Saturday, 20 February 2016

कप्तान बना गई पहली दौड़


कभी-कभी कोई घटना खेल-खेल में घट जाती है और व्यक्तित्व पर छा जाती है. हमारे साथ खेल के मैदान में खेल-खेल में ये घटना घटी जिसने हमें एथलेटिक्स का कप्तान बनवा दिया. इंटरमीडिएट तक तमाम सारे खेलों में हिस्सा लिया मगर कभी भी एथलेटिक्स की तरफ रुझान नहीं रहा था. कॉलेज पहुंचकर भी अन्य खेलों की तरफ निगाह जाती थी मगर एथलेटिक्स की तरफ उधर भी नहीं सोचा. हाँ, बाबा जी द्वारा सुबह टहलने की जो आदत डलवाई गई थी वह हॉस्टल में भी मुन्ना भाईसाहब, पप्पू भाईसाहब के कारण बनी रही.

कॉलेज के वार्षिक खेलकूद के दिन आ गए. सभी खिलाड़ी मैदान पर अपने-अपने खेलों में व्यस्त हो जाते और हम जैसे कुछ दोस्त अपनी मस्ती-शरारत में हाथ आजमाते रहते. हॉस्टल से कोई न कोई किसी न किसी खेल में अपनी सहभागिता कर रहा था. क्रिकेट, शतरंज, बैडमिंटन, कैरम, हॉकी, दौड़ आदि सबमें हॉस्टल की हिस्सेदारी बनी हुई थी. उस दिन पाँच हजार मीटर दौड़ की घोषणा हुई. मुन्ना-पप्पू भाईसाहब सौ मीटर से लेकर पंद्रह सौ मीटर दौड़ में भागीदारी किया करते थे, सो उनको इसमें भाग नहीं लेना था. धावक ट्रेक पर जाने लगे मगर हॉस्टल से इसमें कोई सहभागिता नहीं दिखी. एकदम से लगा जैसे बिना खेले ही हॉस्टल की हार हो गई. हमने कहा कि हम दौड़ेंगे पाँच हजार मीटर दौड़ में. पहले तो कुछ लोगों ने समझाया कि मैदान के एक-दो नहीं पूरे साढ़े बारह चक्कर लगाने होंगे मगर हमने ठान लिया था कि इसमें भाग लेना ही लेना है. हमें पता था कि हम शारीरिक रूप से भले ही मजबूत न दिख रहे हों मगर मानसिक रूप से, आत्मविश्वास के रूप में कमजोर नहीं हैं.

हॉस्टल के बाकी भाइयों ने हमारी बात का खूब चिल्ला-चिल्लाकर, शोर मचाकर समर्थन किया. हमारे स्पोर्ट्स टीचर ने भी हमको प्रोत्साहित करते हुए कहा कि तू बस दौड़ पूरी कर ले, हम इनाम देंगे. दौड़ शुरू होने से पहले हमको इतनी लम्बी दौड़ दौड़ने के टिप्स बताये जाने लगे. कोई साथी हमारे पैरों की माँसपेशियों को मलने में लगा था, कोई चिल्ला-चिल्ला कर ताकत भरने में लगा था. सबकी हिम्मत लेकर, हॉस्टल की सहभागिता करने के लिए, महज खेल-खेल में ट्रेक पर उतर आये. उस स्पर्धा से जुड़े प्रोफ़ेसर हम हॉस्टलर्स का जोश देखकर अचंभित थे. लम्बी सीटी बजी और दौड़ना शुरू हुआ. मैदान के साढ़े बारह चक्कर लगाने थे, सो शुरूआती चक्कर आराम से लगाने शुरू किये. हॉस्टल के हमारे साथी क्रम से चिल्लाते हुए हमारे साथ ट्रेक के किनारे दौड़ लगाते जाते. उनका साथ-साथ दौड़ना हममें और जोश भरता. कब एक-दो-तीन-चार चक्कर लगाते-लगाते अंतिम चक्करों तक पहुँचने लगे पता ही नहीं चला. पैर, जांघ, पिंडलियाँ ऐसे लगने लगी मानो हमारे शरीर में ही नहीं हैं. मुँह सूखने की स्थिति में, साँस लम्बी-लम्बी चलने लगी मगर सबका चिल्लाते हुए हमारे साथ दौड़ना हमें थकने नहीं दे रहा था. कभी लगता कि अब गिरे कि तब गिरे मगर अपने साथियों, बड़े भाइयों, स्पोर्ट्स टीचर, कॉलेज के अन्य साथियों की तरफ से आती आवाजों के सहारे अगले चक्कर के लिए बढ़ जाते.

