Friday, 19 September 2014

प्रिंट के साथ-साथ इंटरनेट पर भी लेखन आरम्भ

पहली बार की घटनाओं का एक मीठा सा एहसास सभी को हो यही सोच कर एक ब्लॉग प्रारम्भ किया था. अब चूँकि बात ब्लॉग की हो रही है तो सोचा कि क्यों न अपने पहली बार ब्लॉग पर आने के बारे में आप लोगों से बात की जाये. घर पर इंटरनेट कनेक्शन लिए लगभग पाँच माह होने को आ गये थे. अपने काम की कुछ साइट पर घूमने के साथ साथ ऐसी साइट भी देखा करते थे जिन पर अपने लेख, कविता, कहानी आदि को भेज कर प्रकाशित करवा सकें. 

किसी भी लेखक के लिए छपास रोग बहुत ही विकट रोग है. हमारे ख्याल से वे दिन तो हवा हो गये जब लोग स्वान्तः सुखाय के लिए लिखा करते थे. अब तो छपास रोग के कारण लिखना पड़ता है. यही छपास रोग हममें भी था पर शायद इसकी बहुत हद तक पूर्ति इस रूप में हो चुकी थी कि माँ सरस्वती और बड़ों के आशीर्वाद से उस समय से ही छपना शुरू हो गये थे जब हमें बच्चा कहा जाता था. उम्र रही होगी कोई नौ-दस वर्ष की. तबसे कागज पर तो छपते रहे. अब घर में इंटरनेट हो और लेखन भी होता हो तो छपास का कीड़ा दूसरे रूप में कुलबुलाया. बहुत खोजबीन की पर समझ नहीं आया कि इंटरनेट पर इस रोग का निदान कैसे हो? खोजी प्रवृति ने हिन्दी खोज के दौरान यह तो दिखाया कि बहुत से लोग हिन्दी में अपने मन का विषय लिखते दिख रहे हैं पर कैसे यह समझ से परे था?

एक दिन टीवी पर एक कार्यक्रम आ रहा था जिस पर चर्चा हो रही थी ब्लॉग से सम्बंधित. बस दिमाग ने क्लिक से इस शब्द को पकड़ा. ब्लॉग की बातें सुनी जो ब्लॉग बनाने को लेकर तो नहीं पर किसी सेलीब्रिटी को लेकर हो रहीं थीं. इससे पहले अमिताभ बच्चन के ब्लॉग की बातें सुनते रहते थे सो एक दिन बिग अड्डा पर जाकर पंजीकरण करवा दिया मगर कुछ पल्ले न पड़ा था. ब्लॉग की बात सुनते ही तुरन्त कम्प्यूटर ऑन किया, गूगल पर जाकर सर्च किया Create Blog. अब एक दो हों तो समझ में भी आये, वहाँ तो ढेरों साइट. न समझ आये कि इस वेबसाइट पर बनाना है, न समझ में आये कि उस वेबसाइट पर बनाना है. दिमाग पर जोर डाल कर देखा तो बहुत सी साइट के एड्रेस पर या तो ब्लॉगपोस्ट लिखा मिला या फिर वर्डप्रैस. बस हिम्मत करके ब्लॉगर पर गये और ब्लाग बना डाला. इसके बाद वर्डप्रेस पर भी जाकर एक ब्लॉग बना डाला. नाम भी बड़ा जबरदस्त रखा रायटोक्रेटकुमारेन्द्र. ब्लॉग बनाने के बाद वर्डप्रेस पर कम लिखना हुआ. ब्लॉगर पर खूब लिखा गया, खूब सारे ब्लॉग बना कर लिखा गया. 

अब दोनों जगह ब्लाग बन गये पर पोस्ट कहीं नहीं किया. दोनों जगह जाकर देखा पर हिम्मत नहीं हुई कुछ भी पोस्ट करने की. सोचा कहीं पोस्ट करने के बाद कोई पंजीकरण की कोई शर्त न हो? डर लगा कि कहीं इसका कोई भुगतान न करना पड़े? ऐसा बहुत होता है, किसी स्टार के निशान के नीचे छिपी हुई स्थिति में. इस सम्बन्ध में और जानकारी के लिए अपने एक मित्र को फोन किया, अपने भाई को फोन किया. पूरी तरह से आश्वस्ति के बाद हमने अपनी पहली पोस्ट लिखी. अब यह भी समस्या थी कि इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ेंगे कैसे? फिर सोचा कि ये समस्या बाद की है, पहले कुछ लिख लिया जाये. तो बैठ गए लिखने, जो दिमाग में आया, अपनी पहली ब्लॉग पोस्ट के रूप में. पहली पोस्ट जो लिखी, वो यहाँ साथ में दी गई है, आप भी जरूर पढ़ें.

