Wednesday, 19 August 2015

एक दिन का स्कूल


किसी भी व्यक्ति के जीवन में जन्मने के बाद महत्त्वपूर्ण दिन होता है उसका पहले दिन स्कूल जाना. लगभग सभी के लिए पहला स्कूली दिन बहुत ही ख़ास होता है. एक जैसी होते हुए भी सबकी अलग-अलग सी कहानी रहती है. वैसे देखा जाये तो स्कूल भी अपने आपमें एक अजब सा स्थान होता है, बच्चों के लिए. किसी के लिए दहशत भरा, किसी के लिए कौतुहल भरा, किसी के लिए खेल का स्थान, किसी के लिए बोझिल सा. हमारे लिए स्कूल कभी भी दहशत भरा नहीं रहा. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक शैक्षिक संस्थान को बहुत सहजता से आत्मसात करते रहे. बहरहाल, हम भी स्कूल गए, गए क्या, भेजे गए. समय से ही स्कूल भेजे गए.

हमारा पहला स्कूली दिन बहुत ही रोचक स्थिति में गुजरा. स्कूल का नाम सही-सही तो याद नहीं पर शायद राधा कृष्ण जूनियर हाई स्कूल या फिर कुछ इसी तरह का नाम था. स्कूल घर से काफी दूर था. स्कूल में प्रवेश कैसे हुआ, किसने करवाया, कब हुआ याद नहीं. हाँ, इतना याद है कि पहले दिन स्कूल जाना हुआ एक आया माँ के साथ. स्कूल पहुँचने के कुछ समय बाद हमें स्कूल में अच्छा नहीं लगा. बंद-बंद सा माहौल, छोटे-छोटे से कमरे. आज के भव्य स्कूलों, सजावटी इमारतों से इतर साधारण सा, किसी पुराने मकान में चलता स्कूल. जब तक वे आया माँ दिखती रहीं, तब तक तो हम स्कूल में जमे रहने की कोशिश करते रहे. उनके कुछ देर बाद न दिखने की स्थिति में हमने घर जाने की जिद मचाई तो बताया गया कि आया माँ किसी काम से स्कूल से चली गईं हैं, उनके आते ही घर भिजवा दिया जायेगा. ये पता लगते ही कि आया माँ स्कूल में नहीं हैं, घर जाने की जिद और तेज हो गई. 

जिद से भी ज्यादा जिद्दी होने का स्वभाव बचपन से ही रहा है, आज भी है. शायद उसी जिद के साथ-साथ रोना, चिल्लाना बहुत ज्यादा ही रहा होगा तभी स्कूल प्रबंधन ने एक शिक्षक के साथ हमें घर वापसी की राह दिखाई. घर का पता किसी को मालूम नहीं था. आया माँ स्कूल में नहीं. हमने पूरे विश्वास के साथ कहा कि हमें घर का रास्ता पता है. बस फिर क्या था, अपने विश्वास के भरोसे एक शिक्षक हमारे साथ घर को चल दिए. हम अपने पहले ही दिन अपनी याददाश्त, अपने विश्वास के सहारे वापस घर तक लौट आये. उस स्कूल में हमारा पहला दिन, उस स्कूल का आखिरी दिन भी साबित हुआ.

आज भी अम्मा जी उस दिन को याद कर बताती हैं कि वे शिक्षक और हमारे घर वाले हैरान थे कि उस अत्यंत छोटी सी उम्र में हमें स्कूल से घर तक का रास्ता कैसे याद रहा? हैरानी आपको भी हो रही होगी मगर सच ये है कि आज भी ये प्राकृतिक शक्ति हममें विद्यमान है कि किसी रास्ते से एक बार गुजर जाएँ, किसी भी व्यक्ति से एक बार मिल लें फिर वह हमारे दिमाग में हमेशा को बस जाता है.


