Sunday, 12 March 2017

होली का हुड़दंग रेलवे स्टेशन तक


होली आये और होली में किये हुए हुड़दंग भी याद न आयें तो समझो कि होली मनाई ही नहीं. हम लोग संयुक्त परिवार में रहते आये हैं और बचपन से ही सभी परिजनों के साथ ही होली का मजा लूटते रहे हैं. होली जलने की रात से शुरू हुआ धमाल कई-कई दिनों तक चलता रहता था. बचपन में अपने बड़ों की मदद से होली का हुड़दंग किया जाता था जो बड़े होने पर स्वतंत्र रूप में बदल गया. हॉस्टल का माहौल पारिवारिकता से भरपूर था. हम सभी छात्रों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं था. पहला ही साल था और हम सभी मिलकर दीपावली, दशहरा आदि अपने-अपने घरों में मनाने के पहले हॉस्टल में एकसाथ मना लिया करते थे. इसी विचार के साथ कि होली भी घर जाने के पहले हॉस्टल में मना ली जायेगी सभी कुछ न कुछ प्लानिंग करने में लगे थे.

हम कुछ लोगों का एक ग्रुप इस तरह का था जो हॉस्टल की व्यवस्था में कुछ ज्यादा ही सक्रिय रहा करता था. इसी कारण से उन दिनों हॉस्टल की कैंटीन की जिम्मेवारी हम सदस्यों पर ही थी. होली की छुट्टियां होने के ठीक दो-तीन दिन पहले रविवार था. रविवार इस कारण से हम लोगों के लिए विशेष हुआ करता था कि उस दिन एक समय, सुबह ही, भोजन बना करता था. खाना बनाने वाले को रात के खाने का अवकाश दिया जाता था. इसी वजह से रविवार को पूड़ी, सब्जी, खीर, रायता आदि बनाया जाता था.

हम सदस्यों ने सोचा कि कुछ अलग तरह से इस दिन का मजा लिया जाये. हमारी इस सोच में और तड़का इससे और लग गया जब पता चला कि हॉस्टल के बहुत से छात्र उसी रविवार को अपने-अपने घर जा रहे हैं. रविवार के भोजन को खास बनाने की योजना हम दोस्तों तक रही और अन्य सभी छात्रों के साथ आम सहमति बनी कि होली इसी रविवार को खेली जायेगी, उसके बाद ही जिसको घर जाना है वो जायेगा. अपनी योजना के मुताबिक उस दिन खीर में खूब सारी भांग मिलवा दी. इस बात की चर्चा किसी से भी नहीं की. सभी ने मिलकर खाना खाया और हम दोस्तों ने सभी को खूब छक कर खीर खिलवाई. मीठे के साथ भांग का नशा और उस पर होली की हुड़दंग का सुरूर. हॉस्टल के सभी छात्रों पर तो जैसे मस्ती खुद आकर विराज गई हो. खूब दम से होली खेली जाने लगी, टेप चलाकर गानों के साथ नाच भी शुरू हुआ. किसी के बीच सीनियर-जूनियर जैसी बात नहीं दिख रही थी.

इसी बीच कुछ छात्र जो होली नहीं खेलना चाहते थे और उन्हें घर भी जाना था, सो उन्होंने खीर भी इतनी नहीं खाई थी कि नशा उनको अपने वश में करता. ऐसे लगभग पांच-छह छात्रों ने हॉस्टल की दीवार फांदकर रेलवे स्टेशन की ओर भागना शुरू किया. उनके दीवार फांदने का कारण ये था कि हम सभी रंगों से भरी बाल्टी आदि लेकर दरवाजे पर ही बैठे थे ताकि कोई भी बिना रंगे घर न जा पाये. हम लोगों को भनक लग गई कि कुछ लोग जो हमारी इस होली में साथ नहीं हैं वे पीछे से भाग गये. बस फिर क्या था, होली का हुड़दंग सिर पर चढ़ा हुआ था, भांग का नशा अपनी मस्ती दिखा ही रहा था, हम सभी जो जिस तरह से बैठा था वैसे ही रेलवे स्टेशन की तरफ दौड़ पड़ा. 

कोई नंगे पैर तो कोई एक पैर में चप्पल-एक पैर में जूता बिधाये; कोई शर्ट तो पहने है पर पैंट गायब तो कोई नंगे बदन दौड़े ही जा रहा था. और तो और उन्हें रंगना भी था जो बिना रंगे निकल पड़े थे तो हाथों में रंगों से भरी बाल्टी भी लिये सड़क पर दौड़ चल रही थी. आप सोचिए कि बिना होली आये, होली जैसी मस्ती को धारण किये एकसाथ दस-पंद्रह लड़के बिना किसी की परवाह किये सड़क पर दौड़े चले जा रहे थे. लगभग चार-पांच किमी की दौड़ लगाने के बाद स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर हुरियारों की टोली पहुंच ही गई, वे भी स्टेशन पर बरामद कर लिए गये जिनको रंगना था. बस फिर क्या था चालू हो गई होली रेलवे स्टेशन पर ही. मस्ती का मूड, भांग का सुरूर, अपने साथियों को रंगने के बाद अपनी तरह के ही कुछ मस्ती के दीवाने यात्रियों को भी रंगना शुरू किया गया. कुछ देर का हुल्लड़ देखने के बाद प्लेटफॉर्म पर बनी चौकी के सिपाहियों ने आकर दो-दो हाथ  करने चाहे तो रंगीन हाथ उनके साथ भी हो गये. बाद में समझाने पर सभी वापस हॉस्टल लौट आये.

