Saturday, 31 October 2015

कोई स्कूल नहीं हमारे उस स्कूल जैसा

पहले स्कूल से पहले ही दिन वापसी के कितने दिनों तक हम घर में बैठे, ये याद नहीं. ऐसी कोई चर्चा भी नहीं की गई हमसे, हाँ, इसकी चर्चा अवश्य हुई कि हमें स्कूल में भेजे जाने को लेकर घर में उच्च स्तरीय शिखर वार्ताएँ शुरू हो गईं थीं. ऐसा अम्मा जी अक्सर अपनी बातों में जिक्र किया करती हैं. उन दिनों उरई में गिने-चुने स्कूल हुआ करते थे. उस समय का एकमात्र अंग्रेजी माध्यम का मिशन स्कूल आज भी है. घर से बहुत दूर होने के कारण उस स्कूल में हमारे एडमीशन को लेकर आमराय पारिवारिक वार्ताओं में न बन सकी. घर के पास एक स्कूल था पर घर और स्कूल के बीच पड़ता एक विकट नाला उस स्कूल में हमारे प्रवेश में बाधक बना. इसी विचार-विमर्श के बीच हमारे मोहल्ले में ही एक नए स्कूल का उदय हुआ. घर के सभी सदस्यों को लगा जैसे इस स्कूल का खुलना सिर्फ हमारे लिए ही हुआ था. घर से बहुत दूर नहीं, बीच में नदी, नाला, सड़क, यातायात जैसा कुछ नहीं. सो एक दिन निश्चित करके हमारा प्रवेश उस नवोन्मेषी स्कूल में करवा दिया गया.

पं० उमादत्त मिश्र बालिका विद्यालय के नाम से आरम्भ वह स्कूल वर्तमान में भी पं० उमादत्त मिश्र जूनियर हाई स्कूल के नाम से संचालित है. उस समय छोटा सा वह स्कूल अपने आसपास खेलने का मैदान समेटे हुआ था, जो अब कुछ हद तक सिकुड़ सा गया है. शिक्षिकाएँ, जिन्हें हम दीदी कहकर पुकारते थे और प्रधानाचार्या को बड़ी दीदी. सभी का स्नेह, प्यार, दुलार, आशीर्वाद तब भी मिला, आज भी मिल रहा है. बड़ी दीदी के रूप में मधु दीदी के साथ शीला दीदी, सुमन दीदी, सरोजनी दीदी, रेखा दीदी, स्नेहलता दीदी और इनके साथ-साथ शुक्ला आचार्य जी और प्रह्लाद आचार्य जी आदि ने हमारी नींव को भली-भांति तैयार किया. इस नींव की सुरक्षा का दायित्व बहुत दिनों तक लक्ष्मीआया माँ ने उठाया. बाद में हमारे दोनों छोटे भाइयों का प्रवेश भी उसी स्कूल में करवाया गया. जिनकी सुरक्षा का दायित्व हीरा आया माँ के जिम्मे किया गया.

उस समय विशेष बात यह थी कि स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या कम थी. नया-नया स्कूल होने और बच्चों की संख्या कम होने के कारण सभी बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाता था. ऐसे में वे सभी बच्चे जो पढ़ने-लिखने के साथ-साथ अन्य गतिविधियों में आगे रहते थे, अपने आप ही शिक्षिकाओं और अन्य बच्चों की निगाह में आ जाते थे. अपनी कक्षा सम्बन्धी गतिविधियों के अलावा अन्य दूसरी गतिविधियों में भी हम बराबर सहभागिता करते, आगे रहने का प्रयास करते. इसके चलते न केवल अध्यापकों के वरन समूचे स्कूल के बच्चों के चहेते बने रहते थे. ये तो नहीं कहेंगे कि आज के बच्चों की तरह हीरो टाइप रहन-सहन रहा हो, वेशभूषा रही हो पर अघोषित हीरो तो बने ही थे. हमारी इस हीरोगीरी को हमारे प्यारे-प्यारे से दोस्त और हवा दिए रहते थे. अश्विनी, अनिरुद्ध, रॉबिन्स, मनोज, हरकिशोर, राजीव, संतोष, श्यामबाबू, सौरभ, इरफ़ान, संजय, रोहिणी, स्नेहलता, सुचित्रा, अन्नपूर्णा, रेनू, मनोरमा आदि दोस्तों में से बहुत से आज भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. कुछ इसी दुनिया में बहुत दूर-दूर हैं जो बराबर याद आते रहते हैं. कुछ तो रूठकर हमेशा को दूसरी दुनिया में चले गए, उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.