Wednesday, 3 June 2015

आटा गूँथने की कोशिश में बन गई रबड़ी

गर्मियों के दिन आते हैं और जब कभी हम सभी आँगन में बैठ कर एकसाथ भोजन करते हैं तो अपने बचपन का एक किस्सा याद आ जाता है. छोटे-छोटे हाथों से पहली कोशिश रोटी बनाने के पहले आटा गूँथने की. बात उन दिनों की है जब हम कक्षा आठ में या नौ में पढ़ रहे होंगे. गरमी के दिन थे और परीक्षाओं के प्रेत से भी मुक्ति मिल चुकी थी, मई या जून की बात होगी. गरमी के कारण या फिर किसी और कारण से अम्मा जी की तबियत कुछ बिगड़ सी गई. अपनी क्षमता के अनुसार उन्होंने उस दशा में भी हम तीनों भाइयों का और घर का सारा काम सम्पन्न किया. लगातार काम करते रहने और कम से कम आराम करने के कारण अम्मा की तबियत ज्यादा ही खराब हो गई.

अम्मा तो पड़ गईं बिस्तर पर और मुसीबत आ गई हम भाइयों की. खाने की समस्या, सुबह नाश्ते की दिक्कत. पड़ोसी हम लोगों को बहुत ही अच्छे मिले हुए थे इस कारण समस्या अपना भयावह स्वरूप नहीं दिखा पाती थी. बगल के घर की दीदी आकर मदद करतीं और हम तीनों भाई दौड़-दौड़ कर उनका हाथ बँटाते रहते. दो-तीन दिनों के बाद एक शाम हमने अम्मा से कहा कि आज हम आटा गूँथते हैं. अम्मा ने मना किया कि अभी तुमसे ऐसा हो नहीं पायेगा पर हमने भी ऐसा करने की ठान ली. अपने नियत समय पर दीदी को भी आना था तो यह भी पता था कि उनके आते ही हमारा यह विचार खटाई में पड़ जायेगा. हमने अपने कार्य को करने के लिए पूरा मन बना लिया था. इससे पहले कभी भी आटा गूँथा नहीं था सो मन में कुछ ज्यादा ही उत्साह था. यह भी विचार आ रहा था कि हम अम्मा का एक काम तो कर ही सकते हैं. अम्मा आँगन में चारपाई पर लेटीं थीं और हम जमीन पर आटा, परात, पानी का जग लेकर बैठ गये. अम्मा ने जितना बताया उतना आटा परात में डालकर उसमें पानी मिलाया.

अब शुरू हुई हमारी आटा कहानी, पानी डरते-डरते डाला तो कम तो होना ही था. अम्मा के निर्देश पर थोड़ा सा और पानी डालकर गूँथना शुरू किया. आटे का स्वरूप कुछ-कुछ सही आने लगा पर अभी पानी की कमी लग रही थी. अम्मा के कहने पर फिर पानी डाला और हाथ चलाने शुरू किये. अब लगा कि पानी कुछ ज्यादा हो गया है. जब पानी ज्यादा हुआ तो थोड़ा सा आटा मिला दिया. हाथ चलाये तो लगा कि आटा ज्यादा है, फिर पानी की धार.

ऐसा तीन-बार करना पड़ गया. आटा, पानी.... पानी, आटा होते-होते आटा अन्ततः गुँथ तो गया किन्तु बजाय हम चार-पाँच लोगों के कम से कम आठ-नौ लोगों के लिए काफी हो गया. अब क्या हो? याद आये फिर भले पड़ोसी. दीदी को आवाज दी, जितना आटा हम लोगों के काम आ सकता था उतना तो निकाला शेष दीदी के हवाले कर दिया. दीदी ने मुस्कुराते हुए शाबासी भी दी और अम्मा ने भी हौसला बढ़ाया. इसका परिणाम यह निकला कि अगले दो-चार दिन आटा-वृद्धि के बाद हमने आटा भली-भाँति गूँथना सीख लिया. इस सीख का सुखद फल हमें तब मिला जब हम पढ़ने के लिए ग्वालियर साइंस कॉलेज के हॉस्टल में रहे. मैस के लगातार बन्द रहने के कारण पेट भरने में इस आटा-कहानी ने बड़ी मदद की.