भांग का नशा तो दूसरे दिन दोपहर तक उतर गया किन्तु सिर का भारीपन दो दिनों तक बना रहा. इसी भारीपन में नीबू चूस-चूस कर अपनी प्रयोगात्मक परीक्षा दी, जो सोमवार को सुबह सम्पन्न हुई. रेलवे स्टेशन की हमारी होली की खबर हमारे हॉस्टल वार्डन डॉ० धीरेन्द्र सिंह चन्देल साहब के पास तक आ चुकी थी. सभी प्रोफेसर्स को भी पता था कि हम लोग किस तरह की मस्ती के बाद प्रयोगात्मक परीक्षा दे रहे हैं. यह तो भला हो उन सभी गुरुजनों का जिन्होंने पूरे सहयोग के साथ हमारी होली के आनन्द और प्रयोगात्मक परीक्षा के बीच संतुलन बिठा दिया.

आज भी कभी-कभी होली में भांग का स्वाद लेने का प्रयास किया जाता है तो हॉस्टल की होली और रेलवे स्टेशन का हुड़दंग याद आये बिना नहीं रहता है.

Friday, 10 March 2017

सम्मान हमारी कलम को, लेखन को


मंचासीन सत्र अध्यक्ष की ओर से इशारा होते ही संचालक महोदय ने भोजनावकाश का संकेत किया. राजकीय महाविद्यालय, चरखारी के सभागार में मनोविज्ञान विषय पर आयोजित राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में उपस्थित लोग अपनी-अपनी जगह से उठकर भोजन कक्ष की तरफ चल दिए. कुछ लोग अतिथियों से परिचय का आदान-प्रदान कर रहे थे. कुछ लोग धीरे-धीरे चलते हुए विषय से सम्बंधित विद्वानों से विमर्श करते जा रहे थे. एक हॉल में भोजन की व्यवस्था की गई थी. आधुनिक परिपाटी से इतर सभी अतिथियों को, आमंत्रितजनों को कुर्सी-मेज पर ससम्मान बिठाकर भोजन करवाया जा रहा था. वरिष्ठजनों को आगे बढ़ाते हुए उरई से एकसाथ पहुँचे हम कुछ मित्र अपने बैठने की व्यवस्था देखने में लग गए. 

तभी आप वही कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी हैं जो अमर उजाला में लिखते हैं? के द्वारा एक लड़की ने अपना संशय दूर करना चाहा. उसके प्रश्नवाचक वाक्य को जैसे ही हमारी सहमति मिली उस लड़की सहित अन्य चार-पांच छात्र-छात्राओं के चेहरे पर अनोखी चमक सी फ़ैल गई. उन लोगों के द्वारा अभिवादन करने, उनके हावभाव से ऐसा लगने लगा जैसे बहुत बड़ा नाम उन लोगों के सामने खड़ा हो.

अभी तक प्रकाशित हो चुके तमाम पत्रों की सामग्री, उसी राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किये गए शोध-पत्र की चर्चा, आगे किस विषय पर लिखेंगे सहित कई विषयों पर बात हुई. उन लोगों ने इस पर भी राय माँगी कि वे लोग भी लिखना चाह रहे हैं, कैसे लिखा जाये, कैसे छपा जाये, क्या लिखा जाये जिसे पढ़ा जा सके आदि-आदि. एक तरफ उन लोगों के द्वारा बातचीत का क्रम जारी था और दूसरी तरफ वे छात्र-छात्राएं हम लोगों के लिए उसी हॉल में एक किनारे कुर्सी-मेज की अतिरिक्त व्यवस्था कर चुके थे. ऐसा समझ आया कि सबके बीच हम लोगों को बिठाकर वे अपनी बातचीत का, संपर्क का अवसर खोना नहीं चाह रहे थे. भोजन करवाते समय उनका आसपास रहना, उसके बाद सभागार में भी साथ-साथ रहना, अनेक बिन्दुओं पर चर्चा करना, लेखन सम्बन्धी अपनी समस्याओं-जिज्ञासाओं का समाधान चाहना हमें अपने आपमें अद्भुत अनुभव करवा रहा था. 

टीवी पर किसी कलाकार, लेखक, साहित्यकार आदि द्वारा अधिकतर यह कहते सुना कि उसका सबसे बड़ा सम्मान उसके पाठकों, दर्शकों का प्यार, स्नेह, समर्थन है. तब ऐसी बात बड़ी आदर्शात्मक लगती थी किन्तु चरखारी के उस अनुभव ने उस आधार पर खड़ा कर दिया जहाँ कि अपने प्रशंसकों का प्यार, स्नेह, सम्मान ही सबसे बड़ा पुरस्कार लगता है. उरई से चरखारी जाते समय हमारे अन्दर उत्साह, रोमांच था अपनी पहली राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में सहभागिता करने का. अब जबकि चरखारी से उरई के लिए वापसी कर रहे थे तब अपनी लेखन-क्षमता का विस्तार, अपने पाठकों का प्यार मिलता देखकर अपार ख़ुशी का अनुभव हो रहा था.