आज भी उस स्कूल के प्रति आकर्षण बना हुआ है. उस स्कूल के शिक्षक, आया माँ, साथी बराबर याद आते हैं, स्मृति में बसे हुए हैं. उस समय के कुछ लोग आज भी साथ हैं. आये दिन उनसे मुलाकात होती रहती है. उस समय को याद करते हैं तो घर-परिवार जैसी अनुभूति होती है, जो आज के स्कूलों में देखने को नहीं मिल रही है. 

Saturday, 19 September 2015

बाबा आदम के ज़माने का स्कूटर


हमारी पूरी गैंग के घर लगभग एक ही दिशा में थे. जीआईसी से छुट्टी के बाद हम सब एकसाथ ही घर वापसी करते थे. पूरे रास्ते हुल्लड़, मस्ती, शरारतें होती रहतीं. तब आज की तरह न तो बहुत ज्यादा ट्रैफिक हुआ करता था और न ही बाइक के स्टंट. साइकिलों, रिक्शों की ही आवाजाही अधिक रहती थी. इक्का-दुक्का स्कूटर और कभी-कभी कोई मोटरसाइकिल, जिन्हें हम बच्चे फटफटिया कहते थे, दिख जाया करती थीं. लेम्ब्रेटा स्कूटर अपने अजब से हावभाव के कारण आसानी से पहचाने में आता. इसके साथ ही बजाज, प्रिया, सूर्या के स्कूटर भी अपनी उपस्थिति बनाये हुए थे. इन स्कूटरों के बीच बुलेट, येज़दी और राजदूत फटफटियाँ अपनी दमदार आवाज़ के कारण दिल-दिमाग में बसी थीं. इन सबके बाद भी शहर की सड़कें खाली-खाली ही रहती थीं. इसके अलावा तब शहर के नागरिक भी हम बच्चों को सड़क पर पूरा स्पेस देते थे, अपनी शरारतों को संपन्न करने का.

निश्चित सी दिनचर्या के बीच हम मित्रों की कॉलेज से घर वापसी हो रही थी. हा-हा, ही-ही अपने निर्धारित रूप में चल रही थी. आसपास के लोग, दुकान वाले, रिक्शे वाले हम बच्चों के मजाक का निशाना बनते थे, उस दिन भी बन रहे थे. तभी हम लोगों के बगल से एक स्कूटर बिना आवाज़ के निकला. हल्का आसमानी-सफ़ेद रंग का, नई अलग सी डिजाईन का स्कूटर देख हम सब चौंक से गए. चौंकने के कई कारण थे. एक तो अभी तक के चिरपरिचित एकरंग के स्कूटरों से इतर यह स्कूटर दो रंग का था. दूसरे तेज फट-फट आवाज़ के स्कूटरों से बिलकुल अलग लगभग खामोश आवाज़ वाला स्कूटर भी अपने आपमें चौंका रहा था. तीसरे तब के स्कूटरों में पीछे लगी स्टेपनी से इतर इसमें एक तरह का खालीपन भी आश्चर्य में डाले थे. जिस धीमी रफ़्तार से वह स्कूटर बगल से निकला, उससे कई गुना तीव्र गति में ये सब आश्चर्य आँखों के सामने से घूम गए. इस आश्चर्यजनक अकबकाहट में हमारे मुँह से निकल पड़ा, निकल क्या पड़ा चिल्लाहट सी गूँज उठी देखो, बाबा आदम के ज़माने का स्कूटर. 