Wednesday, 20 May 2015

हाय रे साइकिल

जब पहली बार साइकिल चलाये तो धरती माता की गोद में जा गिरे थे. उस काण्ड के बाद साइकिल का एक काण्ड और हुआ. कुछ दिनों की मेहनत और लगन के चलते साईकिल को नियंत्रित करना सीख गए. पिताजी की बड़ी साइकिल को उस छोटे से कद में सीट पर बैठकर चलाना तो संभव नहीं था, सो जिसे आम बोलचाल की भाषा में कैंची चलाना कहते हैं, हम भी चलाने लगे. एक दिन अपने दोस्तों के बीच बैठे सभी अपनी साईकिल कलाकारियाँ बताने में लगे थे. उसी में मिलकर विचार किया कि स्कूल के पास किराये की साइकिल देने वाले से एक साईकिल ली जाये और उसका मजा लिया जाये. वो साईकिल वाला छोटे बच्चों की साईकिल किराये से देता था. उस समय वह कुछ घंटों का पच्चीस पैसे लिया करता था.

हम तीन मित्रों ने पैसे जोड़कर चवन्नी बनाई और एक लाल रंग की छोटी साईकिल लाकर रामलीला मैदान से बरगदिया तरे तक दौड़ाना शुरू किया. साईकिल की मौज-मस्ती में समय का ध्यान ही नहीं रहा. किराये के निर्धारित समय से बहुत अधिक समय हो चुका था. अब डर लगा कि यदि साईकिल जमा करने जायेंगे को वो और पैसे माँगेगा, तब पैसे कहाँ से देंगे उसे. कुछ देर के बाद छुटपन समाधान निकाला गया कि साईकिल जमा करने के बजाय कोई अपने घर ले जाये. जब साईकिल वाला घर से लेने आएगा तो घरवाले अपने आप उसे पैसे दे देंगे. राबिन्स और मनोज ने अपनी-अपनी पिटाई का डर दिखाकर साईकिल ले जाने से मना कर दिया. हम भी इसी बात से घबरा रहे थे. पिटाई के डर से हम तीनों में से कोई भी साईकिल ले जाने को तैयार न हुआ और उसे रामलीला मैदान में पाखर के पेड़ के नीचे खड़ा कर दिया.

ऐसा करके भी डर लगा कि साईकिल कोई और चुरा ले गया और साईकिल वाला घर आ गया. तब तो बहुत ज्यादा मार पड़ेगी. अभी हो सकता है कि सिर्फ डांट ही पड़े. ऐसा विचार दिमाग में आते ही हमने साईकिल उठाई और घर ले आये. राबिन्स और मनोज दूसरे मोहल्ले में रहते थे, वे लोग अपने घर चले गए. मोहल्ले के बच्चों ने भी कुछ घंटे उसका मजा लिया. बाद में पिताजी की नज़रों से बचाने के लिए उसे मोहल्ले के बच्चों की मदद से अपने घर की छत पर चढ़ा दिया. इसके बाद जैसा कि सोचा था, वही हुआ. साईकिल वाला जानकारी करते हुए घर आ गया. चूँकि सुबह से मोहल्ले के सभी लोग साईकिल चलाते हुए देख रहे थे, सो उस साईकिल वाले को घर पहुँचने में परेशानी नहीं हुई. छत से उतरवा कर उसकी साईकिल और शेष किराया उसको दिया गया. मार तो नहीं पड़ी क्योंकि सब सच-सच बता दिया था हमने. हाँ, डांट पड़ी कुछ-कुछ, साईकिल को लेकर, इसी साईकिल से गिरने के कारण लगी चोटों को लेकर. उसके बाद बस पिताजी की बड़ी साईकिल पर हाथ-पैर मारे जाते रहे. गिरते रहे, चोट खाते रहे.