जिसको जीतना था वो जीत गया. हम छह लोगों में पाँचवे स्थान पर आये. आज भी बहुत अच्छे से याद है जैसे ही हमने फिनिश लाइन को छुआ, हमारे हॉस्टल के साथियों ने दौड़कर बाहों में उठा लिया. किसी ने शरीर को चादर से ढंका, कोई पैरों की मालिश करने लगा. ऐसे में हमारे स्पोर्ट्स टीचर ने आकर पीठ थपथपाई और शाबासी देते हुए कहा कि पहली बार में ही इतनी लम्बी दौड़ पूरी करना अपने आप में जीत है. 

अगले दिन हमने दस हजार मीटर दौड़ में भाग लिया. हालाँकि स्थान वहां भी न मिला तथापि तीनों साल लगातार सहभागिता करने के कारण अंतिम वर्ष में हमको एथलेटिक्स का कप्तान चुना गया. उन्हीं स्पोर्ट्स टीचर ने कप्तान की गरिमा, मर्यादा, जिम्मेवारी को समझाते हुए वार्षिक खेल प्रतियोगिताओं के आरम्भ में कॉलेज के ध्वज के साथ हमारे द्वारा सभी खिलाडियों को शपथ ग्रहण करवाई. हमारी अगुवाई में लगभग आधा सैकड़ा खिलाड़ियों ने शपथ लेते हुए अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया. वो दिन आज भी याद है और गौरवान्वित कर जाता है.

CAPTAIN ATHLETICS लिखा वो बैज आज तक सुरक्षित है. उस समय न ब्लेजर बनवा सके और न उसे सीने पर लगा सके. अब बस यादें शेष हैं, उस दिन की, अपने एथलेटिक्स कप्तान होने की, खिलाड़ियों को शपथ दिलवाने की, अपने दौड़ने की.

Monday, 8 February 2016

चवन्नी की जमींदारी


जीवन में कोई व्यक्ति अपने भविष्य को लेकर निरंतर सजग रहता है, लगातार आगे बढ़ने का प्रयास करता है और इस यात्रा में, अपनी सजगता में वो अपने अतीत को विस्मृत नहीं कर पाता है. ये और बात है कि जिंदगी की आपाधापी में इन्सान ने अपने अतीत को स्वतः याद करना बंद सा कर दिया है किन्तु बहुत सी घटनाएँ ऐसी होती हैं जो अक्सर मन-मष्तिष्क में उभर कर बीते दिनों की सैर कराने लगती हैं. 

ऐसा ही कुछ उस समय हुआ था जबकि एक समाचार पढ़ने को मिला था कि सरकार ने स्टील की मंहगाई और अन्य कारणों से पच्चीस पैसे के सिक्के को बनाना बंद कर दिया है. इस बंदी के साथ-साथ इसके चलन को भी समाप्त कर दिया गया. हालाँकि सरकारी आदेश के बहुत पहले से पच्चीस पैसे और पचास पैसे का चलन समाज ने स्वतः ही बंद कर रखा था. अब भले ही ये सिक्के लेन-देन के दौरान चलन में न दिखते हों मगर शौकिया तौर पर बनाये गए संग्रह में से कभी-कभार ये सिक्के और अन्य पुराने सिक्के सामने आकर बचपन में ले जाते हैं. कुछ ऐसा ही अपने संग्रह का अवलोकन करते समय पच्चीस पैसे के सिक्के को देखकर हुआ और बचपन की वो ख़ुशी आँखों के सामने चमक उठी जो एक पच्चीस पैसे के सिक्के के द्वारा मिल जाया करती थी.

ये बात सन् 83-84 की है, जब हम राजकीय इंटर कालेज, उरई के छात्र थे. उस समय हमको स्कूल जाने पर नित्य जेबखर्च के रूप में पच्चीस पैसे मिला करते थे. चार आने का मूल्य होने के कारण आम बोलचाल की भाषा में पच्चीस पैसे के सिक्के को चवन्नी कहकर पुकारा जाता था. आज के बच्चों को यह बहुत ही आश्चर्य भरा लगेगा कि रोज का जेबखर्च मात्र पच्चीस पैसे अर्थात चवन्नी, पर हमारे लिए उस समय यह किसी करोड़पति के खजाने से कम नहीं होता था. उस समय इस एक छोटे से सिक्के के साथ एक छोटी सी पार्टी भी हो जाया करती थी. इसके अलावा हम दो-तीन दोस्त हमेशा एकसाथ रहा करते थे और सभी के ऐसे छोटे-छोटे सिक्के मिल-मिलाकर एक ग्रांड पार्टी का आधार तैयार कर दिया करते थे.