Thursday, 9 March 2017

जो गुजर गई सो गुजर गई

होश संभालने के बाद से खुद को खुद से ही अलग पाया. अतीत को लादकर चलने की आदत नहीं रही और भविष्य के लिए परेशान नहीं रहे. वर्तमान को अपना समझा और उसको खूब मौज-मस्ती के साथ जिया भी. इसका अर्थ यह भी नहीं कि अतीत से कुछ सीखा नहीं और भविष्य के लिए कोई सपना देखा ही नहीं. सीखने वाली बातों को सीखा और सपनों के लिए बिना परेशान हुए सपनों को देखा, खूब देखा और उन्हें पूरा करने का प्रयास भी किया. 

आँख खुलने के साथ नए दिन का आरम्भ और फिर कोई नया सपना. कभी खुद से जुड़ा हुआ, कभी अपनों से जुड़ा हुआ, कभी समाज के लिए, कभी देश के लिए. सपनों की कोई कीमत तो अदा करनी न थी सो खूब सारे सपने देखे. मौज-मस्ती के सपने देखे, कुछ विशेष करने के सपने देखे. तमाम सारे सपनों के बीच कभी भी एक सपना नहीं देखा, वो था शादी करने का, परिवार बसाने का. कारण कभी समझ भी नहीं आया कि जिस उम्र में प्रत्येक युवक-युवती अपने विवाह, अपने जीवनसाथी के बारे में सपने सजाते रहते हैं, उस उम्र में भी हमने शादी के बारे में, अपने जीवनसाथी के बारे में नहीं सोचा था.

ऐसा नहीं कि हमारे मित्रों की सूची में लड़कियाँ न रही हों; लड़कियों के प्रति आकर्षण न हो; लड़कियों की तरफ से प्रेम-प्रस्ताव न मिले हों; हमें प्रेम न हुआ हो मगर किसी के प्रति उसको जीवनसाथी के रूप में देखने का भाव नहीं जागा. हाँ, एक के प्रति ऐसा भाव जागा भी तो इतनी देर से कि वो सामने होकर भी सामने न थी; पास होकर भी बहुत दूर थी. जब कभी अपने शादी सम्बन्धी सपने न देखने का कारण सोचते, उस पर विचार करते तो लगता कि जो कुछ करने का हमारा मन है, जिस तरह का हमारा स्वभाव है वह किसी बंधन को स्वीकार नहीं कर पायेगा. यदि किसी भी तरह से उस बंधन को स्वीकार किया भी तो जिम्मेवारी की भावना के चलते शेष सपनों के प्रति अवरोध सा उत्पन्न हो जायेगा.

हो सकता है, विवाह बहुत से लोगों के लिए बंधन न हो, आवश्यक अथवा अनिवार्य प्रक्रिया हो पर हमारे लिए बंधन इस दृष्टि से है कि कोई एक लड़की अपने समूचे घर-परिवार को छोड़कर, सारे रिश्तों को एक रिश्ते पति के लिए पीछे छोड़कर आती है. दो लोगों से आरम्भ परिवार समय के साथ विकास करता है. यही वे सारी स्थितियाँ होती हैं जो जिम्मेवारी की माँग करती हैं. जब सपनों की दुनिया में हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया का दर्शन रहा हो; समूची धरती को दो कदमों से नाप लेने की मंशा हो; सारे सौन्दर्य को कैमरे के सहारे अपनी मुट्ठी में कैद करने की अकुलाहट हो; कभी हसरत थी आसमां छूने की, अब तमन्ना है आसमां के पार जाने की जैसा दर्शन हो तब कोई भी अनचाही जिम्मेवारी बंधन ही महसूस होती है.

घर में सबसे बड़े होने के नाते न चाहते हुए भी अंततः उस बंधन को स्वीकार करना पड़ा, जिसके बारे में कभी विचार भी नहीं किया था. एक निर्णय से सारे के सारे सपने ध्वस्त होते दिखे. अस्थिर आर्थिक आधार पर तो खुद खड़े थे और अब एक लड़की को उसी अस्थिरता पर लाने वाले थे. कुछ अलग सा करने की दुनिया अब बंधे-बंधाये तरीकों से संचालित होने वाली थी. हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाने की दम रखने वाला व्यक्ति फिक्रमंद होने जा रहा था. भविष्य की परवाह न करने वाले को भविष्य की चिंता सताने लगी. आखिर अब सवाल सिर्फ खुद के अस्तित्व का नहीं, उसके अस्तित्व का अधिक था जिसे हमारे भरोसे आना था. उनके अस्तित्व का था जिनको हम दोनों के भरोसे जन्मना था. ऊहापोह में रहकर अपनी सपनीली दुनिया को पीछे कर परिवार की ख़ुशी में शामिल हो गए. अम्मा-पिताजी सहित बाकी परिवार की ख़ुशी अपने सपनों से बहुत-बहुत बड़ी लगी. पल-पल सरकती ज़िन्दगी आखिरकार 08 दिसम्बर 2003 को आकर रुक गई जबकि हम दोनों ने एकदूसरे को जयमाला पहनाकर अग्नि के सात फेरे लिए.

परिजनों, इष्ट मित्रों, सहयोगियों की भीड़ होने के बाद भी अकेले से इलाहाबाद पहुँचे और 09 दिसम्बर को एक जिम्मेवारी, एक बंधन लेकर वापस लौटे. नहीं पता था कि साथ आने वाला कितना सहयोगी बनेगा? नहीं मालूम था कि आने वाला हमारे सपनों की दुनिया को कितना आगे ला पायेगा, ला भी पायेगा या नहीं? नहीं पता था कि उसके साथ उसके कौन-कौन से सपने आ रहे हैं? नहीं मालूम था कि उसके सपनों की सम्पूर्णता हमारे द्वारा किस तरह, कैसे होगी? रौशनी के बीच सबकुछ अँधेरे में था. पहली रात एक शाल, एक चाँदी का सिक्का जीवन-संगिनी निशा के हाथों में रखकर उससे अपनी अपेक्षा व्यक्त की कि तुमको कभी सुख-सुविधाओं की कमी नहीं होने देंगे बस पारिवारिकता का धन तुम संभाले रहना.