दलित विमर्श को समझने की जरूरत है

साहित्य में समाज की तरह दलित विमर्श को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है. देखा जाए तो दलित विमर्श को अभी भी सही अर्थों में समझा नहीं गया है. दलित विमर्श के नाम पर कुछ भी लिख देना विमर्श नहीं है. साहित्यकार को ये विचार करना होगा की उसके द्वारा लिखा गया सारा समाज देखता है. दलित साहित्यकार दलित विमर्श को स्वानुभूती सहानुभूति के नाम देकर विमर्श की वास्तविक धार को मोथरा कर रहे हैं. अपने समाज का मसीहा मानने वाले महात्मा बुद्ध को क्या वे स्वानुभूती या समनुभुती अथवा सहानुभूति के द्वारा अपना रहे हैं? महात्मा बुद्ध तो एक राजपरिवार के सदस्य थे उनहोंने न तो दुःख देखा था न ही किसी तरह का कष्ट सहा था फ़िर दलितों के लिए निकली उनकी आह को दलित अपना क्यों मानते हैं? दलित विमर्श के बारे में यदि गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो यह अपनी धार खो देगा.

Sunday, 10 August 2014

कुछ सच्ची कुछ झूठी के बहाने जुड़िए हमसे


आत्मकथा लेखन शुरू किया जा चुका है. शीर्षक कुछ सच्ची कुछ झूठी के साथ. संभव हो कि आप लोगों को शीर्षक देखकर हैरानी हुई हो. शीर्षक निर्धारण के बाद बहुत लोगों से इस सम्बन्ध में चर्चा होती रही, सोशल मीडिया के द्वारा भी इसके बारे में लोगों को जानकारी होती रही. कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसने इस शीर्षक पर आश्चर्य व्यक्त न किया हो. होना भी चाहिए था क्योंकि एक आमधारणा है कि आत्मकथा में सबकुछ सच ही होता है. उसमें झूठ का कोई स्थान नहीं होता है. ऐसे में कुछ सच्ची तो समझ आता है मगर कुछ झूठी से आशय स्पष्ट नहीं होता है. चूँकि आप सब हमारी इस कहानी के द्वारा हमसे किसी न किसी रूप में जुड़ चुके हैं, ऐसे में हमारा दायित्व भी बनता है कि आपको बहुत ज्यादा हैरान-परेशान न करवाते हुए शीर्षक के कुछ झूठी के बारे में बता दें.

पहली बात तो यहाँ यह स्पष्ट कर दें कि हमने अपनी इस कहानी के लिए अपने आरम्भिक चालीस वर्षों के जीवनकाल (1973-2013) का ही चयन किया है. ऐसा किसी कारण विशेष से नहीं बस कुछ सच्ची कुछ झूठी को विस्तार से रोकने के लिए ऐसा किया गया है. यद्यपि इन चालीस वर्षों में ही अनुभव की इतनी विराट यात्रा की जा चुकी है कि संस्मरणों, स्मृतियों का एक विस्तृत खजाना हमारे पास सुरक्षित है. यह अनुभव निश्चित ही हमारी अपनी थाती है मगर ऐसा अनुभव किया है कि सामाजिक जीवन से जुड़े लोगों का जीवन उनका निजी अथवा व्यक्तिगत नहीं रह जाता है. उसे भी उनके कार्य-व्यवहार की तरह सामाजिक होना पड़ता है. ऐसा होना भी चाहिए, तभी किसी सामाजिक व्यक्ति के कहने और करने के बीच किसी तरह का विरोधाभास दिखाई नहीं देता है.

सामाजिक जीवन से आये, मिले अनुभवों के अपने लाभ हैं तो अपनी हानियाँ भी हैं. उनके अपने खतरे भी हैं. यहाँ हमने तो आत्मकथा लिखने के बहाने कई तरह के खतरे उठाने का मन बना लिया है मगर हमें यहीं रुक कर सोचना पड़ेगा कि क्या वे लोग खतरा उठाने की मानसिकता बना पाए हैं अथवा खतरा उठा पाएंगे जिनका जिक्र इसमें होने वाला है? यही वह बिंदु है जिसने सोचने को मजबूर किया कि अपने अनुभवों की थाती में से किसी के जीवन का एक छोटा सा पल भी यदि सामने लाया जा रहा है तो क्या यह उचित होगा कि अपनी कहानी कहने भर के लिए किसी दूसरे के जीवन में उथल-पुथल मचा दी जाये?