विशेष बात तो यह होती थी घर से स्कूल जाते समय अम्मा ही चवन्नी दिया करती थीं. कभी-कभार ऐसा होता था कि थोड़ी बहुत देर होने के कारण अथवा किसी और वजह से हमें स्कूल छोड़ने के लिए पिताजी साइकिल से जाया करते थे. उनकी हमेशा से एक आदत रही थी कि स्कूल के गेट पर हमें साइकिल से उतारने के बाद हमसे पूछा करते थे कि पैसे मिले? झूठ बोलने की हिम्मत तो जुटा ही नहीं पाते तो ऐसे समय में हम या तो चुप रह जाते या फिर कह देते कि हाँ हैं. इसके बाद भी पिताजी अपनी जेब से पच्चीस पैसे का उपहार हमें दे ही देते. चूँकि पिताजी कभी-कभी ही छोड़ने आते थे और जिस दिन उनका आना होता उस दिन हमारा जेबखर्च पच्चीस से बढ़कर पचास हो जाया करता था. समझिए कि उस दिन तो बस चाँदी ही चाँदी होती थी. क्या कुछ ले लिया जाये और क्या कुछ छोड़ा जाये, समझ में ही नहीं आता था. चूँकि उस समय स्कूल परिसर में ऐसी कोई सामग्री बेचने भी नहीं दी जाती थी जो हम बच्चों के लिए हानिकारक हो, इस कारण से घरवाले भी निश्चिन्त रहते थे.

हमारी पच्चीस पैसे की नवाबी उस समय और तेजी से बढ़ गई जब हमारे साथ पढ़ने के लिए हमारा छोटा भाई पिंटू (श्री हर्षेन्द्र सिंह सेंगर) भी साथ जाने लगा. अब हम दो जनों के बीच पचास पैसे की जमींदारी हो गई जो हमारी मित्र मंडली में किसी के पास नहीं होती थी. हम दो भाइयों के बीच एकसाथ आये पचास पैसे के मालिकाना हक से हम अपनी मित्र मंडली पर रोब भी जमा लेते थे पर भोजनावकाश में सारी हेकड़ी आपस में खान-पान को लेकर छूमंतर हो जाती थी. सबके सब अपने-अपने छोटे से करोडपतित्व को आपस में मिला कर हर सामग्री का मजा उठा लेते थे. 

आज जब भी अपने सिक्कों के संग्रह को देखते हैं तो बरबस ही उस चवन्नी की याद तो आती ही है साथ में उन बीस पैसे के, दस पैसे के, पाँच पैसे के सिक्कों की भी याद आ गई जो न जाने कब अपने आप ही चलन से बाहर हो गये. वाह री चवन्नी! तुम्हारी याद तो हमेशा मन में रहेगी जिसने उस छोटी सी उम्र में ही नवाबी का एहसास करा दिया था, धन की अहमियत को समझा दिया था.

Tuesday, 12 January 2016

व्यक्तित्व विकास का आधार बनी बाल सभा


हो सकता है कि आज की पीढ़ी को ये शब्द बाल सभा कुछ अजूबा सा लगे. ऐसा इसलिए क्योंकि अब किसी विद्यालय में ऐसा कोई आयोजन होते दिखता नहीं है. विद्यालयों में आजकल बच्चों की प्रतिभा को निखारने के स्थान पर मँहगे-मँहगे प्रकाशकों की मँहगी-मँहगी किताबों को रटवाना एकमात्र काम रह गया है. कभी-कभार अभिभावकों को दिखाने के नाम पर, समाचार-पत्रों में सुर्खियाँ बटोरने के नाम पर कहीं-कहीं प्रोजेक्ट, विज्ञान मेला, बाल-मेला जैसे आयोजन करवा लिए जाते हैं. ये आयोजन भी बच्चों से ज्यादा अभिभावकों की प्रतिभा, उनकी जेब की परीक्षा लेते हैं.

बाल सभा शब्द बहुतेरे लोगों के लिए उतना ही अजूबा जितना कि उसे पता चले कि आज भी कुछ लोग फाउंटेन पेन से लिख रहे हैं. आज कॉलेज में जब हमारे विद्यार्थियों, सहकर्मियों, साथियों को पता चलता है कि हम आज भी फाउंटेन पेन से लिखते हैं तो वे आश्चर्य से भर जाते हैं. हालाँकि अभी उरई जैसे शहर में पठन-पाठन पूरी तरह से ई-सामग्री पर, कंप्यूटर पर निर्भर नहीं हो सका है, इस कारण यहाँ के विद्यार्थी पेन-कागज से अपना परिचय बनाये हुए हैं. इसके बाद भी फाउंटेन पेन की उपलब्धता, उपयोग न के बराबर देखने को मिल रहा है. बहरहाल, बात हो रही थी बाल सभा की. बाल सभा को हम अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों का आधार कह सकते हैं. यही वो गतिविधि है जिसने हमारे भीतर की झिझक, संकोच को दूर करके भाषण देने की शक्ति, सञ्चालन करने की क्षमता, नाट्य-कार्यक्रमों में सहभागिता करने को विकसित किया. आज यह सब विद्यालयों से नदारद दिखता है. 