इसके बाद स्कूटर उतनी ही तेजी से रुका, जितनी तेजी से हमारे शब्द निकले थे. स्कूटर चलाने वाले युवा सज्जन, जिनके बारे में मालूम चला कि बड़े सेठ जी हैं, उतर कर, बड़ी ही रोब-दाब के साथ हम बच्चों को हड़काने लगे. हम सब पूरी मौज के साथ उन सेठ जी की मौज लेने लगे. बात बढ़ते-बढ़ते हाथापाई, पत्थरबाजी जैसी स्थिति तक आने की आशंका दिखाई देने लगी तो आसपास के दुकानदारों ने उनको समझाने की कोशिश की. इस कोशिश में वे पूरी हनक के साथ उस स्कूटर की कीमत बताते हुए ऐसा एहसास दिलाने लगे मानो हम लोगों ने उनके विशिष्ट स्कूटर की घनघोर बेइज्जती कर दी हो.

बहरहाल वे सज्जन खिसियाहट के साथ अपने स्कूटर में बैठे और सेल्फ बटन के द्वारा उसे स्टार्ट कर वहाँ से निकल लिए. रंग, आकार, आवाज़ से अभी तक आश्चर्य में गोते खा रहे हम बच्चों के लिए ये एक और अचम्भा था कि स्कूटर बटन से स्टार्ट होता है, झुका कर किक मारने से नहीं. ये आगे बढ़ता है तो खटर-पटर किये गियर बदले बिना. आँखों में विस्मय की चमक लिए हम बच्चों के मुंह से अबकी एकसाथ फिर वही शब्द बाबा आदम के ज़माने का स्कूटरगूँजे मगर इस बार पिछली बार के मुकाबले और जोर की आवाज़ से. 


Thursday, 17 September 2015

पारिवारिक संस्कारों से मिली प्रेरणा

घर में पढ़ाई का माहौल था. बाबा जी ने तो अंग्रेजी शासन में अपने पारिवारिक विरोध के बाद भी अपनी पढ़ाई को जारी रखा था. बाबा जी बताया करते थे कि घर में जमींदारी होने के कारण उनके बड़े भाई नहीं चाहते थे कि वे पढ़ें. उनका सोचना था कि गाँव आकर जमींदारी के कामों में उनका सहयोग करें. ऐसे में बाबा जी की पढ़ने की जिद को उनके पिताजी ने माना और पढ़ने के लिए कानपुर भेजा. बड़े बाबा जी (बाबा जी के बड़े भाई श्री भोला सिंह जी) अक्सर बाकी जरूरी सामानों को तो भेज देते मगर पैसे नहीं भिजवाते थे. 

ऐसे में खुद को आर्थिक स्थिति से उबारने के लिए बाबा जी अपने एक मित्र की ट्रांसपोर्ट कंपनी में बिठूर से उन्नाव ट्रक भी चलाया करते थे. उस समय बनवाया गया लाइसेंस बाबा जी के पास अंतिम समय तक सुरक्षित रहा, जिसे वे कभी-कभी हम लोगों को दिखाकर अपने आत्मविश्वास और अपनी कर्मठता को बताया करते थे. बहरहाल उन्होंने अपने संघर्षों के द्वारा कानून की पढ़ाई पूरी की. बाद में वे सरकारी मुलाजिम बने. उनके चारों बेटों ने भी उनकी प्रेरणा से उच्च शिक्षा प्राप्त की. हमारी दादी भी शिक्षित थीं और अम्मा जी को भी बाबा से उच्च शिक्षा ग्रहण करने की प्रेरणा मिली.

शिक्षा के प्रति यह लगाव सांस्कारिक रूप से हमारे भीतर भी विरासतन आ गया. स्कूल में अपने सभी दोस्तों के बीच पढ़ाई-लिखाई में अव्वल होने के साथ-साथ अन्य गतिविधियों में भी पर्याप्त सक्रियता के साथ आगे-आगे बने रहते थे. यद्यपि घर-परिवार में माना जाता है और खुद हमें भी इस बात का एहसास होता है कि हमारे स्वभाव में एक प्रकार का संकोचीपन, एक तरह की अंतर्मुखी भावना परिलक्षित होती है. बचपन में इसकी अधिकता होने के बाद भी स्कूल में प्रति शनिवार भोजनावकाश के बाद होने वाली बालसभा में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया जाता. कभी सञ्चालन करने, कभी भाषण देने, कभी कविता सुनाने, कभी गीत गाने आदि में बहुत उत्साह से भाग लिया जाता. इसके अलावा खेलकूद में भाग लेना, प्रातःकालीन प्रार्थना के बाद संपन्न होने वाले कुछ नियमित कार्यों में तत्पर रहना, कक्षा में मॉनिटर बनने में आगे रहना, स्कूल में होने वाले छोटे-छोटे कार्यों में छात्र-छात्राओं का नेतृत्व करना भी बखूबी होता रहता. बचपन में जैसे-जैसे संकोची भावना में कमी आती रही, अंतर्मुखी व्यक्तित्व को निखरने में कुछ सहायता मिली, वैसे-वैसे पढ़ाई के प्रति रुझान और बढ़ता गया.