आत्मकथा लिखने के पहले यहीं रुककर विचार किया कि यदि सत्य को छिपाया जाता है अथवा उस पर झूठ का आवरण ओढ़ाया जाता है तो फिर आत्मकथा में सत्यता के साथ खिलवाड़ हो जायेगा. ऐसे में दोनों स्थितियों के बीच सामंजस्य निकालते हुए एक ऐसे आवरण को तैयार किया गया जो झूठ नहीं है बस सत्य को किसी और तरीके से प्रस्तुत करता है. एक ऐसा आवरण जो सामने वाले को प्रदर्शित करने के साथ-साथ उसका आभूषण भी बनता है. बस, हमारे अनुभवों में शामिल अनेकानेक लोगों को उनकी उथल-पुथल से बचाने के लिए यही आवरण कुछ झूठी के रूप में प्रयोग किया गया है. इस तरह कुछ सच्ची कुछ झूठी की रचना-प्रक्रिया आरम्भ हुई.

अब कुछ थोड़ी सी बातें, विशुद्ध आपसे ही, अपने सन्दर्भ में, कुछ सच्ची कुछ झूठी के सन्दर्भ में. हमारी अपनी इस कहानी में कोई दर्शन नहीं है, कोई आदर्श नहीं है, कोई प्रवचन नहीं है. अपनी कहानी आपसे बाँटने के पीछे न तो अपने आपको किसी आदर्शात्मक रूप से प्रस्तुत करना है और न ही यह अभिलाषा है कि इसमें किसी भी तरह का आदर्श तलाशा जाये. यह विशुद्ध रूप से हमारे अपने जीवन की वह कहानी है जो हमने बचपन से लेकर अभी तक देखी और महसूस की है. जीवन के सुखद और दुखद पक्षों को देखा है. स्याह और उजले पक्षों को भोगा है. कुछ सच्ची कुछ झूठी उनकी ही एक कथात्मक प्रस्तुति है.

इसके साथ ही एक बात विशेष रूप से गौर करने वाली यह है कि अभी तक किसी परिदृश्य में हम उस स्थिति में स्थापित नहीं हो सके हैं जहाँ से हमारा जीवन आदर्श माना, समझा जाये. ऐसा कुछ भी विशेष नहीं किया है, जिससे प्रेरित होकर लोग हमारा अनुसरण कर सकें. अपने पूर्वजों के बने-बनाये रास्तों, आदर्शों पर चलते हुए स्वयं अपने लिए ही रास्तों, आदर्शों को खोजने की प्रक्रिया में लगे हुए हैं. इसलिए आप लोग यदि किसी आदर्शात्मक स्थिति, किसी अनुसरण करने वाली स्थिति के विचारार्थ हमारी कहानी को पढ़ने-सुनने की कोशिश करेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी. हाँ, विशुद्ध मनोरंजक रूप में जिन्दगी को एक कहानी समझ, हमारी कहानी में उतरने का प्रयास करेंगे तो आनंद अवश्य ही महसूस करेंगे. यहाँ जीवन से सम्बंधित हमारा अपना ऐसा कुछ है जो समय-समय पर हमें गुदगुदाता है, हँसाता है, रुलाता है, परेशान करता है, दुखी करता है. इसी सबमें से खूब सारी गुदगुदी, ढेर सारी हँसी, बेलौस मस्ती, थोड़े से आँसू, जरा सी परेशानी, हल्का सा दुःख आपके साथ बाँटने आ गए हैं.

Tuesday, 5 August 2014

इंतजार उस एक फोन का


कुछ बातें व्यक्ति के जीवन में बहुत प्रभावी न होने के बाद भी प्रभावी बनकर रहती हैं. ऐसी बहुत सी बातें होती हैं जिनका सम्बंधित व्यक्ति के अलावा किसी और के लिए कोई महत्त्व नहीं होता है. हमसे ही सम्बंधित बहुत सी बातों का किसी और के लिए हो सकता है कोई महत्त्व न हो मगर प्रत्येक बात का अपना एक सन्दर्भ होता है, उसका अपना एक प्रभाव होता है. यही बातें ही हैं जो व्यक्ति के अंतर्संबंधों का, सह-संबंधों का आकलन करती हुई उनका विश्लेषण करती हैं. ऐसी ही बातों में अगस्त का पहला रविवार, जिसे फ्रेंडशिप डे के नाम से जाना जाता है, हमारे साथ जुड़ा हुआ है. कोई विशेष बात न होने के बाद भी एक अलग तरह की सुगंध का एहसास उस दिन होता है.