नर्सरी से लेकर कक्षा पाँच तक की मात्र छह वर्ष की अवधि को अल्पावधि भले ही कहा जाये मगर इन छह वर्षों में प्रति शनिवार भोजनावकाश के बाद सभी बच्चों को एक बड़े से बरामदे में एकत्र होना पड़ता था. यह सभी विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य था. बाल सभा में लगभग सभी बच्चों को किसी न किसी रूप में अपनी सहभागिता करनी पड़ती थी. किसी को सञ्चालन, किसी को भाषण, किसी को गीत, किसी को अभिनय, किसी को कविता. सभी हँसी-हँसी पूरे उत्साह के साथ अपनी भूमिकाओं का निर्वहन करते. स्कूल की शिक्षिकाएँ, जिन्हें हम बच्चे दीदी कहा करते थे, अपने कुशल, स्नेहिल निर्देशन में न केवल हमारी वरन अन्य विद्यार्थियों की प्रतिभा को निखारती थीं. 

प्रति शनिवार निश्चित रूप से होने वाली बाल सभा ने हमारे व्यक्तित्व विकास में भी बहुत बड़ी भूमिका का निर्वाह किया. भाषण, सञ्चालन, लेखन, अभिनय, निर्देशन आदि के विकास का आधार उसी बाल सभा में बखूबी हुआ, बस गायन-वादन में अपने को आगे न ला सके. आने वाले समय में इस पर भी हाथ आजमाया जायेगा.


Wednesday, 6 January 2016

आत्मीयता, अपनत्व के सन्देश से भरी वो इंट्रो पार्टी


इंटरमीडिएट पास करने के बाद हमें साइंस कालेज, ग्वालियर में बी०एस-सी० में अध्ययन के लिए प्रवेश दिलवाया गया. हॉस्टल में हमारे रहने की व्यवस्था की गई थी. हॉस्टल के नाम से उस समय पूरे शरीर में सिरहन सी दौड़ जाती थी. डर लगा रहता था रैगिंग का. घर में किसी से यह कहने का साहस नहीं हो पा रहा था कि हम हॉस्टल में नहीं रहेंगे. मरता क्या न करता की स्थिति में हमने हॉस्टल में प्रवेश किया. पहले दिन हमें छोड़ने हमारे पिताजी और चाचाजी आये. पिताजी और चाचाजी ने हमारे आने से पहले ही सीनियर्स से मुलाकात कर ली थी क्योंकि शायद घर के लोग भी रैगिंग के नाम से परेशान हो रहे थे? सीनियर्स ने उनको आश्वस्त किया कि यहाँ रैगिंग के नाम पर ऐसा वैसा कुछ भी नहीं होता है. 

हॉस्टल में दो-तीन दिन बड़ी ही अच्छी तरह से कटे. लगभग हर शाम को सभी लोग छत पर या बाहर लॉन में एकत्र होते और हँसी-मजाक चलता रहता. इसी बीच थोड़ी बहुत रैगिंग भी होती रहती पर मारपीट से कोसों दूर. हाँ, उन दो-चार लोगों को अवश्य ही दो-चार हाथ पड़े जिन्होंने सीनियर्स के साथ बदतमीजी की.

एक रात लगभग दस साढ़े दस बजे होंगे, हॉस्टल के गेट पर दो-तीन मोटरसाइकिल और स्कूटर रुकने की आवाजें सुनाईं दीं. थोड़ी देर की शांति के बाद हमारे हॉस्टल चौकीदार, जिन्हें हम लोग उनकी उम्र के कारण बाबा कहते थे, ने आकर मैस में पहुँचने को कहा. अब तो डर के मारे हालत खराब क्योंकि ऐसा सुन रखा था कि किसी दिन पुराने सीनियर छात्र रात को आते हैं और उसी समय जबरदस्त रैंगिंग होती है यहाँ तक कि मारपीट भी. डरते-डरते डाइनिंग हॉल में पहुँचे, वहाँ सीनियर्स पहले से ही मौजूद थे. उन सभी छात्रों को जिन्होंने हॉस्टल में पहली बार प्रवेश लिया था, उन्हें दीवार से टिक कर खड़े होने को कहा गया. ऐसे छात्रों में बी०एस-सी० प्रथम वर्ष के अलावा दूसरे और तीसरे वर्ष के छात्र तो थे ही साथ में कुछ एम०एस-सी० के छात्र भी थे. हॉल के बीचों-बीच पड़ी मेज के एक ओर सीनियर्स भाई बैठे हुए थे, उन्हीं के साथ वे पुराने सीनियर भाई भी बैठे हुए थे, जो कुछ देर पहले आये थे.