उस स्कूल के बाद भी पढाई का क्रम बना रहा. बाबा जी ने पढ़ाई के महत्त्व को अपनी युवावस्था में ही जान-समझ लिया था. गाँव की बातें बताते समय वे अक्सर कहा करते थे कि तुम्हारे पिताजी और चाचा लोगों को गाँव से इसीलिए बाहर निकाला कि वे पढ़-लिख कर कुछ बन सकें. वे हम सबको बहुत छोटे से ही समझाते रहे थे कि पढ़ाई खूब करना क्योंकि यही दौलत कोई नहीं छीन सकता. वे यह भी समझाते रहते थे कि कभी भी जमीन-जायदाद के लिए लड़ने की, रंजिश लेने की आवश्यकता नहीं. पढ़ने-लिखने के बाद उससे कहीं अधिक संपत्ति अर्जित की जा सकती है. शिक्षा के प्रति उनका अनुशासनात्मक भाव ही कहा जायेगा कि पढ़ाई से कभी मुँह नहीं चुराया. शिक्षा के प्रति उनके द्वारा जगाई गई ललक ने ही हमें दो विषयों, हिन्दी साहित्य और अर्थशास्त्र में, पी-एच०डी० डिग्री प्रदान करवा दी.

Wednesday, 19 August 2015

एक दिन का स्कूल


किसी भी व्यक्ति के जीवन में जन्मने के बाद महत्त्वपूर्ण दिन होता है उसका पहले दिन स्कूल जाना. लगभग सभी के लिए पहला स्कूली दिन बहुत ही ख़ास होता है. एक जैसी होते हुए भी सबकी अलग-अलग सी कहानी रहती है. वैसे देखा जाये तो स्कूल भी अपने आपमें एक अजब सा स्थान होता है, बच्चों के लिए. किसी के लिए दहशत भरा, किसी के लिए कौतुहल भरा, किसी के लिए खेल का स्थान, किसी के लिए बोझिल सा. हमारे लिए स्कूल कभी भी दहशत भरा नहीं रहा. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक शैक्षिक संस्थान को बहुत सहजता से आत्मसात करते रहे. बहरहाल, हम भी स्कूल गए, गए क्या, भेजे गए. समय से ही स्कूल भेजे गए.

हमारा पहला स्कूली दिन बहुत ही रोचक स्थिति में गुजरा. स्कूल का नाम सही-सही तो याद नहीं पर शायद राधा कृष्ण जूनियर हाई स्कूल या फिर कुछ इसी तरह का नाम था. स्कूल घर से काफी दूर था. स्कूल में प्रवेश कैसे हुआ, किसने करवाया, कब हुआ याद नहीं. हाँ, इतना याद है कि पहले दिन स्कूल जाना हुआ एक आया माँ के साथ. स्कूल पहुँचने के कुछ समय बाद हमें स्कूल में अच्छा नहीं लगा. बंद-बंद सा माहौल, छोटे-छोटे से कमरे. आज के भव्य स्कूलों, सजावटी इमारतों से इतर साधारण सा, किसी पुराने मकान में चलता स्कूल. जब तक वे आया माँ दिखती रहीं, तब तक तो हम स्कूल में जमे रहने की कोशिश करते रहे. उनके कुछ देर बाद न दिखने की स्थिति में हमने घर जाने की जिद मचाई तो बताया गया कि आया माँ किसी काम से स्कूल से चली गईं हैं, उनके आते ही घर भिजवा दिया जायेगा. ये पता लगते ही कि आया माँ स्कूल में नहीं हैं, घर जाने की जिद और तेज हो गई. 