समय गुजरता रहा, इस बीच पिताजी का देहांत, हमारी दुर्घटना, छोटे भाई-बहिनों की शादी, बच्चों का जन्म, परिवार के अन्य मांगलिक कार्यक्रमों सहित अनेक छोटी-बड़ी घटनाएँ हम दोनों के बीच से गुजरीं. तमाम सारे विषयों पर सहमति भी बनी, तमाम असहमतियाँ भी रहीं. प्रेम-स्नेह भी दिखा, कहा-सुनी भी हुई. इसके बाद भी विगत एक दशक की दाम्पत्य यात्रा का हम अपनी दृष्टि से जब खुद का आकलन करते हैं तो अपने आपको असफल ही पाते हैं. सामाजिक जिम्मेवारियों, लेखकीय दायित्व आदि के बीच पारिवारिक जिम्मेवारियों का निर्वहन करने के बाद भी इस जिम्मेवारीपूर्ण निर्वहन में खुद में कुछ कमी पाते हैं. अनेकानेक बार ये निर्णय अपने ही कदमों में बंधन महसूस होता है. पारिवारिक जिम्मेवारियों के साथ पूर्ण न्याय सा नहीं दिखता है. शादी के लिए हाँ कहने का निर्णय कभी न सुधार सकने वाली गलती दिखाई देती है.

कभी लगता है कि एक बार परिवार के इस निर्णय का तीव्र विरोध कर लिया होता तो अधिक से अधिक क्या होता, तमाम सारी अच्छाइयों के बाद भी परिवार में बनी हमारी विरोधात्मक छवि, लड़ाकू छवि, न दबने की छवि, विद्रोही प्रकृति की छवि, जिद्दी छवि में थोड़ी सी और बढ़ोत्तरी हो जाती. फिलहाल, जो हो गया सो हो गया, जो गुजर गई सो गुजर गई. 

Monday, 19 September 2016

इतनी सी है तमन्ना इस जीवन की


कोई भी प्राकृतिक शक्ति जो जन्म-मृत्यु को संचालित-नियंत्रित करती होगी, उसने हमारा समय भी निर्धारित कर रखा होगा. मनुष्य कुछ स्थितियों, प्रस्थितियों को स्वयं बनाता, प्राप्त करता है. कुछ की प्राप्ति उसको पारिवारिकता के चलते प्राप्त होती है. कुछ स्थितियों का निर्माण उसके लिए समाज करता है. कुछ का निर्माण वही अदृश्य ताकत कर रही होती है जो जन्म-मृत्यु को नियंत्रित-संचालित कर रही होती है. जन्म-मरण के इस पूर्व-निर्धारित अथवा किसी शक्ति-संपन्न के द्वारा निर्धारित किये जाने की समझ न बना पाने के कारण, उस रहस्यमयी सत्ता की अनेक परतों को न सुलझा पाने के कारण ही मनुष्य उसे सर्वशक्तिमान समझता है. 

हाँ तो, उसी सर्वशक्तिमान, रहस्यमयी सत्ता की पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार हमको धरती पर अवतरित होना था, सो हो गए. हाहाहा, आपको अवतरित शब्द पढ़कर आश्चर्य लगा होगा, कहिये हँसी भी आई हो? भले ही आई हो पर यह हमारा अवतरण ही कहा जायेगा क्योंकि समूचे परिवार की विशेष माँग पर हमारा जन्म हुआ. किसी समय जमींदारी व्यवस्था से संपन्न क्षत्रिय परिवार के वर्तमान शैक्षणिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, स्नेहिल परिवेश में उस परिवार के असमय अदृश्य हो गए एक चमकते सितारे के उत्तराधिकार के रूप में हमको हाथों-हाथ लिया गया. हाथों-हाथ क्या, सभी ने अपनी पलकों पर बिठाया, अपनी साँसों में बसाया, अपनी धड़कनों में महसूस किया. हमारी एक-एक साँस समूचे परिवार की साँस बनी. हमारा आँख खोलना उनकी सुबह बनी तो पलक झपकाना उनकी हँसी बनी. हमारा रोने की कोशिश मात्र ही समूचे परिवार के लिए किसी प्रलय से कम नहीं होता.

परिवार का स्नेह, लाड़-प्यार 19 सितम्बर 1973 से जो मिलना शुरू हुआ, वह आजतक कम न हुआ. अपनत्व, ममत्व का सूखा कभी सोचने को भी नहीं मिला. छोटे भाईयों-बहिनों के लिए बड़े भाईजी के रूप में हम भले ही उनको संबल दिखाई पड़ते हों मगर अपने से हर बड़े के लिए वो नन्हा चिंटू हमेशा उतना ही छोटा रहा. यह सौभाग्य हर किसी को नहीं मिलता कि उम्र के चार दशक बीत जाने के बाद भी पारिवारिक स्नेह का ग्राफ कम होने के बजाय बढ़ता ही रहे. इस ग्राफ बढ़ने का कारण साल-दर-साल नए-नए रिश्तों का बनते-जुड़ते जाना भी रहा. परिवार में नए-नए सदस्यों का शामिल होना होता रहा, कभी दामादों के रूप में, कभी बहुओं के रूप में तो कभी भावी पीढ़ी के रूप में.