Wednesday, 6 May 2015

आ गिरे धरती माता की गोद में


किसी भी व्यक्ति के लिए पहली बार कोई नया काम करना कितना कठिन होगा कह नहीं सकते किन्तु हमारे लिए पहली बार साइकिल चलाना तो ऐसा था मानो हवाई जहाज चला रहे हों. उस समय कक्षा पाँच में पढ़ा करते थे. साइकिल चलाने का शौक चढ़ा. घर में उस समय पिताजी की साइकिल थी. पिताजी चले जाते थे कचहरी और शाम को आते, तब तक हम भी अपने स्कूल से लौट आते थे. कई बार की हिम्मत भरी कोशिशों के बाद पिताजी से साइकिल चलाने की मंजूरी ले ली. 

उस समय तक हमने साफ करने की दृष्टि से या फिर अपने बड़े लोगों के साथ बाजार, स्कूल आदि जाने के समय ही साइकिल को हाथ लगाया था. अब साइकिल चलानी तो आती ही नहीं थी तो बस उसे पकड़े-पकड़े लुड़काते ही रहे. कई दिनों के बाद साइकिल पर इतना नियंत्रण बना पाये कि वह गिरे नहीं या फिर इधर-उधर झुके नहीं. एक दिन हमारे स्कूल में किसी संस्था या फिर किसी और स्कूल के द्वारा (यह ठीक से याद नहीं) एक टेस्ट का आयोजन किया गया. इस पूरे टेस्ट में हमारे सबसे ज्यादा नम्बर आये थे. हम भी बहुत खुश थे और इसी खुशी में हमने पिताजी से साइकिल चलाने की अनुमति माँग ली.

अब क्या था? कई सप्ताह हो गये थे साइकिल को खाली लुड़काते-लुड़काते, सोचा कि पिताजी भी खुश हैं हमारे रिजल्ट से, हो सकता है कि कुछ न कहें. बस आव देखा न ताव कोशिश करके चढ़ गये साइकिल पर. दो-चार पैडल ही मारे होंगे कि साइकिल एक ओर को झुकने लगी. यदि साइकिल चलानी आती होती तो चला पाते पर नहीं. अब हमारी समझ में नहीं आया कि क्या करें? न तो हैंडल छोड़ा जा रहा था और न ही पैडल चलाना रोका जा रहा था. साइकिल झुकती भी जा रही थी और गति भी पकड़ती जा रही थी. गति थोड़ी रुकती, पैडल जरा थमते, हैंडल और सँभलता उससे पहले वही हुआ जो होना था. हम साइकिल समेत धरती माता की गोद में आ गिरे. तुरन्त खड़े हुए कि कहीं किसी ने देख न लिया हो? कपड़े झाड़कर घर आये और चुपचाप साईकिल यथास्थान खड़ी कर दी. शाम को बाजार जाते समय पिताजी को उसकी कुछ बिगड़ी हालत देखकर पता चल ही गया. परिणाम में पिटाई तो नहीं हुई क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ था किन्तु साइकिल चलाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया.

देखा ऐसी रही हमारी पहली साइकिल सवारी.


Wednesday, 22 April 2015

तमन्ना है आसमां के पार जाने की

चंद पलों की अपनी विषम स्थिति में ऊपर से गुजरती ट्रेन की गति से भी तेज गति से न जाने क्या-क्या सोच लिया गया था. कुछ समय बाद कार जिस तेजी से कानपुर के लिए दौड़ रही थी, उससे कहीं अधिक तेजी से दिमाग दौड़ रहा था. कुछ होने नहीं देना है, कुछ होगा नहीं, कुछ होने नहीं देंगे की जिद सी लिए साँसों को अपने आपमें थामते चले जा रहे थे. रास्ते भर की मजबूत, विश्वासपरक स्थिति हॉस्पिटल के सामने एक पल को उस समय कमजोर लगी जब अपने सामने मुन्नी जिज्जी, जीजा जी (श्री रामकरन सिंह) को खड़े पाया. प्यास लगने की इच्छा और पानी नहीं पिलाने की हिदायत एक साथ होंठों पर प्रकट हुई. जिज्जी के प्यार भरे स्नेहिल हाथ ने जैसे हाँफती-टूटती साँसों को नया जीवन दे दिया हो. स्ट्रैचर पर लेटे उस एक पल से लेकर हमारे कृत्रिम पैर के सहारे खड़े होकर चलने तक जिज्जी-जीजा जी का स्नेहिल हाथ पल भर को भी अलग न हुआ.  