जिद से भी ज्यादा जिद्दी होने का स्वभाव बचपन से ही रहा है, आज भी है. शायद उसी जिद के साथ-साथ रोना, चिल्लाना बहुत ज्यादा ही रहा होगा तभी स्कूल प्रबंधन ने एक शिक्षक के साथ हमें घर वापसी की राह दिखाई. घर का पता किसी को मालूम नहीं था. आया माँ स्कूल में नहीं. हमने पूरे विश्वास के साथ कहा कि हमें घर का रास्ता पता है. बस फिर क्या था, अपने विश्वास के भरोसे एक शिक्षक हमारे साथ घर को चल दिए. हम अपने पहले ही दिन अपनी याददाश्त, अपने विश्वास के सहारे वापस घर तक लौट आये. उस स्कूल में हमारा पहला दिन, उस स्कूल का आखिरी दिन भी साबित हुआ.

आज भी अम्मा जी उस दिन को याद कर बताती हैं कि वे शिक्षक और हमारे घर वाले हैरान थे कि उस अत्यंत छोटी सी उम्र में हमें स्कूल से घर तक का रास्ता कैसे याद रहा? हैरानी आपको भी हो रही होगी मगर सच ये है कि आज भी ये प्राकृतिक शक्ति हममें विद्यमान है कि किसी रास्ते से एक बार गुजर जाएँ, किसी भी व्यक्ति से एक बार मिल लें फिर वह हमारे दिमाग में हमेशा को बस जाता है.


Wednesday, 3 June 2015

आटा गूँथने की कोशिश में बन गई रबड़ी

गर्मियों के दिन आते हैं और जब कभी हम सभी आँगन में बैठ कर एकसाथ भोजन करते हैं तो अपने बचपन का एक किस्सा याद आ जाता है. छोटे-छोटे हाथों से पहली कोशिश रोटी बनाने के पहले आटा गूँथने की. बात उन दिनों की है जब हम कक्षा आठ में या नौ में पढ़ रहे होंगे. गरमी के दिन थे और परीक्षाओं के प्रेत से भी मुक्ति मिल चुकी थी, मई या जून की बात होगी. गरमी के कारण या फिर किसी और कारण से अम्मा जी की तबियत कुछ बिगड़ सी गई. अपनी क्षमता के अनुसार उन्होंने उस दशा में भी हम तीनों भाइयों का और घर का सारा काम सम्पन्न किया. लगातार काम करते रहने और कम से कम आराम करने के कारण अम्मा की तबियत ज्यादा ही खराब हो गई.

अम्मा तो पड़ गईं बिस्तर पर और मुसीबत आ गई हम भाइयों की. खाने की समस्या, सुबह नाश्ते की दिक्कत. पड़ोसी हम लोगों को बहुत ही अच्छे मिले हुए थे इस कारण समस्या अपना भयावह स्वरूप नहीं दिखा पाती थी. बगल के घर की दीदी आकर मदद करतीं और हम तीनों भाई दौड़-दौड़ कर उनका हाथ बँटाते रहते. दो-तीन दिनों के बाद एक शाम हमने अम्मा से कहा कि आज हम आटा गूँथते हैं. अम्मा ने मना किया कि अभी तुमसे ऐसा हो नहीं पायेगा पर हमने भी ऐसा करने की ठान ली. अपने नियत समय पर दीदी को भी आना था तो यह भी पता था कि उनके आते ही हमारा यह विचार खटाई में पड़ जायेगा. हमने अपने कार्य को करने के लिए पूरा मन बना लिया था. इससे पहले कभी भी आटा गूँथा नहीं था सो मन में कुछ ज्यादा ही उत्साह था. यह भी विचार आ रहा था कि हम अम्मा का एक काम तो कर ही सकते हैं. अम्मा आँगन में चारपाई पर लेटीं थीं और हम जमीन पर आटा, परात, पानी का जग लेकर बैठ गये. अम्मा ने जितना बताया उतना आटा परात में डालकर उसमें पानी मिलाया.