कामना उस रहस्यमयी सत्ता से, जिसने इस जन्म का निर्धारण इस परिवार में किया, कि यदि जन्म-मरण का चक्र सतत प्रक्रिया है तो वह सदैव इसी परिवार में जन्म को अनिवार्य रूप से निर्धारित कर दे. श्रीमती किशोरी देवी-श्री महेन्द्र सिंह सेंगर की संतान के रूप में ही हमारा जन्म अनिवार्य कर दे. 

Tuesday, 13 September 2016

हर बार रुला जाता है बुढ़वा मंगल


उस दिन बुढ़वा मंगल था. स्थानीय अवकाश होने के कारण विद्यालय, कार्यालय, कचहरी आदि में छुट्टी थी. पिताजी घर पर थे, छोटा भाई हर्षेन्द्र अपने कुछ मित्रों के साथ उरई के पास बने संकट मोचन मंदिर गया हुआ था. हम भी अपनी छुट्टी के चलते ग्वालियर नहीं गए थे. मंदिर वगैरह जाने का, बुढ़वा मंगल को होने वाला दंगल देखने का ऐसा कोई विशेष शौक न तो हमारा था और न ही हमारे मित्रों का. ऐसे में दोपहर को घर में ही आराम से पड़े थे. बात सन 1991 की है, तब हाथ में न तो मोबाइल होता था, न मेज पर कंप्यूटर और न ही इंटरनेट जैसा कुछ. सो किताबों से अपनी दोस्ती को सहज रूप से आगे बढ़ा रहे थे. 

तभी किसी ने दरवाजे को बहुत जोर-जोर से पीटना शुरू किया. साथ में वो व्यक्ति पिताजी का नाम लेता जा रहा था. दरवाजा पीटने की स्थिति से लग रहा था कि उसे बहुत जल्दी है. हम शायद जोर से चिल्ला बैठते मगर उसके द्वारा पिताजी का नाम बार-बार, चिल्ला-चिल्ला कर लेते जाने से लगा कि कोई ऐसा है जो उम्र में पिताजी से बड़ा है. जल्दी से उठकर दरवाजा खोला तो सामने गाँव के द्वारिका ददा हैरान-परेशान से खड़े थे. इतनी देर में अन्दर से पिताजी भी बाहर आ गए. चाचा की तबियत बहुत ख़राब है. ददा के मुँह से इतना ही निकला.

कहाँ हैं? के सवाल पर उनका हाथ पास के क्लीनिक की तरफ उठा. हमने बिना कुछ आगे सुने, उस तरफ पूरी ताकत से दौड़ लगा दी. बमुश्किल सौ मीटर की दूरी पर बने उनके क्लीनिक के सामने एक जीप खड़ी थी और गाँव के कुछ लोग. हमने जल्दी से जीप के पीछे वाले हिस्से में चढ़कर देखा, बाबा चादर ओढ़े लेते हुए थे.

बाबा, बाबा हमारी आवाज पर कोई हरकत नहीं हुई. तब तक पिताजी, अम्मा भी आ गए. डॉक्टर ने जीप में अन्दर जाकर बाबा को देखा और नकारात्मक मुद्रा में सिर हिला दिया. अम्मा-पिताजी, हमारी और गाँव के बाकी लोगों की आँखों में पानी भर आया. फिर से देखने के आग्रह के बाद डॉक्टर ने दोबारा जाकर जाँच की और जीप से उतर कर फिर वही जवाब दिया.

एक झटके में लगा जैसे समूचा परिवार ख़तम हो गया. अइया गाँव में ही थीं. रोने-बिलखने के बीच बाबा की पार्थिव देह को गाँव ले जाने की ही सलाह पिताजी को दी गई. मोहल्ले के कुछ लोगों को खबर दी गई. समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या किया जाये. तब दूरसंचार सुविधा भी आज के जैसी अत्याधुनिक नहीं थी. तीनों चाचा लोग दूर थे, उनको कैसे खबर दी जाए, पिताजी इस सोच में थे. टेलीफोन से, तार से, जाकर जैसे भी हो उनको खबर दी जाए, इसकी जिम्मेवारी मोहल्ले के लोगों ने ले ली. 

17 सितम्बर 1991, दिन मंगलवार, बुढ़वा मंगल, हम लोग उसी जीप में बैठकर बाबा की देह को लेकर गाँव चल दिए. वे बाबा जो उसी सुबह तक लगभग 75-76 वर्ष की उम्र में पूरी तरह स्वस्थ, तंदरुस्त, सक्रिय थे और अचानक हम सबको छोड़कर चले गए. काम करने के दौरान सुबह दीवार से सिर टकरा जाने, गाँव के नजदीक के कस्बे माधौगढ़ में प्राथमिक उपचार के बाद उरई लाया गया. जहाँ वे बिना किसी तरह की सेवा करवाए इस निस्सार संसार में हम सबको अकेला कर गए.