उस दिन रविवार था, अगस्त का पहला रविवार. उन दिनों मोबाइल सपने में भी सोचा नहीं गया था. बेसिक फोन की घंटी घनघनाई. रविवार होने के कारण सभी लोग घर में ही थे. घनघनाती फोन की घंटी रुकी और उधर से हमको पुकारते हुए अम्मा बोली, किसी लड़की का फोन है. 

दिमाग की सारी घंटियाँ घनघना गईं. हैलो के साथ हैप्पी फ्रेंडशिप डे की खनकती आवाज़ कानों में घुल गई. कोई विशेष दिन मनाये जाने का न चलन था और अपनी आदत के अनुसार हम ऐसे किसी दिन के प्रति सजग-सचेत नहीं थे, सचेत-सजग तो आज भी नहीं रहते हैं. सेम टू यू कहने के बाद कुछ और आगे कहते उससे पहले ही दूसरी तरफ से उलाहना आकर कानों में गिरा, आप पहले फोन करके विश नहीं कर सकते थे? 

उलाहना देने का अंदाज़ भी इतना गज़ब कि अपनी आदत के अनुसार ठहाका मारते हुए हमने इतना कहा, दोस्ती में ऐसी औपचारिकता हम नहीं करते. 

दो-तीन मिनट के बाद जब फोन रखा तो समझ नहीं आया कि इस तरह की हलकी-फुलकी मधुर नोंक-झोंक के बाद बात समाप्त हुई या बात शुरू हुई? समय गुजरता रहा. वक्त बदलता रहा. स्थितियाँ-परिस्थितियाँ बदलती रहीं मगर बात ख़तम होकर जहाँ शुरू हुई थी वो न बदली. अगस्त आता रहा. अगस्त का पहला रविवार आता रहा. हर बार की तरह फोन उधर से ही आता रहा. हर बार विश करने के बाद वही मधुर उलाहना दिया जाता रहा, आप पहले फोन करके विश नहीं कर सकते थे? हमारा वो ठहाकेदार जवाब वैसे ही निकलता रहा.

सबकुछ बदलने के बाद भी लगता है जैसे कुछ न बदला. दोस्ती की नोंक-झोंक न बदली. दोस्ती का वो बेलौस अंदाज़ न बदला. अगस्त बार-बार आता रहा. अगस्त में पहला रविवार बार-बार आता रहा. एक आदत सी हो गई अगस्त के पहले रविवार को फोन आने की, एक उलाहना दिए जाने की. आने वाले न जाने कितने वर्षों तक अगस्त आता रहेगा, अगस्त का पहला रविवार भी आता रहेगा, उसका उलाहना भरा फोन भी आता रहेगा.


Wednesday, 30 July 2014

खौफ भरी छोटी सी यात्रा

हमको अपने छोटे भाई हर्षेन्द्र के साथ आगरा से एक परीक्षा देकर कानपुर आना था. रेलवे स्टेशन पहुँचकर पता लगा कि उस समय कानपुर के लिए कोई ट्रेन नहीं है. यदि आगरा से टुंडला पहुँच कर वहाँ से आसानी से कानपुर के लिए ट्रेन मिल जायेगी. आगरा से टुंडला तक बस से आने के बाद टुंडला स्टेशन पर जैसे ही पहुँचे पता लगा कि एक ट्रेन आ रही है. पैसेंजर ट्रेन थी और इसके बाद दो-तीन घंटे कोई ट्रेन भी नहीं थी, कानपुर पहुँचना अत्यावश्यक था. इस कारण से पैसेंजर ट्रेन में बैठने के अलावा कोई और रास्ता भी नहीं था. 

टिकट खिड़की पर जबरदस्त भीड़ होने के चलते टिकट मिलता संभव न लगा. पहले सोचा कि बिना टिकट ही चढ़ जायें पर कभी बिना टिकट यात्रा न करने के कारण से हिम्मत नहीं हो रही थी. सोचा-विचारी में समय न गँवा कर हमने तुरन्त सामने दरवाजे पर खड़े एक टिकट चेकर से अपनी समस्या बताई. 