अब शुरू हुई हमारी आटा कहानी, पानी डरते-डरते डाला तो कम तो होना ही था. अम्मा के निर्देश पर थोड़ा सा और पानी डालकर गूँथना शुरू किया. आटे का स्वरूप कुछ-कुछ सही आने लगा पर अभी पानी की कमी लग रही थी. अम्मा के कहने पर फिर पानी डाला और हाथ चलाने शुरू किये. अब लगा कि पानी कुछ ज्यादा हो गया है. जब पानी ज्यादा हुआ तो थोड़ा सा आटा मिला दिया. हाथ चलाये तो लगा कि आटा ज्यादा है, फिर पानी की धार.

ऐसा तीन-बार करना पड़ गया. आटा, पानी.... पानी, आटा होते-होते आटा अन्ततः गुँथ तो गया किन्तु बजाय हम चार-पाँच लोगों के कम से कम आठ-नौ लोगों के लिए काफी हो गया. अब क्या हो? याद आये फिर भले पड़ोसी. दीदी को आवाज दी, जितना आटा हम लोगों के काम आ सकता था उतना तो निकाला शेष दीदी के हवाले कर दिया. दीदी ने मुस्कुराते हुए शाबासी भी दी और अम्मा ने भी हौसला बढ़ाया. इसका परिणाम यह निकला कि अगले दो-चार दिन आटा-वृद्धि के बाद हमने आटा भली-भाँति गूँथना सीख लिया. इस सीख का सुखद फल हमें तब मिला जब हम पढ़ने के लिए ग्वालियर साइंस कॉलेज के हॉस्टल में रहे. मैस के लगातार बन्द रहने के कारण पेट भरने में इस आटा-कहानी ने बड़ी मदद की.

Wednesday, 20 May 2015

हाय रे साइकिल

जब पहली बार साइकिल चलाये तो धरती माता की गोद में जा गिरे थे. उस काण्ड के बाद साइकिल का एक काण्ड और हुआ. कुछ दिनों की मेहनत और लगन के चलते साईकिल को नियंत्रित करना सीख गए. पिताजी की बड़ी साइकिल को उस छोटे से कद में सीट पर बैठकर चलाना तो संभव नहीं था, सो जिसे आम बोलचाल की भाषा में कैंची चलाना कहते हैं, हम भी चलाने लगे. एक दिन अपने दोस्तों के बीच बैठे सभी अपनी साईकिल कलाकारियाँ बताने में लगे थे. उसी में मिलकर विचार किया कि स्कूल के पास किराये की साइकिल देने वाले से एक साईकिल ली जाये और उसका मजा लिया जाये. वो साईकिल वाला छोटे बच्चों की साईकिल किराये से देता था. उस समय वह कुछ घंटों का पच्चीस पैसे लिया करता था.

हम तीन मित्रों ने पैसे जोड़कर चवन्नी बनाई और एक लाल रंग की छोटी साईकिल लाकर रामलीला मैदान से बरगदिया तरे तक दौड़ाना शुरू किया. साईकिल की मौज-मस्ती में समय का ध्यान ही नहीं रहा. किराये के निर्धारित समय से बहुत अधिक समय हो चुका था. अब डर लगा कि यदि साईकिल जमा करने जायेंगे को वो और पैसे माँगेगा, तब पैसे कहाँ से देंगे उसे. कुछ देर के बाद छुटपन समाधान निकाला गया कि साईकिल जमा करने के बजाय कोई अपने घर ले जाये. जब साईकिल वाला घर से लेने आएगा तो घरवाले अपने आप उसे पैसे दे देंगे. राबिन्स और मनोज ने अपनी-अपनी पिटाई का डर दिखाकर साईकिल ले जाने से मना कर दिया. हम भी इसी बात से घबरा रहे थे. पिटाई के डर से हम तीनों में से कोई भी साईकिल ले जाने को तैयार न हुआ और उसे रामलीला मैदान में पाखर के पेड़ के नीचे खड़ा कर दिया.