जमींदार परिवार से होने के बाद भी बाबा जी ने अपने समय में बहुत कठिनाइयों का सामना किया. पढ़ाई के समय भी संघर्ष किया. आज़ादी की लड़ाई में खुलकर भाग भले न लिया हो पर आन्दोलनों में भागीदारी की. एकबार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का प्रमाण-पत्र बनवाने का मौका आया तो ये कहकर मना कर दिया कि उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया कि उन्हें सेनानी कहा जाये. बाबा जी से बहुत कुछ सीखने को मिला. मेहनत, आत्मविश्वास, कर्मठता, निर्भयता, जोश, जीवटता, सकारात्मक सोच आदि-आदि गुणों का जो क्षणांश भी हममें मिलता है वो उनकी ही देन है. आज कई वर्ष हो गए उनको हमसे दूर हुए मगर ऐसा लगता है जैसे वो बुरा वक्त कल की ही बात हो. बुढ़वा मंगल हर बार रुला जाता है.

Saturday, 23 July 2016

आँखों के रास्ते वो दिल में उतर गई

रात का समय, घड़ी नौ से अधिक का समय बता रही थी. झमाझम बारिश हो जाने के बाद हल्की-हल्की फुहारें अठखेलियाँ करती लग रही थीं. स्ट्रीट लाइट के साथ-साथ गुजरते वाहनों की हेडलाइट भी सड़क को जगमग कर रही थी. गीली सड़क पर वाहनों और लोगों की आवाजाही के बीच मद्धिम गति से चलती बाइक पर फुहारों का अपना ही आनंद आ रहा था. घर पहुँचने की अनिवार्यता होते हुए भी पहुँचने की जल्दबाजी नहीं थी. दोस्तों का संग, हँसी-ठिठोली के बीच समय भी साथ-साथ चलता हुआ सा एहसास करा रहा था. सड़क किनारे एक दुकान के पास बाइक रुकते ही उतरा जाता उससे पहले उससे नजरें मिली. चंचलता-विहीन आँखें एकटक बस निहार रही थी. आँखों में, चेहरे में शून्य सा स्पष्ट दिख रहा था.  चेहरा-मोहरा बहुत आकर्षक नहीं था. कद-काठी भी ऐसी नहीं कि पहली नजर में ध्यान अपनी तरफ खींचती. आँखों में भी किसी तरह का निवेदन नहीं, कोई आग्रह नहीं, कोई याचना नहीं. इसके बाद भी कुछ ऐसा था जो उसकी नज़रों से अपनी नज़रों को हटा नहीं सका. ऐसा क्या था, उस समय समझ ही नहीं आया. 

बाइक से उतर कर खड़े होते ही वो उन्हीं नज़रों के सहारे नजदीक चली आई. चाल रुकी हुई सी थी मगर अनियमित नहीं थी. आँखों में बोझिलता थी मगर सजगता साफ़ झलक रही थी. चेहरे पर थकान के पर्याप्त चिन्ह थे मगर कर्मठता में कमी नहीं दिख रही थी. एकदम नजदीक आकर भी उसने कुछ नहीं कहा. अबकी आँखों में हलकी सी चंचल गति समझ आई. एक हाथ से अपने उलझे बालों की एक लट को अपने गालों से हटाकर वापस बालों के बीच फँसाया और दूसरे हाथ में पकड़े कुछेक गुब्बारों को हमारे सामने कर दिया. 

बिना कुछ कहे उसका आशय समझ आ गया. उस लड़की का आँखों ही आँखों में गुब्बारे खरीदने का अंदाज दिल को छू गया. गुब्बारे जैसी क्षणिक वस्तु बेचने का रिस्क और उस पर भी कोई याचना जैसा नहीं. कोई अनुरोध जैसा नहीं बस आँखों की चंचलता. उस चंचलता से झाँकता आत्मविश्वास जैसा कुछ. उस लड़की के हाव-भाव ने, आँखों की चपलता ने प्रभावित किया. लगा कि उसकी मदद की जानी चाहिए किन्तु घर जाने की स्थिति अभी बनी नहीं थी. मन में घुमक्कड़ी का भाव-बोध हावी था. मौसम भी आशिकाना रूप में साथ-साथ चल रहा था. इस कारण गुब्बारे न ले पाने की विवशता ने अन्दर ही अन्दर परेशान किया.

उस लड़की की दृढ़ता और एकबार पुनः गुब्बारों की तरफ देखने के अंदाज़ ने दोस्तों को भी प्रभावित सा किया. जेब में गया हाथ चंद रुपयों के साथ बाहर आया. भाव उभरा कि घर न जाने के कारण हम गुब्बारे नहीं ले पा रहे हैं पर ये कुछ रुपये रख लो. उस लड़की ने रुपयों की तरफ देखे बिना ऐसे बुरा सा मुँह बनाया जैसे उसे रुपये नहीं चाहिए बस गुब्बारे ही बेचने हैं. अबकी आँखों में कुछ अपनापन सा उभरता दिखाई दिया. उसके होंठों पर एक हल्की सी, न दिखाई देने वाली मुस्कराहट क्षण भर को उभरी और गायब हो गई. आँखों और होंठों की समवेत मुस्कराहट में गुब्बारे खरीद ही लेने का अनुरोध जैसा आदेश सा दिखा. हम दोस्तों ने अपने आपको इस मोहजाल से बाहर निकालते हुए गुब्बारे खरीद लिए. गुब्बारों के बदले रुपये लेते उभरी उस मुस्कान ने, आँखों की चमक ने, चेहरे की दृढ़ता ने, उसके आत्मसम्मान ने उसके प्रति आकर्षण पैदा किया.