अपने अभिन्न मित्र रवि और अन्य लोगों की सलाह पर कानपुर स्थित एलिम्को में कृत्रिम पैर बनवाने को अंतिम मुहर लगी. कृत्रिम पैर बनवाने की प्रक्रिया क्या होगी? उसके सहारे कैसे चला जायेगा? चल भी पाएंगे या नहीं? और भी तमाम सवाल खुद से करते और फिर खुद से ही उनके जवाब देते. एलिम्को में कृत्रिम पैर बन जाने के बाद वहाँ ही चलने-चलाने का अभ्यास वहीं के चिकित्सकों एवं अन्य योग्य स्टाफ की देखरेख में किया जाता है. सम्बंधित व्यक्ति के चलने सम्बन्धी दोषों को पूरी तरह समाप्त करने के बाद वहाँ से जाने की अनुमति मिलती है.

एलिम्को पहुँचने के बाद लगा कि एकमात्र हम ही ऐसी स्थिति से पीड़ित नहीं हैं. चार-पाँच साल की मासूम बच्ची को वहाँ कृत्रिम पैर लगवाने के लिए आते देखा तो लगभग सत्तर वर्ष की वृद्ध महिला को चलने का अभ्यास करते पाया. कोई युवा एक कृत्रिम पैर के सहारे चल रहा है तो कोई युवती दोनों कृत्रिम पैरों से. किसी ने दुर्घटना में अपना पैर खोया है तो कोई किसी बीमारी के कारण अपंगता का शिकार हो गया. कोई अकेले आ रहा, किसी के साथ उसके वृद्ध माता-पिता, किसी के भाई, किसी का दोस्त. संसार के जितने रंग समझ सकते हैं, एलिम्को के भीतर उतने दिनों में उतनी तरह के दर्द दिखाई दिए.

कृत्रिम पैर बन जाने के बाद लगभग पच्चीस दिन तक नियमित रूप से कृत्रिम पैर द्वारा चलने का अभ्यास करने वहाँ जाना पड़ा. इसके लिए जीजा जी हमारे सारथी बने और जिज्जी उसी तरह से मातृत्व भाव से देखभाल करने में तत्पर रहीं जैसे कि हमारे बचपन में रहती थीं. कब जूस पीना है, कब कुछ खाना है, कितनी देर चलने का अभ्यास करना है, कितनी देर आराम करना है, किस तरह चलना है, सही चलना हो रहा या गलत इसका ध्यान जीजा जी-जिज्जी द्वारा ऐसे रखा जाता जैसे कोई बच्चा घुटनों चलने के बाद खड़े होकर चलना सीख रहा हो. वैसे सही में ऐसा हो भी रहा था.

कभी मैदान पर पाँच हजार, दस हजार मीटर की दूरी को हँसते-हँसते नापने वाला एथलीट एलिम्को स्थित दो स्टील बार के सहारे दर्द को पीते हुए चलने का अभ्यास कर रहा हो तो उसकी देखभाल एक बच्चे की तरह ही होगी. एलिम्को से निकलते ही सच्चे साथियों की संख्या में दो साथियों की वृद्धि हो गई. अब कृत्रिम पैर और छड़ी भी आजीवन सच्चे साथियों में शामिल हो गए थे. इन दो साथियों ने न केवल चलने में मदद की वरन दाहिने पैर के एक पल को भी बंद न होने वाले बेइन्तिहाँ दर्द से दोहरे होते शरीर को संतुलित बनाये रखने में भी अपना सहयोग दिया.