सबसे पहले हम सबका परिचय उन लोगों से करवाया गया, कोई राजनीति कर रहा था तो कोई ठेकेदारी. कोई कहीं नौकरी में था तो कोई अपना कारोबार कर रहा था. सबका परिचय जानने के बाद हम लोगों का परिचय शुरू हुआ. सभी का परिचय हो जाने के बाद शुरू हुआ रैगिंग का सिलसिला. रैगिंग के नाम पर सभी को कुछ न कुछ करके दिखाना था. किसी को नाचना पड़ा तो किसी को गाना था. किसी को लड़की बनके किसी लड़के के सामने प्यार का इजहार करना था तो किसी को पंखे को अपना दुश्मन मानकर गालियाँ सुनानी थीं. उसी बातचीत, पूछताछ में एक भाई ने अपना शौक फलां नेता को गोली मारना बताया. इस पर सभी सीनियर्स भाई खूब हँसे और बोले इसे शौक नहीं कहते. इसके बाद भी वो भाई अपनी बात पे अडिग रहे और बार-बार इसे ही अपना शौक बताते रहे. इस तरह की हँसी-मजाक जैसी स्थिति के कारण, किसी दूसरे को कुछ उल्टा-पुल्टा करते देख मजा आता, हँसी भी आती किन्तु हँस नहीं सकते थे क्योंकि हँसे तो बना दिए जाते मुर्गा.

ऐसी रैगिंग के बीच जिसका भय था वह नहीं हुआ यानि कि मारपीट. हाँ, खड़े-खड़े पैरों की हालत खस्ता हुई जा रही थी. किसी लड़के के कुछ न कर पाने पर, किसी के द्वारा कुछ न बता पाने पर पता चला कि सभी को हाथ उठाकर खड़ा करने की सजा मिली. अब खड़े हैं आधा घंटे तक हाथ ऊपर किये. इस बीच सभी सीनियर्स उठकर चाय पीने चले गये और कह भी गये कि हम चाय पीने जा रहे हैं तब तक हाथ ऊपर उठाये रहना. कोई मुर्गा बना था, कोई एक पैर पर खड़ा था, किसी को हाथ उठाने की सजा तो कोई किसी और रूप में सजा काट रहा था. समय गुजरता जा रहा था और सीनियर्स थे कि आने का नाम ही नहीं ले रहे थे. लगभग डेढ घंटे के बाद उन लोगों का आना हुआ.

आने के बाद सभी की सजा समाप्त हुई. सीनियर्स ने हम सभी को कुछ टिप्स दिये कि कैसे मिलजुल कर रहना है. बताया कि प्रत्येक को अपने से बड़े का सम्मान करना है. सभी की मदद करनी है, यह भी बताया कि घर से दूर होने के कारण हम सभी को घर की तरह से रहना है. इन सबके बीच समय खिसकते-खिसकते सुबह के पाँच बजने तक पहुँच गया. सीनियर्स, जो सभी बाद में भाईसाहब ही पुकारे गए, चलने को हुए और अपने साथ हम सभी को चलने को कहा. हम सभी हँसी-मजाक के माहौल में उनके साथ रेलवे स्टेशन तक गये. वहाँ पहुँच कर एक रेस्टोरेंट में हम सभी ने बढ़िया चाय-नाश्ता किया. रात भर की थकान, रैगिंग का डर तब तक निकल चुका था.

इसके बाद भी हॉस्टल में रैगिंग हुई, मगर चुहल भरी. हाँ, मारपीट की घटना भी किसी दो-चार के साथ ही हुई, वो भी एक-दो झापड़ों तक की. ऐसा भी तभी हुआ जबकि अगले ने कोई बदतमीजी की. आज भी हॉस्टल की वो आत्मीयता भरी रैगिंग बहुत याद आती है.

