में जाते और तेज़ ब्लेड के एक वार से उसकी एक तरफ़ की मूँछ उड़ा आते थे. उनके द्वारा यह सब इतनी सहजता से किया जाता कि सोये हुए भाई को खबर ही न हो पाती कि राकेश भाईसाहब उसकी मूँछ के साथ क्या कर गए. एक तरफ की मूँछ से वंचित वह भाई जब अगली सुबह अपने  चेहरे को देखता, अपनी एक तरफ की उड़ी हुई मूँछ देखता तो परेशान हो जाता, हैरान भी होता. बाक़ी लोग मौज लेते हुए इसे सात नम्बर कमरे के भूत का काम बताते. हॉस्टल के सात नंबर कमरे को हमने कभी खुले नहीं देखा. ऐसा कहा जाता कि उसमें एक भूत है और इसी कारण उस कमरे को खोला नहीं जाता. वह कमरा किसी को दिया नहीं जाता. उसमें किसी को रुकाया भी नहीं जाता. असलियत क्या थी न किसी ने बताया, न ही जानने की कोशिश की.

बहरहाल बात अपने हॉस्टल के मूँछ कटवा की. दो-चार लोगों की मूँछें उड़ने के बाद पता चल गया कि ये मूँछ उड़ाने वाला भूत कौन है. इस शरारत को राकेश भाईसाहब ने उन्हीं लोगों पर आज़माया जो अपनी ज़रा-ज़रा सी मूँछों पर इतराते फिरते थे. एक तरफ़ की उड़ने के बाद अगला आदमी दूसरे तरफ़ की ख़ुद उड़ाता था. इसके बाद हम सभी ख़ूब मौज लेते थे, बिना मूँछ वाले भाईसाहब की.

ऐसे ही मूँछधारी भाइयों में में एक भाईसाहब हुआ करते थे एम०पी० सिंह कुशवाह. हॉस्टल के मूँछ कटवा ने उनकी भी एक तरफ़ की मूँछ उड़ा दी. इसके बाद भी उन्होंने दूसरे तरफ़ की मूँछ न बनाई. जो मूँछ उड़ा दी गई थी, उस जगह वे तब तक बैंडेज लगाते रहे जब तक कि उनकी मूँछ न आ गई.

पता नहीं ये चोटी-कटवा या मुँहनुचवा किसलिए ऐसा कर रहा था पर हमारे भाईसाहब ने फ़ुल मौज-मस्ती-शरारत में मूँछ कटवा की भूमिका निभाई. इसमें किसी की मारपीट न हुई, किसी को भूत-चुड़ैल न घोषित किया गया. आज भी ये शरारत याद आने पर गुदगुदी सी होने लगती है.