ज़िन्दगी कब क्या दिखाए, कहा नहीं जा सकता है. एक पल में देखे-बुने सपने ध्वस्त हो जाते हैं. अचानक से वह स्थिति सामने खड़ी हो जाती है, जिसके बारे में कभी सोचा भी नहीं होता है. जीवन की यही अनिश्चितता व्यक्ति को यदि डराती है तो उसे आगे बढ़ने का हौसला भी देती है. उसके भीतर जिजीविषा का संचार करती है. कल क्या होगा, अगले पल क्या होगा इसके बारे में महज पूर्वानुमान किया जा सकता है. अपने इसी पूर्वानुमान को सच करने के लिए वह निरन्तर प्रत्यनशील रहता है. जागती आँखों से सपनों को देखना और फिर उनको सच करने के लिए लगातार प्रयासरत रहना ही किसी भी व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बन जाता है. ऐसे ही अनेक सपने सच करने की कोशिश में वहाँ तमाम लोगों को देखा. हमारी भी ऐसी ही कोशिश लगातार जारी है.

Saturday, 4 April 2015

बाल मन की वो नादानी


बचपन के आरम्भिक दिन किराये के मकान में गुजरे. मकान, मकान-मालिक, मोहल्ला, मोहल्लावासी इतने अच्छे और भले थे कि जब तक हम लोग वहाँ रहे महसूस ही नहीं हुआ कि हम लोग किरायेदार हैं. वैसे भी तब हमारी समझ में थी ही नहीं मकान-मालिक और किरायेदार की अवधारणा. हमें तब भी वह मकान अपना सा लगता था, आज भी उस मकान को छोड़े तीन दशक होने को आये पर अपना सा ही लगता है. और लगे भी क्यों नहीं, एक हमने ही नहीं हमारे परिवार के बहुत से लोगों ने अपना बचपन, जवानी उसमें गुजारी है. हम भाई-बहिनों ने उसी आँगन में, उसी छत पर दौड़ना, चलना, गिरना सीखा.

हमारे मकान-मालिक अपने समय के जाने-माने अधिवक्ता थे. पैतृक संपत्ति की कोई कमी नहीं थी. गाँव भी पास में था. अच्छी खासी खेतीबाड़ी थी. उरई स्थित उनका बड़ा मकान इसका उदाहरण भी था. इसके साथ ही उनकी सम्पन्नता को इस रूप में समझा जा सकता था कि उस समय वे एम्बेसडर कार के मालिक भी हुआ करते थे. उनका अपने स्वभाव के विपरीत अदालत जाना, गाँव जाना, बाजार जाना आदि कार से ही हुआ करता था. स्वभाव के बारे में आम धारणा यह बनी थी कि वे कंजूस प्रवृत्ति के हैं. न सिर्फ उनके लिए बल्कि उनकी पत्नी के लिए भी मोहल्ले में ऐसी धारणा बनी हुई थी. उम्रदराज होने के कारण वे दोनों लोग मोहल्ले में बहुतों के चाचा-चाची थे और हम बच्चों के बाबा-दादी हुआ करते थे. हम उनको वकील बाबा कहकर पुकारते थे. 

परिवार के नाम पर उनके दो भाई और इनका भरा-पूरा परिवार उरई में ही आमने-सामने निवास करता था पर वे दोनों जन परिवार के नाम पर दो ही प्राणी थे. उनकी उम्र का तकाजा था या फिर उनकी प्रवृत्ति की वास्तविकता, एक दिन पता चला कि वकील बाबा ने अपनी सफ़ेद एम्बेसडर बेच दी. अब उनका स्थानीय यातायात का साधन साइकिल हो गया. यदाकदा उनकी कार में घूमने के कारण उनकी कार का न रहना बुरा लगा. ये भी बुरा लगा कि अब कार में घूमना नहीं हो पायेगा. बालमन, जो आर्थिक ताने-बाने को समझता न था, एक दिन हमने घर आकर अम्मा से कहा, वकील बाबा ने अपनी कार बेचकर साइकिल खरीद ली है. पिताजी से कहो कि अपनी साईकिल बेचकर कार खरीद लें. अम्मा ने उस समय हँसकर बहुत लाड़ से सिर पर हाथ फिरा दिया. बाद में जिस-जिसने हमारी बात को सुना, खूब हँसा. अम्मा के साथ-साथ बाकी लोगों के हँसने का कारण तब तो समझ नहीं आया मगर जब कार-साइकिल का अर्थ हमें खुद समझ आया तो अपने उस बालमन के समीकरण पर खुद भी हँसे बिना न रहा गया.