उस ने बिना कोई तवज्जो दिये पूरी लापरवाही से कहा कि बैठ जाओ, पैसेंजर में कोई नहीं पकड़ता.

भाईसाहब कोई दिक्कत तो नहीं होगी? हमने शंका दूर करनी चाही.

उसको लगा कि कोई अनाड़ी हैं जो पहली बार बिना टिकट यात्रा करने की हिम्मत जुटा रहे हैं. सो उसने थोड़ा सा ध्यान हम लोगों की ओर दिया और बताया कि वैसे बिना टिकट जाने में कोई समस्या नहीं फिर भी यदि टिकट लेना है तो दो स्टेशन के बाद यह गाड़ी थोड़ी देर तक रुकती है, वहाँ से ले लेना.

उनके इतना कहते है जैसे हमें कोई संजीवनी मिल गई हो. हम दोनों भाई तुरन्त लपके क्योंकि गाड़ी भी रेंगने लगी थी. डिब्बे के अन्दर पहुँचते ही बैठ भी गये, सीट भी मिल गई पर इसके बाद हमारी जो हालत हुई कि पूछिए मत. आने-जाने वाला हर आदमी लगे कि टिकट चेक करने वाला आ गया. कभी इस तरफ देखें, कभी उस तरफ देखें. लगभग 45 मिनट की यात्रा के बाद वह स्टेशन आया जहाँ से टिकट लिया जा सकता था. तुरत-फुरत में दो टिकट लिए गए. अब सुकून मिला और कानपुर तक आराम से आये. आज भी छोटी सी मगर बिना टिकट यात्रा याद है.

Monday, 14 July 2014

बचपन के वे सुहाने दिन

बचपन की ढेर सारी यादें आज भी साथ हैं. बचपन के दोस्त याद हैं. बचपन की शरारतें याद हैं. बचपन में मिलता प्यार-दुलार याद है. कुछ भी तो ऐसा नहीं जिसे भूला जाये और आखिर क्यों भूला जाये? यही एक ऐसी सम्पदा है जो ताउम्र साथ रहती है और कोई चाह कर भी न इसे भूल पाता है, न ही भुला पाता है. मासूम सा, निश्छल सा, प्यारा सा, शरारती सा, हँसता सा, उड़ता सा बचपन. बहुत कुछ ऐसा है जो हमें आज भी याद है. स्वतः की गई अनुभूति के कारण याद है. इसके साथ ही बहुत कुछ ऐसा है जो घर-परिवार के सदस्यों के द्वारा सुनते रहने के कारण याद है.

याद रखना, याद रखे रहना भी बड़ी गज़ब स्थिति है. क्या याद रखते-रखते क्या भूल जाएँ कह नहीं सकते. व्यक्ति अपने जीवन भर बहुत कुछ याद रखता है, बहुत कुछ भूलता भी है. इस याद रखने और भूलने के बीच वह अपने बचपन को कतई नहीं भूल पाता. इसी कारण वह बच्चों के साथ घुल-मिल कर अपने बचपन के दिनों को याद करने लगता है. हम भी इससे बच नहीं सके हैं. आज भी अपना वो पुराना घर, वो बरगद का विशाल पेड़, जिसके मैदान में हम बच्चे खूब धमाचौकड़ी मचाया करते थे, वो स्कूल, वे साथी और न जाने कितनी-कितनी कहानियाँ इधर लेखन के दौरान उभरती रहीं, मन में घुमड़ती रहीं. हर बार कोई कहानी याद आती, हर बार कलम रुककर फिर उसी बचपन में ले जाती. नवरात्रि का रात्रि जागरण, टेसू-झिंझिया का विवाह, मामुलिया का लोकोत्सव, रामलीला का आयोजन, निर्मित मकानों के बालू के ढेरों पर कूदना, पत्थर मार-मार कर बेर, इमली का गिराना, होली का हुल्लड़, दीपावली का धमाल जाने कितना-कितना है जो बार-बार बचपन में घसीट ले जाता है.