Monday, 28 December 2015

हॉस्टल का वो पहला दिन


पढ़ना भी अपने आपमें एक समस्या होती है. क्या पढ़ना है, कहाँ पढ़ना है, क्यों पढ़ना है आदि-आदि सहित और भी न जाने कितने सवाल. अब धरती पर आये, पढ़े-लिखे परिवार में आये तो यकीनन पढ़ना हमारी भी जिम्मेवारी बनती थी. सो पढ़े, मन लगाकर पढ़े और पास हो गए इंटरमीडिएट. पहले तो हाईस्कूल के बाद समस्या उठी थी कि क्या पढ़ना है? अब इंटरमीडिएट पास कर लिया तो फिर वही समस्या खड़ी हो गई कि क्या पढ़ना है, कहाँ पढ़ना है. अब आगे क्या पढ़ा जाये, कहाँ पढ़ा जाये, क्यों पढ़ा जाये जैसे सवालों से जूझते हुए हमने एलान सा कर दिया कि उरई के डी०वी० कॉलेज में नहीं पढ़ेंगे. इसका कारण था उस समय वहाँ बेहिसाब नक़ल का होना. यहाँ हमारा ऐलान हुआ, उधर पिताजी ने भी लौटती डाक की तरह से निर्णय सुना दिया कि उरई नहीं पढ़ना, तो क्या विदेश जाओगे पढ़ने? इस सम्पुट के कुछ अन्तराल बाद सुखद संदेशा फिर सुनाई दिया, ग्वालियर करवा देते हैं एडमीशन. 

कुछ आवश्यक भागदौड़ के बाद हमारा एडमीशन ग्वालियर में हो गया. अरे जी! ग्वालियर किसी संस्था का नाम नहीं है, ग्वालियर शहर के साइंस कॉलेज में हमारा एडमीशन हो गया, बी०एस-सी० में. पढ़ने का बंदोवस्त किया गया तो रहने की व्यवस्था भी की गई. हमारे सबसे छोटे चाचा यानि कि हम सबके भैया चाचा जो उनके भारतीय स्टेट बैंक वालों के लिए श्री धर्मेन्द्र सिंह सेंगर थे, उस समय ग्वालियर में ही रह रहे थे. उनके यहाँ रहने की व्यवस्था की बजाय कॉलेज के हॉस्टल को वरीयता दी गई. कॉलेज के एडमीशन होते ही हॉस्टल में भी प्रवेश मिल गया.

कॉलेज, हॉस्टल, रैगिंग, सीनियर्स आदि के डर को अपने में समेटे पहले दिन हमने पिताजी और चाचा जी की छत्रछाया में हॉस्टल की उस देहरी का स्पर्श किया जो आने वाले सालों में हमारी अत्यंत प्रिय जगह बन गई. हॉस्टल प्रवेश द्वार पर सबसे पहली मुलाकात हुई बी०एस-सी० प्रथम वर्ष के छात्र अनुराग से. फलों के स्वाद के साथ मित्रता की मिठास का शुभारम्भ हुआ, जो आजतक अपना मीठापन बनाये हुए है. अनुराग ने हमसे कुछ दिन पहले ही हॉस्टल में प्रवेश लिया था. उसकी रैगिंग भी हो चुकी थी. जब उसने अपनी रैगिंग के किस्सों की, हॉस्टल के सीनियर्स के व्यवहार की चर्चा की तो हमारी जान में जान आई. जहाँ एक तरफ हमारे भीतर का डर दूर जाता दिखा वहीं दूसरी तरफ पिताजी-चाचा जी भी संतुष्ट दिखे.

हॉस्टल का वह पहला दिन अत्यंत खुशनुमा बीता. पहले दिन ही सीनियर्स से बड़े भाइयों जैसा स्नेह मिलना इतना शुभ रहा कि पूरे तीन वर्ष निसंकोच, निर्द्वन्द्व, बेफिक्र होकर कब बीत गए पता ही नहीं चला. अपने सीनियर्स, सहपाठी तथा जूनियर्स भाइयों का इतना सहयोग, स्नेह, प्यार रहा कि आज भी उस हॉस्टल लाइफ में वापस जाने का मन करता है.


Saturday, 26 December 2015

वीडियो चलवाना भी सामूहिक पर्व हुआ करता था

बड़ा सा टीवी जो लकड़ी के बक्से में बंद. काले-सफ़ेद, झिलमिल करते चित्र, एक जगह स्टैंड पर रखा, छत पर लगे हवाई जहाजनुमा एंटीना के तार से बंधा. अभी इस आश्चर्य से पूरी तरह मुक्ति भी न पा सके थे कि वीडियो के अवतार ने रोमांचित कर दिया. काले-सफ़ेद की जगह रंगीन चित्र. बड़े से भारीभरकम एंटीना का कोई चक्कर नहीं. किसी एक घर की जागीर नहीं, आज इसके घर तो कल उसके घर.