आँखों आँखों में बने रास्ते पर चलकर नजदीक आई उस लड़की ने हमारे कुछ सवालों पर अपने होंठों को खोला. पता चला कि उस जगह से लगभग पन्द्रह किमी दूर उसका घर है. बड़े से शहर से दूर ग्रामीण अंचल तक उसे अकेले जाना है. कोई उसके साथ नहीं है. अकेले का आना, अकेले का जाना, सुबह से देर रात तक सिर्फ गुब्बारे बेचना, पूरे दिन में सत्तर-अस्सी रुपयों को जमा कर लेना, पेट की आग शांत करने के कारण पढ़ न पाना, चंद मिनट में उसने रुक-रुक कर बहुत कुछ बताया. उम्र, कर्मठता, जिम्मेवारी और आत्मविश्वास के अद्भुत समन्वय में फुहारों में भीगती शबनमसुबह की बजाय रात को जगमगा रही थी. 

बाइक पर चढ़कर जाते समय गीली सड़क पर खड़ी बारह-तेरह वर्ष की वो बच्ची एकाएक प्रौढ़ लगने लगी. उसके नाजुक हाथों में गुब्बारे की जगह जिम्मेवारियाँ दिखाई देने लगी. स्ट्रीट लाइट और गाड़ियों की लाइट से उसका चेहरा चमक रहा था. लोगों के लिए इस चमक का कारण स्ट्रीट लाइट और गाड़ियों की लाइट हो सकती थी मगर हमारी निगाह में वो चमक उसकी कर्मठता की, उसके आत्मविश्वास की थी.

Friday, 22 April 2016

ऐसी दोस्ती, ऐसा दोस्त हर जन्म में मिले

दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो अनाम सम्बन्ध के द्वारा सदैव आगे बढ़ता रहता है. ये हमारी खुशकिस्मती ही है कि हमें दोस्तों का, सच्चे दोस्तों का, भरोसेमंद दोस्तों का साथ खूब मिला है. ख़ुशी में भी दोस्त हमारे साथ रहे हैं और मुश्किल में तो और भी ज्यादा साथ आये हैं. उस समय भी ऐसी ही मुश्किल घड़ी थी पूरे परिवार के सामने. एक माह का समय और दो बड़ी दुर्घटनाएँ. 16 मार्च पिताजी का देहांत और फिर अगले माह 22 अप्रैल हमारी दुर्घटना. ट्रेन से दुर्घटना, एक पैर का स्टेशन पर ही कट जाना, दूसरे पैर का बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाना. घायल होने के बाद भी दिमाग में अम्मा, छोटे भाईयों, पत्नी, सभी परिजनों के चेहरे उभरते. कभी लगता कि एक और बुरी खबर घर पहुँचेगी फिर हिम्मत करते और जल्द से जल्द कानपुर पहुँचने की बात सोचने लगते. 

घर में सिर्फ चाचा को खबर की और कानपुर अपने जीजा जी श्री रामकरन सिंह को. रास्ते में भागती कार के साथ ख्याल आया कि आज शुक्रवार है कहीं ऐसा न हो कि रवि आज ही उरई आ जाये. रवि हमारा दोस्त, जो कानपुर में हड्डी रोग विशेषज्ञ है और उस समय प्रति शनिवार-रविवार उरई आया करता था, एक नर्सिंग होम में मरीज देखने. रवि को फोन करके पूरी स्थिति से अवगत कराया. दुर्घटना के पहले दिन से लेकर आज तक हमारे पैर की एक छोटी से छोटी समस्या से लेकर बड़ी से बड़ी परेशानी का इलाज सिर्फ और सिर्फ रवि के द्वारा ही होता है.

उस समय तो ऐसी स्थिति थी नहीं कि कोई कुछ कहता-सुनता क्योंकि कानपुर में हमारे साथ हमारा छोटा भाई और उसके दो-तीन मित्र साथ आये थे तथा कानपुर में जीजा जी, जिज्जी, बृजमोहन भैया. बाद में जिसने भी सुना उसने आश्चर्य जताया कि इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद भी हमने रवि पर विश्वास किया, उसको इलाज के लिए आगे किया. ये विश्वास किसी डॉक्टर से अधिक अपने दोस्त पर था. वो दोस्त जिसके साथ बचपन गुजरा, जिसके साथ झगड़े भी हुए, जिसके साथ खेले-कूदे भी, जिसके साथ पढ़ाई की, जिसके साथ हँसी-मजाक किया. विश्वास था कि वो दोस्त जो अब डॉक्टर है वो हमारे साथ गलत नहीं होने देगा. दोस्ती का, दोस्त का विश्वास ही है कि हम आज चल पा रहे हैं. दुर्घटना वाली शाम जो कानपुर पहुँचते-पहुँचते रात में बदल गई थी. रवि के कारण हॉस्पिटल में सारी व्यवस्थायें पहले से तत्परता से काम करने में लगी थी.