बचपन के वे दिन बहुत शिद्दत से याद आते हैं जबकि सभी चाचा-चाची, सभी भाई-बहिन होली, दीपावली उरई इकठ्ठा हुआ करते थे. उस हंगामी मस्ती में न दिन समझ आता था, न रात. न सुबह, न शाम. न खाने की सुध, न सोने की चिंता. बस चौबीस घंटे मस्ती ही मस्ती. ऐसा नहीं कि इसमें सिर्फ हम भाई-बहिन ही शामिल रहते थे. चाचा लोग भी एकदम से बच्चे बने हम सबके साथ उसी बेलौस अंदाज में मस्त रहते थे. घर का खुला हुआ लॉन, पास में बनी पुलिस चौकी का या फिर कॉलेज का ग्राउंड हम सबकी मस्ती का गवाह बनता. कभी पुराने कपड़ों पर साईकिल के ट्यूब को काटकर बनाये छल्लों के सहारे गेंद बनाई जाती तो कभी पॉलीथीन को जला-जलाकर.
घर के बाहर की मस्ती से अलग घर के अन्दर की धमाचौकड़ी भी कुछ अलग तरह की होती. कभी सैनिक बनकर देश की रक्षा की जाती, कभी अधिकारी बन कर जनता के काम किये जाते, कभी पुलिस वाला बनकर चोरियां रोकी जाती तो कभी शिक्षक बनकर पढ़ाने का काम किया जाता, कभी वकील-जज बनकर मुक़दमे निपटाए जाते. पलंग, चारपाई, कुर्सियाँ कार में बदल जाया करते थे. चम्मचें, कटोरियाँ, कंघे आदि घरेलू सामान सम्बंधित खेल के साजो-सामान के रूप में इस्तेमाल किये जाने लगते. 

होली के मस्ती भरे माहौल में क्या घर के लोग, क्या सड़क चलते लोग सभी को रंग लगाया जाता, सभी के साथ उसकी उम्र के हिसाब से अभिवादन करते हुए मिल जाता. दीपावली आती तो देर रात पटाखे चलाने के बाद अलस्सुबह उठकर अधचले, चलने से बचे पटाखों को छत पर बीनने का काम शुरू हो जाता. लालजी की चाट, छुटकन की मटर, संपत की दूध की बोतल, लालमन की जलेबी, स्टेशन के रसगुल्ले, सड़क किनारे लगे पानी के बताशे आदि कितनी-कितनी संख्या में हम बच्चों के पेट के अन्दर चले जाते, कुछ अंदाजा न होता.

आज भी त्योहारों पर अथवा किसी अन्य अवसरों पर सभी का मिलना, इकठ्ठा होना होता है मगर अब वो धमाल नहीं होता. मस्ती-हुड़दंग आज भी होता है मगर कतिपय सामाजिक स्थितियों ने सबकुछ एक निश्चित दायरे में समेट कर रख दिया है. बदलते दौर के इस सामाजिक परिवेश में आज भी वही परिवेश लगातार याद आता है. एक हमें ही नहीं घर में सबके इकठ्ठा होने पर न सही व्यावहारिक रूप में मगर बातचीत में वही माहौल फिर जन्म ले लेता है. हँसी-मजाक, यादें, स्मृतियाँ, पुराने किससे फिर सबको उन्हीं दिनों में सैर कराने निकल पड़ते हैं. भूल कर भी वे दिन फिर-फिर याद आ जाते हैं. इसी याद रखने, भूल जाने, रह-रह कर याद आने का नाम है कुछ सच्ची कुछ झूठी.


Wednesday, 25 June 2014

बच्चों के स्नेह, सम्मान ने ले लिया पहला ऑटोग्राफ


बचपन में लगभग नौ-दस वर्ष की उम्र में ही घरवालों, पड़ोसियों, स्कूल वालों, दोस्तों आदि की तरफ से खूब जमकर प्रशंसा पाई थी, जबकि उस समय हमारी स्व-रचित एक कविता दैनिक भास्कर, स्वतंत्र भारत में बच्चों वाले पृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी. उस कविता प्रकाशन पर सभी ने खूब प्रशंसा की थी. हमें खूब सारा आशीर्वाद भी मिला था. उसके बाद पढ़ाई के बोझ ने लेखन क्षमता को पूरी तरह से पनपने न दिया. इस बीच पेंटिंग, स्केचिंग, निर्देशन, फोटोग्राफी आदि सहित अन्य और भी शौक गले लग गए.

स्कूल से निकल कर कॉलेज पहुँचने के क्रम में लिखना लगातार हुआ, भले ही कम रहा हो परन्तु प्रकाशन नहीं हो सका. स्नातक उपाधि के बाद लेखन की तरफ पुनः मुड़ना हुआ. पत्रिकाओं को रचनाएँ भेजने के साथ ही समाचार-पत्रों में पत्र कॉलम में नियमित रूप से लिखना शुरू किया. पत्रिकाओं में सीमित प्रकाशन स्थान मिलता किन्तु समाचार-पत्रों ने प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया. अमर उजाला ने तो हमारे बहुत सारे पत्रों का प्रकाशन ख़ास ख़त कॉलम के अंतर्गत भी किया. इन पत्रों को पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित भी करवाया जा चुका है.  