Monday, 23 March 2015

पहली बार रक्तदान वो भी डरते-डरते


रक्तदान करके खुद में बड़ा सुखद अनुभव होता है. आज हॉस्टल का वह समय याद आ गया जबकि पहली बार रक्तदान किया था. समय रहा होगा कोई सन 1990 का दिसम्बर महीने का या सन 1991 का जनवरी का. पहली बार रक्तदान करने जाना, मन ही मन एक डर. डर इस बात का कतई नहीं था कि रक्तदान से कोई दिक्कत हो जाएगी या फिर रक्तदान करने से किसी तरह की कमजोरी आ जाएगी. इसके ठीक उलट डर लग रहा था अपनी पहचान सामने आ जाने का. भय था खुद को पहचान लिए जाने का. डर था परिजनों को मालूम चलने पर पड़ने वाली डांट की सम्भावना का.

घर से बाहर ग्वालियर में स्नातक की पढ़ाई हॉस्टल में रहकर कर रहे थे. ग्वालियर में चाचा, मामा रह रहे थे. ऐसे में लगा कि यदि समाचारों में निकल आया तो कहीं डांट न पड़े. असल में हम लोगों को प्रोत्साहित करने को बताया गया था कि जो लोग रक्तदान करेंगे उनका नाम, फोटो अख़बार में निकलेगा. उस समय रक्तदान को लेकर जागरूकता आज की तरह नहीं थी. उस समय ऐसा लगता था जैसे रक्तदान करने के बाद महीनों की दिक्कत हो जाएगी. न जाने कितनी कमजोरी आ जाएगी. हमको ऐसी किसी भ्रान्ति की समस्या नहीं थी. थोड़ा बहुत पढ़ रखा था, थोड़ा बहुत समझ लिया था. इतना समझ चुके थे कि समय-समय पर, नियमित अन्तराल पर रक्तदान करने से शरीर में रक्तकणों, प्लाज्मा आदि के बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है. रक्त की रवानी, शुद्धता बढ़ जाती है. शरीर में ताकत, स्फूर्ति आ जाती है. आज की तरह रक्तदान शिविरों का आयोजन तब नहीं हुआ करता था. तब शिक्षकों, चिकित्सकों आदि की तरफ से भी बहुत ज्यादा कुछ बताया-समझाया नहीं जाता था. तकनीकी भरा दौर उस समय ऐसा नहीं था कि जानकारी सहजता से हर हाथ को मिल जाए.

बहरहाल दिमाग में कोई समस्या नहीं थी और मन भी बना लिया था, सो जयारोग्य हॉस्पिटल में संचालित शिविर में पहुँचे. वहाँ आवश्यक कार्यवाही हेतु जानकारी माँगी गई तो नाम, पता, उम्र, कॉलेज, क्लास आदि सबकुछ गलत भरवा दिया. गनीमत रही कि हमसे परिचय-पत्र नहीं माँगा गया. शरीर दुबला-पतला था किन्तु उनके अपेक्षित वजन को पार कर लिया. अपने पहली बार रक्तदान में एक दिक्कत वजन को लेकर भी लग रही थी. बाकी सब बातें दुरुस्त पायी गईं और हमने जीवन में पहली बार रक्तदान किया. हमें खुद को छोड़कर बाकी सबकुछ फर्जी ही था सो वहाँ से अपना कर्तव्य निर्वहन करते ही जल्दी से भागे कि कहीं कोई परिचित का न मिल जाये. जिस काम के लिए गए थे, वो हो गया. आंतरिक ख़ुशी महसूस हुई. साथ ही संतोष इसका हुआ कि किसी को पता भी नहीं चला. उस दिन उस बात से और भी संतोष मिला कि मीडिया के लोग वहाँ नहीं थे. उसी दिन नियमित रूप से वर्ष में दो-तीन बार रक्तदान करने का निश्चय कर लिया, जो आज तक बना हुआ है. इस निश्चय को तब और बल मिला जबकि खबर पढ़ने को मिली कि विश्वस्तरीय एथलीट अपनी किसी प्रतिस्पर्द्धा में जाने के कुछ घंटे पहले अपना ही रक्त निकलवा कर पुनः चढ़वा लेते हैं. ऐसा करने से उनके शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का संचार उनमें सक्रियता भर देता है.