पूरे मोहल्ले में जोश भर जाता था. आज कोई व्यक्ति वीडियो चलवा रहा है तो कल कोई दूसरा व्यक्ति. आज बरगदिया तरे (नीचे) तो कल पीली कोठी पर पाखर के पेड़ के नीचे. बरगदिया हमारे पाठकपुरा मोहल्ले में वो प्रसिद्द जगह थी जहाँ एक विशालकाय बरगद का पेड़ लगा हुआ था. ये वृक्ष आज भी उसी तरह मौजूद है. उसके किनारे एक मंदिर और आसपास मकान बने हुए थे. ये जगह हम बच्चों के खेलने-कूदने की जगह हुआ करती थी तो बड़ों के विमर्श का मंच. सभी लोग उस जगह को बरगदिया तरे अर्थात बरगद के पेड़ के नीचे से ही जानते-पहचानते-संबोधित करते थे. हाँ, तो बात हो रही थी वीडियो की. किसी दिन सामूहिक चंदा करके वीडियो चलता तो किसी दिन कोई अपनी रईसी दिखाते हुए सारा खर्चा खुद ही करता.

मोहल्ले में लगभग रोज ही वीडियो पर फिल्मों का चलना होता किन्तु हम भाइयों को किसी-किसी दिन ही विशेष परिस्थितियों में, कुछ शर्तों के अनुपालन के बाद किसी बड़े के संरक्षण में फिल्म देखने को मिल पाती. ऐसी सुविधा भी हमें दिखाई जाने वाली फिल्मों के चरित्र के आधार पर उपलब्ध करवाई जाती थी.  ऐसी अनुशासनात्मक बंदिशों के बाद भी कई बार चोरी से फिल्मों का दिख जाना हो जाता था. ऐसा गर्मियों की रातों में ही हो पाता था जबकि रात में छत पर सोने के दौरान आसपास के घरों की छतों पर चलते वीडियो हमें भी लाभान्वित कर जाते. चारपाई को अपने छत की छोटी सी चहारदीवार के सहारे टिका कर उसी पर बैठकर वीडियो क्रांति का चोरी-चोरी लाभ उठा लेते.

वीडियो के उस क्रांतिकारी प्रदर्शन के दौर में मोहल्ले के बच्चों में फिल्म देखने की प्रतियोगिता सी चल पड़ी. कौन सी फिल्म कितनी बार देखी गई, इस बात को लेकर आपस में होड़ लग गई. शहंशाह, नगीना, शराबी, संतोषी माता, प्रेम रोग जैसी फिल्मों को कुछ बच्चों द्वारा पंद्रह-बीस बार देखने का ऐलान सा कर दिया गया. उधर मोहल्ले के बच्चों की फिल्म देखने की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही थी और इधर हमारे खाते में सीमित संख्या बनी हुई थी. पारिवारिक अनुशासन और माहौल का नुकसान भले ही ये रहा हो कि मोहल्ले के बच्चों के साथ फिल्मों की संख्यात्मक प्रतियोगिता में हम फिसड्डी बने रहे पर गुणात्मक रूप में अपने समय की बेहतरीन फ़िल्में देखने का अवसर हमको बचपन में ही मिल गया था. फिल्म जगत के तमाम नामचीन कलाकारों द्वारा अभिनीत बेहतरीन फिल्मों को देखने का मौका मिला. उनमें से बहुत सी फ़िल्में तो समझ आ जाती और बहुत सी ऐसी होती जिन्हें बस देखते ही रहते, देखते ही रह जाते. तब देखते रह जाने वाली ऐसी फिल्मों का अर्थ, उनके कथ्य को अब जाकर समझा.

Monday, 30 November 2015

किसी अजूबे से कम न था टीवी

बचपन का वो दौर सिर्फ मौज-मस्ती का दौर, शरारतों का दौर, शैतानियों का दौर था. आज की तरह न घुटन भरा माहौल, न आज की तरह पढ़ाई का अनावश्यक बोझ. बचपन का अर्थ तब विशुद्ध बचपन ही होता था. मासूमियत, भोलापन, नादानी से सजा-संवरा बचपन. आज के बच्चों की तरह गैजेट्स से सुसज्जित नहीं था सो आज के बच्चों की तरह बुजुर्गियत भी नहीं थी. तब कोई भी नई चीज कौतूहल का केंद्र हुआ करती थी. घर की साइकिल कौतुहल थी, तो वकील बाबा की एम्बेसडर कार भी आश्चर्य थी. घर में जालीदार एंटीना लगा रेडियो अचरज की विषय-वस्तु थी तो टीवी महाअजूबा के रूप में प्रकट हो गया. 