अमर उजाला के साथ-साथ दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, आज, राष्ट्रीय सहारा आदि में भी नियमित प्रकाशन होने लगा. जनपद जालौन में हमको हमारी पारिवारिक पृष्ठभूमि से इतर हमारे दो कार्यों ने हमारी पहचान की आधारभूमि निर्मित की. इनमें एक तो पत्र कॉलम में नियमित पत्रों का प्रकाशन और दूसरा कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम का तब आरम्भ करना जबकि इस दिशा में किसी भी तरह का कार्य जनपद में नहीं हो रहा था. फिलहाल तो अपनी मूल बात से न भटकते हुए आपको अपनी उस ख़ुशी की तरफ ले चलते हैं जो हमें हमारे प्रशंसकों से प्राप्त हुई.

नेहरू युवा केंद्र की ओर से राष्ट्रीय पुनर्निर्माण वाहिनी परियोजना जिले में संचालित हो रही थी. परियोजना समन्वयक प्रवीण सिंह जादौन छोटे भाई के मित्र हैं और हमारे लिए भी छोटे भाई के समान ही हैं. सामाजिक कार्यों से जुड़े होने के कारण हमको भी परियोजना की एक समिति का सदस्य मनोनीत किया गया था. सौ स्वयंसेवकों का दस दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम उरई से लगभग सात-आठ किमी दूर बोहदपुरा गाँव के राजकीय प्रशिक्षण संस्थान में चल रहा था. वहां के कार्यक्रम के सञ्चालन, स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित करने की, उनको विविध विषयों पर जानकारी देने जिम्मेवारी हमें भी दी गई थी.

शिविर के दस दिनों तक स्वयंसेवकों के साथ रहने से उनके साथ आत्मीय सम्बन्ध बन गए थे. दस दिनों तक सञ्चालन करने, कई विषयों पर जानकारी देने के कारण बहुत से स्वयंसेवक काफी करीब से जुड़ गए थे. आये दिन किसी न किसी विषय पर वे अलग से मिलकर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान चाहते. वो शिविर का अंतिम दिन था. परम्परानुसार समापन समारोह हुआ. समापन समारोह के बाद लोगों को अपने-अपने क्षेत्र में कार्य करने जाना था. स्पष्ट था कि अब सभी का इस तरह से एकसाथ मिलना शायद ही कभी-कभी हो पाए. स्वयंसेवक, अधिकारीजन, अतिथिजन एक-दूसरे से मिलते हुए चलने की तैयारी में थे. 

हम भी सबसे मिलते हुए चलने की तैयारी किये थे. उसी समय चार-पाँच लड़के-लड़कियों का एक समूह आया. लड़कियों ने सम्मानपूर्वक नमस्कार किया और लड़कों ने एकदम से पैर छू लिए. इस तरह के कृत्य का अंदाजा न होने के कारण हम खुद एकदम से हड़बड़ा गए. कुछ बातचीत हो पाती इससे पहले ही उन सभी बच्चों ने अपनी-अपनी डायरी हमारे सामने करके ऑटोग्राफ की माँग कर दी. हमने पहले तो हँसकर उन बच्चों को टालने की कोशिश की. उनको समझाया कि हम ऐसे व्यक्ति या व्यक्तित्त्व नहीं कि हमारे ऑटोग्राफ लिए जाएँ. उन बच्चों ने बड़ी ही शालीनता से, सम्मान से हमारे लेखन, समाचार-पत्रों में हमारे पत्र प्रकाशन का हवाला देते हुए उनसे बहुत कुछ सीखने की बात कही. विगत दस दिनों में हमारे सञ्चालन, विषयों पर दिए गए प्रस्तुतिकरण से प्रभावित होना बताया.

अपने प्रति उनका स्नेह, सम्मान देखकर मन बहुत प्रसन्न हुआ. बच्चों में उत्साह दिख रहा था हमारा ऑटोग्राफ लेते समय और उन सभी बच्चों को अपने जीवन का पहला ऑटोग्राफ देते समय हमें भी खुद में रोमांच हो रहा था. अपने आपको किसी विशिष्ट व्यक्तित्व से कम न समझते हुए लगा कि अभी तक पत्र कॉलम में जो भी लिखा-छपा वो निरर्थक नहीं गया. विचारों की शक्ति सामाजिक परिवर्तन करती है, मानसिक परिवर्तन करती है. हमारे विचारों से उन बच्चों ने क्या सीखा ये तो वही जानें मगर अपने लिए उनके मन में सम्मान की भावना देखकर सुखद अनुभूति हुई.