ऐसा करके भी डर लगा कि साईकिल कोई और चुरा ले गया और साईकिल वाला घर आ गया. तब तो बहुत ज्यादा मार पड़ेगी. अभी हो सकता है कि सिर्फ डांट ही पड़े. ऐसा विचार दिमाग में आते ही हमने साईकिल उठाई और घर ले आये. राबिन्स और मनोज दूसरे मोहल्ले में रहते थे, वे लोग अपने घर चले गए. मोहल्ले के बच्चों ने भी कुछ घंटे उसका मजा लिया. बाद में पिताजी की नज़रों से बचाने के लिए उसे मोहल्ले के बच्चों की मदद से अपने घर की छत पर चढ़ा दिया. इसके बाद जैसा कि सोचा था, वही हुआ. साईकिल वाला जानकारी करते हुए घर आ गया. चूँकि सुबह से मोहल्ले के सभी लोग साईकिल चलाते हुए देख रहे थे, सो उस साईकिल वाले को घर पहुँचने में परेशानी नहीं हुई. छत से उतरवा कर उसकी साईकिल और शेष किराया उसको दिया गया. मार तो नहीं पड़ी क्योंकि सब सच-सच बता दिया था हमने. हाँ, डांट पड़ी कुछ-कुछ, साईकिल को लेकर, इसी साईकिल से गिरने के कारण लगी चोटों को लेकर. उसके बाद बस पिताजी की बड़ी साईकिल पर हाथ-पैर मारे जाते रहे. गिरते रहे, चोट खाते रहे.

Wednesday, 6 May 2015

आ गिरे धरती माता की गोद में


किसी भी व्यक्ति के लिए पहली बार कोई नया काम करना कितना कठिन होगा कह नहीं सकते किन्तु हमारे लिए पहली बार साइकिल चलाना तो ऐसा था मानो हवाई जहाज चला रहे हों. उस समय कक्षा पाँच में पढ़ा करते थे. साइकिल चलाने का शौक चढ़ा. घर में उस समय पिताजी की साइकिल थी. पिताजी चले जाते थे कचहरी और शाम को आते, तब तक हम भी अपने स्कूल से लौट आते थे. कई बार की हिम्मत भरी कोशिशों के बाद पिताजी से साइकिल चलाने की मंजूरी ले ली. 

उस समय तक हमने साफ करने की दृष्टि से या फिर अपने बड़े लोगों के साथ बाजार, स्कूल आदि जाने के समय ही साइकिल को हाथ लगाया था. अब साइकिल चलानी तो आती ही नहीं थी तो बस उसे पकड़े-पकड़े लुड़काते ही रहे. कई दिनों के बाद साइकिल पर इतना नियंत्रण बना पाये कि वह गिरे नहीं या फिर इधर-उधर झुके नहीं. एक दिन हमारे स्कूल में किसी संस्था या फिर किसी और स्कूल के द्वारा (यह ठीक से याद नहीं) एक टेस्ट का आयोजन किया गया. इस पूरे टेस्ट में हमारे सबसे ज्यादा नम्बर आये थे. हम भी बहुत खुश थे और इसी खुशी में हमने पिताजी से साइकिल चलाने की अनुमति माँग ली.

अब क्या था? कई सप्ताह हो गये थे साइकिल को खाली लुड़काते-लुड़काते, सोचा कि पिताजी भी खुश हैं हमारे रिजल्ट से, हो सकता है कि कुछ न कहें. बस आव देखा न ताव कोशिश करके चढ़ गये साइकिल पर. दो-चार पैडल ही मारे होंगे कि साइकिल एक ओर को झुकने लगी. यदि साइकिल चलानी आती होती तो चला पाते पर नहीं. अब हमारी समझ में नहीं आया कि क्या करें? न तो हैंडल छोड़ा जा रहा था और न ही पैडल चलाना रोका जा रहा था. साइकिल झुकती भी जा रही थी और गति भी पकड़ती जा रही थी. गति थोड़ी रुकती, पैडल जरा थमते, हैंडल और सँभलता उससे पहले वही हुआ जो होना था. हम साइकिल समेत धरती माता की गोद में आ गिरे. तुरन्त खड़े हुए कि कहीं किसी ने देख न लिया हो? कपड़े झाड़कर घर आये और चुपचाप साईकिल यथास्थान खड़ी कर दी. शाम को बाजार जाते समय पिताजी को उसकी कुछ बिगड़ी हालत देखकर पता चल ही गया. परिणाम में पिटाई तो नहीं हुई क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ था किन्तु साइकिल चलाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया.

देखा ऐसी रही हमारी पहली साइकिल सवारी.