घर में रेडियो था, जो किंचित आरम्भिक आश्चर्यबोध के पश्चात् गर्व की अनुभूति करवाने लगा. इसके पीछे कारण ये था कि तब मोहल्ले में आसपास रेडियो न के बराबर थे. एक ऐसे डिब्बे के बीच जिसमें बोलने-गाने वाला दिखाई नहीं दे रहा हो कोई ऐसा बड़ा डिब्बा देखने को मिल जाये जिसमें गाने वाले, बातचीत करने वाले सामने दिख रहे हों तो उसे दुनिया का अजूबा ही समझा जायेगा. इतने छोटे से डिब्बे में कैसे घुसे होंगे ये लोग? इतने छोटे से डिब्बे में इतने सारे लोग आये कैसे होंगे? जो लोग दिख रहे, उनके अलावा बाकी लोग कहाँ छिपे हैं? जिस दिन पहली बार टीवी देखा, ऐसे न जाने कितने सवाल दिमाग में आते रहे और दिमाग को चकराते रहे. खुद से ही सवाल करते रहे, खुद को ही जवाब देते रहे. ये शायद 1977-78 की बात होगी, हमारे सबसे बड़े चाचा श्री नरेन्द्र सिंह सेंगर, हम लोगों के मन्ना चाचा तब कालपी में भारतीय स्टेट बैंक में सेवारत थे. हमारा बहुत सारा समय मन्ना चाचा के साथ गुजरा. उरई से बहुत पास होने के कारण या तो चाचा परिवार सहित उरई आ जाते या फिर हम लोग चाचा के पास पहुँच जाते.

चाचा के पास कालपी जाने पर वहीं इस बुद्धू बक्से से परिचय हुआ. चाचा जी के मकान मालिक अपने समय के धनाढ्य व्यक्तियों में माने जाते थे. उनको हम बच्चे ताऊजी-ताईजी से संबोधित करते थे. सरल, स्नेहिल स्वभाव के धनी ताऊजी-ताईजी एक ब्लैक-व्हाइट टीवी के मालिक भी हुआ करते थे. हम लोगों के कालपी पहुँचते ही उस टीवी से उनका और उनके बच्चों का मालिकाना हक़ समाप्त हो जाता और वह बोलता-बतियाता डिब्बा हमारी संपत्ति हो जाया करती. नमस्कार के साथ शुरू होने वाला टीवी शुभ रात्रि के साथ ही बंद होता. एकमात्र दूरदर्शन चैनल होने के कारण सीमित समयावधि में चलने वाले कार्यक्रमों से हम बच्चों का कोई लेना-देना नहीं होता. बस टीवी देखना होता था सो देखते रहते थे. कृषि सम्बन्धी चर्चा हो, स्वास्थ्य सम्बन्धी चर्चा हो, सामाजिक विमर्श हो, समाचार हों, गाने हों बस देखना था सो देखना था. लम्बे-लम्बे एंटीना की सहायता से नेटवर्क पकड़ने का प्रयास किया जाता था. बहुधा कार्यक्रमों में झिलमिलाहट रहती, आवाज़ आती-जाती रहती, चित्र बनते-बिगड़ते रहते इसके बाद भी उन तीन-चार घंटों के टीवी दर्शन से अत्यंत सुखद अनुभूति मिलती. न विषय की समझ, न विमर्श की पहचान, न खबरों से वास्ता मगर इसके बाद भी सबकुछ बहुत अच्छा-अच्छा सा लगता था. हम बच्चों का टीवी दर्शन के साथ-साथ ताईजी का घरेलू पकवान खिलवाते रहने का प्यार-दुलार भी चलता रहता.

आज जबकि तब के बड़े-बड़े एंटीनों की जगह छोटी-छोटी छतरियों ने ले ली है; आज जबकि तब के सामान्य से प्रसारण के मुकाबले फुल एचडी फॉर्मेट में प्रसारण होने लगा है; आज जबकि तब के चंद घंटों के प्रसारण के मुकाबले चौबीस घंटे प्रसारण होने लगा है; आज जबकि तब के एक चैनल के मुकाबले सैकड़ों चैनल कार्यक्रम परोसने में लगे हों तब भी टीवी एक पल को वो सुख-आनंद नहीं दे पाता है जो उस समय मिलता था. चित्रहार के लिए दिन गिनना, सीरियल के लिए पूरे सप्ताह इंतजार करना, नए वर्ष के मनमोहक कार्यक्रमों का वर्ष भर इंतजार रहना, प्रातःकालीन प्रसारण शुरू होने के बाद रंगोली को चारपाई में दुबके-दुबके देखना आदि-आदि अपने आपमें स्वर्गिक अनुभूति देने वाला रोमांच था, जिसकी याद आज भी आनंद के सागर में गोते लगवाती है.