Tuesday, 10 June 2014

कुछ सच्ची कुछ झूठी के आवरण में


अपने बारे में कुछ लिखने का, अपने बारे में सबको बताने का विचार बहुत दिनों से या कहें कि बहुत वर्षों से मन में था पर अभी इस उम्र में ही अपने बारे में कुछ लिखने-कहने के बारे में सोचा नहीं था. कई-कई जीवनियों, कई-कई संस्मरणों, कई-कई महानुभावों को पढ़ने के दौरान मन कहता था कि कभी लोग हमारे बारे में भी ऐसे ही पढ़ेंगे. हमारे बारे में भी ऐसे ही चर्चा करेंगे. यह भी सोचा करते थे कि जब हम अपनी कहानी लिखेंगे तो उसको किस शीर्षक के भीतर समेटेंगे? जब हमारी बात किसी पुस्तक के रूप में सामने आएगी तो लोगों के सामने उसे किस नाम से लायेंगे? जितनी बड़ी समस्या अपने बारे में लिखने-बताने की थी, उससे कहीं बड़ी समस्या पुस्तक के शीर्षक को लेकर थी. 

समस्या का समाधान कोई और कर भी नहीं सकता था क्योंकि समस्या किसी के सामने प्रकट भी नहीं की गई थी. यार-दोस्तों के बीच रखी भी नहीं थी. ऐसे में हमारी ही समस्या और हमारा ही समाधान जैसी बात होने के कारण उसका समाधान हमें ही निकालना था. समस्या का समाधान यह निकला कि जब आत्मकथा लिखी जाएगी, जब अपनी कहानी कही जाएगी तो उसका नामकरण उसी समय कर दिया जायेगा. अपनी कहानी लिखना भविष्य का प्रोजेक्ट था, सो उसका नामकरण भी भविष्य के गर्भ में डाल दिया गया. 

समय बदलता रहा, परिस्थितियाँ बदलती रहीं, उम्र बदलती रही, हम बदलते रहे और इस अदला-बदला में विचार भी बदलते रहे. उम्र के तीन दशकों की यात्रा के बाद सोचा कि अब कुछ लिखा जाये पर लगा कि अभी कुछ ज्यादा ही जल्दी हो जाएगी. इतनी जल्दी भी लोगों का सिर नहीं खाना चाहिए. लोगों को पकाना नहीं चाहिए. इसके बाद एक दशक के इंतजार के बाद इस पड़ाव पर आकर सोचा कि अब न देर है और न ही जल्दी. अब कुछ लिखा जा सकता है. लोगों को अपने बारे में बताया जा सकता है. 

क्या लिखा जाये? क्या बताया जाये? क्यों बताया जाये? कैसे बताया जाये? कितना बताया जाये? इस तरह के न जाने कितने प्रश्नों ने अपना सिर उठाया. एक पल में चार दशकों की यात्रा आँखों के सामने से घूम गई. बहुत कुछ सुखद, बहुत कुछ दुखद, कितना अपनापन, कितना बेगानापन, कितनी सफलताएँ, कितनी असफलताएँ, कितने आरोप, कितने प्रत्यारोप, कितनों का मिलना, कितनों का बिछड़ना, क्या-क्या सीखना, क्या-क्या सिखाना, क्या-क्या बनाना, क्या-क्या बिगाड़ना, क्या-क्या हासिल हुआ, क्या-क्या खो दिया, कितना लाभ, कितनी हानि आदि का हिसाब-किताब दिमागी कैल्क्यूलेटर पर होने लगा.

क्यों? क्या? कैसे? किसको? आदि ने डराया भी. बहुत से नकाब उतरने का संकट दिखाई दिया. खुद अपने को भी कमजोर देखा. अपनों की टूटन दिखाई देने लगी. विचार काँपे. हाथ काँपे. कलम ने चलने को मना किया पर वर्षों की मनोच्छा को पूरा करना था, सो हिम्मत बांधी. विचारों को थाम विचारों को ही टटोला. शीर्षक के बहाने एक आवरण खोज निकाला और फिर कुछ सच्ची कुछ झूठी कहने बैठ गए.