उस रात ऑपरेशन थियेटर का दृश्य आज भी दिमाग में कौंधता है. रवि से अपने कटे पैर को ऑपरेशन करके लगाने की बात कहना, उसका कहना कि तुमको चलाने से ज्यादा हमारे लिए जरूरी है तुमको बचाना. घर-परिवार की, अम्मा, भाईयों, पत्नी आदि की न जाने कितनी-कितनी जिम्मेवारियाँ रवि के कंधों पर डालते हुए जैसे बहुत इत्मीनान सा मिला था. स्पाइनल कॉर्ड के जरिये इंजेक्शन लगाकर आगे का इलाज होना था. उसके पहले की तमाम बातें हम रवि से कर लेना चाहते थे क्योंकि एक वही ऐसा दिख रहा था जिससे दिल की सभी बातें की जा सकती थीं. उस रात शुरू हुआ इलाज कितनी-कितनी बार ऑपरेशन टेबल से गुजरा. न जाने कितने-कितने इंजेक्शन रवि की निगरानी में, मुस्तैद निगाहों के बीच से गुजर कर हमारे शरीर में लगे. ऑपरेशन थियेटर में बिना रवि के किसी का एक कदम भी हमारी तरफ न बढ़ता. बेहोशी का इंजेक्शन बहुत देर असरकारी न रहता और रवि बहुत ज्यादा डोज देना नहीं चाहता था. ऐसे में चीखते-चिल्लाते उसकी हथेलियों का स्पर्श जैसे दर्द को कम कर देता था. उसका आश्चर्य भरा एक सवाल बार-बार होता कि क्यों बे, क्या कोई नशा करते हो? हर बार मुस्कुराकर हमारा इंकार होता और उसका भी इंकार इस रूप में कि तुम झूठ बोल रहे हो.

पता नहीं संसार को संचालित करने वाली परम सत्ता हमारी आंतरिक शक्ति का इम्तिहान ले रही थी या फिर भविष्य के दर्द सहने की आदत डलवा रही थी जो कुछ मिनटों की संज्ञाशून्यता के बाद फिर होशोहवास में ला देती थी. उसी स्थिति ने उस संसार का दूसरा रूप भी दिखाया, जहाँ खुद अपने कानों सुना कि डॉक्टर साहब, यदि ये आपके मित्र न होते तो इससे कम से कम दस लाख रुपये बनाते. बहरहाल, वो उनका अपना व्यवसाय था और हमें विश्वास था कि हम अपने दोस्त के साये में हैं तो कुछ भी गलत नहीं होगा. ये रवि जैसे दोस्त का साथ था जिसने ज़िन्दगी को तो बचाया ही लम्बी अवधि के इलाज के बाद भी जेब पर डाका नहीं पड़ने दिया.

इलाज के दौरान न जाने कितनी बार बहुत छोटी सी लापरवाही पर हॉस्पिटल के स्टाफ को डांट उसके द्वारा पड़ी. रवि ने खुद न जाने कितने-कितने डॉक्टर्स से संपर्क किया, अपने कई सीनियर्स को बुलाकर उनसे सलाह ली मगर हमें एक दिन को भी अकेला न छोड़ा. क्या दिन, क्या रात, क्या सुबह, क्या शाम, क्या व्यक्तिगत आकर, क्या फोन से जैसे चाहे वैसे उसने अपने आपको हमारे आसपास बनाये रखा.

हॉस्पिटल में ऐसा लग रहा था कि जितनी जल्दी हमें ठीक होने की थी, उससे कहीं ज्यादा जल्दी रवि को हमारी रिकवरी की थी, हमारी आंतरिक शक्ति को, आत्मविश्वास को और बढ़ाने की थी. हर दिन कुछ न कुछ सुधारात्मक स्थिति को अपनाया जाता. न जाने कितनी बार ऑपरेशन थियेटर ले जाया जाता, न जाने कितनी बार सर्जरी की जाती, न जाने कितनी बार अन्य दूसरे तरीके अपनाये जाते. एक महीने हॉस्पिटल और फिर दो माह मामा जी के यहाँ रुकने के दौरान रवि की उपस्थिति बराबर रही. एक-एक पहलू पर गंभीरता से निगाह रहती उसकी. एक-एक स्थिति पर सतर्कता दिखाई देती. अंततः तीन महीने के कानपुर चिकित्सकीय प्रवास के बाद उरई आने के पहले रवि ने एक पैर पर सहारा देकर खड़ा करवा ही दिया. न कोई चक्कर, न कोई कमजोरी, न कोई परेशानी.


उरई आने के बाद भी उसका संपर्क बराबर बना हुआ था. शनिवार-रविवार आने पर तो उसका घर आना होता ही था. क्या, कैसे और बेहतर हो सकता है, इस बारे में भी उसकी चिंता दिखाई देती. एक साल बाद कृत्रिम पैर लगवाने में भी उसकी राय को वरीयता दी गई. कानपुर एलिम्को की मदद से कृत्रिम पैर के द्वारा चलना शुरू किया गया. दर्द, समस्या, परेशानी, दाहिने पंजे से हड्डियों के टुकड़ों का बाहर निकल आना, ऑपरेशन, ड्रेसिंग, इलाज आदि से मुक्ति अभी भी न मिल सकी थी. रवि को भी मुक्ति न मिली थी. आज स्थिति में बहुत सुधार है. अब पंजे की हड्डियाँ टूटकर बाहर नहीं आती, मुड़ी उंगलियाँ अब चलने में दिक्कत न करती, दर्द की तीव्रता से ध्यान हटाकर उसे कम सा कर लिया है तब भी समस्याओं का समाधान रवि ही बनता है. इसके बाद भी मिलने पर उसको हम दोस्तों की टीका-टिप्पणी हमसे ही सुननी पड़ती है कि अबे, आता भी कुछ या ऐसे ही डॉक्टरी दिखाते फिरते हो? काश! ये दोस्ती हर जन्म में मिले, सबको मिले.