वर्ष 1991 से अभी तक मात्र दो वर्ष 2005 और 2006 ऐसे निकले जबकि हम अपनी शारीरिक दिक्कत के चलते रक्तदान नहीं कर सके. आश्चर्य की एक और बात आपको बताएँ कि हमने अपनी मूल पहचान के साथ पहली बार सन 1996 में रक्तदान किया था जबकि हम परास्नातक की शिक्षा पूरी कर चुके थे. एक बार रक्तदान शिविर में पंजीकरण फॉर्म भरवाते समय झाँसी से आई टीम के सदस्य ने रक्तदाता की जानकारी भरने वाले फॉर्म को भरते समय पूछा कि कितनी बार रक्तदान कर चुके हैं? हमने उसे इंकार की मुद्रा दिखाई तो उसने संख्या भरना आवश्यक बताया. उसके ऐसा कहते ही हमने कहा कि यदि ऐसा है तो संख्या का अनुमान आप लगा लो, हम सन 1991 से लगातार रक्तदान कर रहे हैं. हमारे ऐसा कहते ही उसने कहा क्या सौ बार? उसके इस वाक्य पर हमने मुस्कुराकर इतना ही कहा ऐसा न कहिये, बहुतों को समस्या हो जाएगी यहाँ. ऐसा जवाब सुनकर उसने मुस्कुराकर हमारी तरफ देखा और फॉर्म में अपेक्षित जगह कोई संख्या भर कर फॉर्म हमारे हस्ताक्षर के लिए सामने सरका दिया. हमने भी सिर्फ हस्ताक्षर करने पर ध्यान दिया और आगे बढ़ गए.

संख्या पर दिमाग जब इतने सालों में नहीं दौड़ाया तो यहाँ क्या दौड़ाना? दरअसल संख्याबल की मारामारी बहुत देखने को मिल रही है विगत कुछ समय से. पता नहीं कैसे याद रह जाती है गिनती? कुछ तो ऐसे भी मिले जिन्होंने शायद ही कभी रक्तदान किया हो पर वे प्रशासनिक संबंधों के चलते सर्वाधिक रक्तदान का इनाम तक हासिल कर चुके हैं. हाँ, एक बात अवश्य है कि ऐसे किसी कैम्प में हम रक्तदान करने से बचते हैं. इसके पीछे हमारा मानना है कि एक बार रक्तदान आपको कम से कम तीन माह के लिए प्रतिबंधित कर देता है. ऐसे में किसी जरूरतमंद को आवश्यकता पड़ने पर मजबूर होने के सिवाय कुछ हाथ नहीं रह जाता.

फ़िलहाल तो अपनी रक्तदान करने की संख्या याद भी नहीं और न ही कोई मंशा है याद रखने की. इसके पीछे हमारा मानना है कि यदि दान किया जा रहा है तो गिनती करके उसके महत्त्व को कम नहीं करना चाहिए. वैसे भी हमारे लिए गिनती याद करना इसलिए भी उचित नहीं क्योंकि हम अपनी गिनती का पुराना हिसाब खुद अपने ही ऊपर खर्च कर चुके हैं, सन 2005 में.